Friday, December 11, 2009

आज नये लुटेरों को चुनने का पर्व है

अव्‍वल तो अपन ज्‍यादा बुद्धिजीवी चोचलों में फंसने के बजाय और क्‍यों हर किसी को वोट का इस्‍तेमाल करना चाहिए की बहस में पड़ने से इतर वोट डाल आते हैं....हमारे कुछ घनिष्‍ठों के बहिष्‍कारपूर्ण रवैये के बावजूद ...अब कोई वोट दे या ना दे हमारी बला से, हमने ठेका ना ले रखा दूसरों को जागरूक करने का...पिछले लोकसभा चुनाव में एक नया फैशन चला कि मतदान केंद्र जाकर अपनी पहचान प्रदर्शित कर हस्‍ताक्षर करो, उंगली पर स्‍याही लगवाओ और बिना वोट डाले ही आ जाओ...सो हम फैशन के मारों ने वो भी करके देख लिया....बाद में अखबारों से पता भी लगा कि फलां जगह इतनी डंपिंग हुई फलां जगह फलां के लोगों ने कब्‍जा कर दूसरों को वोट ना डालने दिया....सब कुछ हुआ और हम बड़े प्रसन्‍न कि हां भाई कम से कम हम जैसे जागरूक लोगों ने तो बहुत हटके और कुछ नया टाइप का काम किया लोकतंतर के वास्‍ते...अब ऐसे लोगों की संख्‍या यदि बढ़ेगी तो जरूर कुछ बात बनेगी...सरकार की भी बात कुछ खोपड़ी में आयेगी....पर उक्‍त चुनाव में जीत का अंतर डेढ़ लाख देखकर और हम जैसे फैशनबाजों की संख्‍या दहाई से तिहाई ना होते देखकर अपना उत्‍साह भी ठंडा....

अब आज से पिछले वाले नगर-निकाय के चुनावों का हाल...वार्ड में स्‍थानीय मंत्रीजी दिनभर अपनी लालबत्‍ती लगाकर घूमते रहे...सैकड़ों वोटरों को पहली बार ज्ञान हुआ कि हम इस वार्ड में आज के लिए मतदाता नहीं रहे...हो सकता है कल कोई दूसरे चुनाव हों तो दुबारा हमारा नाम आ जाए...फिर वोटों की गिनती का भी अपना अलग ही तौरतरीका है....मतगणना केंद्र से खबर निकली कि फलां जीत गए...पता लगा कि जीत की घोषणा गलती से हो गई...दुबारा गिनती में मंत्रीजी के चहेते विजयी होकर निकले

बहरहाल आज अपने लिए चैन है, बर्षों बाद लगा कि सुबह से शाम तक बिजली मिलना किसे कहते हैं इसलिए ठाठ से ब्‍लॉगिंग कर रहे हैं...और छुट्टी का आनंद ले रहे हैं...अभी थोड़ा काम से बाहर निकले तो पता लगा कि शहर में जगह-जगह मुख्‍य मार्गों के आसपास भी जो मतदान केंद्र बने हैं उसके आसपास पत्‍थर रखकर, हाथठेले अड़ाकर सारा यातायात बंद....सारे बाजार बंद...सारे यातायात के साधन बंद....भाई शांतिपूर्ण मतदान जो कराना है...फिर मतदाता भले ही शांतिपूर्ण ढंग से वोट डालने को तैयार हो पर हमें तो शांति की सही परिभाषा ही लागू करनी है...भले हमें कहीं जाना है और हम इंतजार कर रहे हैं कि कब शाम हो और सब कुछ सामान्‍य हो...इतने में एक सज्‍जन मिले मुहल्‍ले में पूछने लगे कि वोट नहीं डाले क्‍या...हमने कहा डालकर भी क्‍या होगा...सो हमें अकल बताने लगे कि वोट तो जरूर देना चाहिए....एक झन्‍नाटेदार झापड़ देने की विकट इच्‍छा होते हुए भी उसे जब्‍त करके हमने टरकाने के लिए कहा कि शाम तक डाल ही आयेंगे...वरना और जब्‍त करना पड़ता....वैसे भी हिंदुस्‍तान के सबसे बुरे लोकतंत्र जिसे लुभावने शब्‍दों में सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम से पुकारा जाता है, में आपकी जब्‍त करने की गजब की ताकत होनी चाहिए...तभी आप यहां जिंदा रह सकते हैं..

मुझे तो लगता है पाश की जो कविता है 'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' उसे केवल यहीं लिखा जा सकता था।

Wednesday, July 29, 2009

आईये पाक में बढ़ते आतंक के लिए माफी मांगे

मुंबई हमलों के बाद जब दिल्‍ली में बैठे गीदड़ों में भभकी देने का कंपटीशन चला तब ऐसा लगा कि वाकई कुछ हो लेगा. अब तो अमेरिका भी साथ है और सबूत भी और उधर यूएन को भी समझाके पाक की कर देंगे ऐसी-तैसी. पर हाय रे किस्‍मत ! ...क्‍या कहें जैसी किस्‍मत हमारे पडौसियों ने पाई उसका जवाब नहीं. गीदड़ कुर्सी पे यहां बैठते हैं और पूंछ उनके निजाम के सामने हिलाते हैं. वाह जी वाह....इसे ही तो कहते हैं अंधे के हाथ बटेर नहीं बतख लगना....वरना कोई बेवकूफ थोड़े ही खामखा मिस्र के बियावान में जाकर अपनी नाक काटकर पेश करेगा, ऐसी बहादुरी तो कोई महान स्‍कॉलर ही कर सकता है जिसकी विद्वत्‍ता और मैनेजमेंट की चर्चा लोग-बाग ऐसे बयान करते हैं जैसे उसने गद्दी पर बैठकर इस मुल्‍क पर अहसान कर दिया हो....दाल बेशक नब्‍बे रुपये हो फर्क नहीं पड़ता, भई दाल महंगी है तो पनीर खाओ, रोटी महंगी है तो ब्रेड खाओ...खामखा यहां का अवाम चुपचाप ऐसे विद्वान से शासित होने के बजाय हल्‍ला मचाता है.
मेरा अनुरोध उक्‍त विद्वान महोदय से सिर्फ इतना है कि यदि उन्‍हें हमारे पडौसियों के दुखदर्द की इतनी ही चिंता है तो क्‍यों नहीं उनके यहां आतंकवाद,दुखदर्द, गरीबी, भुखमरी मिटाने को एक पैकेज की घोषणा कर देते....भुखमरी दूर हो ना हो, कम से कम कुछ समय के लिए वे उससे असलहा वगैरह खरीदकर खुद की भारतीयों से रक्षा ही कर लेंगे आखिर हमने उनकी नाक में दम जो कर रखा है....मुझे पक्‍का विश्‍वास है कि आदरणीय उक्‍त मसले पर अगली कैबिनेट और पार्टी मीटिंग में जरूर विचार करेंगे और यदि उनके पास वाकई एक इंसान का दिल है तो एक सताये हुए राष्‍ट्र से क्षमा मांगने तक में वे पीछे नहीं हटेंगे.

ऐसी महान आत्‍मा को मेरा कोटि-कोटि नमन !

Monday, June 15, 2009

ये बेजुबान भी हमारे अपने हैं

कुछ समय पहले मेरे पास एक एसएमएस आया जिसे यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं-

HUMBLE REQUEST:
Plz keep a bowl in ur balcony or window so that BIRDS can drink water as it too hot this summer for all lives...plz fwd it to all..

बचपन में मैं हमेशा पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम कर देता था...पर कुछ समय से थोड़ा आलसी हो गया हूं...पर मेरी एक रिश्‍ते की बहन ने एसएमएस करके फिर से मुझे इसके लिए उकसाया और अपना आलस त्‍यागकर छत पर गया तो दो पुराने मटके रखे हुए थे। उनके ऊपरी हिस्‍से को काटकर मैंने उनमें पानी भरा और अलग-अलग जगहों पर रख दिया।
इस एसएमएस को यहां रखने का यही उद्देश्‍य सभी को इसके लिए उकसाना है कि अपने घरों की छतों, बालकनियों, छायादार स्‍थानों पर गर्मियों में मिट्टी के बर्तन या पुराने मटकों इत्‍यादि में पानी भरकर रखें जिससे बेचारे प्‍यासे पक्षी अपना कंठ तर कर सकें।
वैसे भी हमारे भारत में प्‍यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्‍य माना गया है तो क्‍यों ना मुफ्त में पुण्‍य भी बटोर लें :-) ।

Sunday, June 14, 2009

जरूरतें कम करके भी आप पर्यावरण को बचा सकते हैं


सबसे पहले तो अपन स्‍पष्‍ट कर दें कि अपन यहां पूंजीवाद, साम्‍यवाद, समाजवाद या और किसी वाद या विचारधारा पर बहस की शुरूआत नहीं कर रहे। फिलहाल जो दुनियाभर में हल्‍ला मचा हुआ है ग्‍लोबल वार्मिंग का और उसके लिए जो प्रयास हो रहे हैं वो कितने मायने रखते हैं जब तक हम एक व्‍यापक परिवर्तन या ठीक से कहें तो जीवनशैली में परिवर्तन को एक मुद्दा नहीं बनाते। मेरा मानना है कि आज के इंसान की जीवनशैली संबंधी जरूरतें इसी तरह बढ़ती रहें और साथ ही हम ग्‍लोबल वार्मिंग व पर्यावरण की ढपली भी बजाते रहें तो उससे कोई सुधार आ सकेगा ऐसा लगता तो नहीं।
आज की मुक्‍त बाजार व्‍यवस्‍था और पूंजीवाद के घनघोर समर्थक चाहते हैं कि लोगों की जरूरतें बढ़ें, लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा उपभोक्‍ता सामान खरीदें, उन्‍हें किसी भी तरह ललचाकर बाजार तक खींचा जाए और यही एक बढ़ती और तरक्‍की करती हुई अर्थव्‍यवस्‍था का मूलमंत्र है। इसी विषय पर मैंने काफी समय पहले एक पोस्‍ट लिखी थी (पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) जिसमें मैंने मुद्दा उठाया था कि किस प्रकार पूंजीवादी व्‍यवस्‍था लोगों की जरूरतें बढ़ाने और बेवजह के सामानों का निर्माण कर उन्‍हें बहुत ही आवश्‍यक वस्‍तु के रूप में प्रचारित कर बाजार में खपाने की है। पूंजीवाद के समर्थकों का कहना है कि इस व्‍यवस्‍था के अलावा फिलहाल कोई विकल्‍प नहीं है और ये व्‍यवस्‍था लोगों का जीवन-स्‍तर सुधारने और उपभोक्‍ता वस्‍‍तुओं तक उनकी पहुंच सुलभ बनाने के लिए कारगर साबित हुई है परंतु धरती पर दिनोंदिन बढ़ रहा कचरा, ई-कचरा, संसाधनों का अंधाधुंध शोषण, कटते जंगलों के लिए क्‍या यही व्‍यवस्‍था उत्‍तरदायी नहीं है। केवल और केवल यही कारण है कि मुझे इस व्‍यवस्‍था से चिढ़ है चूंकि पर्यावरण के लिए बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍थाएं और बढ़ते बाजार एक अभिशाप बन चुके हैं और ध्‍यान देने वाली बात ये है कि इन बाजारों में आम इंसान की जरूरत की चीजों के अलावे जो अधिकांश चीजें खपाई जा रही हैं उनकी वास्‍तविकता में कोई जरूरत व औचित्‍य नहीं है पर बाजार बढ़ाना है, मुनाफा बढ़ाना है अर्थव्‍यवस्‍था बढ़ानी है और सबसे बड़ी बात ये है कि दूसरे देशों से आज के युग में प्रतिद्वंदिता भी करनी है और मुनाफे की इस रेस के लिए चाहे कितनी भी कुर्बानी देनी पड़े सब जायज है।
लोगों को मेरी बात कष्‍ट पहुंचा सकती है...कुछ लोग ये भी कहेंगे कि पैसा जो मैं अपनी मेहनत से कमाता हूं उसे खर्च करने की मुझे पूरी आजादी है पर क्‍या एक इंसान होने के नाते आपकी जो जिम्‍मेदारी है उसके लिए क्‍या आपने सोचा है।
हालांकि इसमें लोगों का दोष भी नहीं है....उन्‍हें जो सिखाया जाता है वे वैसा ही करते हैं। आजकल के बच्‍चे जो पैदा होते ही टीवी देखकर बड़े हो रहे हैं वे बड़े होकर इन सब बातों को कैसे समझ पायेंगे। आज की बाजार व्‍यवस्‍था एक ऐसा समाज तैयार कर रही है जिसमें उसे केवल उपभोक्‍ता ही नहीं बनाने हैं बल्कि उनकी सोच, उनकी आदतों का भी निर्माण करना है और ऐसे ही लोगों की जरूरत है इस सिस्‍टम को।
महात्‍मा गांधी का वो प्रसिद्ध कथन तो सबने पढ़ा होगा कि ये धरती लोगों की जरूरतें पूरा करने में सक्षम है पर उसके लालच को नहीं। पर फिर भी बाजार व्‍यवस्‍था के समर्थक कुतर्क करने से बाज नहीं आने वाले जबकि बाजार व्‍यवस्‍था और बढ़ता हुआ लालच एक दूसरे के पर्यायवाची हैं और दुनिया को लगातार लालची बनाते जाने के दुष्‍परिणाम हम अभी से देख ही रहे हैं।
ब्राजील में अमेजन के घने जंगल जिन्‍हें धरती के फेफड़े भी कहा जाता है उन फेंफड़ों में भी यही लालची बाजार व्‍यवस्‍था कैंसर की तरह प्रवेश कर चुकी है। पर फिर भी लगता है कि पर्यावरण सरकारों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है सभी मुद्दों का केंद्र है बढ़ती हुई अर्थव्‍यवस्‍था जिससे उद्योगपति भी खुश, उपभोक्‍ता भी खुश और टैक्‍स से अपनी जेबें भरने वाली सरकारें भी खुश।
एक साधारण समझ की बात है एक तरफ तो हम अपनी जरूरतों को बढ़ाने में लगे हुए हैं दूसरी तरफ पर्यावरण की भी बात कर लेते हैं। ये दोनों ही बातें घोर विरोधाभाषी हैं....जैसे हम पानी बचाने की बात करते हैं पर पैसा होने पर घर में खुद का स्‍वीमिंग पूल बनवाने से भी नहीं कतराते। जबकि जितनी भी लग्‍जरी सुविधाएं हैं उन्‍हीं की कीमत हम चुका रहे हैं।

खैर इस तरह की उपदेशात्‍मक बातें करके भी हम क्‍या उखाड़ लेंगे। आईये आज हम मिलकर संकल्‍प लेते हैं कि बाजार से केवल उन्‍हीं सामानों को खरीदेंगे जिनकी हमें जरूरत है। केवल विज्ञापनों से प्रभावित होकर, पड़ौसियों व रिश्‍तेदारों से प्रभावित होकर हम बाजार का रुख नहीं करेंगे। यही एक मंत्र है जिसको हमें आत्‍मसात करना होगा यदि वाकई हम पर्यावरण के प्रति सचेत हैं।

Sunday, June 07, 2009

सभी हिंदी ब्‍लॉगर्स से पर्यावरण के हित में एक अनुरोध


परसों विश्‍व पर्यावरण दिवस था, इस प्रकार के औप‍चारिक दिवस चूंकि दिखावा बन कर रह गये हैं सो लोगों ने इस ओर ध्‍यान देना ही बंद कर दिया है हालांकि पहले भी इनको कितनी तवज्‍जो दी जाती थी यह सभी जानते ही हैं...बस चंद बड़े अखबारों में सरकारी विज्ञापन और संपादकीय लिखने भर की रस्‍म-अदायगी करके दिवस मना लिया जाता है पर फिलहाल अपन इस तरह की बातों का रोना-धोना मचाकर खुद को बुद्धिजीवी साबित नहीं करना चाहते सो कुछ ठोस बात करते हैं।

काफी दिनों से सोच रहा था कि ऐसे कौन से उपाय हैं जो हम अपने पर्यावरण को बचाने और इस धरती को लाखों-सालों तक जीवित बनाये रखने के लिए अपना सकते हैं। वैसे जहां बिगड़ते पर्यावरण के बावजूद लोगों को गैरजिम्‍मेदाना हरकतें करते देखता हूं तो खून खौल उठता है परंतु फिर भी हमारे आसपास अक्‍सर ऐसे सज्‍जन लोग मिल ही जाते हैं जो अपने पर्यावरण के लिए वाकई ईमानदारीपूर्ण प्रयास कर रहे हैं पर मुझे लगता है कि ऐसे एकल प्रयासों के साथ-साथ सामूहिक प्रयासों की भी आवश्‍यकता है और मेरा मानना है कि हमारा हिंदी ब्‍लॉगर्स का जो इतना बड़ा समुदाय है वह साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ संकल्‍प ले और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करे तो लाखों-करोंड़ों नहीं तो कुछ हजार लोगों का ये कदम बहुत छोटा ही सही कुछ तो परिवर्तन ला ही सकता है। वैसे काबिले-गौर बात ये भी है कि ज्‍यादातर हिंदी ब्‍लॉगर इस बारे में काफी सजग हैं और अपने स्‍तर पर प्रयास करते भी रहते हैं। काफी समय पहले परिचर्चा नामक फोरम पर(जो कि आजकल बंद पड़ा हुआ है) बहुत से ब्‍लॉगर्स ने अपने प्रयासों और आइडियाज को शेयर किया था वे वाकई काबिले-तारीफ थे जैसे संजय बेंगाणीजी महानगर में रहते हुए भी अपने अधिकर कामों के लिए सायकल का प्रयोग करते हैं, बहुत से लोग पॉलीथीन की जगह कपड़े के थैले प्रयोग कर रहे हैं, पानी का भी बहुत किफायत से इस्‍तेमाल करने वाले लोग हैं।
मेरा मानना है कि हम सभी लोग जो भी प्रयास कर रहे है उन्‍हें एक-दूसरे से साझा करें, कुछ तुम चलो कुछ हम चलें की तर्ज पर और जो भी इसके लिए नया किया जा सकता है करें, नये नये उपाय एक-दूसरे को सुझायें-अपनायें। साथ ही अपने परिवार और आसपास में भी यथासंभव जो किया जा सकता है उसकी शुरुआत करें ।

फिलहाल तो मेरी सभी ब्‍लॉगर बंधुओं से अपील है कि वे अपने-अपने चिट्ठे पर खुद के द्वारा पर्यावरण के लिए किये जा रहे प्रयासों से दूसरों को अवगत करायें हालांकि कुछ लोगों को ये खुद मियां मिट्ठू बनना लग सकता है फिर भी प्‍लीज ऐसा करें क्‍योंकि जब हम अपने आइडियाज दूसरों से शेयर करेंगे तो ही तो हम दूसरों को कुछ बता पायेंगे और उनसे कुछ नया सीख पायेंगे।

फिलहाल तो मैं खुद के कुछ प्रयासों के बारे में यहां लिख रहा हूं आप सब से भी अपील है कि अपने-अपने चिट्ठे पर ऐसे ही प्रयासों के बारे में लिखें जिससे दूसरे भी पढ़कर उन्‍हें अपना सकें।-

1- सबसे पहले बात बिजली की, अपने घर में जिन बिजली के उपकरणों जैसे पंखा, टीवी, ट्यूबलाइट आदि का प्रयोग नहीं हो रहा है उनको बंद करना

2- बल्‍ब की जगह सीएफएल प्रयोग करना

3- पॉलीथीन का प्रयोग यथासंभव कम करना और जहां उसके बिना काम चल सकता हो वहां उसका प्रयोग ना करना।

4- जितना संभव हो पैदल चलना, सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग करना। पैदल चलना इसलिए भी मुफीद है कि मेरा शहर छोटा है।

5- एक तरफ से प्रिंट किये हुए फालतू कागजों, पैम्‍पलेट आदि को कचरे में नहीं फेंकना बल्कि उनकी दूसरी तरफ लिखने के लिए प्रयोग में लेना।

6- पानी का जितना कम प्रयोग हो सके करना और फालतू पानी को पौधों-गमलों में डालना।

7- कॉस्‍मेटिक्‍स का प्रयोग बिलकुल नहीं करना क्‍योंक‍ि ऐसी अनुपयोगी चीजें केवल कचरे को बढ़ावा देती हैं जो बायोडिग्रेडेबल नहीं हैं साथ ही उनमें क्‍लोरो-फ्लोरो कार्बन होते हैं जो विशेष रूप से खतरनाक हैं।


हालांकि सूची बहुत छोटी है पर हौसले बुलंद हैं....इंशाल्‍लाह ये सूची आपके मार्गदर्शन से बढ़े और हमारे सामूहिक प्रयासों को नेट पर ही सही दुनिया देखे।
फिलहाल तो अपन यहीं से शुरूआत करते हैं....बाकी धीरे-धीरे जब कारवां चल पड़ेगा तो और भी मुसाफिर आ जाएंगे काफिले में... साथ ही आप सबसे एक छोटी सी गुजारिश और है कि अपने आस-पास और कहीं भी पर्यावरण के लिए काम कर रहे लोगों के छोटे-छोटे प्रयासों को भी अपने चिट्ठे पर प्रकाशित कर दूसरों को भी उनके बारे में बताएं..वस्‍तुत: यही लोग जो छोटे-छोटे प्रयास कर रहे हैं हमारे हीरो हैं और हमें इनके प्रयासों से खुद भी प्रेरणा लेकर दूसरों को भी उनके बारे में बताना चाहिए क्‍योंकि आलोचनाएं और दूसरों पर दोषारोपण तो बहुत हो चुका अब समय है खुद कुछ कर दिखाने का और सकारात्‍मक सोचने का.....वो गायत्री परिवारवाले कहते हैं ना कि हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।