Sunday, April 01, 2007

सौ चूहे खाकर चले अर्जुन सिंह हज करने

केंद्र सरकार की आरक्षण नीति फिर से सुर्खियों में है। इस बार माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने केंद्र सरकार से स्‍पष्‍ट कहा है कि 1931 के सर्वेक्षण पर अन्‍य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने का कोई आधार नहीं बनता। फिलहाल उच्‍चतम न्‍यायालय ने अगली सुनवाई की तारीख अगस्‍त में तय की है। पर सरकार के साथ सभी राजनैतिक दल पशोपेश में हैं कि अब अगला कदम क्‍या उठाया जाय?

आरक्षण नीति के वर्तमान समय के पैरोकार माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री जो कि मानव संसाधन विनाश की कसम खाकर ही शायद कुर्सी पर बैठे हैं, सामाजिक न्‍याय के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं यह बार-बार दुहराने की आवश्‍यकता नहीं है।

परंतु माननीय मानव संसाधन विनाश मंत्रीजी जो कि हमारे मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री भी रह चुके हैं, के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं जो मैं समझता हूं सभी को अवश्‍य पता होनी चाहिए। जिससे वे स्‍वयं निर्णय ले सकें कि माननीय मंत्रीजी सामाजिक न्‍याय और समाज में सभी को समान हक देने के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं।

माननीय मंत्रीजी शायद 1980 में इंदिरा गांधी के आशीर्वाद से हमारे प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने। मैं तो उस समय पैदा भी नहीं हुआ था। पर हमारे बड़े बुजुर्गों से जरूर उनकी कहानियां सुनने को मिल जाती हैं। अपने शासनकाल में इन्‍होंने जिस प्रकार एक जातिविशेष को संरक्षण दिया और उसे आगे बढ़ाया ये आपको यहां के किसी भी जानकार व्‍यक्ति से पता लग जायगा। अर्जुन सिंह चूंकि ठाकुर जाति से हैं इसलिए गतवर्ष के उनके अन्‍य पिछड़ा वर्ग को केंद्रीय उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं में आरक्षण देने के कदम से ठाकुर जाति के लोग विशेष रूप से इनसे रुष्‍ट हो गए हैं। ऐसे ही मेरे एक परिचित ठाकुर जाति के सज्‍जन उनके इस कदम से बड़े आहत थे और कह रहे थे कि अर्जु‍न सिंह की गिनती अब हम ठाकुरों में नहीं करते। वैसे इसमें कोई विशेष बात नहीं है क्‍योंकि जब अर्जुन सिंह ने उनके फायदे के लिए कोई कदम नहीं उठाया तो वे रुष्‍ट तो होने ही थे। पर फिर वे बीते दिनों की यादों में खो गए। कहने लगे वे भी क्‍या दिन थे जब प्रदेश में ठाकुरों की तूती बोलती थी। अर्जुन सिंह का उस समय का कार्यकाल ठाकुर जाति के लिए विशेष गौरव का काल था। इसलिए नहीं कि अर्जुन सिंह स्‍वयं ठाकुर थे अपितु उस समय कोई भी व्‍यक्ति मुख्‍यमंत्री से सीधे जाकर बताता था कि वह ठाकुर है और उसका फलां काम होना है तो मुख्‍यमंत्री स्‍वयं यथाशीघ्र उस काम में रुचि ले उसको निपटाते थे फिर भले उस व्‍यक्ति से मुख्‍यमंत्री की दूर-दूर तक पहचान न हो। ऐसा हमारे क्षेत्र के ठाकुर जाति के बुजुर्ग लोग स्‍वयं स्‍वीकार करते हैं। मुख्‍मंत्रीजी उस समय पूरी तरह अपनी जाति के लोगों को बढ़ावा देने के लिए कृतसंकल्पित थे। यदि कोई ठाकुर अपने बेरोजगार पुत्र को नौकरी दिलाने के लिए मुख्‍यमंत्री से जाकर मिल ले तो मुख्‍यमंत्रीजी चूंकि वह व्‍यक्ति ठाकुर है उसकी अर्जी जरूर मानते थे।

हमारे शहर में उस समय में एक सड़कछाप नेता कहें या गुंडा हुआ करता था। जिसकी हैसियत आज भी सड़कछाप टाइप ही है, पर माननीय मंत्रीजी के कार्यकाल में उस व्‍यक्ति की हैसियत की कोई बराबरी नहीं कर सकता था। उक्‍त व्‍यक्ति सरेआम आई.ए.एस और आई.पी.एस स्‍तर के अधिकारियों और मंत्रालय तक में अपना जोर चलाता था। उसकी इस हैसियत का सिर्फ एक ही कारण था कि वह जाति से ठाकुर था। कुछ लोगों से तो मैंने यहां तक सुना है कि उस समय उक्‍त व्‍यक्ति ने जो कह दिया वह समझो अर्जुन सिंह ने कह दिया।

एक और खास बात मैंने माननीय मंत्रीजी के संबंध में सुनी थी हालांकि उसका इस विषय से कोई लेना-देना नहीं है। मंत्रीजी के लाड़ले पुत्र उन दिनों शिकार का शौक फरमाते थे और वह भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि शेर का। जबकि वह मध्‍यप्रदेश में टाइगर प्रोजेक्‍ट का शुरूआती समय था। परंतु मुख्‍यमंत्रीजी के लाड़ले भोपाल के पास स्थित राष्‍ट्रीय उद्यान को अपनी शिकारगाह के तौर पर इस्‍तेमाल करते थे। रात के समय जब-तब उनकी वैन घने जंगल में उतर जाया करती थी। शौक भी क्‍यों न फरमायें आखिर वे मुख्‍यमंत्री के चिरंजीव जो ठहरे!

वही अर्जुन सिंह सरकार में अपने कद को ऊंचा करने के लिए आरक्षण का घिनौना दांव खेलें तो इसमें अचरज क्‍या है। अचरज तो तब होता है जब उनके मुंह से सामाजिक न्‍याय और बराबरी जैसे शब्‍द निकलते हैं।

5 comments:

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

यह हुई ना पोस्ट!

वाह भुवनेशजी, अब मजा आया, दोनो ही पोस्ट शानदार है, यह थोड़ी ज्यादा है इस कारण इस पर टिपिया रहा हूँ :)

हमेशा ऐसा ही लिखा करें!

bng said...

Arjun Singh ji ki kasmasahat samjhi jaa sakti hai ki bechare varisht hote hue bhi pradhan mantri ki kursi se pichchar gaye. Vaa ri rajniti kya din dikhaye ke ek kanishth vyakti ke neeche kaam karnaa pr raha hai vaise kaam kuchch karte bhi hain yaa nahin yeh bhi apne aap men ek bada prashana hai. Bhuvnesh ji ne nahi dekha to kya sabhi jaanati hai chrhat lottrey kaan ke aprasidh abhineta ka tamagaa bhi to aArjun Singh ji kee paas Hai. Kaash Pradhan Mantri kutchch thodi si apni himmat dikhate aur inhe raasta dihaa dete to aakal thikaane aa jaati.

अनूप शुक्ला said...

ऐसे ही नियमित लिखते रहो!

Aflatoon said...

इसका मतलब अर्जुन सिंह में सुधार हुआ है।बिरादरी से बाहर किए गए मतलब डी-कास्ट हुए।सामाजिक न्याय का लक्ष्य स्पष्ट तौर पर जातिविहीन समाज की रचना होता है और आपकी पोस्ट से स्पष्ट है कि कम से कम अर्जुन सिंह अब जाति के नाम पर स्वार्थसिद्धि नहीं कर पायेंगे । यह तो अच्छा हुआ समाज के लिए।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

किस खड्डूस पर अपनी लेखनी बरबाद कर रहे हो भाई.

This chap - Arjun Singh is not worth writing such a good post on.