Wednesday, December 30, 2009

रिमोट कंट्रोल से ही चल पायेगा ये लोकतंत्र

आज के दैनिक भास्‍कर में वेदप्रताप वैदिक ने भारतीय राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भूमिका के बारे में लिखा है...उनकी भूमिका और प्रबल हो ऐसा लोकतंत्र और राष्‍ट्र दोनों के हित में है ऐसा वे कहते हैं...साथ ही सबसे बड़ा मुद्दा उन्‍होंने उठाया है दोनों पार्टियों के अंदर के आंतरिक लोकतंत्र का...उन्‍होंने भारतीय जनता के ऊपर थोपे हुए नेता जो कि जनता के अपने नहीं हैं, द्वारा शासन किये जाने की विडंबना पर चिंता व्‍यक्‍त करने के साथ बताया है कि इन नेताओं का रिमोट कंट्रोल कहीं और ही है.

वैदिकजी की बात से असहमत होने की कोई वजह नहीं है परंतु जो बातें उन्‍होंने कहीं यदि ऐसा वाकई में संभव हो जाए और गांधी परिवार कांग्रेस को एवं अन्‍य पार्टियों के अपने-अपने रिमोट कंट्रोलर उन्‍हें रिमोट कंट्रोल से संचालित करने की बजाय खुला छोड़ दे और आंतरिक लोकतंत्र विकसित होने देने लायक परिस्थितियां उत्‍पन्‍न हो सकें तब क्‍या स्थिति होगी क्‍या इसकी कल्‍पना नहीं की जानी चाहिए?.....हालांकि जो रिमोट कंट्रोल वाली कहावत है वह केवल कांग्रेस में ही नहीं है...ऐसा दल जिसका केवल एक ही सांसद या दो-चार ही एमएलए होंगे वहां भी यही स्थिति देखने मिलेगी.

एक साधारण व्‍यक्ति जो थोड़ी-बहुत राजनीति में दिलचस्‍पी लेता है वह भी निश्चित रूप से इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचेगा कि हर पार्टी में जो आका बैठा हुआ है यदि उसकी पार्टी पर पकड़ ढीली हो जाए या उसके बिना पार्टी की कल्‍पना करके देखें तो हमें केवल और केवल अराजकता नजर आयेगी...हां कुछ समय के लिए ये हो सकता है कि यदि उनके पास सत्‍ता है तो वे अपने हितों को ध्‍यान में रखकर एक-दूसरे से चिपके रहें....पर अंतत: सिर-फुटौव्‍वल ही होना है...उदाहरण देने की यहां आवश्‍यकता यों नहीं कि ये सभी बातें लोगों ने विगत काफी समय से अनुभव की ही होंगी....हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र ही इस प्रकार का है कि हम कभी विचारधारा को तवज्‍जो दे ही नहीं सकते...हमें कोई मसीहा चाहिए, हमें चमत्‍कारिक नेता चाहिए, हमारी आस्‍थाओं में सामंतवाद अभी भी जिंदा है....व्‍यक्तिपूजा से दूर हम रह नहीं सकते.... ऐसी स्थिति में सत्‍ता की चाबी जनता से कुछेक लोगों या परिवारों तक पहुंच जाना सहज ही है...फिर वे चाहे उसका कैसा ही दुरुपयोग करें...हम एक व्‍यक्ति विशेष को इतना शक्तिशाली बना देते हैं कि पार्टी में बाकी लोगों को यदि अपना अस्तित्‍व कायम रखना है तो उसको शीश नवाना ही पड़ेगा, इसीलिए कोई पार्टी व्‍यक्ति-विशेष के रिमोट से संचालित उपकरण बनकर रह जाती है.....

जब ऐसी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र लागू कर दिया जाए तो इतने मतभेद उभरकर सामने आयेंगे कि उसका हाल जनता पार्टी जैसा हो जाएगा...जैसा आज लोगों को पता ही नहीं कि कौन सी जनता पार्टी जनता पार्टी है और बाकी जनता पार्टियां जाने कितने व्‍यक्ति-विशेषों की तिजोरियों में बंद हैं...

बड़ी ही विचित्र विरोधाभासी स्थिति है....जैसा कि वैदिक कहते हैं कि सही मायने में लोकतंत्र स्‍थापित होने के लिए जरूरी है कि पार्टियों में भी आंतरिक लोकतंत्र हो....वाकई ये एक आदर्श स्थिति है...परंतु हमारी भारतभूमि पर रोना ये है कि यदि ऐसा आंतरिक लोकतंत्र पार्टियों में हो जाए तो ये सब लड़-झगड़कर लोकतंत्र का सब रायता ही फैला दें...और पार्टी के इतने टुकड़े कर दें कि पता ही ना चले कि हम किस पार्टी और किस आंतरिक लोकतंत्र की बात कर रहे थे... इसलिए कम से कम रिमोट कंट्रोल से ही सही और दिखावे के लिए ही सही लोकतंत्र तो चल ही रहा है...बाकी वैदिकजी के लेख पर यही कहा जा सकता है कि 'दिल के खुश रखने को वैदिकजी ये खयाल अच्‍छा है'

Friday, December 11, 2009

आज नये लुटेरों को चुनने का पर्व है

अव्‍वल तो अपन ज्‍यादा बुद्धिजीवी चोचलों में फंसने के बजाय और क्‍यों हर किसी को वोट का इस्‍तेमाल करना चाहिए की बहस में पड़ने से इतर वोट डाल आते हैं....हमारे कुछ घनिष्‍ठों के बहिष्‍कारपूर्ण रवैये के बावजूद ...अब कोई वोट दे या ना दे हमारी बला से, हमने ठेका ना ले रखा दूसरों को जागरूक करने का...पिछले लोकसभा चुनाव में एक नया फैशन चला कि मतदान केंद्र जाकर अपनी पहचान प्रदर्शित कर हस्‍ताक्षर करो, उंगली पर स्‍याही लगवाओ और बिना वोट डाले ही आ जाओ...सो हम फैशन के मारों ने वो भी करके देख लिया....बाद में अखबारों से पता भी लगा कि फलां जगह इतनी डंपिंग हुई फलां जगह फलां के लोगों ने कब्‍जा कर दूसरों को वोट ना डालने दिया....सब कुछ हुआ और हम बड़े प्रसन्‍न कि हां भाई कम से कम हम जैसे जागरूक लोगों ने तो बहुत हटके और कुछ नया टाइप का काम किया लोकतंतर के वास्‍ते...अब ऐसे लोगों की संख्‍या यदि बढ़ेगी तो जरूर कुछ बात बनेगी...सरकार की भी बात कुछ खोपड़ी में आयेगी....पर उक्‍त चुनाव में जीत का अंतर डेढ़ लाख देखकर और हम जैसे फैशनबाजों की संख्‍या दहाई से तिहाई ना होते देखकर अपना उत्‍साह भी ठंडा....

अब आज से पिछले वाले नगर-निकाय के चुनावों का हाल...वार्ड में स्‍थानीय मंत्रीजी दिनभर अपनी लालबत्‍ती लगाकर घूमते रहे...सैकड़ों वोटरों को पहली बार ज्ञान हुआ कि हम इस वार्ड में आज के लिए मतदाता नहीं रहे...हो सकता है कल कोई दूसरे चुनाव हों तो दुबारा हमारा नाम आ जाए...फिर वोटों की गिनती का भी अपना अलग ही तौरतरीका है....मतगणना केंद्र से खबर निकली कि फलां जीत गए...पता लगा कि जीत की घोषणा गलती से हो गई...दुबारा गिनती में मंत्रीजी के चहेते विजयी होकर निकले

बहरहाल आज अपने लिए चैन है, बर्षों बाद लगा कि सुबह से शाम तक बिजली मिलना किसे कहते हैं इसलिए ठाठ से ब्‍लॉगिंग कर रहे हैं...और छुट्टी का आनंद ले रहे हैं...अभी थोड़ा काम से बाहर निकले तो पता लगा कि शहर में जगह-जगह मुख्‍य मार्गों के आसपास भी जो मतदान केंद्र बने हैं उसके आसपास पत्‍थर रखकर, हाथठेले अड़ाकर सारा यातायात बंद....सारे बाजार बंद...सारे यातायात के साधन बंद....भाई शांतिपूर्ण मतदान जो कराना है...फिर मतदाता भले ही शांतिपूर्ण ढंग से वोट डालने को तैयार हो पर हमें तो शांति की सही परिभाषा ही लागू करनी है...भले हमें कहीं जाना है और हम इंतजार कर रहे हैं कि कब शाम हो और सब कुछ सामान्‍य हो...इतने में एक सज्‍जन मिले मुहल्‍ले में पूछने लगे कि वोट नहीं डाले क्‍या...हमने कहा डालकर भी क्‍या होगा...सो हमें अकल बताने लगे कि वोट तो जरूर देना चाहिए....एक झन्‍नाटेदार झापड़ देने की विकट इच्‍छा होते हुए भी उसे जब्‍त करके हमने टरकाने के लिए कहा कि शाम तक डाल ही आयेंगे...वरना और जब्‍त करना पड़ता....वैसे भी हिंदुस्‍तान के सबसे बुरे लोकतंत्र जिसे लुभावने शब्‍दों में सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम से पुकारा जाता है, में आपकी जब्‍त करने की गजब की ताकत होनी चाहिए...तभी आप यहां जिंदा रह सकते हैं..

मुझे तो लगता है पाश की जो कविता है 'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' उसे केवल यहीं लिखा जा सकता था।

Wednesday, July 29, 2009

आईये पाक में बढ़ते आतंक के लिए माफी मांगे

मुंबई हमलों के बाद जब दिल्‍ली में बैठे गीदड़ों में भभकी देने का कंपटीशन चला तब ऐसा लगा कि वाकई कुछ हो लेगा. अब तो अमेरिका भी साथ है और सबूत भी और उधर यूएन को भी समझाके पाक की कर देंगे ऐसी-तैसी. पर हाय रे किस्‍मत ! ...क्‍या कहें जैसी किस्‍मत हमारे पडौसियों ने पाई उसका जवाब नहीं. गीदड़ कुर्सी पे यहां बैठते हैं और पूंछ उनके निजाम के सामने हिलाते हैं. वाह जी वाह....इसे ही तो कहते हैं अंधे के हाथ बटेर नहीं बतख लगना....वरना कोई बेवकूफ थोड़े ही खामखा मिस्र के बियावान में जाकर अपनी नाक काटकर पेश करेगा, ऐसी बहादुरी तो कोई महान स्‍कॉलर ही कर सकता है जिसकी विद्वत्‍ता और मैनेजमेंट की चर्चा लोग-बाग ऐसे बयान करते हैं जैसे उसने गद्दी पर बैठकर इस मुल्‍क पर अहसान कर दिया हो....दाल बेशक नब्‍बे रुपये हो फर्क नहीं पड़ता, भई दाल महंगी है तो पनीर खाओ, रोटी महंगी है तो ब्रेड खाओ...खामखा यहां का अवाम चुपचाप ऐसे विद्वान से शासित होने के बजाय हल्‍ला मचाता है.
मेरा अनुरोध उक्‍त विद्वान महोदय से सिर्फ इतना है कि यदि उन्‍हें हमारे पडौसियों के दुखदर्द की इतनी ही चिंता है तो क्‍यों नहीं उनके यहां आतंकवाद,दुखदर्द, गरीबी, भुखमरी मिटाने को एक पैकेज की घोषणा कर देते....भुखमरी दूर हो ना हो, कम से कम कुछ समय के लिए वे उससे असलहा वगैरह खरीदकर खुद की भारतीयों से रक्षा ही कर लेंगे आखिर हमने उनकी नाक में दम जो कर रखा है....मुझे पक्‍का विश्‍वास है कि आदरणीय उक्‍त मसले पर अगली कैबिनेट और पार्टी मीटिंग में जरूर विचार करेंगे और यदि उनके पास वाकई एक इंसान का दिल है तो एक सताये हुए राष्‍ट्र से क्षमा मांगने तक में वे पीछे नहीं हटेंगे.

ऐसी महान आत्‍मा को मेरा कोटि-कोटि नमन !

Monday, June 15, 2009

ये बेजुबान भी हमारे अपने हैं

कुछ समय पहले मेरे पास एक एसएमएस आया जिसे यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं-

HUMBLE REQUEST:
Plz keep a bowl in ur balcony or window so that BIRDS can drink water as it too hot this summer for all lives...plz fwd it to all..

बचपन में मैं हमेशा पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम कर देता था...पर कुछ समय से थोड़ा आलसी हो गया हूं...पर मेरी एक रिश्‍ते की बहन ने एसएमएस करके फिर से मुझे इसके लिए उकसाया और अपना आलस त्‍यागकर छत पर गया तो दो पुराने मटके रखे हुए थे। उनके ऊपरी हिस्‍से को काटकर मैंने उनमें पानी भरा और अलग-अलग जगहों पर रख दिया।
इस एसएमएस को यहां रखने का यही उद्देश्‍य सभी को इसके लिए उकसाना है कि अपने घरों की छतों, बालकनियों, छायादार स्‍थानों पर गर्मियों में मिट्टी के बर्तन या पुराने मटकों इत्‍यादि में पानी भरकर रखें जिससे बेचारे प्‍यासे पक्षी अपना कंठ तर कर सकें।
वैसे भी हमारे भारत में प्‍यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्‍य माना गया है तो क्‍यों ना मुफ्त में पुण्‍य भी बटोर लें :-) ।

Sunday, June 14, 2009

जरूरतें कम करके भी आप पर्यावरण को बचा सकते हैं


सबसे पहले तो अपन स्‍पष्‍ट कर दें कि अपन यहां पूंजीवाद, साम्‍यवाद, समाजवाद या और किसी वाद या विचारधारा पर बहस की शुरूआत नहीं कर रहे। फिलहाल जो दुनियाभर में हल्‍ला मचा हुआ है ग्‍लोबल वार्मिंग का और उसके लिए जो प्रयास हो रहे हैं वो कितने मायने रखते हैं जब तक हम एक व्‍यापक परिवर्तन या ठीक से कहें तो जीवनशैली में परिवर्तन को एक मुद्दा नहीं बनाते। मेरा मानना है कि आज के इंसान की जीवनशैली संबंधी जरूरतें इसी तरह बढ़ती रहें और साथ ही हम ग्‍लोबल वार्मिंग व पर्यावरण की ढपली भी बजाते रहें तो उससे कोई सुधार आ सकेगा ऐसा लगता तो नहीं।
आज की मुक्‍त बाजार व्‍यवस्‍था और पूंजीवाद के घनघोर समर्थक चाहते हैं कि लोगों की जरूरतें बढ़ें, लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा उपभोक्‍ता सामान खरीदें, उन्‍हें किसी भी तरह ललचाकर बाजार तक खींचा जाए और यही एक बढ़ती और तरक्‍की करती हुई अर्थव्‍यवस्‍था का मूलमंत्र है। इसी विषय पर मैंने काफी समय पहले एक पोस्‍ट लिखी थी (पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) जिसमें मैंने मुद्दा उठाया था कि किस प्रकार पूंजीवादी व्‍यवस्‍था लोगों की जरूरतें बढ़ाने और बेवजह के सामानों का निर्माण कर उन्‍हें बहुत ही आवश्‍यक वस्‍तु के रूप में प्रचारित कर बाजार में खपाने की है। पूंजीवाद के समर्थकों का कहना है कि इस व्‍यवस्‍था के अलावा फिलहाल कोई विकल्‍प नहीं है और ये व्‍यवस्‍था लोगों का जीवन-स्‍तर सुधारने और उपभोक्‍ता वस्‍‍तुओं तक उनकी पहुंच सुलभ बनाने के लिए कारगर साबित हुई है परंतु धरती पर दिनोंदिन बढ़ रहा कचरा, ई-कचरा, संसाधनों का अंधाधुंध शोषण, कटते जंगलों के लिए क्‍या यही व्‍यवस्‍था उत्‍तरदायी नहीं है। केवल और केवल यही कारण है कि मुझे इस व्‍यवस्‍था से चिढ़ है चूंकि पर्यावरण के लिए बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍थाएं और बढ़ते बाजार एक अभिशाप बन चुके हैं और ध्‍यान देने वाली बात ये है कि इन बाजारों में आम इंसान की जरूरत की चीजों के अलावे जो अधिकांश चीजें खपाई जा रही हैं उनकी वास्‍तविकता में कोई जरूरत व औचित्‍य नहीं है पर बाजार बढ़ाना है, मुनाफा बढ़ाना है अर्थव्‍यवस्‍था बढ़ानी है और सबसे बड़ी बात ये है कि दूसरे देशों से आज के युग में प्रतिद्वंदिता भी करनी है और मुनाफे की इस रेस के लिए चाहे कितनी भी कुर्बानी देनी पड़े सब जायज है।
लोगों को मेरी बात कष्‍ट पहुंचा सकती है...कुछ लोग ये भी कहेंगे कि पैसा जो मैं अपनी मेहनत से कमाता हूं उसे खर्च करने की मुझे पूरी आजादी है पर क्‍या एक इंसान होने के नाते आपकी जो जिम्‍मेदारी है उसके लिए क्‍या आपने सोचा है।
हालांकि इसमें लोगों का दोष भी नहीं है....उन्‍हें जो सिखाया जाता है वे वैसा ही करते हैं। आजकल के बच्‍चे जो पैदा होते ही टीवी देखकर बड़े हो रहे हैं वे बड़े होकर इन सब बातों को कैसे समझ पायेंगे। आज की बाजार व्‍यवस्‍था एक ऐसा समाज तैयार कर रही है जिसमें उसे केवल उपभोक्‍ता ही नहीं बनाने हैं बल्कि उनकी सोच, उनकी आदतों का भी निर्माण करना है और ऐसे ही लोगों की जरूरत है इस सिस्‍टम को।
महात्‍मा गांधी का वो प्रसिद्ध कथन तो सबने पढ़ा होगा कि ये धरती लोगों की जरूरतें पूरा करने में सक्षम है पर उसके लालच को नहीं। पर फिर भी बाजार व्‍यवस्‍था के समर्थक कुतर्क करने से बाज नहीं आने वाले जबकि बाजार व्‍यवस्‍था और बढ़ता हुआ लालच एक दूसरे के पर्यायवाची हैं और दुनिया को लगातार लालची बनाते जाने के दुष्‍परिणाम हम अभी से देख ही रहे हैं।
ब्राजील में अमेजन के घने जंगल जिन्‍हें धरती के फेफड़े भी कहा जाता है उन फेंफड़ों में भी यही लालची बाजार व्‍यवस्‍था कैंसर की तरह प्रवेश कर चुकी है। पर फिर भी लगता है कि पर्यावरण सरकारों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है सभी मुद्दों का केंद्र है बढ़ती हुई अर्थव्‍यवस्‍था जिससे उद्योगपति भी खुश, उपभोक्‍ता भी खुश और टैक्‍स से अपनी जेबें भरने वाली सरकारें भी खुश।
एक साधारण समझ की बात है एक तरफ तो हम अपनी जरूरतों को बढ़ाने में लगे हुए हैं दूसरी तरफ पर्यावरण की भी बात कर लेते हैं। ये दोनों ही बातें घोर विरोधाभाषी हैं....जैसे हम पानी बचाने की बात करते हैं पर पैसा होने पर घर में खुद का स्‍वीमिंग पूल बनवाने से भी नहीं कतराते। जबकि जितनी भी लग्‍जरी सुविधाएं हैं उन्‍हीं की कीमत हम चुका रहे हैं।

खैर इस तरह की उपदेशात्‍मक बातें करके भी हम क्‍या उखाड़ लेंगे। आईये आज हम मिलकर संकल्‍प लेते हैं कि बाजार से केवल उन्‍हीं सामानों को खरीदेंगे जिनकी हमें जरूरत है। केवल विज्ञापनों से प्रभावित होकर, पड़ौसियों व रिश्‍तेदारों से प्रभावित होकर हम बाजार का रुख नहीं करेंगे। यही एक मंत्र है जिसको हमें आत्‍मसात करना होगा यदि वाकई हम पर्यावरण के प्रति सचेत हैं।

Sunday, June 07, 2009

सभी हिंदी ब्‍लॉगर्स से पर्यावरण के हित में एक अनुरोध


परसों विश्‍व पर्यावरण दिवस था, इस प्रकार के औप‍चारिक दिवस चूंकि दिखावा बन कर रह गये हैं सो लोगों ने इस ओर ध्‍यान देना ही बंद कर दिया है हालांकि पहले भी इनको कितनी तवज्‍जो दी जाती थी यह सभी जानते ही हैं...बस चंद बड़े अखबारों में सरकारी विज्ञापन और संपादकीय लिखने भर की रस्‍म-अदायगी करके दिवस मना लिया जाता है पर फिलहाल अपन इस तरह की बातों का रोना-धोना मचाकर खुद को बुद्धिजीवी साबित नहीं करना चाहते सो कुछ ठोस बात करते हैं।

काफी दिनों से सोच रहा था कि ऐसे कौन से उपाय हैं जो हम अपने पर्यावरण को बचाने और इस धरती को लाखों-सालों तक जीवित बनाये रखने के लिए अपना सकते हैं। वैसे जहां बिगड़ते पर्यावरण के बावजूद लोगों को गैरजिम्‍मेदाना हरकतें करते देखता हूं तो खून खौल उठता है परंतु फिर भी हमारे आसपास अक्‍सर ऐसे सज्‍जन लोग मिल ही जाते हैं जो अपने पर्यावरण के लिए वाकई ईमानदारीपूर्ण प्रयास कर रहे हैं पर मुझे लगता है कि ऐसे एकल प्रयासों के साथ-साथ सामूहिक प्रयासों की भी आवश्‍यकता है और मेरा मानना है कि हमारा हिंदी ब्‍लॉगर्स का जो इतना बड़ा समुदाय है वह साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ संकल्‍प ले और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करे तो लाखों-करोंड़ों नहीं तो कुछ हजार लोगों का ये कदम बहुत छोटा ही सही कुछ तो परिवर्तन ला ही सकता है। वैसे काबिले-गौर बात ये भी है कि ज्‍यादातर हिंदी ब्‍लॉगर इस बारे में काफी सजग हैं और अपने स्‍तर पर प्रयास करते भी रहते हैं। काफी समय पहले परिचर्चा नामक फोरम पर(जो कि आजकल बंद पड़ा हुआ है) बहुत से ब्‍लॉगर्स ने अपने प्रयासों और आइडियाज को शेयर किया था वे वाकई काबिले-तारीफ थे जैसे संजय बेंगाणीजी महानगर में रहते हुए भी अपने अधिकर कामों के लिए सायकल का प्रयोग करते हैं, बहुत से लोग पॉलीथीन की जगह कपड़े के थैले प्रयोग कर रहे हैं, पानी का भी बहुत किफायत से इस्‍तेमाल करने वाले लोग हैं।
मेरा मानना है कि हम सभी लोग जो भी प्रयास कर रहे है उन्‍हें एक-दूसरे से साझा करें, कुछ तुम चलो कुछ हम चलें की तर्ज पर और जो भी इसके लिए नया किया जा सकता है करें, नये नये उपाय एक-दूसरे को सुझायें-अपनायें। साथ ही अपने परिवार और आसपास में भी यथासंभव जो किया जा सकता है उसकी शुरुआत करें ।

फिलहाल तो मेरी सभी ब्‍लॉगर बंधुओं से अपील है कि वे अपने-अपने चिट्ठे पर खुद के द्वारा पर्यावरण के लिए किये जा रहे प्रयासों से दूसरों को अवगत करायें हालांकि कुछ लोगों को ये खुद मियां मिट्ठू बनना लग सकता है फिर भी प्‍लीज ऐसा करें क्‍योंकि जब हम अपने आइडियाज दूसरों से शेयर करेंगे तो ही तो हम दूसरों को कुछ बता पायेंगे और उनसे कुछ नया सीख पायेंगे।

फिलहाल तो मैं खुद के कुछ प्रयासों के बारे में यहां लिख रहा हूं आप सब से भी अपील है कि अपने-अपने चिट्ठे पर ऐसे ही प्रयासों के बारे में लिखें जिससे दूसरे भी पढ़कर उन्‍हें अपना सकें।-

1- सबसे पहले बात बिजली की, अपने घर में जिन बिजली के उपकरणों जैसे पंखा, टीवी, ट्यूबलाइट आदि का प्रयोग नहीं हो रहा है उनको बंद करना

2- बल्‍ब की जगह सीएफएल प्रयोग करना

3- पॉलीथीन का प्रयोग यथासंभव कम करना और जहां उसके बिना काम चल सकता हो वहां उसका प्रयोग ना करना।

4- जितना संभव हो पैदल चलना, सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग करना। पैदल चलना इसलिए भी मुफीद है कि मेरा शहर छोटा है।

5- एक तरफ से प्रिंट किये हुए फालतू कागजों, पैम्‍पलेट आदि को कचरे में नहीं फेंकना बल्कि उनकी दूसरी तरफ लिखने के लिए प्रयोग में लेना।

6- पानी का जितना कम प्रयोग हो सके करना और फालतू पानी को पौधों-गमलों में डालना।

7- कॉस्‍मेटिक्‍स का प्रयोग बिलकुल नहीं करना क्‍योंक‍ि ऐसी अनुपयोगी चीजें केवल कचरे को बढ़ावा देती हैं जो बायोडिग्रेडेबल नहीं हैं साथ ही उनमें क्‍लोरो-फ्लोरो कार्बन होते हैं जो विशेष रूप से खतरनाक हैं।


हालांकि सूची बहुत छोटी है पर हौसले बुलंद हैं....इंशाल्‍लाह ये सूची आपके मार्गदर्शन से बढ़े और हमारे सामूहिक प्रयासों को नेट पर ही सही दुनिया देखे।
फिलहाल तो अपन यहीं से शुरूआत करते हैं....बाकी धीरे-धीरे जब कारवां चल पड़ेगा तो और भी मुसाफिर आ जाएंगे काफिले में... साथ ही आप सबसे एक छोटी सी गुजारिश और है कि अपने आस-पास और कहीं भी पर्यावरण के लिए काम कर रहे लोगों के छोटे-छोटे प्रयासों को भी अपने चिट्ठे पर प्रकाशित कर दूसरों को भी उनके बारे में बताएं..वस्‍तुत: यही लोग जो छोटे-छोटे प्रयास कर रहे हैं हमारे हीरो हैं और हमें इनके प्रयासों से खुद भी प्रेरणा लेकर दूसरों को भी उनके बारे में बताना चाहिए क्‍योंकि आलोचनाएं और दूसरों पर दोषारोपण तो बहुत हो चुका अब समय है खुद कुछ कर दिखाने का और सकारात्‍मक सोचने का.....वो गायत्री परिवारवाले कहते हैं ना कि हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।

Wednesday, March 18, 2009

भड़काऊ कौन है अब ये एनडीटीवी से पूछना पड़ेगा ?

वरुण गांधी आजकल खिसियाहट में अपने कहे से पल्‍ला झाड़ते नजर आ रहे हैं, बातों से ज्‍यादा खिसियाहट उनके चेहरे पर नजर आती है। उनके बारे में ज्‍यादा कहने की जरूरत नहीं है सिवाय इसके कि उनका ना तो भारतीय राजनीति और बीजेपी में ही कोई वजूद है और ना ही उन्‍हें बात करने तक की समझ है। बेचारे पहले चुनाव के समय जोश में आकर-उल्‍टा सीधा कह गये तो ना तो अब निगलते बन रहा है और ना उगलते, ऐसे नादान बालक अपनी लुटिया खुद ही डुबोते हैं...यदि वे जीत भी जाएं तो भी बीजेपी में उन्‍हें कोई घास डालने से रहा। सबसे बड़ी बात है उनके भीतर भरी कुंठा, यदि उनके पिता जीवित होते तो शायद वे भारतीय राजनीति के दैदीप्‍यमान नक्षत्र व युवराज जैसे संबोधनों से नवाजे जा रहे होते...पर हाय रे किस्‍मत! ऐसा कुंठित व्‍यक्ति यदि खुद के वजूद का अहसास कराने के लिए कुछ उल्‍टा-सीधा कर बैठता है तो इसमें बेचारे का क्‍या दोष। कुंठा से भरा हर व्‍यक्ति ऐसे ही ऊटपटांग हरकत करते पाया जाता है।

खैर आज रात एनडीटीवी के न्‍यूज पॉइंट पर मुख्‍य मुद्दा यही था....बेचारे की लंगोटी को पकड़े हुए थे चैनल वाले। वैसे भी हिंदूविरोध और खासकर बीजेपी विरोध का ठेका उन्‍होंने ले ही रखा है....बेचारे कम्‍युनिस्‍टों की मजबूरी भी है वे खाते ही इसका हैं....बाकी इसके लिए पैसा पाकिस्‍तान से आये या किसी खाड़ी देश से उन्‍हें सब मंजूर है।
चैनल के एंकर ने वरुण गांधी के बहाने एक तरफ से लपेटना शुरू किया पहले वरुण के बहाने बीजेपी की छीछालेदर शुरू की फिर बाबरी मस्जिद जैसे महान स्‍मारक के शहीद होने पे टसुए बहाए गए, फिर कल्‍याण सिंह और बाल ठाकरे को जी भरकर कोसा गया। कुल मिलाकर चुनावी मौसम में एनडीटीवी वाले जी-जान से जुटे हैं कि बीजेपी को एक भड़काऊ, फासीवादी, गंगा-जमुनी संस्‍कृति विरोधी और अंतत: चूंकि हमारा चरित्र सेक्‍युलर है इसलिए राष्‍ट्रविरोधी होने तक का सर्टिफिकेट दे दिया जाए।

ये चांडाल कंपनी बहुत सामाजिक सरोकारों और पत्रकारिता के ऊंचे आदर्शों की बात करती है पर अब चुनाव का मौसम है तो ये सब बातें छोड़कर केवल एक खास पार्टी के खिलाफ प्रोपेगैंडा चालू है। इसके लिए अलग से इन्‍हें चुनावी बजट भी मिला होगा।

कांग्रेस ने पिछले 5 साल में अपने कितने चेले-चपाटे राष्‍ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के जरिए लखपति-करोड़पति बना दिए इसका इनके पास कोई हिसाब किताब नहीं। उल्‍टा इनके चहेते कारत तो इस योजना को बहुत सफल मानते हैं। पिछले बीजेपी के शासन के मुकाबले इस शासन में आधारभूत-संरचना व निर्माण कार्यों पर कितना काम हुआ। सेना के आधुनिकीकरण के जो दावे किये जाते रहे वो कहां गये। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का दावा करने वाले राहुल बाबा को आम आदमी की समझ कितनी है.....राष्‍ट्रीय मुद्दों और राष्‍ट्रीय समस्‍याओं को वो कितना समझते हैं सिवाय अपने सुनियोजित स्‍टंटों के।

इन सब बातों के बजाय पूरा ध्‍यान इस बात पर दिया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी कितना बड़ा शैतान है....और यदि गलती से कहीं बीजेपी सत्‍ता में आ गई तो ईराक में सद्दाम हुसैन के शासनकाल से भी भयंकर कत्‍लेआम शुरू हो जाएगा....कल्‍याण सिंह के पुराने वीडियो बार-बार दिखाये जा रहे हैं और उस बहाने बीजेपी को गरियाया जा रहा है......एक साध्‍वी जिसके खिलाफ अभी तक आरोप साबित नहीं हुए और मामला चल रहा है उसका बहाना लेकर हिंदुओं को आतंकवादी होने का सर्टिफिकेट ये पहले दे ही चुके हैं....बाकी सोहराबुद्दीन जैसों के लिए भारतीय न्‍याय-व्‍यवस्‍था तक को गरिया सकते हैं....हिंदू तालिबानों से किसी भी तरह कम नहीं ऐसा भी ये एक परम मूर्ख और घटिया आदमी प्रमोद मुथालिक का उदाहरण देकर साबित कर ही चुके हैं.....

बाकी सेक्‍युलर और कम्‍युनिस्‍टों के लिए सब जायज है.....चाहे यासीन मलिक जैसे आतंकवादी खुलेआम मीडिया पर तकरीर करते पाये जाते हैं अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर.......पर बेचारे जम्‍मू के हिंदुओं के हितों के बारे में चर्चा करने की फुर्सत इन्‍हें आज तक नहीं मिली.....इनके चहेते कम्‍युनिस्‍ट रोजाना अनगिनत बांग्‍लादेशियों को सीमापार करवाकर उनके राशनकार्ड बनवाते हों....फिर भी रवीश कुमार जैसे महान पत्रकार टीवी पर इसी चिंता में घुले हुए नजर आते हैं कि पाकिस्‍तानी कलाकारों को हिंदुस्‍तान में क्‍यों कुछ लोग भला बुरा कहते हैं...और लगे हाथ इसके खिलाफ बीजेपी और संघ परिवार जैसे तालिबानी(?) संगठनों की भूमिका भी बतला देते हैं.....ये महान सेक्‍युलरता के झंडाबरदार लालू के समय में हुए दंगों और पासवान के बांग्‍लादेशियों के प्रति प्रेम को भूल जाते हैं क्‍योंकि वे सेक्‍युलर हैं.....असम में बांग्‍लादेशियों का हरा झंडा फहराना तक इन्‍हें मंजूर है... पर मकबूल फिदा हुसैन की प्रदर्शनी में हुए छुटपुट बवाल के खिलाफ वृंदा करात जैसी महान नेत्रियां इनके कैमरे के सामने चिल्‍लाने लगती हैं।

भाईयों एक दिन किसी हिंदू के मंदिर जाने या तिलक लगाने और जन्‍माष्‍टमी मनाने को भी सांप्रदायिक करार दे दिया जाएगा। वैसे भी वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलने को तो सांप्रदायिक करार दिया ही जा चुका है......किसी को भी खुद को भारतीय होने से पहले खुद को सेक्‍युलर साबित करना होगा तभी वह इस देश में रह सकेगा.....और सेक्‍युलरिज्‍म के सर्टिफिकेट के लिए आपको रवीश कुमार, बरखा दत्‍त एण्‍ड कंपनी की शरण में जाना होगा.....बाकी यदि आप जालीदार टोपी पहनते हैं, दाड़ी बढ़ाकर रखते हैं और हिंदू आतंकवाद की बात करते हैं तो आपका काम बिना सर्टिफिकेट के भी चल जाएगा :)

चलूं मैं भी सेक्‍युलर होने का सर्टिफिकेट ले लूं......खुदा हाफिज :)

Monday, February 23, 2009

गर्व है कि हम स्‍लमडॉग से बेहतर फिल्‍में बनाते हैं

कल तकरीबन छ: महीने बाद कोई फिल्‍म सिनेमा में जाकर देखी वो भी इसलिए कि फिल्‍म के बारे में इतना सुन रखा था कि बिना देखे रह नहीं सका.....पर लौटते समय यही बात जेहन में थी कि हम भारतीय कब बाज आयेंगे गुलामी की आदत से। स्‍लमडॉग के रिलीज से पहले और रिलीज के वक्‍त हमारे यहां विवाद हो चुके हैं पर अब जब इसे आठ ऑस्‍कर मिल चुके हैं तो सभी खुश हैं। मीडिया जश्‍न मना रहा है, कहीं इसे भारत की सफलता बताया जा रहा है, कहीं भारत का सम्‍मान।
पर मुझे अफसोस है कि क्‍यों मैंने इस घटिया फिल्‍म को देखने के लिए पैसे खर्च किये। यदि मनोरंजन की बात है तो साउथ की एक्‍शन फिल्‍में देखकर कहीं अधिक मनोरंजन हो सकता है और यदि वास्‍तविकता या सामाजिक मुद्दे पर फिल्‍म बनाने की बात है तो इसमें मुझे ऐसी कोई बात भी नजर ही नहीं आई। नजर आया तो केवल यह कि फिल्‍म का एक और केवल एक ही उद्देश्‍य था भारत की गंदगी, सड़ी हुई व्‍यवस्‍था और लोगों की दयनीय व्‍यवस्‍था को दिखाना और फिर वाहवाही लूटना। कुछ समय पहले अमिताभ बच्‍चन ने भी इसे लेकर नाराजगी जताई थी पर लोगों ने उनकी ही आलोचना करना शुरू कर दिया और फिर जब सब अच्‍छा ही अच्‍छा हो रहा हो- रहमान अवार्ड पर अवार्ड जीते जा रहा हो, भारतीय कलाकार उस फिल्‍म का हिस्‍सा हों और हमारी प्‍यारी आमची मुंबई पर फिल्‍म बनी हो तो बस हमें लग रहा है कि हमने दुनिया फतह कर ली।
पश्चिम में ऐसा प्रचार किया गया कि स्‍लमडॉग पहली फिल्‍म है जिसने भारत की वास्‍तविकता को सिनेमा के पर्दे पर दिखाया है। मतलब अब तक हम केवल मिथुन और शाहरुख टाइप मसाला और फूहड़ फिल्‍में ही बनाना जानते हैं और हमें एक गोरे से सीखने की जरूरत है कि फिल्‍म क्‍या होती है और कैसे व क्‍यों बनाई जाती है।
यदि हम मुंबई की ही बात करें तो विगत समय में हमारे यहां इतनी बेहतरीन फिल्‍में फिल्‍मकारों ने बनाई हैं कि स्‍लमडॉग वाला डैनी बॉयल उनके आगे पानी भरे। इस समय मुझे कुछ बेहतरीन फिल्‍में याद आ रही हैं- चांदनी बार, पेज3, ब्‍लैक फ्रायडे, अ वेडनेसडे और मुंबई मेरी जान। इन फिल्‍मों ने वाकई वास्‍तविकता के धरातल को छुआ है अपने सही अर्थों में। सच्‍चाई ये है और सच्‍चाई वो भी है जो स्‍लमडॉग में दिखाई देती है पर उसके पीछे छिपा नजरिया ही नहीं नजर आता।
यदि वास्‍तविकता की भी बात करें तो उस स्‍तर पर भी ये एक बचकानी फिल्‍म है। केवल मुंबई के स्‍लम्‍स, कूड़े के ढेर, गंदगी से पटे नाले, भीख मांगते बच्‍चे यही सब दिखाकर रियैलिटी का हल्‍ला मचाया जा रहा है। फिल्‍म का हीरो कैसे कौन बनेगा करोड़पति के हर सवाल का जवाब जानता है इसकी कहानी भी बहुत बचकानी सी और नाटकीय है। फिक्‍शन भी तर्कयुक्‍त होना चाहिए ना कि शाहरुख खान की 'रब ने बना दी जोड़ी टाइप'।
मेरे ख्‍याल में यदि स्‍लमडॉग जैसी घटिया फिल्‍म को ऑस्‍कर मिलता है तो कम से कम अब तो हमें जरूर खुश होना चाहिए। स्‍लमडॉग की सफलता पर नहीं बल्कि इस पर कि हम स्‍लमडॉग से बेहतर फिल्‍में बना चुके हैं और बना रहे हैं।
और हां वह गाना जिसके लिए रहमान को दो ऑस्‍कर मिले वाकई मुझे तो कुछ खास नहीं लगा पर ऑस्‍कर वालों को खास इसलिए लगा कि वह एक गोरे की फिल्‍म में है, जो कि केवल अपना सम्‍मान करना जानते हैं। रहमान इससे कई गुना बेहतर संगीत पहले रच चुके हैं। लगान या रंग दे बसंती के गीत ही सुन लें। पर गोरे लोगों को वही चीज पसंद आती है जिसमें हम भारतीयों की भद्द पिटे उनकी नहीं वरना लगान को ऑस्‍कर ना देने के पीछे का कारण मेरी समझ में तो नहीं आता।
हाल फिलहाल में सुना है एक भारतीय लेखक अरविंद अडिगा को भी बुकर मिला है। पश्चिम के हाथ एक और मसाला लगा है जिसके माध्‍यम से भारत की नीचता का प्रचार किया जा सके। पश्चिमी पुरस्‍कारों की मंशा मेरे ख्‍याल से पुरस्‍कार देकर हर उस चीज का प्रचार करने की है जिससे पूरब का अपमान होता हो। वरना वास्‍तविकता ही यदि दिखाना है तो बहुत कुछ है दिखाने को।
पर हमेशा पश्चिमी ठप्‍पा लगवाने को आतुर हम भारतीय हमेशा ऑस्‍कर को ही परम सत्‍य मानते हैं। क्‍या कोई भारतीय कह सकता है कि स्‍लमडॉग लगान से एक बेहतर फिल्‍म थी ? क्‍यों हम उस समय लगान के ऑस्‍कर में नामांकित होने पर जश्‍न मना रहे थे और पुरस्‍कार ना जीत पाने पर मायूस थे।
कुछ भी हो स्‍लमडॉग के ऑस्‍कर मिलने के बाद एक बात अच्‍छी हुई है कि हमें इस बात पर विचार-मंथन करने का मौका मिला है कि क्‍या वाकई ऑस्‍कर जैसे टुच्‍चे पुरस्‍कारों का कोई मतलब है और जो पुरस्‍कार ऐसी दोयम दर्जे की फिल्‍म को मिला है क्‍यों ना हम सब मिलकर उसका बॉयकॉट करें और फैसला लें कि अब कोई भारतीय फिल्‍म ऐसे छोटे और ओछे पुरस्‍कार के लिए ना भेजी जाए :) ।

छायाचित्र: बीबीसी के सौजन्‍य से।

Thursday, February 19, 2009

पूंजीवाद से चिढ़ इसलिए है

वैसे वैश्विक मंदी के दौर में जहां एक ओर सुना जा रहा है कि साम्‍यवादी विचारधारा की ओर फिर से लोग आकर्षित हुए हैं और कार्ल मार्क्‍स की किताबों की बिक्री बढ़ गई है तब पूंजीवाद जैसी व्‍यवस्‍था को गरियाना बुद्धिजीवी टाइप लोगों के लिए एक शगल हो सकता है खासकर उनके लिए जिनकी रोजी-रोटी ही पूंजीवाद के विरोध पर टिकी है ये बात अलग है कि उनकी खुद की जीवनशैली से पूंजीवाद को निकाल दिया जाए तो वे घिघियाने लगेंगे।
पर हर किसी के लिए पूंजीवाद के विरोध के अपने कारण हैं। ज्‍यादातर लोग किसी वाद या व्‍यवस्‍था के विरोधी इसीलिए होते हैं क्‍योंकि वे उसकी विरोधी व्‍यवस्‍था के पोषक होते हैं, ऐसे में उन्‍हें तो आंख मूंदकर उसका विरोध करना होता है। होता ये भी है कि यदि आप किसी एक विचारधारा या व्‍यवस्‍था का विरोध करते हैं तो आपको खुद-ब-खुद विरोधी खेमे का समझ लिया जाता है। जैसे यदि आप कांग्रेस का विरोध करते हैं तो यकीनन आपको लोग खाकी पैंट वाला ही समझेंगे चाहे आप उनसे भी कांग्रेस जितनी ही नफरत करते हों।

बहरहाल बिना बेकार की भूमिका बांधे सीधे मुद्दे पर आ जाते हैं। मैं कभी किसी वाद या विचारधारा का समर्थक नहीं रहा। किसी भी विचारधारा को अपना लेने के कारण मेरे ख्‍याल से हर सिस्‍टम या विचारधारा की अच्‍छी-बुरी बातों को जानने-समझने से हम महरुम रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में हम जब कुछ देखते हैं तो उसी विचारधारा के चश्‍मे से देखते हैं जैसे मनमोहन सिंह समाजवाद के नाम से और वामपंथी पूंजीवाद के नाम से बिदकते हैं।

पूंजीवाद के समर्थक मानते हैं क‍ि ये एक संपूर्ण व्‍यवस्‍था है और जनता के हितों के लिए जितने प्रयास इस व्‍यवस्‍था के माध्‍यम से किये जा सकते हैं उतने किसी और से नहीं। पर वास्‍तव में जनता-जनार्दन क्‍या है पूंजीवाद में ? अपना मुनाफा बढ़ाने का एक जरिया मात्र !
आज दोपहर में मैं एक नये बने शॉपिंग मॉल में घूम रहा था। वहां दो-चार शोरूम में मैंने लकड़ी का बना हुआ फर्श देखा। फालतू और बेवजह के लग्‍जरी सामान से बेहद चिढ़ होने के कारण मुझे बहुत बुरा लगा कि कैसे अनगिनत बेहतरीन पेड़ों को जूतों के तले रौंदे जाने के लिए फर्श में इस्‍तेमाल कर लिया जाता है। पिछले साल बीबीसी के राजेश जोशी दक्षिण अमेरिका में अमेजन के जंगलों से रिपोर्टिंग करते हुए कह रहे थे कि बड़ी तेजी से ये जंगल काटे जा रहे हैं और इसकी लकड़ी यूरोप और अन्‍य देशों में लकड़ी का सामान बनाने के लिए हो रही है। लकड़ी के सामान की जरूरत हर घर में होती है पर फर्श तक लकड़ी का बनवाने को लोग शान समझने लगे हैं। इसके पीछे की कीमत को कोई नहीं जानना चाहता। मेरा तो मानना है कि ये तो एक अपराधिक स्‍तर का उपभोक्‍तावाद है जिसमें प्रकृति के अपराधी हम खुद हैं और जैसा कि सर्वविदित है हमें एक ना एक दिन इसकी सजा मिलनी है।
पर आज के समय में जहां हर चीज मुनाफे को ध्‍यान में रखकर की जाती है और मुनाफा ही भगवान है वहां पर्यावरण जैसी चीजों के तो कोई मायने रह ही नहीं जाते।
टीवी पर विज्ञापन आ रहा है कि फलां परफ्यूम या डियो लगाये लौंडे के पीछे लड़कियां भाग रही हैं। जिसके पास बढि़या गैजेट्स हैं वही हीरो है। जो जितना ज्‍यादा फिजूलखर्च है उसका उतना ही जलवा है। हर कंपनी चाहती है लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा खरीदें और ज्‍यादा से ज्‍यादा मुनाफा दें। यहां तक कि एक पूंजीपति तो ये सोचता है कि लोग पुराने का मोह से जितनी जल्‍दी मुक्‍त हों उतना अच्‍छा और जितनी जल्‍दी पुराने माल को फेंककर नया माल खरीदने आयें उतनी ही चांदी। पर इस तरह की सोच हमें ले कहां जा रही है। क्‍या हमने कभी सोचा है कि हम जो अनाप-शनाप कॉस्‍मेटिक्‍स उपयोग करते हैं उनको बनाने और उनके उपयोग करने और उपयोग के बाद जो वेस्‍ट बचता है उसको मिलाकर पर्यावरण की कितनी वाट लगाये दे रहे हैं। हमें सिखाया जाता है कि हमें क्‍यों फलां चीज खरीदनी चाहिए और क्‍यों पुराना गैजेट बेकार है और तुरंत नया खरीद लेना चाहिए और एक उपभोक्‍ता के तौर पर हम वही सब किये जा रहे हैं जो पूंजीपति हमसे कराना चाहता है।

पूंजीवाद के समर्थक कहेंगे कि ये उपभोक्‍ताओं के लिए बेहतर है क्‍योंकि इसमें उपभोक्‍ता के हाथ में चॉइस रहती है, एक स्‍वस्‍थ प्रतियोगिता होती है जिससे उपभोक्‍ता वाजिब दामों पर अपनी मनपसंद चीजें खरीदता है। पर उपभोक्‍ता की अपनी पसंद या नापंसद क्‍या हो ये तो पूंजीवाद ही तय करता है। उपभोक्‍ता के ब्रेनवॉश के लिए जो तरीके अपनाये जाने चाहिए वे सब उसे पता हैं। उसे पता है कि कैसे किसी महाफालतू चीज की जरूरत पैदा की जाए और कैसे उसे एक जरूरी चीज में तब्‍दील करके उपभोक्‍ताओं से तगड़ा मुनाफा कमाया जाए। और एक बेचारा उपभोक्‍ता है जो दिन-ब-दिन पूंजीवाद के बहकावे और अपनी सुविधा के लालच में भयंकर रूप से लालची होता जा रहा है और उपभोक्‍ता का लालच जितना ज्‍यादा बढ़ेगा उतना ही बाजार की ताकतें उसे अपने जाल में उलझाकर मुनाफा ऐंठेंगी। लाखों-करोडों टन वेस्‍ट, ई-कचरा, धुंआ पैदा होता रहे उन्‍हें इससे क्‍या। उनका मकसद तो मुनाफा है चाहे इसके लिए धरती लाइलाज बीमारियों से ग्रसित होती रहे।
आजकल बड़े पैमाने पर लग्‍जरी आयटम्‍स की खरीदी की जाती है। ऐसे सामान जो गैरजरूरी और फालतू हैं उनका बाजार खड़ा करके एक दिखावटी समाज तैयार किया जा रहा है जो केवल दिखावे को ही सब-कुछ मानता है चाहे उसकी कितनी भी कीमत चुकानी पड़े। पर पूंजीवाद और आम ग्राहक की सुविधा के नाम पर सब चल रहा है और चूंकि सभी खुश हैं इसलिए किसे फिक्र है-सादा जीवन उच्‍च विचार जैसी बातें सुनने की। फैक्ट्रियां दिन-रात फालतू का सामान, जिसकी वास्‍तव में कोई जरूरत नहीं है, बनाने के लिए दिन-रात धुंआ उगल रही हैं। सरकारें भी खुश हैं कि टैक्‍स ज्‍यादा इकट्ठा हो रहा है। फिर ये सब करके क्‍योटो प्रोटोकाल जैसे सिस्‍टम बनाये जाते हैं मानो सौ चूहे खाकर बिल्‍ली हज करने जाए। भई समझौता तो इस बात का होना चाहिए कि मनुष्‍य अपनी जरूरतें कम करे और फालतू सामान की खरीद से बचे पर ये नहीं होगा और क्‍योटो प्रोटोकाल जैसी नौटंकियां चलती रहेगी। आगे और भी योजनाएं बनेंगी पर मनुष्‍य का लालच कहां जाएगा। संसाधनों की कमी का हल्‍ला हर जगह मचता है पर उनके किफायत से उपयोग की बात कभी नहीं होती।

महात्‍मा गांधी ने कहा था कि ये धरती मनुष्‍य की आवश्‍यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है पर उसके लालच की नहीं पर पूंजीवाद तो लालच पर ही टिका है जिस दिन मनुष्‍य ने साधारण तरीके से जीना सीख लिया उस दिन ये बेमौत मर जाएगा। पूंजीवाद एक विचारशून्‍य और भेड़चाल वाले समाज के निर्माण में जुटा है और काफी हद तक वो इसमें सफल भी हो चुका है। एक आदमी जब कुछ खरीदता है तो शायद ही सोच पाता है कि वह चीज वास्‍तव में कितनी जरूरी है उसके लिए। उसे तो बस यही सिखाया जाता है कि स्‍टेटस मेंटेन करना है या शान मारनी है तो फलां चीज तो खरीदनी ही होगी।

कुल मिलाकर पूंजीवाद लालच पर टिका एक ऐसा दैत्‍य है जो सब कुछ खतम करके ही दम लेगा। मनुष्‍य के बढ़ते लालच, उपभोग की चरमसीमा उसे कहां तक ले जाएगी ये बताने की जरूरत नहीं है।

पुरानी भारतीय जीवनशैली मेरे ख्‍याल में पूंजीवाद और पूंजीवाद से धरती के लिए पैदा घनघोर संकट का विकल्‍प हो सकती है। इस पर फिर कभी चर्चा करते हैं..... फिलहाल के लिए बस।

Monday, January 26, 2009

ये गणतंत्र का तमाशा बंद करो भाई

मशहूर कवि नीरज ने अपनी कविता के माध्‍यम से आज के भारत के हालात पर कुछ यूं व्‍यंग्‍य किया है -
'ज्‍यौं लूट लें कहार ही दुल्‍हन की पालकी, हालत वही है आज के हिंदुस्‍तान की।'

आज देश में 26 जनवरी की सालाना रस्‍म अदायगी फिर से की गई। राजपथ पर परेड देखते हुए बहुत ही अलंकारपूर्ण भाषा में जोशीली कमेंट्री सुनकर किसी भी भारतवासी का सीना गर्व से फूल जाता होगा। पर बहुत सालों के बाद आज जानबूझकर मैंने टीवी ऑन नहीं किया परेड देखने। राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, जम्‍मू कश्‍मीर और पूर्वोत्‍तर में सुरक्षा सख्‍त थी ऐसा बताया गया। हर दिन खौफ के साये में जीने वाले आम नागरिक के नाम पर होने वाला ये सालाना तमाशा हर साल शांति से संपन्‍न होता रहे सरकार केवल यही चाहती है शायद। बाकी दिनों में क्‍या होता है क्‍या नहीं इससे कोई मतलब नहीं। आज दिनभर बिजली कटौती भी नहीं हुई वरना पूरा बिल भरकर भी दिन-दिनभर बिजली की कटौती झेलने को आम नागरिक अभिशप्‍त है इसलिए उस पर स्‍वाधीनता या गणतंत्र दिवसों पर एहसान कर सरकार अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेती है।

जब तक कलाम एक राष्‍ट्राध्‍यक्ष की हैसियत से गणतंत्र दिवस की सलामी लेते थे तब तक बहुत सुखद लगता था कि हां ये है हमारा राष्‍ट्रपति जो वहां राजपथ पर बैठा हुआ है पर बासठ साल के बाद भी राजतंत्र की पकड़ ढीली नहीं हुई है इस देश पर। वह लगातार धीरे-धीरे गणतंत्र के टेंटुए को दबा रहा है और हम बस तमाशा देख रहे हैं।

लगभग साठ साल पहले हमने खुद को गणतंत्र घोषित कर ब्रिटेन की महारानी से कह दिया था कि अब हमारे भाग्‍य विधाता हम खुद ही हैं पर ये वादा जनता से नहीं बल्कि केवल उसे भुलावे में रखने के लिए किया गया था। चूंकि आंखों देखी मक्‍खी निगली नहीं जाती इसलिए जनता की आंखों के सामने पर्दा डाल दिया गया और गणतंत्र अब दूसरे राजवंश की गुलामी में आ गया। आज उस राजवंश के वारिस को खुलेआम 'युवराज' जैसे संबोधनों से नवाजा जाता है और उसके चाकर देश के सर्वोच्‍च पदों पर आसीन हैं केवल जनता को भुलावे में रखने के लिए। आज उस राजवंश की हैसियत ये है कि वो एक कुत्‍ते को भी राष्‍ट्रपति पद पर बैठा दे तो जनता उसे भी अगले साल राजपथ पर सलामी लेते देखेगी। आज राष्‍ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और उसकी पूरी कैबिनेट की केवल एकमात्र योग्‍यता ये है कि उसकी निष्‍ठा देश के प्रति ना होकर एक खास परिवार के प्रति है और इसीलिए वो अपने पद पर है वरना जिन लोगों के नाम तक देश की जनता नहीं जानती थी वे ही उस पर राज कर रहे हैं और उस परिवार का वारिस आजकल ये समझने की कोशिश कर रहा है कि ये 'जनता' क्‍या होती है।

बात यहां किसी पार्टीविशेष की पक्षधरता या किसी विरोधी पक्ष की झंडाबरदारी को लेकर नहीं है। बात ये है कि पहले तो ये तय हो कि एक नेता ही देश का नेतृत्‍व करे किसी पूर्व प्रधानमंत्री की रसोई संभालने वाली या किसी के चरणों में शीष नवाने वाले ऐरे-गैरे नहीं। ऐसे थोपे गये लोग तो उन लोक और गण के गाल पर करारा तमाचा हैं जिनका आप हर साल बड़े गर्व से जश्‍न मनाते हैं। पर घोर शर्म की बात है कि ये सब नहीं हो रहा है और इस सबका ठीकरा फोड़ा जा रहा है जनता के ऊपर। पर जनता ने तो वोट देते समय किसी को ये अधिकार नहीं दिया था कि आप हम पर जिसे चाहे थोप दें हम उसे सर आंखों पर बिठा लेंगे। अब पांच साल तक वो जो भी करें उसे मजबूरन जनता को झेलना ही है।

उधर एक 81 साल का बूढ़ा भी दूल्‍हा बनने चला है। इधर भारत में 47 वर्षीय ओबामा की जीत से लोग खुश हैं वहां कबर में पैर लटकाये ये व्‍यक्ति खुद को अगला प्रधानमंत्री बता रहा है। आखिर कौन सी अपील है इसमें ? केवल इसके कि इसकी पार्टी में सबसे वरिष्‍ठ ( केवल उम्र के आधार पर ) यही व्‍यक्ति है। अटल में एक अपील थी जनता उन्‍हें पसंद करती थी। पर ये बुड्ढा तो खुद ही अपने को जनता के ऊपर थोप रहा है। हां उसकी पार्टी वर्तमान व्‍यवस्‍था का एक विकल्‍प हो सकती है पर जरूरी तो नहीं कि उसका नेतृत्‍व वही करे। क्‍या केवल उमर ही इस देश में योग्‍यता का पैमाना हो गई है। ऐसा ही है तभी शायद एक बीमार बूढ़ा, चलने फिरने से लाचार पर शातिर देश के मानव संसाधन के विकास का ठेका लिए बैठा है।

जिन शहीदों को आज मरणोपरांत सम्‍मानित किया गया। उन पर इन्‍हीं नेताओं ने जमकर की‍चड़ भी उछाला और अब वे सम्‍मानित भी हो रहे हैं। मकसद ये था कि कम से कम जनता और शायद सुरक्षा बल तो कम से कम मुगालते में रहें कि लड़ते-लड़ते मरने पर कुछ मेडल-वेडल भी मिलता है वरना हमें ( नेताओं को ) इन कीड़ो मकौड़ों से क्‍या मतलब है पर ये खामखा जनता के बीच हीरो बनेंगे तो हमें भी इनपे कीचड़ तो उछालनी ही होगी।

हमारे सैनिक शस्‍त्रों की जो झांकियां देखकर हमारा सीना गर्व से फूलता है क्‍या हमें पता है कि वे हमारी सुरक्षा करने में पर्याप्‍त हैं भी या नहीं। कुछ समय पहले ही कैग हमारी वायुसेना की क्षमता पर सवाल उठा चुका है। आधुनिकीकरण के लिए जो सामान-संसाधन चाहिए उनकी खरीदी की फाइलें सालों से अटकी पड़ी हैं। पुलिस आधुनिकीकरण की बात की जाती है पर अब भी उनके पास अंग्रेजों के जमाने की बंदूकें हैं और उधर तीन साल पहले ही ये खुलासा हो चुका है कि स्विस बैंक में सबसे ज्‍यादा काला धन जमा करने वाला देश भारत है जिसका लगभग 1500 अरब डालर इन बैंकों में जमा है फिर भी दुनिया के एक-तिहाई भूखे भारत में रहते हैं।

द ग्रेट नेहरु डायनेस्‍टी की वारिसान इंदिरा गांधी ने अपने समय में गरीबी हटाओ का नारा दिया था और गरीबों के लिए इंदिरा आवास योजना जैसे कार्यक्रम बनाये पर आज राजधानी दिल्‍ली तक में गरीबों के लिए बनाये आशियाने चुपचाप दलालों-नेताओं द्वारा दबा लिये जाते हैं तो देश में एक आदमी के जिंदा रहने की जद्दोजहद कितनी कठिन होगी। इतने विरोधाभासों के बीच इन प्रतीकों को पकड़े रहना कम से कम मुझे तो बहुत हास्‍यास्‍पद प्रतीत होता है। हम कब तक ऐसे भुलावे और दिखावे‍ में जियेंगे। गणतंत्र दिवस और स्‍वाधीनता दिवस मनाना सभी चाहते हैं पर पहले हम अपने संविधान को तो खोलकर देखें कि उसमें जो कल्‍याणकारी राज्‍य का नारा दिया गया है उसके लक्ष्‍यों की दिशा में हम कितना आगे बढ़े इन साठ सालों में।

Sunday, January 18, 2009

आखिर मोदी इतने करिश्‍माई क्‍यों हैं


केरल से माकपा सांसद एपी अब्‍दुल्‍ला कुट्टी को गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के मॉडल की तारीफ करना महंगा पड़ गया, जब उन्‍हें अपने बयान के कारण पार्टी से निलंबित कर दिया गया। कट्टर भाजपा विरोधी और मोदी की मुखालफत करने में हमेशा मुखर रहने वाली माकपा को ये सहन नहीं हुआ कि उनका ही एक सांसद मोदी की तारीफ कर रहा है। उधर उद्योगपतियों अनिल अंबानी व सुनील भारती मित्‍तल द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिये प्रोजेक्‍ट करने संबंधी मामला भी गर्म है। मीडिया पिली हुई है भाजपा नेताओं से सफाई मांगने। कुल मिलाकर जो भी हो मोदी उत्‍तरोत्‍तर विवादों के केंद्र में रहकर और विवादों से ऊपर उठकर राष्‍ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर चमकने की पूरी तैयारी में जुटे हैं। हालांकि उन्‍होंने भी कहा है कि आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार हैं और इस बारे में कोई विवाद नहीं है।
जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है वे काफी समय से इसकी चर्चा के केंद्र में रहे हैं और उनके विरोधी इसे नकारते रहे हैं पर हालिया प्रकरण से उनकी इस दावेदारी को और बल मिला है और उनकी स्‍वीकार्यता राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के तौर पर बढ़ी है।
मोदी के बारे में उनके विरोधियों द्वारा कहा जाता है कि गुजरात के बाहर उनका कोई कद नहीं है, वे कट्टर हिंदूवादी और अल्‍पसंख्‍यकविरोधी हैं पर इन सब विवादों के बावजूद पिछले काफी समय से उनकी स्‍वीकार्यता बढ़ती ही गई है और इसमें बहुत बड़ा हाथ उनके विकास के एजेंडे का है। एक मुख्‍यमंत्री के तौर पर उनकी छवि पाक-साफ है उन पर भ्रष्‍टाचार का कोई आरोप नहीं है। सबसे बड़ी बात है गुजरातियों का उनमें विश्‍वास। आज हिंदुस्‍तान का कौन सा प्रदेश है जहां का मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की ही तरह अपने प्रदेश में लोकप्रिय है। मायावती प्रधानमंत्री बनने की बात करती हैं पर क्‍या उत्‍तर प्रदेश का एक आम नागरिक निर्विवाद रूप से उन्‍हें अपना नेता मानता है ? ऐस में देश का नेतृत्‍व कैसे होगा। सही बात तो ये है कि अटलजी के बाद अब तक देश में कोई राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता पैदा नहीं हो सका है जो हैं भी उनकी छवि और स्‍वीकार्यता राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता होने लायक नहीं भले ही वे आडवाणी क्‍यों ना हों।
जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है जनता की समझ में अब आने लगा है कि धर्मनिरपेक्षता की ढपली बजाते रहने वालों का ही दामन इस मामले में सबसे दागदार है। हालांकि प्रोपेगैंडा करने में उन्‍हें महारत हासिल है। वरना मोदी द्वारा गांधीनगर में मंदिरों को तोड़ा जाना उनको नजर नहीं आता जबकि हिंदुस्‍तान में कहीं भी किसी भी दूसरे धर्म के स्‍थलों पर एक ईंट भी उखाड़े जाने पर ये हंगामा बरपा देने के लिए तैयार बैठे हैं।
मोदी साथ सबसे बड़ी बात है कि उनके समर्थक उनके कट्टर समर्थक हैं और विरोधी धुरविरोधी। धीरे-धीरे जनमानस के दिमाग में ये बात बैठ रही है कि एक विकसित प्रदेश का मुख्‍यमंत्री वास्‍तव में एक विकासशील देश को प्रगति के रास्‍ते पर ले जा सकता है। उनके ऊर्जावान भाषणों में जनमानस को प्रभावित करने की कला है। वे मुद्दों पर स्‍पष्‍ट राय रखते हैं और सरल व सहज संप्रेषण कला उनको दूसरों से बेहतर वक्‍ता बनाती है। अभी हाल ही में मध्‍यप्रदेश के चुनावों के समय शहर में हुई आमसभा में एक गुजराती के मुख से हिंदी में जोरदार भाषण सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। उनका व्‍यक्तित्‍व वाकई एक नेता का सा है। वरना आजकल चारों ओर चोर, दलाल, दे शद्रोही नेता बने बैठे हैं। यहां तक कि देश का वर्तमान प्रधानमंत्री तक जब भाषण देता है तो लगता है अपनी ड्यूटी बजा रहा है कमोबेश यही स्थिति भाजपा के भावी प्रधानमंत्री की है और वे अपने दम पर भाजपा को जिता भी पायेंगे इसके कोई आसार नजर नहीं आ रहे।
मोदी के विरोधियों को अन्‍य मतभेदों से परे हटकर इस बात को तो स्‍वीकार करना ही होगा कि अन्‍य प्रदेशों की बजाय गुजरात में संभावनाएं ज्‍यादा नजर आती हैं, उद्योगपति वहां निवेश कर रहे हैं और जनता में उनकी लोकप्रियता निर्विवाद है। वरना विकास को साथ लिये बिना कोई भी नेता इतने समय तक कुर्सी पर काबिज नहीं रह सकता और लो‍कप्रिय नहीं बना रह सकता। ये मोदी ही हैं जिन्‍होंने ये कहने की हिम्‍मत दिखाई कि उन्‍हें केंद्र से एक पैसा नहीं चाहिए बशर्ते उनके प्रदेश से केंद्र को जो टैक्‍स जाता है वो ना मांगा जाए जबकि दूसरे प्रदेशों के मुख्‍यमंत्री कर्जों में डूबे रहने और केंद्र से पैकेज की मांग करने के लिए जाने जाते हैं।
आतंकवाद के मुद्दे और अन्‍य राष्‍ट्रीय मुद्दों पर अपनी बेबाक राय सामने रखना भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेताओं का ही शगल है। जो भी हो नरेंद्र मोदी भले ही आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री ना बन सकें पर राष्‍ट्र का नेतृत्‍व करने की ऊर्जा उनमें है।