Monday, January 26, 2009

ये गणतंत्र का तमाशा बंद करो भाई

मशहूर कवि नीरज ने अपनी कविता के माध्‍यम से आज के भारत के हालात पर कुछ यूं व्‍यंग्‍य किया है -
'ज्‍यौं लूट लें कहार ही दुल्‍हन की पालकी, हालत वही है आज के हिंदुस्‍तान की।'

आज देश में 26 जनवरी की सालाना रस्‍म अदायगी फिर से की गई। राजपथ पर परेड देखते हुए बहुत ही अलंकारपूर्ण भाषा में जोशीली कमेंट्री सुनकर किसी भी भारतवासी का सीना गर्व से फूल जाता होगा। पर बहुत सालों के बाद आज जानबूझकर मैंने टीवी ऑन नहीं किया परेड देखने। राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, जम्‍मू कश्‍मीर और पूर्वोत्‍तर में सुरक्षा सख्‍त थी ऐसा बताया गया। हर दिन खौफ के साये में जीने वाले आम नागरिक के नाम पर होने वाला ये सालाना तमाशा हर साल शांति से संपन्‍न होता रहे सरकार केवल यही चाहती है शायद। बाकी दिनों में क्‍या होता है क्‍या नहीं इससे कोई मतलब नहीं। आज दिनभर बिजली कटौती भी नहीं हुई वरना पूरा बिल भरकर भी दिन-दिनभर बिजली की कटौती झेलने को आम नागरिक अभिशप्‍त है इसलिए उस पर स्‍वाधीनता या गणतंत्र दिवसों पर एहसान कर सरकार अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेती है।

जब तक कलाम एक राष्‍ट्राध्‍यक्ष की हैसियत से गणतंत्र दिवस की सलामी लेते थे तब तक बहुत सुखद लगता था कि हां ये है हमारा राष्‍ट्रपति जो वहां राजपथ पर बैठा हुआ है पर बासठ साल के बाद भी राजतंत्र की पकड़ ढीली नहीं हुई है इस देश पर। वह लगातार धीरे-धीरे गणतंत्र के टेंटुए को दबा रहा है और हम बस तमाशा देख रहे हैं।

लगभग साठ साल पहले हमने खुद को गणतंत्र घोषित कर ब्रिटेन की महारानी से कह दिया था कि अब हमारे भाग्‍य विधाता हम खुद ही हैं पर ये वादा जनता से नहीं बल्कि केवल उसे भुलावे में रखने के लिए किया गया था। चूंकि आंखों देखी मक्‍खी निगली नहीं जाती इसलिए जनता की आंखों के सामने पर्दा डाल दिया गया और गणतंत्र अब दूसरे राजवंश की गुलामी में आ गया। आज उस राजवंश के वारिस को खुलेआम 'युवराज' जैसे संबोधनों से नवाजा जाता है और उसके चाकर देश के सर्वोच्‍च पदों पर आसीन हैं केवल जनता को भुलावे में रखने के लिए। आज उस राजवंश की हैसियत ये है कि वो एक कुत्‍ते को भी राष्‍ट्रपति पद पर बैठा दे तो जनता उसे भी अगले साल राजपथ पर सलामी लेते देखेगी। आज राष्‍ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और उसकी पूरी कैबिनेट की केवल एकमात्र योग्‍यता ये है कि उसकी निष्‍ठा देश के प्रति ना होकर एक खास परिवार के प्रति है और इसीलिए वो अपने पद पर है वरना जिन लोगों के नाम तक देश की जनता नहीं जानती थी वे ही उस पर राज कर रहे हैं और उस परिवार का वारिस आजकल ये समझने की कोशिश कर रहा है कि ये 'जनता' क्‍या होती है।

बात यहां किसी पार्टीविशेष की पक्षधरता या किसी विरोधी पक्ष की झंडाबरदारी को लेकर नहीं है। बात ये है कि पहले तो ये तय हो कि एक नेता ही देश का नेतृत्‍व करे किसी पूर्व प्रधानमंत्री की रसोई संभालने वाली या किसी के चरणों में शीष नवाने वाले ऐरे-गैरे नहीं। ऐसे थोपे गये लोग तो उन लोक और गण के गाल पर करारा तमाचा हैं जिनका आप हर साल बड़े गर्व से जश्‍न मनाते हैं। पर घोर शर्म की बात है कि ये सब नहीं हो रहा है और इस सबका ठीकरा फोड़ा जा रहा है जनता के ऊपर। पर जनता ने तो वोट देते समय किसी को ये अधिकार नहीं दिया था कि आप हम पर जिसे चाहे थोप दें हम उसे सर आंखों पर बिठा लेंगे। अब पांच साल तक वो जो भी करें उसे मजबूरन जनता को झेलना ही है।

उधर एक 81 साल का बूढ़ा भी दूल्‍हा बनने चला है। इधर भारत में 47 वर्षीय ओबामा की जीत से लोग खुश हैं वहां कबर में पैर लटकाये ये व्‍यक्ति खुद को अगला प्रधानमंत्री बता रहा है। आखिर कौन सी अपील है इसमें ? केवल इसके कि इसकी पार्टी में सबसे वरिष्‍ठ ( केवल उम्र के आधार पर ) यही व्‍यक्ति है। अटल में एक अपील थी जनता उन्‍हें पसंद करती थी। पर ये बुड्ढा तो खुद ही अपने को जनता के ऊपर थोप रहा है। हां उसकी पार्टी वर्तमान व्‍यवस्‍था का एक विकल्‍प हो सकती है पर जरूरी तो नहीं कि उसका नेतृत्‍व वही करे। क्‍या केवल उमर ही इस देश में योग्‍यता का पैमाना हो गई है। ऐसा ही है तभी शायद एक बीमार बूढ़ा, चलने फिरने से लाचार पर शातिर देश के मानव संसाधन के विकास का ठेका लिए बैठा है।

जिन शहीदों को आज मरणोपरांत सम्‍मानित किया गया। उन पर इन्‍हीं नेताओं ने जमकर की‍चड़ भी उछाला और अब वे सम्‍मानित भी हो रहे हैं। मकसद ये था कि कम से कम जनता और शायद सुरक्षा बल तो कम से कम मुगालते में रहें कि लड़ते-लड़ते मरने पर कुछ मेडल-वेडल भी मिलता है वरना हमें ( नेताओं को ) इन कीड़ो मकौड़ों से क्‍या मतलब है पर ये खामखा जनता के बीच हीरो बनेंगे तो हमें भी इनपे कीचड़ तो उछालनी ही होगी।

हमारे सैनिक शस्‍त्रों की जो झांकियां देखकर हमारा सीना गर्व से फूलता है क्‍या हमें पता है कि वे हमारी सुरक्षा करने में पर्याप्‍त हैं भी या नहीं। कुछ समय पहले ही कैग हमारी वायुसेना की क्षमता पर सवाल उठा चुका है। आधुनिकीकरण के लिए जो सामान-संसाधन चाहिए उनकी खरीदी की फाइलें सालों से अटकी पड़ी हैं। पुलिस आधुनिकीकरण की बात की जाती है पर अब भी उनके पास अंग्रेजों के जमाने की बंदूकें हैं और उधर तीन साल पहले ही ये खुलासा हो चुका है कि स्विस बैंक में सबसे ज्‍यादा काला धन जमा करने वाला देश भारत है जिसका लगभग 1500 अरब डालर इन बैंकों में जमा है फिर भी दुनिया के एक-तिहाई भूखे भारत में रहते हैं।

द ग्रेट नेहरु डायनेस्‍टी की वारिसान इंदिरा गांधी ने अपने समय में गरीबी हटाओ का नारा दिया था और गरीबों के लिए इंदिरा आवास योजना जैसे कार्यक्रम बनाये पर आज राजधानी दिल्‍ली तक में गरीबों के लिए बनाये आशियाने चुपचाप दलालों-नेताओं द्वारा दबा लिये जाते हैं तो देश में एक आदमी के जिंदा रहने की जद्दोजहद कितनी कठिन होगी। इतने विरोधाभासों के बीच इन प्रतीकों को पकड़े रहना कम से कम मुझे तो बहुत हास्‍यास्‍पद प्रतीत होता है। हम कब तक ऐसे भुलावे और दिखावे‍ में जियेंगे। गणतंत्र दिवस और स्‍वाधीनता दिवस मनाना सभी चाहते हैं पर पहले हम अपने संविधान को तो खोलकर देखें कि उसमें जो कल्‍याणकारी राज्‍य का नारा दिया गया है उसके लक्ष्‍यों की दिशा में हम कितना आगे बढ़े इन साठ सालों में।

Sunday, January 18, 2009

आखिर मोदी इतने करिश्‍माई क्‍यों हैं


केरल से माकपा सांसद एपी अब्‍दुल्‍ला कुट्टी को गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के मॉडल की तारीफ करना महंगा पड़ गया, जब उन्‍हें अपने बयान के कारण पार्टी से निलंबित कर दिया गया। कट्टर भाजपा विरोधी और मोदी की मुखालफत करने में हमेशा मुखर रहने वाली माकपा को ये सहन नहीं हुआ कि उनका ही एक सांसद मोदी की तारीफ कर रहा है। उधर उद्योगपतियों अनिल अंबानी व सुनील भारती मित्‍तल द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिये प्रोजेक्‍ट करने संबंधी मामला भी गर्म है। मीडिया पिली हुई है भाजपा नेताओं से सफाई मांगने। कुल मिलाकर जो भी हो मोदी उत्‍तरोत्‍तर विवादों के केंद्र में रहकर और विवादों से ऊपर उठकर राष्‍ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर चमकने की पूरी तैयारी में जुटे हैं। हालांकि उन्‍होंने भी कहा है कि आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार हैं और इस बारे में कोई विवाद नहीं है।
जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है वे काफी समय से इसकी चर्चा के केंद्र में रहे हैं और उनके विरोधी इसे नकारते रहे हैं पर हालिया प्रकरण से उनकी इस दावेदारी को और बल मिला है और उनकी स्‍वीकार्यता राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के तौर पर बढ़ी है।
मोदी के बारे में उनके विरोधियों द्वारा कहा जाता है कि गुजरात के बाहर उनका कोई कद नहीं है, वे कट्टर हिंदूवादी और अल्‍पसंख्‍यकविरोधी हैं पर इन सब विवादों के बावजूद पिछले काफी समय से उनकी स्‍वीकार्यता बढ़ती ही गई है और इसमें बहुत बड़ा हाथ उनके विकास के एजेंडे का है। एक मुख्‍यमंत्री के तौर पर उनकी छवि पाक-साफ है उन पर भ्रष्‍टाचार का कोई आरोप नहीं है। सबसे बड़ी बात है गुजरातियों का उनमें विश्‍वास। आज हिंदुस्‍तान का कौन सा प्रदेश है जहां का मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की ही तरह अपने प्रदेश में लोकप्रिय है। मायावती प्रधानमंत्री बनने की बात करती हैं पर क्‍या उत्‍तर प्रदेश का एक आम नागरिक निर्विवाद रूप से उन्‍हें अपना नेता मानता है ? ऐस में देश का नेतृत्‍व कैसे होगा। सही बात तो ये है कि अटलजी के बाद अब तक देश में कोई राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता पैदा नहीं हो सका है जो हैं भी उनकी छवि और स्‍वीकार्यता राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता होने लायक नहीं भले ही वे आडवाणी क्‍यों ना हों।
जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है जनता की समझ में अब आने लगा है कि धर्मनिरपेक्षता की ढपली बजाते रहने वालों का ही दामन इस मामले में सबसे दागदार है। हालांकि प्रोपेगैंडा करने में उन्‍हें महारत हासिल है। वरना मोदी द्वारा गांधीनगर में मंदिरों को तोड़ा जाना उनको नजर नहीं आता जबकि हिंदुस्‍तान में कहीं भी किसी भी दूसरे धर्म के स्‍थलों पर एक ईंट भी उखाड़े जाने पर ये हंगामा बरपा देने के लिए तैयार बैठे हैं।
मोदी साथ सबसे बड़ी बात है कि उनके समर्थक उनके कट्टर समर्थक हैं और विरोधी धुरविरोधी। धीरे-धीरे जनमानस के दिमाग में ये बात बैठ रही है कि एक विकसित प्रदेश का मुख्‍यमंत्री वास्‍तव में एक विकासशील देश को प्रगति के रास्‍ते पर ले जा सकता है। उनके ऊर्जावान भाषणों में जनमानस को प्रभावित करने की कला है। वे मुद्दों पर स्‍पष्‍ट राय रखते हैं और सरल व सहज संप्रेषण कला उनको दूसरों से बेहतर वक्‍ता बनाती है। अभी हाल ही में मध्‍यप्रदेश के चुनावों के समय शहर में हुई आमसभा में एक गुजराती के मुख से हिंदी में जोरदार भाषण सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। उनका व्‍यक्तित्‍व वाकई एक नेता का सा है। वरना आजकल चारों ओर चोर, दलाल, दे शद्रोही नेता बने बैठे हैं। यहां तक कि देश का वर्तमान प्रधानमंत्री तक जब भाषण देता है तो लगता है अपनी ड्यूटी बजा रहा है कमोबेश यही स्थिति भाजपा के भावी प्रधानमंत्री की है और वे अपने दम पर भाजपा को जिता भी पायेंगे इसके कोई आसार नजर नहीं आ रहे।
मोदी के विरोधियों को अन्‍य मतभेदों से परे हटकर इस बात को तो स्‍वीकार करना ही होगा कि अन्‍य प्रदेशों की बजाय गुजरात में संभावनाएं ज्‍यादा नजर आती हैं, उद्योगपति वहां निवेश कर रहे हैं और जनता में उनकी लोकप्रियता निर्विवाद है। वरना विकास को साथ लिये बिना कोई भी नेता इतने समय तक कुर्सी पर काबिज नहीं रह सकता और लो‍कप्रिय नहीं बना रह सकता। ये मोदी ही हैं जिन्‍होंने ये कहने की हिम्‍मत दिखाई कि उन्‍हें केंद्र से एक पैसा नहीं चाहिए बशर्ते उनके प्रदेश से केंद्र को जो टैक्‍स जाता है वो ना मांगा जाए जबकि दूसरे प्रदेशों के मुख्‍यमंत्री कर्जों में डूबे रहने और केंद्र से पैकेज की मांग करने के लिए जाने जाते हैं।
आतंकवाद के मुद्दे और अन्‍य राष्‍ट्रीय मुद्दों पर अपनी बेबाक राय सामने रखना भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेताओं का ही शगल है। जो भी हो नरेंद्र मोदी भले ही आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री ना बन सकें पर राष्‍ट्र का नेतृत्‍व करने की ऊर्जा उनमें है।