Thursday, January 22, 2015

आईये कुछ बेस्टसेलर पढ़ें

वैसे तो किताबें पढ़ना बहुत लंबे समय से छूटा हुआ सा था.... हालाँकि एक अधिवक्ता होने के नाते तो हमेशा किताबों से घिरे ही रहना है पर फिलहाल मैं बात कर रहा हूँ अपने विषय से इतर पुस्तकों के बारे में

पिछले कुछ दिनों में जरूर कुछ पढ़ा खासकर दो - तीन विदेशी लेखकों की किताबों का हिन्दी अनुवाद पढ़ा.... आजकल एक बात अच्छी हो गई है कि मूलरूप से दूसरी भाषाओं में लिखी गई किताबों के हिन्दी अनुवाद बहुत ही अच्छे हैं....लगता ही नहीं कि किताब मूलतः हिन्दी में नहीं लिखी गई... विदेशी बेस्टसेलर और 'हाईली रिकमेंड' कही जाने वाली किताबों के हिन्दी अनुवाद भी खूब बिक रहे हैं आजकल... भारतीय अँग्रेज़ी लेखन के भी हिन्दी संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं पर मैंने कभी पढ़े नहीं....

वे दो तीन पुस्तकें भी इस कारण पढ़ डालीं कि इस बहाने कुछ नया पढ़ने को मिलेगा और जानने को मिलेगा कि इन बेस्टसेलर्स में होता क्या है....सबसे बड़ी बात कि ऐसे लेखकों की एक विशेषता होती है मेरी समझ मे... वो एक छोटी और साधारण बात को इतना अच्छे तरीके से... अलग अलग उदाहरणों से प्रस्तुत करके उसे इतना रोचक बना देते हैं कि पाठक के दिमाग में वह बात जम जाए..... और पढ़ने वाले को लगे कि वाकई लेखक ने कमाल की किताब लिख डाली है.... हालाँकि ऐसी किताबों की मार्केटिंग बहुत ही जबरदस्त होती है... इनका प्रचार इस प्रकार से किया जाता है कि यह वो पुस्तक है जो आपके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है... जीवन में सफल होने के लिये इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए.. कुछ इस तरह से इनके बारे में बताया जाता है....

हालाँकि कुछ लोगों से बातें करने पर लगा कि उनके लिये ये किताबें ज्यादा महत्व की नहीं हैं.... क्योंकि इनमें वही सब कहा गया है जो हम पहले से जानते हैं.... पर इतना कह देने भर से इन किताबों को खारिज करना भी मैं जल्दबाजी ही मानूँगा...

हजार साल पहले किसी किसी किताब में कोई बात कह दी गई हो और अब उस बात को दुबारा से कह देना भले ही लोगों को मौलिक ना लगे... पर हममें से कितने हैं जो हज़ार साल पहले की पुस्तक को खोजेंगे.... भले ही हमने उसके बारे में सुन रखा हो... जो चीज सामने है उसे तो पढ़ ही डालें

खैर अपनी अपनी सोच है लोगों की.... यह भी सही है कि सबसे ज्यादा बिकना सबसे अच्छे होने की कसौटी नहीं है पर इन लिखने वालों की एक विशेषता तो है कि वे पाठक को ध्यान में रखकर लिखते हैं और भाषा सहज पठनीय होती है ... जबकि हिन्दी किताबें लिखने वालों का एक बड़ा तबक़ा कतई पाठकों को ध्यान में नहीं रखता लिखते समय... और ना ही एक आम पाठक के समझ में आ जाने वाली भषा से उसे सरोकार है.... और यही तबक़ा सबसे ज्यादा कुंठित है जब किताबें उनकी बिकती नहीं...

पर हिन्दी में नयी पीढ़ी के लेखक वाकई इन विदेशी लेखकों के बेस्टसेलर लेखन से अच्छा लिखने की क्षमता रखते हैं... और लगातार अच्छा लिख भी रहे हैं.... मार्केटिंग भी ठीकठाक हो ही रही है.... मुझे तो पूरा भरोसा है कि आगामी समय में बुकस्टॉल्स से लेकर ईकॉमर्स साइटों तक बेस्टसेलर्स भारतीय ही होंगे... वैसे भारतीय और हिन्दी साहित्य के लिये सबसे अच्छी बात यह है कि किताबों की उपलब्धता आज फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसी साइटों के जरिये सब जगह हो गई है.....

पाठक को फोकस कर बढ़िया लेखन और हर जगह को पाठक की इंटरनेट के माध्यम से किताबों तक पहुँच....ये ट्रेंड धीरे धीरे बढ़ रहा है..... मेरे खुद के शहर में ऐसी एक भी दुकान नहीं जहां  पढ़ने लायक कुछ भी उपलब्ध हो... जितनी भी किताबें मेरे पास हैं सब बाहर से खरीदी गई हैं... पर अब इंटरनेट से खरीदने की शुरूआत की है और घर पर ही आ जाती है किताब... किताब भी वाजिब दामों में फ्री शिपिंग सुविधा के साथ... इससे मेरे जैसे पुराने शौकीन फिर इस शौक की तरफ लौटेंगे

Sunday, August 14, 2011

ए कंपनी बनाम मनमोहन की मनी कंपनी

आज सुबह पढ़ा कि महाराष्‍ट्र के एक पत्र में राहुल गांधी की गुमशुदगी के बारे में विज्ञापन छपा है... महाराष्‍ट्र के किसान इस मसीहा को ढूंढ़ रहे हैं पर मसीहा का कहीं अता-पता नहीं मिल रहा है... पर किसानों से बड़ी चिंता कांग्रेस को है कि अन्‍ना की ए कंपनी की गुंडागर्दी, ब्‍लैकमेलिंग, फिरौती की घटनाओं से कैसे निपटे.... पर अन्‍ना छुट्टा सांड की तरह लोकतंत्र और भारत की सरकार को धमकाते फिर रहे हैं कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो.... ऐन आजादी महोत्‍सव के दिन अन्‍ना ने मार मचा रखी है... पर भले लोगों की भली सरकार गुंडों में मुंह कैसे लगे...

आज दिन में कांग्रेस का एक प्रवक्‍ता मनमोहन सिंह को 120 करोड़ लोगों का प्रधानमंत्री बता रहा था तो लग रहा था कि कॉमड़ी सर्कस जैसे कार्यक्रमों की तो जरूरत ही नहीं... सरदारों पे बने जोक्‍स तो हम सुनते ही रहते हैं पर ये वाला बेस्‍ट लगा... हालांकि मनमोहन सिंह को शायद ये भी पता नहीं होगा कि वे किसके और कब तक ? प्रधानमंत्री हैं.... क्‍योंकि जैसा कि सभी जानते हैं कि उन्‍हें कुछ पता नहीं रहता... वे खुद ही बोलते पाये जाते हैं कि उन्‍हें कुछ नहीं पता... इस सबके बावजूद उनकी एक और खूबी है कि देश को और जनता तक को भी उनका पता नहीं रहता... हां कभी-कभार वो बंद कमरे में अंग्रेजी बोलने वाले पत्रकारों के कान में फुसफुसाकर जरूर जनता को बताते हैं कि वे कहीं लापता नहीं हुए हैं...

वैसे कांग्रेसी स्‍वयं भी उन्‍हें अपना प्रधानमंत्री मानते हैं या नहीं ये चर्चा पुरानी हो चुकी है... नयी बात ये है कि खुद को बहुत बड़ा गांधीवादी बताने वाले अन्‍ना से बड़े गांधीवादी स्‍वयं हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं... गांधी परिवार के सच्‍चे सेवक तो असली मायने में वही हैं तो हुए ना वे सच्‍चे गांधीवादी...

अन्‍ना पूछते हैं किस मुंह से प्रधानमंत्री लाल किले पर जायेंगे... जिस मुंह से वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए हैं... और जिस मुंह से वे रामराज्‍य लाने के लिए तैयार बैठे युवराज के लिए गद्दी छोड़ने की बात करते हैं जैसे वे भरत हों और गद्दी उनके बाप दशरथ की हो... पर गद्दी संभालने वालों को फुर्सत नहीं है इसलिए मनमोहन सिंह उसी मुंह से कुर्सी से चिपके हुए हैं और तब तक चिपके रहेंगे जब तक उन्‍हें गद्दी छोड़ने का आदेश नहीं मिलता...

ऐसे में किसी कांग्रेसी का ये कहना कि मनमोहन से ऐसी बातें पूछना लोकतंत्र का, तिरंगे का, देश का अपमान है.... पर बिना चुनाव लड़ने वाले शख्‍स को एक सौ बीस करोड़ लोगों पर थोपना किसी का अपमान नहीं है... जब अमेरिका शांतिपूर्ण-प्रदर्शनों से निपटने के लिए शांति बरतने की सलाह देता है तो कांग्रेस को गुस्‍सा आता है... पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर डंडे बरसाने वाली कांग्रेस अपने चरित्र से खुद दूसरों को ऐसा कहने का मौका देने से कब चूक रही है... और ना ही उनके आग उगलने वाले नेता जो रामदेव प्रकरण के बाद सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि अन्‍ना ने ऐसा किया तो उनका भी वही हश्र होगा.... वैसे भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण को सीआईए का एजेंट तक बताने वाली कांग्रेस कल को अन्‍ना को आईएसआई एजेंट बताने लगे तो भी कोई अचरज की बात नहीं है...

अन्‍ना के ट्रस्‍टों का हिसाब-किताब नहीं बताने पर आपत्ति जताने वाली कांग्रेस के आका जनता की गाढ़ी कमाई से कितनी बार और किन देशों मे क्‍या करने जाते हैं इसे बताना उन्‍हें फिजूल लगता है... किस देश में किस बीमारी का इलाज सोनिया गांधी का चल रहा है इसे बताना जरूरी नहीं समझा जाता भले ही उसमें पैसा जनता का खर्च हो... राजीव गांधी फाउंडेशन के नाम पर कहां से पैसा आता है और कितनी संपत्ति सरकारी रसूख के चलते फाउंडेशन के नाम पर कब्‍जायी जा चुकी है इसका हिसाब कभी किसी को नहीं दिया जाता...

पर सबसे मजेदार हरकतें तो हमारे थोपे हुए प्रधानमंत्री जी करते हैं कल को लालकिले से वे ये घोषणा कर सकते हैं कि हम 100 दिनों में भ्रष्‍टाचार खतम कर देंगे.... जैसा कि जनता जानती है वे पहले भी 100 दिनों की समयसीमा में ही बहुत सी समस्‍याओं को निपटा चुके हैं...

अन्‍ना को ए कंपनी कहने वालों के प्रधानमंत्री को आज भ्रष्‍टों का मुखिया और आजाद भारत की सबसे भ्रष्‍ट सरकार का प्रधान कहा जाता है तब वे स्‍वयं अपने ही शब्‍दों में फरमाते हैं कि- मैं उतना दोषी नहीं हूं जितना मुझे बताया जा रहा है.... ऐसे में मनमोहन सिंह एंड कंपनी को मनमोहन की मनी कंपनी कहना ज्‍यादा परफेक्‍ट लगता है... वैसे भी नोटों के बिस्‍तर पर सोने और सोने के ताबूत में दफन होने का सपना देखने वालों के लिए तो गालिब ने शायद ये शेर नहीं लिखा था-

काबा किस मुंह से जाओगे गालिब,
शर्म तुमको मगर नहीं आती

Wednesday, July 20, 2011

लो अब गूगल एडसेंस में भी दलाली

कमाने के अवसर अनगिनत हैं यदि बंदा थोड़ा अपनी अकल खपाये...गूगल एडसेंस के विज्ञापनों से कमाई बहुतेरे ब्‍लॉगरों के लिए अतिरिक्‍त आय का साधन बन गया है वहीं बहुत से ब्‍लॉगर अब भी इस अरमान को संजोये बैठे हैं कि कब गूगल एडसेंस उनके आवेदन को स्‍वीकार करे और वे कंप्‍यूटर पर बैठे-बैठे ही अपने खाते में डॉलर जमा होते हुए देखें

हालांकि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के लिए तो ये अभी-भी दूर की ही कौड़ी है क्‍योंकि हिन्‍दी अभी तक गूगल की विज्ञापन सेवा एडसेंस की समर्थित भाषाओं की सूची में नहीं है...हालांकि कुछ ब्‍लॉग्‍स पर अभी भी विज्ञापन नजर आ रहे हैं जिसका कारण है ब्‍लॉग्‍स पर सर्च इंजन से ट्रैफिक जुगाड़ने हेतु अंग्रेजी कीवर्ड्स की उपस्थिति...फिर भी आमदनी नगण्‍य ही है क्‍योंकि अव्‍वल तो ये विज्ञापन ब्‍लॉग पर दिखते ही नहीं और यदि दिखते भी हैं तो आने वाले पाठक इन पर क्लिक नहीं करते...मेरा तो अनुभव यही है बाकी वे लोग बतायें जो इससे यदि वाकई में कुछ कमाई कर रहे हैं

हालांकि आजकल गूगल अपने कुछ विज्ञापनों को हिन्‍दी में भी दिखा रहा है खासकर आजकल बंबई-पूना की सैर कराने वाले विज्ञापन ही हिन्‍दी में ज्‍यादा नजर आ रहे हैं जिन पर शायद ही कोई क्लिक करता होगा...क्‍योंकि हिन्‍दी चिट्ठों पर ज्‍यादातर ट्रैफिक हिन्‍दुस्‍तान से ही आता है...एक और एलआईसी का कराड़पति बनाने वाला विज्ञापन है जो कभी-कभार नजर आता है...ऐसे ही इक्‍के-दुक्‍के विज्ञापन नजर आते हैं फिलहाल हिन्‍दी में...वैसे गुजराती और मराठी भाषाओं के विज्ञापन भी इन इक्‍के-दुक्‍के विज्ञापनों की जमात मे शामिल हैं...

मेरे एक मित्र जिन्‍हें मोबाइल से ब्‍लॉगिंग का शौक है हाल ही में एडसेंस से परिचित हुए हैं और मोबाइल ब्‍लॉगिंग छोड़कर लैपटाप पर हाथ आजमा रहे हैं ताकि अपने अंग्रेजी ब्‍लॉग पर ट्रैफिक बढ़ाकर विज्ञापनों से कमाई की जा सके... उन्‍होंने दो-तीन बार एडसेंस के लिए आवेदन किया पर हर बार उनका आवेदन निरस्‍त हो गया...बेचारे बड़े दुखी थे...गूगल पर उन्‍हें गुस्‍सा भी आ रहा था कि गूगल सबको पैसा कमाने दे रहा है पर उनसे कन्‍नी काट रहा है...मैंने उनको सुझाव दिया कि विज्ञापन प्रदान करने वाली भारतीय सेवाओं जैसे एड्स फॉर इंडियंस या अन्‍य एफिलिएट प्रोग्राम में क्‍यों नहीं रजिस्‍टर कराते वे भी कुछ ना कुछ दे ही देंगे....पर उन्‍हें तो केवल गूगल के ही विज्ञापन चाहिए थे...वे खोजते रहे..उनको कुछ पता लगा तो उन्‍होंने बताया कि कुछ लोग नेट पर गूगल अकाउंट बनाकर देते हैं और उसका आपसे कुछ पैसा भी लेते हैं...मैंने कहा मुझे तो इसकी जानकारी है नहीं यदि ऐसा है तो एक बार कोशिश कर डालिए...उन्‍होंने संबंधित सेवा प्रदान करने वाले व्‍यक्ति से संपर्क कर उसे पैसा भी भेज दिया परंतु आज तक उसकी तरफ से कोई उत्‍तर नहीं मिला है...मेरे मित्र का कहना है कि इंटरनेट पर सक्रिय इस प्रकार के ठगों का काम मजे में चल रहा है और लोग उनके चंगुल में आकर पैसे भी गंवा रहे हैं....शायद लोगों से पैसे ऐंठने का ये भी एक तरीका है... क्‍योंकि बहुतेरे आवेदन जो एडसेंस को भेजे जाते हैं वे निरस्‍त ही हो जाते हैं....और बढि़या ट्रैफिक और विजिटर्स पाने वाले ब्‍लॉगर्स जल्‍द से जल्‍द इस एकाउंट की चाबी चाहते हैं....हालांकि मेरा मानना है कि शायद ही लोगों का काम बनता हो उनका पैसा तो लालच मे आकर पानी में ही बह जाता है....क्‍योंकि गूगल के नियम व शर्तें बहुत सख्‍त हैं....बहरहाल मेरे मित्र बेचारे दुखी हैं विज्ञापन ना जुटा पाने और पैसे डूबने के कारण...फिलहाल उन्‍होंने शादी-ब्‍याह कराने वाले किसी एफिलिएट विज्ञापन के लिए आवेदन किया है और तुरंत ही उन्‍हें एप्रूवल भी मिल गया....देखते हैं बेचारे इतनी मेहनत के बाद भी कुछ कमा पाते हैं या नहीं...