Saturday, January 13, 2007

मुस्लिम नफ़रत की जमीन पर खड़े संगठन और मेरे अनुभव

मैं आज एक सज्जन से बात कर रहा था। आजकल सद्धाम हुसैन का मामला सुर्खियों में है। सो उसी बात पर चर्चा चल निकली। उनका कहना था कि सद्धाम के साथ जो हुआ एकदम सही हुआ। पर मेरा कहना था कि ये सब अमेरिका को नहीं करना चाहिए। सद्धाम तानाशाह थे इसमें कोई दोराय नहीं। पर आजकल अमेरिका और जार्ज बुश वैश्विक आतंकवाद के सबसे बड़े जनक के रूप में उभर रहे हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं। उन सज्जन का केवल एक ही (कु)तर्क था कि आज दुनियाँ की यह स्थिति केवल मुस्लिस्म फ़ंडामेंटलिस्म के कारण है,आप खामख्वाह अमेरिका के पीछे पड़े हैं। उनके अनुसार अमेरिका जिन मुस्लिम देशों के साथ ऐसा कर रहा है, वह इसी लायक हैं। हालाँकि मैं जानता था कि वे मुझसे सहमत नहीं होंगे क्योंकि वे काफ़ी समय से संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों से जुड़े रहे हैं।
पर अक्सर इन तथाकथित हिन्दूवादियों की बातें मुझे परेशान करने लगती हैं और कहीं न कहीं मेरे मन में उनके प्रति घृणा को बढ़ाती ही हैं। उनकी बातों में मैंने मुस्लिम अवाम के प्रति एक भयंकर दुर्भावना देखी है। हालाँकि यह बात भी अपनी जगह है कि मुस्लिम फ़ंडामेंटलिस्म के कारण ही हमारे देश में भी आतंकवादी तत्व सक्रिय हैं, जिनसे हमारी आंतरिक शांति के साथ संपूर्ण विश्व को काफ़ी खतरा है। पर केंद्र में बहस का मुद्दा एक ही है कि क्या पूरी मुस्लिम अवाम को इसके लिए घृणा की नजरों से देखना चाहिए? दुर्भाग्य से हमारे ये हिन्दूवादी संगठन यही सब करने में लगे हैं। हिन्दू हमेशा कहते हुए मिलते हैं कि हमारे धर्म की विशेषता है कि यह सब धर्मों को समान रूप से आदर देता है। यह एक उदार धर्म है, परंतु कभी भी मैंने इन तथाकथित हिन्दूवादियों की बातों में मुस्लिम धर्म के बारे में आदर की भावना नहीं देखी। हालाँकि आदर तो मैं स्वयं भी नहीं करता मुस्लिम धर्म का उसकी कट्टरता की वजह से पर हिन्दू धर्म के लिए भी मेरे मन में कोई आदर की भावना नहीं है। व्यक्तिगत तौर पर मैं किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखता। पर जब ये हिन्दू धर्म के स्वघोषित प्रतिनिधि हैं तो कम से कम उसकी कुछ बातें तो अपनाने की अपेक्षा इनसे की ही जानी चाहिए।

जहाँ तक मेरा अनुभव है, मैंने कभी इन तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों में हिन्दुत्व का वह रूप नहीं देखा जो मैंने सुन रखा है। और इसीलिए इन्हें 'हिन्दूवादी' की जगह 'तथाकथित हिन्दूवादी' कहना ठीक भी लग रहा है। इन संगठनों ने केवल हिन्दू जनमानस में पैठ बनाने के लिए हमेशा उग्र और भड़काऊ नीतियों का ही सहारा लिया है और यही इनका हिन्दुत्व है। जो कि हिन्दुत्व की परिभाषा से सर्वथा अलग है।

बचपन में मेरा एक पड़ौसी था जो कि अपने विद्यालय(सरस्वती शिशु मंदिर) में लगने वाली शाखाओं में जाया करता था। वह अक्सर मुझसे भी शाखा में चलने का आग्रह करता। एक दिन मैंने उससे पूछा कि ये शाखा है क्या चीज? उसने बताया कि शाखा में अच्छे-अच्छे खेल खिलाये जाते हैं और बढ़िया बातें बताई जाती हैं। एक दिन वह मुझे ले जाने के लिए अड़ गया सो मैं उसके साथ शाखा चला गया। वहाँ जाकर देखा तो कुछ पूजा जैसी तैयारियाँ चल रही थीं। मैंने कहा खेल कब खिलाते हैं तो उसने बताया अभी कुछ देर बाद खेलेंगे। फ़िर उनका कुछ भगवा-ध्वज पूजन का कार्यक्रम हुआ। कुछ मंत्र आदि भी हुए। मुझे ये सब करना बड़ा अजीब लग रहा था सो मैंने दोस्त से मना कर दिया कि मैं नहीं करने वाला ये सब। तो उसने कहा कि नहीं करना तो पड़ेगा तभी तो सबसे पहचान होगी और फ़िर बाद में सब मिलकर खेलेंगे। सो मैंने अपनी बारी आने पर ध्वज पर कुछ पूजा-वूजा जैसी की, हाथ जोड़ा और वापस बैठ गया। इस सब में बहुत वक्त गुजर गया और छुट्टी हो गई। मैंने उससे रास्ते में पूछा कि यार कुछ खेल वगैरह तो हुए ही नहीं। तो उसका जवाब था कि कल होंगे आज समय नहीं था इसलिए कल जरूर आना। पर मैं वहाँ के माहौल में कुछ अजीब सा महसूस करने के कारण दुबारा नहीं गया।

फ़िर जब हायर सेकण्डरी में आए तो एक कॉलोनी में एक शिक्षक के यहाँ कोचिंग के लिए जाने लगे। वहीं पास में संघ का कार्यालय था जिसमें शाखा लगा करती थीं। मैं जब भी रास्ते से गुजरता तो कुछ लड़के वहाँ अक्सर झुंड बनाकर खड़े रहते और उनमें से कुछ पहचान वाले हमेशा अंदर आने को कहते। पर मैं नहीं जाता था। एक बार कोचिंग पर आने वाला एक लड़का कुछ दिनों के लिए शाखा में गया। पर जल्द ही वह लौट आया। मैंने उससे पूछा कि क्यों भाई अब क्यों नहीं जाते तो उसने उनकी कलई खोलना शुरू की। उसने बताया कि किस तरह ये लोग दोस्ती-यारी बना के वीडियोगेम,कैरम आदि खेलने के लिए बुलाते हैं और फ़िर कुछ दूसरे ही काम करवाने लगते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये लोग कैसे झूठ बोलकर लड़कों को संघ की शाखा में आने को फ़ुसलाते हैं। पर हद तो तब हुई जब मेरी कोचिंग पर एक संघ का सदस्य भी आने लगा। वह अक्सर संघ की तारीफ़ करता और मुस्लिमों की बुराई अवश्य करता और लौटते में शाखा में फ़िर घुस जाता। एक दिन कहने लगा कि ये मुस्लिम कितने कमीने होते हैं गायों, बकरियों को कैसे बुरी तरह काटते हैं। मैंने सहमति में सिर हिला दिया। पर वह नहीं माना बार-बार वही बात दुहराता रहा। उसकी मुझसे अपेक्षा थी कि मैं भी मुस्लिमों को थोड़ी गाली दूँ और उसके साथ शाखा चलूँ एक दिन उसी की मार्फ़त मुझे पता लगा कि शाखा वालों के पास कुछ वीडियो कैसेट्स हैं जिनमें कुछ जानवरों को काटते हुए दिखाया जाता है और कहा जाता है कि मुस्लिम कितने कमीने और निर्दयी होते हैं जिनमें जानवरों के प्रति बिल्कुल दया नहीं, विशेषकर गायों के। मुझे बड़ा खराब लगा हालाँकि मैं भी शाकाहारी और हिन्दू परिवार से हूँ पर मुझे यही बात अजीब लगी कि ये लोग इन सब बातों को बार-बार बता के और प्रचार करके साबित क्या करना चाहते हैं। यदि ये कुछ बताना ही चाहते हैं तो हिन्दुओं के प्रतिनिधि होने के नाते इन लोगों को हिन्दू धर्म की कुछ अच्छी बातें अपरिपक्व समझ वाले लड़कों को बतानी चाहिए। पर ये लोग ऐसा क्यों करने लगे भला! इनका काम तो लोगों को भड़काना और अपनी राजनैतिक जमीन तैयार करना है।

कभी-कभार जब मैं कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध और अफ़जल को फ़ाँसी देने का समर्थन करता हूँ तो मेरे संघ वाले मित्रों की बाँछें ऐसे खिल जाती हैं मानो मैंने इनके मुँह की बात छीन ली। पर कांग्रेस पार्टी अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के लिए भले बदनाम हो पर ना तो वह मुस्लिम तुष्टिकरण के बावजूद हिन्दुओं के खिलाफ़ कोई प्रोपेगैंडा करती है और ना ही वह संघ जैसे संगठनों के दोगले चरित्र वाली है। जो हमेशा लोगों को धर्म के नाम पर भड़काते रहते हैं। हिन्दूवादी संगठनों के मेरे दोस्तों को मुस्लिम धर्म और अवाम की निन्दा एक संगीत का-सा सुकून देती है। यदि मैं उन्हें ए.आर.रहमान का संगीत भी सुनाऊँ तो भी शायद उन्हें इतना अच्छा न लगे जितना कि एक मुसलमान की निन्दा। और हो सकता है कि वे इसी बात पर भौंहें तानने लगें कि मैं ए.आर.रहमान का संगीत क्यों सुनता हूँ किसी हिन्दू संगीतकार का क्यों नहीं?

एक बार तो अपने को हिन्दूवादी कहने वाले एक महाशय ने हद ही कर दी। उनको कहीं से पता चला कि मेरी पसंदीदा अभिनेत्री विद्या बालन है। तो आकर कहने लगे कि- "आप किसी को भी अपनी पसंदीदा अभिनेत्री बना लेते हैं? पता है उस विद्या बालन का फ़ेवरिट शब्द 'इंशाल्लाह' है जो कि एक उर्दू शब्द है और मुसलमान लोग इसे इस्तेमाल करते हैं।" मेरा दिमाग खराब हो गया। हालाँकि मैं वहाँ से बिना कुछ जवाब दिये रुख्सत हुआ पर एक बार मेरे दिमाग में घूमती रही कि इतनी ज्यादा नफ़रत अपने अंदर समेटे ये लोग समाज के लिए कितने खतरनाक हो सकते है?

आजकल सभी जगह संघ(साथ ही विश्व हिन्दू परिषद और अन्य तथाकतित हिन्दूवादी संगठन) द्वारा कुछ हिन्दू जागरण नाम पर कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जिनमें कहा जा रहा है कि हिन्दुओं की आबादी तेजी से गिर रही है और जल्द ही वे अल्पसंख्यक होने वाले हैं। इसीलिए हिन्दुओं को 'हम दो हमारे दो' जैसे नारों को भुलाकर अपने धर्म की रक्षा हेतु जनसंख्या वृद्धि करनी चाहिए। नहीं तो ये मुस्लिम लोग देश पर कब्जा कर लेंगे। मेरे ख्याल से ये मसला धर्म से जुड़ा हुआ है ही नहीं। जहाँ भी मुस्लिम अनपढ़ और पिछड़े हुए हैं वहाँ स्वाभाविक रूप से उनकी जनसंख्या वृद्धि दर ज्यादा है ठीक ऐसा ही हिन्दुओं में भी है। मेरा एक मुस्लिम मित्र है जो सॉफ़्टवेयर प्रोफ़ेशनल है। उसे मैंने कभी अपने धर्म का पालन करते नहीं देखा। वह महँगी विदेशी शराब पीता है। उसकी बीवी पश्चिमी ढंग के परिधान पहनती है। नमाज आदि के लिए उसके पास वक्त नहीं। उसकी जीवन-शैली ठीक एक आम हिन्दू आदमी के समान है जो केवल अपने कार्यालय और अपनी जिंदगी से ताल्लुक रखता है। फ़िर केवल क्या मैं इस कारण से उससे नफ़रत करूँ कि उसका उपनाम 'खान' है?
हालाँकि मेरी इस मित्रता से मेरे संघ वाले मित्रों को आपत्ति हो सकती है पर इसके लिए मैं क्या कर सकता हूँ ?

12 comments:

जगदीश भाटिया said...

आज हमारे युवा यदि इतना समझ लें तो निश्चित तौर पर हमारे राजनेता सुधर जायेंगे तथा धर्मों के नाम पर हमें भिड़ाना बंद कर दें गे। आज सभी दलों की दुकाने धर्मों के सहारे चल रही हैं, या तो किसी धर्म का तिरस्कार करके या किसी धर्म का प्रचार करके। मुझे समझ नहीं आता कि कोई अपने घर में किस पद्धति से पूजा करता है इस से क्या फर्क पड़ जाता है?

बहुत ही सही लिखा आपने, यूं लगा कि मैं अपने ही विचार पढ़ रहा हूं।

सागर चन्द नाहर said...

बहुत सारी भ्रांतियाँ है लोगों के मन में कोई धर्म कभी बुरा नहीं होता, बुरे होते हैं इसके तथाकथित ठेकेदार।
कभी अजमेर शरीफ़ या मेहसाणा की सुप्रसिद्ध दरगाह मीरा दातार की दरगाह हो इन दरगाहों पर जा करे देखिये आप पायेंगे कि मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू नजर आयेंगे पर किसी भी हिन्दू मंदिर में जाकर देखेंगे तो पायेंगे क कहीं कोई मुस्लिम नहीं दिखेगा
मेरा यह कहना नहीं है कि मुसलमान ज्यादा कट्टर होते है परन्तु मेरे साथ ऐसा अनुभव हो चुका है जिसमें मुस्लिम हिन्दूओं को इतना बुरा कहते हैं कि यहाँ बता भी नहीं सकता। मैं अपने विचार पहले ही यहाँ रख चुका हुँ http://nahar.wordpress.com/2006/07/12/muslim/ http://nahar.wordpress.com/2006/07/12/muslim1/

RSS के बारे में कहन है कुछ टटपूंजियों के चलते एक पूरे संघ को बुरा कहना सही नहीं है। संघ ने कई गाँवों में गरीब आदिवासियों लोगों के उत्थान के लिये जो निस्वार्थ कार्य किये हैं वह किसी से छिपा नहीं है। अगर नहीं जानते तो बतायें व्यक्तिगत मेल से आपको बताऊंगा।
एक बात और ए आर रहमान जन्म से हिन्दू हैं और उनका वास्तविक नाम है दिलीप शेखर।
ये सारी बातें मानवीय बातें हैं इसके लिये किसी भी धर्म को दोष देना गलत है। टिप्पणी ज्यादा लम्बी हो रही है, बस अभी के लिये इतना ही।

Manish said...

शाखाओं के बारे में मेरा कोई निजी अनुभव नहीं है । इसलिए उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूँगा । धर्म के मामले में आपके विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ ।

Anonymous said...

You are also one of the 'Psudo Secularist' who also see fault in Hindu Organisations. Try to learn about Muslim Organisations and their philosophy and then think.
Try to think if America is not fighting the Muslim Fundamentalist then what would have happend to your Secular India. Americans are direct action people not like us Indian who find fault with correct things.

Do you think that all the countries who are fighting terrorism are not intellingent and only you are intellingent to understand Muslims.

first read about history of muslims in the world and if not then at least read about history of muslims in India.

Raman Kaul said...

धर्म अच्छा है और धर्म के ठेकेदार बुरे हैं, यह भी अपने आप में बहुत बड़ी भ्रान्ति है। दरअसल धर्म बहुत बुरे होते हैं। इस्लाम में कई ऐसी बातें कही गई हैं, जो मानवता के विरुद्ध हैं। हिन्दुत्व एक व्यवस्थित और बन्धा हुआ धर्म नहीं है, इस कारण उस में भी कई बुराइयाँ होने पर भी वह विश्व के लिए खतरा नहीं है, और मज़हबों की कैटेगरी में नहीं आता। न ही हिन्दुओं ने दुनिया को कनवर्ट करने का ठेका ले रखा है। हिन्दू समाज में या पुस्तकों में यदि बाल-विवाह, सती, दहेज, आदि जैसी बुराइयाँ हैं, इन्हें कोई पत्थर की लकीर नहीं मानता, और समय के साथ, स्थान के साथ इन में परिवर्तन भी होता है। मुसलमानों से नफरत करने की ज़रूरत न सही, पर इसलाम से डरना स्वाभाविक है - यह पढ़ें। आप का दोस्त यदि इस्लाम का पालन ही नहीं करता तो फिर वह मुसलमान तो हुआ ही नहीं। ऐसे दोस्त तो हर किसी के होते हैं। समस्या तो उन से है, जो इस्लाम को पत्थर की लकीर समझते हैं, और देश, समाज, के हितों की उपेक्षा करते हैं।

ईराक पर आक्रमण और सद्दाम हुस्सैन को दी गई फांसी इस लिए गलत है कि ईराक कट्टर इस्लाम का गढ़ नहीं था, बल्कि अब बन गया है। ईराक और सद्दाम हुस्सैन का पाप यह था कि उन्होंने अमरीका से (वह भी बुश से) टक्कर ली थी।

जहाँ तक संघ की बात है, मैं संघ का स्वयंसेवक रहा हूँ, और मुझे उस में कोई बुराई नहीं दिखी। खेलों और व्यायाम का भी आनन्द लिया है और भारत माता की पूजा का भी। उन दिनों फरीदाबाद में एक रेल दुर्घटना हुई थी, तो रात के चार बजे ओल्ड फरीदाबाद की पटरियों पर नेकरधारी ही राहत कार्य करते दिख रहे थे। नास्तिक होते हुए भी मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं आई। वे उन सब लोगों के पक्ष में हैं, जो भारत को अपना घर मानते हैं, चाहे वे मुस्लिम हों, और किसी भी पूजा पद्धति में विश्वास करते हों, या न करते हों। आप का जिन हिन्दुत्ववादियों से पाला पड़ा है, आवश्यक नहीं कि उन्होंने ही संघ के मर्म को जाना हो। जो भी हो, राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ तो नहीं करते। यह हमारे समाज की कमज़ोरी ही है कि संघ में आने के लिए लोगों को बहला फुसला कर लाना पड़ता है, या खेलों का लालच देना पड़ता है। आप के मन में जो पूर्वधारणाएँ संघ के बारे में थीं, वे तभी समाप्त होतीं यदि आप उसे पास से देखते। कितने ही लोग हैं, जो पूरा जीवन संघ को समर्पित करते हैं, उन का ध्येय केवल मुसलमानों के खिलाफ होना तो नहीं होता, और न ही किसी देश या समाज के खिलाफ बगावत करना होता है, और न ही आत्मदाही दस्ते बनाना होता है।

अनूप शुक्ला said...

लेख में अपने अनुभव को आपने ईमानदारी से लिखा है। मुझे तो यह लगता है कि सारे झगड़े की जड़ एक दूसरे धर्मों के लोगों का आपस में अलगाव का होना भी होता है। हर धर्म में ज्यादातर लोग अच्छे होते हैं। आम लोग किसी का बुरा नहीं चाहते। मैंने अपने आठ साल के शाहजहांपुर के प्रवास के दौरान देखा कि नियमपूर्वक अपने धर्म का पालन करने वाले मुस्लिम भी थे और उनके मन में हिंदुऒं के प्रति कोई बुरी धारणा भी नहीं थी। वहीं तमाम संघ के स्वयंसेवक भी मैंने देखे जो मानवता की सेवा में लगे रहे। राजीव टंडन जी ने जिनजेपीजी का जिक्र किया है वे संघ के समर्पित कार्यकर्ता थे। लेकिन उनके कार्यव्यवहार में कहीं से किसी किसिम की कट्टरता नहीं दिखती थी। अपनी कुल जिंदगी में मैं जिन सबसे अच्छे लोगों से मिला उनमें से कुछ मुस्लिम भी थे। कटटरता का किसी धर्म से कोई मतलब नहीं होता। वैसे एक जानकारी दे दूं कि भले ही मुस्लिम समुदाय के लोग कटटर माने जाते हों लेकिन साम्प्रदायिक दंगे जब होते हैं, वे चाहे जिस कारण हों, नुकसान हमेशा अल्पसंख्यकों का ज्यादा हुआ है। बहरहाल अपने विचार आपने ईमानदारी से रखे इसके लिये बधाई!

Reetesh Gupta said...

बहुत सुंदर और ईमानदार लेख है ।

बधाई !!

रीतेश

Divine India said...

भाई भुवनेश,
तुम्हारे पृष्टिका पर मै पहली दफा आया हूँ,
तुम्हारा यह एक साहसीक प्रयास है...अच्छा लगा
यह सही है कि ईस्लाम धर्म थोड़ा एकांगी है लेकिन
भारत में दो धर्मों के बीच की रेखा का बढ़ना कुछ
दुसरी कहानी को संकेत करता है...मेरा मानना है कि
धर्म तो तुम्हें एक जीने का ढंग देता है तुम चाहो या नहीं
इससे उलझे रहोगे...मानव विकास के कई रास्ते होते है जो
उच्च स्तर तक पहुंचने मे हमारी मदद करते हैं इसकारण
"मै धर्म को नहीं मानता"... गलत है इसकी कुरीतियों को सजाने
की बजाए मौलिकता लाने का प्रयास करो...
१. "अविभक्त विभक्तेषु यः पश्यति स पश्यति"
२."सिवाये इस दुनियाँ में इसके क्या हो रहा है
कोई हंस रहा है तो कोई रो रहा है...अरे चौंक
ख्वावे गफलत कहाँ तक सहर हो गई है और तू सो रहा है।"

Raag said...

धर्म के बारे में मैं अपने विचार पहले ही अपने चिट्ठे धर्म, धर्मांतरण, भगवान, मैं और आप में व्यक्त कर चुका हूँ। घर्म के नाम पर लोगों को अलग करने की राजनीति वास्तव में बड़ी घिनौनी है। सभी धर्मों में एसा चल रहा है तो अब हिन्दू सोचते हैं कि वो भी पीछे क्यूँ रहें? कभी कभी लगता है कि क्या इन्सान का दिमाग अब कम हो रहा और वो भस्मासुर बनने की राह चल रहा है? नफरत करने के तरीके और कारण ज्यादा पैदा हो रहे हैं बजाए प्यार करने के।

अनुनाद सिंह said...

आपकी तरह ही मै भी इस्लाम को हर रोग का कारण नही मानता। किन्तु इतिहास, कुरान और संघ के विचारों के मेरे अध्ययन से मुझे लगता है कि आपको इन सबकी सतही जानकारी ही है। आप के लिखने की एक विशिष्ट शैली है, जो भ्रमित करने के लिये डिजाइन की गयी लगती है।(बुरा मत मानियेगा) आपके पूरे लेख में यही दिख रहा है कि आप अमुक चीज को नहीं मानते और फिर उसकी विपरीत चीज को भी नहीं मानते। तो मानते क्या हैं?

१) क्या आप किसी व्यक्ति को शाखा में बुलाने का कोई बेहतर तरीका सुझा सकते हैं?

२) क्या आप यह कहना चाह्ते हैं कि संघ की शाखाओं में खेल नही होते?

३) क्या आप बता सकते हैं कि काश्मीर आदि विषयों पर सारा मुस्लिम जगत पाकिस्तान के साथ क्यों है?

४) आजादी के समय ब्रिटिश भारत में मुसलमानों की आबादी कोई २८% थी। क्या आप बता सकते हैं कि यह जानते हुए कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं, मुस्लिम लीग ने 'डाइरेक्ट ऐक्शन' की घोषणा किस 'दम' पर कर दी थी? (और इसमे वे सफल भी हुए)

५) क्या ये झूठ है कि मुसलमानों की आबादी अधिक तेजी से बढ़ रही है? आपको किस आधार पर बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या खतरा नहीं लगती? क्या आपकी यह सोच इतिहास(इस्लामिक रीति) से किसी तरह मेल खाती है?


भारत के इतिहास की समस्या यह रही है कि सुरक्षा के मामले मे हम सदा थोथे सिद्धान्तों पर निर्भर रहे। 'मजहब' की प्रकृति को हम सातवीं-आठवीं शताब्दी में भी नही समझ पाये थे और अभी तक नही समझ पाये हैं। हम इसको भी 'धर्म' जैसी चीज मान बैठे हैं। जब तक हम इस तरह के आत्मघाती विचारों के सहारे चलते रहेंगे, भारत की सीमायें सिकड़ने को बाध्य होती रहेंगी।

भुवनेश शर्मा said...

dear 'ANONYMOUS'
सबसे पहले तो आपसे ये कहना चाहूंगा कि यदि आप कहीं भी अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं तो अपना नाम तो दें, गुमनाम रहकर बहस को कैसे आगे बढ़ायेंगे
खैर आपने कहा है कि 'Try to learn about Muslim Organisations and their philosophy and then think'
तो आपको बता दूं कि मैं कट्टरवादी मुस्लिम संगठनों का भी उतना ही विरोधी हूं जितना कि तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों का, पर इस बार संघ के बारे में लिखना था इसलिए आप मुझे मुस्लिमों का पक्षधर समझ बैठे हैं

और आपने कहा है कि यदि अमेरिका इन कट्टरवादी मुसलमानों से नहीं लड़ेगा तो हमारा क्या होगा तो मेरे भाई ये सब जानते हैं कि अमेरिका का इन कट्टरपंथियों को भडअकाने में कितना बड़ा हाथ है और यदि नहीं जानते तो आपके अनुरोध पर इस पर एक पोस्ट लिखूंगा
मैंने भी इतिहास पढ़ा है पर केवल मैं इस कारण तो अपने पहचान के मुसलमानों के बारे में बुरा नहीं सोच सकता कि उनके ही धर्म के लोग आतंकवादी हैं जबकि मेरे मुस्लिम मित्र खुद अपने धर्म की कट्टरता के खिलाफ़ बोलते हैं

Varun Kumar Singh said...

badhai ho,

Vichar kafi achhe hain kami to har jagah hai hum aur aap se hi samaz banta hai ye achhi suruat hai,
jara himmat ho to janab kisi muslim organization ke bare me likhne ki himmat jutayain aour kisi bhi organization me ratio analysis bhi kar ke dekhe.


janab ka histroy ka knoledge to kabile tareef hai wah!!!!!!!!!!!!