हद कर रखी है इस देश में सांप्रदायिक सद्भाव की माला जपने वालों ने। रोज-रोज एक ही बात सुनने को मिलती है कि आतंकवादी अपने मकसद में कभी कामयाब नहीं होंगे, आप सांप्रदायिक सदभाव बनाये रखें, शांति भंग ना करें। अरे बेशर्म नेताओं शांति तो तुम्हारे कारण भंग हो गई है इस देश की। भैया आतंकवादी तो रोज ही अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं पर आपको शायद इस बात का बहुत गम है कि ये हिंदू-मुस्लिम आपस में लड़ काहे नहीं रहे। इन सेक्युलर कहलाने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि रोज कितने लोग मर रहे हैं इन्हें तो बस सांप्रदायिक सदभाव की पड़ी है। हद है भाई ! ऐसा कहकर, लिखकर हमारी सरकार, मीडिया, सेक्युलर जमात साबित क्या करना चाहती है। यही ना कि असल में हम सभी हिंदुस्तानी सांप्रदायिक हैं, हिंसक हैं, दूसरों के खून के प्यासे हैं और हम मार्ग ना दिखायें तो ये जंगली लोग आपस में मर-कटें।
जबकि आंखें खोलकर देखने वाला व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है कि लंबे समय से हिंदू और मुसलमान इस देश में साथ रहते आए हैं और अब भी उनके इतने गहरे अंतर्संबंध हैं कि उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। हालांकि धर्म और सियासत ने हमेशा ही दोनों के बीच खाई को चौड़ा करने का प्रयास किया है और उनके बीच झगड़े भी होते रहे हैं पर हर बम धमाके के बाद एक ही माला जपना जबकि एक आम आदमी को जिंदगी की जद्दोजहद से कहां इतनी फुर्सत कि सांप्रदायिक सदभाव बिगाड़ने के पुनीत कार्य में लग जाए।
जब भी कोई बड़ा आतंकवादी हमला होता है तो हर बार सांप्रदायिक सदभाव का भोंपू फुल आवाज में बजने लगता है। पर आज तक मेरी समझ में ये बात नहीं आई कि आतंकवादी घटनाओं का सांप्रदायिक सदभाव से क्या लेना-देना है। जबकि लंबे समय से घटित हो रही आतंकी वारदातों के बावजूद ये साबित हो चुका है कि सांप्रदायिक सदभाव तो नहीं बिगड़ता अव्वल इससे नेताओं को बड़ा कष्ट होता है कि कहीं कोई सांप्रदायिक सदभाव बिगड़े और हम वोट बैंक का नंगा नाच शुरू करें। इन नेताओं की बात सुनकर तो ऐसा लगता है कि हिंदुस्तानियों पर कोई और काम रह ही नहीं गया है बजाय सांप्रदायिक सदभाव बिगाड़ने के। अरे भाई हमको कोई काम-धाम है कि नहीं, हमारे घरों में बाल-बच्चे नहीं हैं, जिनके लिए हमें रोज सुबह काम के लिए निकलना पड़ता है, जो हम हिंदू और मुसलमान सांप्रदायिक सदभाव के पीछे पिल पड़ें और यदि हिंदू-मुसलमान के बीच का ये सांप्रदायिक सौहार्द एक बम धमाके के इंतजार में ही बिगड़ने को बैठा है तो इससे तो सांप्रदायिक वैमनस्य ज्यादा भला है। पर शुक्र की बात है कि ऐसा कुछ है नहीं।
मेरी कल की पोस्ट पर आयी कुछ टिप्पणियों का मैं जिक्र करना चाहूंगा
आदरणीय श्री दिनेशराय द्विवेदी जी जिन्हें मैं अपना गुरू मानता हूं ने लिखा है कि "आप बेटी को तो अधिकार दे सकते हैं। उस बेटी के बेटे की बहू को क्यों नहीं? क्या इस लिए कि वह पराए घर से आई है?" उनसे मैं कहना चाहूंगा कि यहां बात अधिकार देने या ना देने की नहीं है। बात है तो अधिकारों के इस्तेमाल के जायज और नाजायज तरीके की। यहां मेरा या किसी और का किसी पराये या विदेशी से व्यक्तिगत वैमनस्य नहीं है। मनमोहन सिंह जिनके बारे में तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता वे भी भारतीय हैं और उनके बारे में भी मैं पहले लिखता रहा हूं कि उनमें जरा भी गैरत होती तो वे यूं प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ना बैठे होते। और जो भी सत्ता के उच्चतम स्तर पर बैठा है उसे आलोचनाओं का सामना करना होगा फिर वह यह कहकर तो नहीं बच सकता कि वह विदेशी है इसलिए उसके बारे में ऐसा कहा जा रहा है। ऐसे में तो उसको स्वयं और जिम्मेदार तरीके से व्यवहार करना चाहिए। और जहां तक बेटी (इंदिरा गांधी) की बात है तो उन्होंने भी गरीबी हटाओ का नारा देकर क्या देश की जनता के साथ मजाक नहीं किया था, जब भ्रष्टाचार चरम पर था और उन्होंने कांग्रेस पार्टी को भाटों और चारणों की पार्टी में तब्दील कर दिया था और ये उन्हीं के चिरंजीव थे जो गरीब को रोटी ना होने पर ब्रेड खाने की सलाह देते थे। अब उनकी जगह सोनिया है तो उसे भी आलोचना सहनी होगी भले ही वह देश की नागरिक हो और वर्षों तक इस देश में बिना नागरिकता के रहने के बाद अब उसकी नागरिक बनकर उसने हम पर कोई अहसान तो नहीं किया है।
और आदरणीय डॉ. अमर कुमार लिखते हैं कि सोनिया से ऎसा द्वेष
क्यों ? शासक को कोसने से पहले उनको पकड़ें, जो शासित
होने को निहुरे पड़े हैं, मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि, आप
सच्चे भारतीय हैं.. भारतीय तो आप यहाँ जन्म लेने मात्र से
स्वतः हो गये, सच्चे यूँ कि किसी को भी गरिया कर और अपना
कालर झरिया कर हम निश्चिन्त हो लेते हैं... आप भी तो ?
डॉक्टर साहब आपसे कहना चाहता हूं कि मेरा सोनिया गांधी से कोई व्यक्तिगत वैमनस्य नहीं है। जब साढ़े चार साल पहले वे सत्ता में आई थीं तब हमने भी उनसे कुछ उम्मीदें लगाई थीं कि बीजेपी के शाइनिंग इंडिया के नाटक के बाद अब कोई तो ऐसा मिले जो बस काम करे। पर वे तो अपनी सास इंदिरा गांधी के पावन पदचिन्हों पर चल निकलीं। उन्होंने अपनी पार्टी में कार्यकर्ता नाम के जीव का अस्तित्व ही खत्म कर दिया अब वहां बस चाटुकार ही पाये जाते हैं और कितनी बेशर्मी से उनका एक चाटुकार शिवराज पाटिल इतनी बुरी तरह इज्जत उतरने के बाद भी कहता है कि आलाकमान का मुझमें पूरा विश्वास है। मतलब जनता का आपमें विश्वास हो ना हो सोनिया के दरबार में आप रोज जाकर दंडवत करें तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वाह दुनिया में भारत शायद पहला देश होगा जहां ऐसी मिसाल मिलेगी।
और जहां तक गरियाने की बात है तो मुझे, आपको और हम सभी को सत्ता तंत्र की आलोचना का पूरा अधिकार है। यदि आलोचना ना की जाए तो कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि जो तटस्थ्ा रहेगा समय उनके भी अपराध लिखेगा और आलोचना की जाए तो एक सच्चे भारतीय का तमगा आप दे ही दे रहे हैं कि भारतीयों को यही काम है बस गरियाने का। अब आप ही मार्ग सुझायें कि ऐसे समय में क्या किया जा सकता है।
मेरे मित्र गौरव कहते हैं कि मैं सोनिया जी का नाम यहां पर तर्कसंगत नहीं मानता... वो देश की बहु हैं और इस नाते से बराबर का सम्मान उनका हक है. किसी दूसरे देश मैं जन्म लेना किसी भी रूप से से उनके व्यक्तित्व को छोटा नहीं करता या नहीं कर सकता
गौरव भाई आपकी गलतफहमी पर क्या कहूं पर वे एक देश की बहू नहीं एक परिवार की बहू हैं जिसने यहां राज करने का पट्टा लिखाया हुआ है और आजकल उस पट्टे के दम पर वो राज कर रही हैं....और उनकी मंत्रिमंडल के लोगों के लिए भी उनके पास एक पट्टा है जो आमतौर पर एक जानवर विशेष के लिए होता है और उसी के दम पर प्रधानमंत्री और उनकी पूरी कैबिनेट उनके सामने दुम हिलाती है। मुद्दा यहां किसी से भेदभाव का नहीं है मुद्दा तो देश के आम आदमी की जिंदगी बनी हुई है ऐसे में हम उस महिला के सम्मान की ढपली कैसे बजायें।
Tuesday, September 16, 2008
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11 comments:
Bhuvnesh ji ,
thanks for commenting on My blog...
Aap mere blog par Adsense likh ke sarch kijiye to aapko shayad kuch achha mil jayega
waise Aage bhi isme likhne wala hun....
Again Thanks for commenting
Ankit
http:/hi.pratham.net
प्रिय भुवनेश मेरी ग्वालियर/ककनमठ की यात्रा एवं मुरेना में बिताये गये कुछ क्षण आज भी मन में ताजा है. कई बार लगता है कि काश पंख होते तो उडकर अपनी चंबल की मिट्टी में वापस चला जाता.
पिछले ग्वालियर यात्रा के आखिरी हफ्ते से चिट्ठाकारी जो बिगडी तो अब जाकर मैं नियमित हुआ हूँ.
आज तुम्हारा नाम देखा तो एकदम चटका कर यहा आ गया. यह लेख बहुत पसंद आया. खासकर निम्न वाक्य:
"जब भी कोई बड़ा आतंकवादी हमला होता है तो हर बार सांप्रदायिक सदभाव का भोंपू फुल आवाज में बजने लगता है।"
लिखते रहो. सशक्त कलम है तुम्हारी.
पुरातत्व की कोई नई खबर है क्या मेरे लिये?
सस्नेह
-- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
कल तक जो बहू के लिए रो रहे थे, आज चुप बैठे है? अरे भाई लोगों कुछ तो बोलो, क्या दुखियारी बहू के समर्थन में कोई मर्द सामने नहीं आएगा?
भुवनेश जी, आप अत्यन्त निकट हैं, आप में भविष्य की अनेक संभावनाएँ भी हैं। इसीलिए दो लाइन की वह छोटी टिप्पणी की। अन्यथा मैं उस आलेख को पढ़ कर वैसे ही छोड़ देता।
मेरा प्रतिवाद इस बात को ले कर नहीं कि आप वंशवाद के विरुद्ध बात न करें, वह इसलिए भी नहीं कि आप सोनिया और मनमोहन सिंह के कार्यकलापों की आलोचना न करें। वह खूब करें। वह जरूरी भी है। लेकिन आलोचना का मुद्दा यह तो नहीं कि वह विदेश से आयी है। यदि आप उसे विदेश से आयी कह कर ही कोसते रहे तो फिर वह आलोचना नहीं गाली गलौच होगी। मुद्दों पर आलोचना के स्थान पर मुद्दों से भटकाव होगा।
आप की पोस्ट पर कल अनेक भटकाव थे। वस्तुतः आप भी मीडिया के टीआरपी भटकाव के चक्कर में आ गए। शिवराज पाटील की आलोचना गृहमंत्री के रूप में उन की असफलता को लेकर की जा सकती है। लेकिन टीवी क्या दिखा रहा है? उन्होंने तीन बार कपड़े क्यों बदले? यह आलोचना का विषय नहीं हो सकता। लेकिन भारतीय जनमानस को यह प्रभावित करता है, यहाँ धारणा यह है कि घर में गमी हो जाने पर बारह दिनों तक कपड़े मत बदलो, बदलो तो उन पर प्रेस न हो, सिर में तेल न ड़ालो, कंघी न करो, हजामत न बनाओ साबुन न लगाओ आदि आदि। टीवी चैनल अपना टी आर पी बढ़ा रहा है।
अब मैं आप की पोस्ट में उपयोग किए गए शब्दों पर आ जाता हूँ। आप ने 'आयातित महारानी' 'मक्कार''लात मारकर''इटेलियन महारानी''विदेशी महिला'प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लिए पालतू कहना''सिक्ख होने के बावजूद अपना सिर मुंडवाना''विदेशी महिला की जूतियों का सम्मान' 'संविधान में आस्था न होना' आदि शब्दों का प्रयोग किया है।
आप एक वकील भी हैं। केवल भारी भारी अपमानित करने वाले शब्दों का उपयोग करने मात्र से काम नहीं चल सकता, उन पर लोग ध्यान ही नहीं नहीं देंगे। क्यों कि यहाँ कोई शब्द प्रतियोगिता नहीं हो रही है। कि जो अधिक भारी भरकम अपमानित करने वाले शब्दों का प्रयोग करे वह प्रतियोगिता को जीत लेगा।
गृहमंत्री की आलोचना उस के कपड़े बदलने से की जाएगी क्या? सोनिया की आलोचना क्या उस के विदेशी होने से की जाएगी?
आप ने वास्तविक मुद्दों से संबंधित आलोचना की होती तो आप को और लोगों की प्रशंसा भी मिली होती। क्यों कि ऐसी आलोचना के लिए मुद्दे उपलब्ध हैं। हालांकि जिस तरह की आलोचना आपने की उसे भी अनेक लोगों की प्रशंसा मिल गई है। लेकिन ऐसी प्रशंसा करने वाले लोग वे हैं जो अपने विरोधियों के प्रति अपशब्दों का प्रयोग सुन कर ही प्रसन्न हो लेते हैं। उन्हें आप से कोई लेना देना नहीं। इस प्रशंसा से आप को लाभ के स्थान पर हानि ही होगी। क्यों कि आप इसे ही सही आलोचना समझ कर इसी मार्ग पर आगे बढ़ते रहेंगे।
आज आप ने फिर से सांप्रदायिक सोहार्द्र को भाड़ में जाना लिखा है। वही तो इस देश की जीवनी शक्ति है। आतंकवादी क्या चाहते हैं? यही न कि सांप्रदायिक सोहार्द्र भाड़ में चला जाए? और क्या आप भी यही नहीं कह रहे हैं? इस तरह आप भारत की नहीं, भारतीय जनता की भी नहीं अपितु आतंकवादियों की मदद कर रहे होते हैं।
आप में देश और जनता के प्रति जज्बा है। आप सही आलोचना तक जा सकते हैं। लेकिन उस के लिए वे मुद्दे उठाने होंगे जिन में दम हो और जिन के सबूत भी हों, जो तार्किक भी हों। तभी वह श्रेष्ठ आलोचना होगी।
आशा है मेरी इस आलोचना को आप या कोई भी अन्यथा नहीं लेंगे।
"भुवनेश जी, आप में भविष्य की अनेक संभावनाएँ भी हैं।"
अतः चूप रहा करें, मेडम के बारे में अंटसंट न लिखा करें. देश का मतलब गाँधी परिवार है अतः उनकी बहू देश की बहू.
संजय बेंगानी की सलाह मानें!
जी हाँ, गाँधी परिवार की आलोचना करना मतलब देशद्रोह है, आप पिज्जा की आलोचना कर सकते हैं लेकिन इटली का शब्द मुँह से निकला तो देख लेना… त्याग की प्रतिमूर्ति के बारे में ऐसा कहना शोभा नहीं देता, क्या आपको मालूम नहीं चीन ने भी उन्हें ही ओलम्पिक में बुलाया था, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति होंगे अपने घर के… गाँधी परिवार की जय बोलना और सेकुलर लोगों के साथ मधुर सम्बन्ध बनाये रखने में ही आपका फ़ायदा हो सकता है… देश इन्हीं लोगों का है, काहे आप इनकी आलोचना करके "साम्प्रदायिक" कहलाने का खतरा मोल लेते हैं?
सत्य कथन, और सांची अकुलाहट. सेकलरिज्म के नाम पर अवसरवादिता हो रही है और इस वक्त देश के लिए यही सबसे घातक है...
आपने बिल्कुल सही लिखा है. अपनी नालायकी को छिपाने का तरीका खोज रखा है शासन करने वालों ने. जैसे ही कोई आतंकवादी घटना होती है, ये साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखने की बात क्यों करते हैं, पता नहीं? लगता है जैसे याद दिला रहे हों कि तुमलोग कुछ करते क्यों नहीं?
रही सवाल सोनिया गाँधी या पाटिल साहब के विरोध का तो पाँच सौ मुद्दों पर इनका विरोध किया जा सकता है. इनलोगों ने पिछले लगभग पाँच सालों में जिस तरह से मनमानी की है, उसकी लिस्ट बड़ी लम्बी है. आप तो वकील हैं, क्या आपको यह याद नहीं कि अदालत के कितने फैसलों को इन्होने नहीं माना है? क्या-क्या नहीं किया है. कितनी बार सुप्रीम कोर्ट से फटकार मिली है. किन-किन मुद्दों पर इन्होने कैसे-कैसे लोगों का साथ दिया है, ये क्या छिपा हुआ है? या फिर देश के अदालत की तौहीन का मतलब देश के वकील ही नहीं समझते? अदालत के न जाने कितने फैसले विधेयक के द्बारा खारिज कर दिए गए हैं.....छोड़िये, क्या-क्या लिखूंगा. धर्मनिरपेक्षता की कमान संभालने वाले अभी आकर संघी बनाकर चलते बनेंगे.
हम तो यही कह रहे हैं-लिखते रहो। बस्स!
bhuvneshji , main aapse sahmat hoon.
main aapke blog se itna impress hua ki reply ke liye goole account create karna pada .
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