Sunday, January 14, 2007

मुस्लिम नफ़रत की जमीन पर खड़े संगठन और मेरे अनुभव- 2

मैंने अपनी जो पिछली प्रविष्टि लिखी थी उस पर काफ़ी लोगों ने टिप्पणियों के माध्यम से अपने-अपने विचार व्यक्त किये। कुछ लोग मुझसे सहमत दिखे तो कुछ असहमत। परंतु एक बात मुझे जो सबसे ज्यादा अखरती है वह ये कि जब भी आप किसी संगठन या विचारधारा की आलोचना करते हैं तो उस संगठन या विचारधारा के अनुयायी आपको उसके विरोधियों में शामिल मान लेते हैं। जैसे कि मेरे पोस्ट पर कुछ लोगों ने मुझे यह समझाने का प्रयास किया है कि मुस्लिम कितने कट्टर होते हैं और हिन्दुओं के बारे में कितना बुरा कहते हैं। लोगों का यह भी कहना है कि पहले मैं जरा मुस्लिम संगठनों के बारे में ठीक से जान लूँ।

बस यहीं ये लोग चूक कर जाते हैं उन्हें लगता है कि मैंने कट्टर मुस्लिम संगठनों की मानसिकता, कार्यप्रणाली का अध्ययन न करके अपना ध्यान सिर्फ़ संघ को कोसने में ही लगाया है क्योंकि उनके अनुसार मैं संघ-विरोधी हूं और उसके विरोधियों का हिमायती। हाँ मैं खुद स्वीकार करता हूँ कि मैं संघ का कट्टर विरोधी हूँ और हर उस संगठन और संस्था का विरोधी हूँ जो इस प्रकार की नफ़रतभरी मानसिकता रखते हैं और बेशक इनमें मुस्लिम संगठन भी शामिल हैं।
पर तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों से ताल्लुक रखने वाले लोगों को शायद लग रहा है कि मैं हिन्दू होकर भी इन संगठनों के विरोध में क्यों हूँ जबकि मेरा कर्तव्य होना चाहिये था कि मैं हिन्दू होने के नाते केवल मुस्लिम कट्टरपंथियों को गाली देता रहूँ पर इनसे कुछ न बोलूँ।
परंतु ये मानसिकता कहाँ तक उचित समझी जायेगी कि मैं एक हिन्दू हूँ तो हिन्दू संगठनों का पक्ष लूं और दूसरों पर पिल पड़ूँ। भाई यदि मुझे इन तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों में कुछ तो ऐसा नज़र आया ही होगा जिसके आधार पर मैं वह पोस्ट लिखने को विवश हुआ।

रमन कौल जी का कहना है कि "मुसलमानों से नफरत करने की ज़रूरत न सही, पर इस्लाम से डरना स्वाभाविक है"। मैं इस्लाम से क्यूं डरूँ अलबत्ता मुझे इससे नफ़रत जरूर है। जिस प्रकार कुरान में अल्लाह को एकमात्र ईश्वर बताया गया है और पैगंबर मुहम्मद को उनका एकमात्र पुत्र और इस्लाम को न मानने वालों को काफ़िर। हालाँकि मेरे मुस्लिम मित्र स्वयं इस बात को सही नहीं मानते और उनके धर्म के अनुसार, जो हिन्दुओं को भी काफ़िर कहता है, की गई व्याख्या के बावजूद हिन्दुओं और अन्य धर्मों के लोगों से अच्छे ताल्लुकात और प्रेमभाव रखते हैं। फ़िर ऐसी क्या बात है कि मैं उनसे नफ़रत करूँ। और मुझे एकाध नहीं कई ऐसे हिन्दूवादियों से पाला पड़ा है जो उनका नाम लेते ही नाक-भौं सिकोड़ने और गाली देने की मुद्रा में आ जाते हैं।

अनुनादजी का कहना है कि- "आपके पूरे लेख में यही दिख रहा है कि आप अमुक चीज को नहीं मानते और फिर उसकी विपरीत चीज को भी नहीं मानते। तो मानते क्या हैं?"
अनुनादजी मैं संघ के विचारधारा को नहीं मानता और मैंने साथ ही यह भी कहा है कि मैं मुस्लिम कट्टरपंथ और कांग्रेस की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का भी विरोध करता हूँ। एक बात और कि मैं अफ़जल की फ़ाँसी का समर्थन करता हूँ।
पर यहीं शायद आपसे चूक हुई। आपको शायद लगता है कि अगला आदमी एक साथ तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों और कट्टर मुस्लिमों का विरोधी कैसे हो सकता है साथ ही कांग्रेस का भी। ये कोई जरूरी तो नहीं कि मैं संघ की किसी गलत बात का विरोध करूँ तो मुझे कांग्रेसी होना चाहिये। या फ़िर मैं कांग्रेस का विरोध करूँ तो ऐसा मैं तथाकथित हिन्दूवादियों के साथ ही कर सकता हूँ, स्वतंत्र रूप से नहीं। मुझे संविधान के तहत किसी भी संगठन या पार्टी की गलत सोच और नीतियों की आलोचना करने की स्वतंत्रता है। यदि कुछ गलत हो रहा है तो वह चाहे कोई भी करे उसका विरोध उचित ही है पर ये मतलब कतई नहीं कि एक को कोसें तो दूसरे के खेमे में घुसकर। यदि अफ़जल की फ़ाँसी का विरोध करें तो क्या संघ के बैनर तले ही ये संभव है? स्वतंत्र रूप से नहीं? यह तो वही बात हुई कि "जो हमारे साथ नहीं वो हमारा दुश्मन है" अर्थात विरोधी खेमे से है। मैं कांग्रेस की नीतियों की खुलकर आलोचना करूँगा तो क्या मैं संघ से सहमत हो गया। बिल्कुल नहीं। यदि वे भी कुछ गलत करेंगे तो उसकी आलोचना करनी पड़ेगी।

अनुनादजी के उक्त कथन का तात्पर्य है कि "आप अमुक का साथ नहीं देते तो उसके विपरीत का साथ दो और यदि नहीं दो तो आप दोनों के विरोध में एक साथ नहीं जा सकते।"
फ़िर तो जो उन्होंने मेरे बारे में कहा है वह मीडिया के बारे में भी सच है। क्योंकि एक दिन वह एक पार्टी की कमियाँ उजागर करती है और दूसरे दिन उसकी विरोधी पार्टी की भी। उसका काम स्वस्थ रूप से किसी के गुण-दोषों का आकलन करना है ना कि एक का पक्ष लेना और दूसरे पर पिलना और इसीलिए वह मीडिया है। और शायद वही मैं भी हूँ।

आपने पूछा है कि "क्या आप किसी व्यक्ति को शाखा में बुलाने का कोई बेहतर तरीका सुझा सकते हैं?"
भई मैं तो ये कहता हूँ कि यदि आप किसी को शाखा में बुला रहे हैं तो वह यदि आपकी विचारधारा से सहमत है तो स्वयं ही आयेगा। आप अपनी नीतियों, विचारधारा का प्रचार करें बजाय इसके कि भाई आओ आपको वीडियोगेम या फ़ुटबाल खिलायें। ये प्रश्न ही स्वयं में हास्यास्पद है कि शाखाओं में फ़ुसलाकर बुलाने के क्या तरीके हो सकते हैं? साथ ही एक और बात बता दूँ कि कई लोग जो इस प्रकार फ़ुसलाकर बुलाये जाते हैं वे बाद में इस झूठ के कारण ही फ़िर कभी नहीं जाते वहाँ।

आपका अगला प्रश्न है "क्या आप बता सकते हैं कि काश्मीर आदि विषयों पर सारा मुस्लिम जगत पाकिस्तान के साथ क्यों है?" और "आजादी के समय ब्रिटिश भारत में मुसलमानों की आबादी कोई २८% थी। क्या आप बता सकते हैं कि यह जानते हुए कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं, मुस्लिम लीग ने 'डाइरेक्ट ऐक्शन' की घोषणा किस 'दम' पर कर दी थी? (और इसमे वे सफल भी हुए)"
इस बारे में आप सही हैं पर केवल मुस्लिमों में बहुत से लोग खराब हैं और पाकिस्तान हमारा दुश्मन है इसे आधार बनाकर संघ सही तो साबित नहीं हो जाता! मुस्लिम गलत हैं तो इसका ये अर्थ नहीं हुआ कि संघ सही हो गया।

और जनसंख्या के बारे में बस एक छोटा सा ही उदाहरण दे दूँ-
मेरे गाँव में कुछ बहुत ही पिछड़ी जाति के हिन्दू रहते हैं जो मजदूरी आदि करके गुजारा चलाते हैं उनमें से कई के आठ-दस तक बच्चे हैं और अभी तक वे छोटे परिवार का महत्व नहीं जानते क्योंकि अनपढ़ हैं ऐसे ही मेरे आसपास कई मुसलमान हैं जो पंक्चर जोड़कर, मिस्त्री का काम करके और बहुत छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा चलाते हैं। और उनके यहाँ भी जनसंख्या वृद्धि-दर ज्यादा है क्योंकि वे शिक्षा से दूर और पिछड़े हुए हैं। और भारत में मुसलमान अधिकांश पिछड़े और निरक्षर ही हैं जिसके कारण उनमें छोटे परिवार के प्रति जाग्रति नहीं। इसमें धर्म की बात कहाँ पैदा हुई? मुझे तो समझ में ही नहीं आता।

साथ ही एक बात और कि आपके अनुसार मुझे इन हिन्दूवादी संगठनों की सतही जानकारी है फ़िर भी मैं लिखे जा रहा हूँ दनादन इनके विरोध में। तो इतना कहना चाहूँगा कि जितनी जानकारी मुझे संघ के बारे में है उससे १० गुना कम तो कांग्रेस और मुस्लिम संगठनों के बारे में है फ़िर भी मैं उन्हें कोसता हूँ। क्योंकि किसी भी संगठन के बारे में उसकी नीतियों, कार्यप्रणाली आदि से जाना जा सकता है। उसके बारे में जानने के लिए हमें उस संगठन की सदस्यता लेकर शोध करने की जरूरत तो है नहीं शायद। और दुनियाँ में हम किसी भी संगठन के बारे में सूचना आदि उससे जुड़े लोगों, खबरों आदि से ही जानते हैं ना कि उसके सदस्य बनकर। और जहाँ तक संघ का सवाल है तो मेरे अधिकांश भाई-बंधु संघ के कट्टर और नियमित कार्यकर्ता हैं और मैं उनके अत्यधिक निकट होकर और उससे जुड़े लोगों के बीच रहकर उनकी मानसिकता का जायजा क्यों नहीं ले सकता भला? और कमाल की बात देखिये कि चारों ओर से इन तथाकथित हिन्दूवादियों से घिरा होने के बावजूद मैं इनकी विचारधारा से नफ़रत करता हूँ और दुनियाँ में हर उस संगठन से जो कट्टरवाद और नफ़रत का झंडाबरदार है।

15 comments:

Reetesh Gupta said...

भुवनेश भाई,

बहुत सही लिखा है आपने । पढ़कर अच्छा लगा
बधाई !!

रीतेश गुप्ता

Udan Tashtari said...

मेरी टिप्पणी न आने को अन्यथा न लें. मै पढ़ रहा हूँ मगर बस टिप्पणी नहीं की है किंचित कारणोंवश....बाकि देख सब रहा हूँ, कृप्या अन्यथा न लें. :) अच्छे लेखन की बधाई स्विकार करें.

जगदीश भाटिया said...

संतुलित तथा परिपक्व !
बहुत ठीक लिखा आपने।

प्रमेन्द्र प्रताप सिंह said...

आप अच्छा लिख रहे है लिखिये, मै भी वक्त आने तथा मिलने पर अपना पछ रखूँगा! कुछ बाते हम एक धारणा बना लेते है, बह गलत है, ह्म्व आपनी सोच के दायरे को बडना चाहिये!
प्रत्येक संगठन मे विभिन्न विचारो के लोग होते है. कुछ दूषित मनशिकता वालो के कारन सब को गलत कहना ठीक नही है!

DR PRABHAT TANDON said...

दोनो पक्षों के साथ मुसीबत यही है कि एक दूसरे के बारे मे नफ़रत भरी राय रखते हैं,और बाकी इनके संगठन
तो इनका कहना ही क्या । बहुत ही संतुलित लिखा है। जारी रखें...

अनुनाद सिंह said...

भुवनेश भाई, केवल यह कहने से क्या होगा कि मै अमुक चीज को नहीं मानता और अमुक चीज को भी नही! विकल्प सुझाइये ! ऐसा विकल्प जो अलग हो और अधिक कारगर। अभी तो यही मेरी त्वरित टिप्पणी है।

सागर चन्द नाहर said...

साथ ही एक बात और कि आपके अनुसार मुझे इन हिन्दूवादी संगठनों की सतही जानकारी है फ़िर भी मैं लिखे जा रहा हूँ दनादन इनके विरोध में।
यह बात बिल्कुल सही है कि आपको इन हिन्दूवादी संगठनों के बारे में बहुत कम जानकारी है। कुछेक लोगों की बातों को सुनकर आपने यह अंदाजा कैसे लगा लिया कि पूरी संस्था खराब है। आपको उनकी खराब लिख दी पर उनके द्वारा किये जा रहे अच्छे कामों की जानकारी ही नहीं है। इन संगठनों के बारे में आपको पूरी जानकारी होनी चाहिये लेख लिखने से पहले।
रमन कौल जी ने बिल्कुल सही कहा था कि ये हमारा दुर्भाग्य है कि हमें खेलों का लालच देकर लोगों को बुलाना पड़ रहा है।

मेरे प्रभू said...

भगवान आप को सदबुद्गि दे

अनुनाद सिंह said...

"भई मैं तो ये कहता हूँ कि यदि आप किसी को शाखा में बुला रहे हैं तो वह यदि आपकी विचारधारा से सहमत है तो स्वयं ही आयेगा।"



आपका सुझाव कितना व्यावहारिक है यह बताने के लिये कृपया किसी एक संगठन का नाम बताइये जिसने अपने सिद्धान्तों को एक पुस्तिका में छाप दिया और उसके बाद केवल उन छपे सिद्धान्तों के बदौलत वह संगठन फलता-फूलता चला गया।

Raman Kaul said...

कहने को बहुत कुछ है, पर अभी सिर्फ इतना और कहना चाहूँगा - आप के अनुभव-1 और अनुभव-2 जो भी रहे हों, संघ "मुस्लिम नफ़रत की जमीन पर खड़ा संगठन" नहीं है, और आप के पोस्टों के शीर्षक से ही आप की पूर्वनिर्धारित धारणाओं का आभास होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वही है जो इस का नाम कहता है - National Volunteers Organization. इस का उद्देश्य या आधार मुस्लिम नफ़रत कतई नहीं है। अपने लक्ष्य में यह संगठन कितना सफल है और कितना असफल, यह विवाद का विषय हो सकता है।

Anonymous said...

भैया,

लगता है की आपके पास करने के लिये ज्यादा काम नहीं है, और इसलिये आज आपको किसी न किसी पर गुस्सा उतारना है...इसलिये आज संघ परिवार को पकङ लिया है.

इस प्रकार के बिना गहराई वाले लेखों को देख कर मुझे बहुत बुरा लगता है.

इतना बङा लेख पढा, और क्या ज्ञान मिला ? कुछ नहीं. ऊपर से यह कमेंट पोस्ट करने में जो समय बर्बाद हुआ सो अलग.

पर चलिये, अब लेख पढ डाला तो अब अपनी राय भी व्यक्त कर ही दूँ.

मुसलामानों द्वारा की गयी हिंसा तो जग जाहिर है. पर कुछ किस्से तो दिल ही सहमा देते हैं.

मुझे सबसे बुरा तब लगा था जब ईरान में एक 12 साल की लङकी को क्रेन से लटका दिया गया था क्योंकी वह बङी हो कर माधुरी दिक्षित जैसी बनना चाहती थी.

इंटरनेट पर आप सैकङों विडियो देख सकते हैं जिसमें काफिरों का सर काटा जा रहा हो.

एक दो वीडियों देख कर तो मुझे कई दिन ठीक से नीन्द नहीं आयी. किसी का सर काट कर, एक आदमी "अल्ला-हू-अकबर" चीखे जा रहा था ...

सनक की भी एक हद होती है. इसे कहते हैं कट्टरता.

** और इसी धर्म के कारण हमारे देश का विभाजन हुआ. **

कभी कभी सोचने पर विवश हो जाता हूँ की क्रिस महान व्यक्ति ने यह धर्म बनाया था ...

जब यह हिन्दुओं से लङने में व्यस्त नहीं होंगे, तो फिर यह इसाइयों से लङेगे. जब इसाइयों से मन भर जायेगा, तब बौद्ध लोगों पर अपना कहर बरसायेंगे.

और जब यह सारी दुनिया से काफिरों को मिटा देंगे तो फिर यह आपस में शिया / सुन्नी के लङाई में लग जायेंगे.

इन लोग समय तो बिल्कुल नष्ट करते, क्योंकी ईराक में तो यह शुरु भी हो गया है :)

Manish said...

भुवनेश मेरे ख्याल से इस तरह के विषयों पर लोग अपनी राय रखते हुए कुछ ज्यादा ही भावनात्मक हो जाते हैं । और इसकी वजह हमारा इतिहास रहा है ।
अनुनाद जी ने विकल्प दिखाने की बात की है । भारतीय राजनीति में विकल्प समय के साथ बदलते रहते हैं क्योंकि कोई भी पार्टी विचारधारा से ज्यादा तात्कालिक लाभों के आधार पर अपनी रणनीति तय करती है । भाजपा और कांग्रेस दोनों में कुछ बातें अच्छी और बुरी हैं। इसलिए एक आम आदमी के लिये जरूरी नहीं की वो हर मुद्दे पर किसी एक दल का समर्थन करे ।

ranju said...

बहुत ठीक लिखा आपने। पढ़कर अच्छा लगा

ranju

Anonymous said...

you are thinking & writing childishly.

prakharhindutva said...

देश ही नहीं विश्व में जो भी जो भी उथल पुथल हो रही है वह इस्लाम की देन है।


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सच्चाई तो यह है कि अल्लाह के बन्दे एक बार फिर हँसे है और क़ुरआन के अनुसार उन्हें जन्नत मिलना तय है। आख़िर 186 काफ़िरों को मौत के घाट उतारने के बाद तो अल्लाह ने इन्हें इतना सबाब दिया होगा कि इनकी आने वाली पीढ़ियों को भी जन्नत का पासपोर्ट मिल जाएगा।....

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