Friday, August 13, 2010

बेचारा कौन है प्रधानमंत्री या देश ?

अफगानिस्‍तान में तालिबान के भरपूर रूप से हावी होने के बावजूद शायद काबुलवासियों को ये तो गलतफहमी होगी कि हमारे देश में न सही काबुल ही में एक हामिद करजई नाम का व्‍यक्ति गद्दीनशीं है.....पर दिल्‍लीवासियों को शायद ये भी गलतफहमी ना हो.....उनके दिमाग में शायद दो ही तस्‍वीरें उभरती होंगी....एक उस भद्र और महान यूरोपियन महिला की जिसने त्‍याग और महानता का ऐसा पाठ हिंदुस्‍तानियों को पढ़ाया जिसके लिए शायद भविष्‍य में नोबल पुरस्‍कार समिति तक पश्‍चाताप करते हुए कहे कि उन्‍हें हम नोबल भले ना दे पाये हों सही मायने में नोबल का भी उनके लिए कोई महत्‍व नहीं.....दूसरी तस्‍वीर है विकास की मशाल थामे हुए एक ऐसी महिला की जिसके दामन पर कुछ स्‍वार्थी और विरोधी तबके के लोग कॉमनवेल्‍थ की कीचड़ उछालने में लगे पड़े हैं पर फिर भी मुझे विश्‍वास है कि एक दिन दिल्‍ली उनके नेतृत्‍व में शंघाई और सिंगापुर को पीछे छोड़ेगा अभी भले सड़कों के गढ्ढे मीडिया चिरकुटों को अफवाह फैलाने का मसाला देते हों......
अब बात आती है एक बेचारे व्‍यक्ति की....जिसे ऑ‍फीशियली तो जनरल नॉलेज की किताबों में बच्‍चे प्रधानमंत्री के नाम से जानते होंगे....पर जिन्‍हें अपनी ही पार्टी या गठबंधन के लोग प्रधानमंत्री नहीं मानते...और शायद वे खुद भी अपने बारे में ऐसे ही सोचते होंगे...
कुछ दिनों पहले मनमोहन की जब ओबामा से मुलाकात हुई तो अगले दिन अखबार में छपा कि ओबामा कह रहे हैं कि- जब मनमोहन बोलते हैं तब दुनिया सुनती है....
पर क्‍या वाकई मनमोहन बोलते हैं.....
उन्‍हें बोलने की क्‍या जरूरत है....वे बहुत बड़े अर्थशास्‍त्री हैं....वे देश के प्रधानमंत्री हैं....उनको महंगाई दूर करनी है....वे काम के बोझ के मारे हैं...उनको इतनी फुर्सत कहां...हालांकि बेचारे बूढ़े जरूर हो गए हैं पर जब तक महान युवराज की ताजपोशी नहीं हो जाती उनको आराम की इजाजत नहीं है
बोलने के लिए बहुत लोग हैं- अभिषेक सिंघवी, कपिल सिब्‍बल, मनीष तिवारी, चिदंबरम....इतनी लंबी चौड़ी टीम है....और मीडिया या विपक्ष ज्‍यादा कांय-कांय करें तो प्रणव मुखर्जी जैसे संकटमोचक भी तो हैं...
पर जितने भले प्रधानमंत्री हैं उससे भले इस देश के लोग हैं....कहीं भी आपको ये सुनने को मिल जाएगा....बेचारा बड़ा ईमानदार है या बेचारा बड़ा भला है....बाकी सब खूबियां तो ठीक पर ये 'बेचारा' शब्‍द सुनकर बड़ी कोफ्त होती है....
15 अगस्‍त आ रहा है....एक बार फिर 'बेचारे' प्रधानमंत्री लालकिले से लिखा-लिखाया भाषण पढ़कर सुना देंगे....उनके भाषण को सुनकर मुझे अपने स्‍कूल के दिनों की याद आती है....जब टीचर को सुनाने के लिए हम रट्टा लगाकर जाते थे....पर चूंकि वे प्रधानमंत्री हैं तो उन्‍हें रट्टा मारने की जरूरत नहीं वे आराम से कागज पर लिखे को पढ़कर जनता को सुना सकते हैं....
रस्‍म-अदायगी भर करने के लिए मनमोहन कुर्सी पर जमे हैं....थके से, युवराज के इंतजार में कि कब उन्‍हें रिटायरमेंट नसीब हो...अजीब लगता है जब लोग कहते हैं कि वे एक महान अर्थशास्‍त्री हैं....देश में उच्‍च-शिक्षा का हाल बुरा है....आप यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरी करिए, छात्रों को खूब पढ़ाईये अर्थशास्‍त्र....ये प्रधानमंत्रीगिरी आपका काम नहीं बाबू....पर वे जमे हैं क्‍योंकि वे वफादार हैं...और वफादार की अंतरात्‍मा मरती नहीं है बल्कि उसके गले में वफादारी का पट्टा तभी पहनाया जाता है जब खूब जांच-परख कर ये पता कर लिया जाता है कि अंतरात्‍मा जैसी चीज भगवान ने उसमें फिट ही नहीं की...
फिलहाल इस 'बेचारे' देश को आने वाले स्‍वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

Saturday, July 31, 2010

चरणस्‍पर्श और इमेज-बिल्डिंग

मेरे एक रिश्‍तेदार ने जब बताया कि फलांजी आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे...मुझे उत्‍सुकता हुई तो मैंने और पूछा तो उन्‍होंने उन फलांजी के मुंह से की गई तारीफ के पुलिंदे खोल दिए....मुझे लगा फलांजी मेरी इतनी तारीफ क्‍यों कर सकते हैं ?
वे फलां सज्‍जन हमारी जिला अदालत में सीनियर एडवोकेट हैं जिन्‍हें मैं काफी पहले से जानता हूं...पर वे मुझे नहीं जानते थे....एक दिन वे घर जाने के लिए किसी रिक्‍शे वगैरह का इंतजार कर रहे थे....मुझे वे दिख गए मैंने उनके चरणस्‍पर्श किए और गाड़ी में बैठने को कहा...वे अपने साथी महोदय के साथ बैठ गए...उन साथी महोदय ने उनका मुझसे परिचय कराया...बातें हुईं रास्‍ते में ही उनका घर था....उतरते समय मैंने फिर से खासतौर पर उनके चरणस्‍पर्श किए....अब इसमें खास बात क्‍या है मुझे तो कुछ समझ नहीं आया....पर इस चरणस्‍पर्श के चमत्‍कारिक प्रभाव मैंने और भी जगह देखे...कुल मिलाकर जिनके चरणस्‍पर्श मैं किया करता हूं उन सबकी राय मेरे बारे में एक सुसंस्‍कारी और बहुत अच्‍छे बालक की हो गई....वैसे चरणस्‍पर्श करने को मैं एक औपचारिकता से ज्‍यादा नहीं मानता और ना ही अब तक मेरी नजर में चरणस्‍पर्श जैसी बातों की कोई अहमियत थी....चरणस्‍पर्श को हमेशा से ही मैं दकियानूसी परंपरा मानता था और अब भी मानता हूं पर अब अंदर से कुछ और होते हुए भी बाहर कुछ और दिखावा करने की आदत-सी बन गई है.....अब जितने भी लोगों के आप चरणस्‍पर्श करते हैं उनमें से कई ऐसे भी होंगे जो चरणस्‍पर्श कराने की बजाय जूते खाते हुए लोगों को नजर आयें तो लोग कहें- ठीक रहा, साले के साथ यही होना चाहिए था...पर फिर भी ऐसे लोग चरणस्‍पर्श कराने का सुख पा जाते हैं...
मेरे एक सीनियर हैं जो चरणस्‍पर्श करने में इतने महारथी हैं कि हमें उनसे दूर रहना पड़ता है....पता नहीं कब कोई उन्‍हें सामने नजर आये और उसके चरणों में झुक जायें और इसी कारण वे अपना काम भी बड़ी आसानी ने निकाल लेते हैं....साथ होने के कारण हमें भी ये करना पड़ता है
व्‍यक्तिगत रूप से मैं इस परंपरा को बिलकुल ठीक नहीं मानता हूं...कारण बहुत सारे हैं....मैं स्‍वयं किसी से पैर छुआना पसंद नहीं करता....चाहे छोटा बच्‍चा हो....कभी-कभार बराबर के लोग भी रिश्‍तेदारी वगैरह टाइप का संबंध होने के कारण भी पैर छूने पर उतारू हो जाते हैं तो उनको रोकना पड़ता है...
ये कहने की जरूरत नहीं कि आचार और व्‍यवहार में तो हम लोग बहुत बड़े ढोंगी हैं....पर अभिवादन जैसे छोटे-मोटे मुद्दों पर भी हम ढोंग करने से बाज नहीं आते....हालांकि मैं स्‍वयं भी ऐसा ही करने लगा हूं कुछ समय से....पर कुछ मजबूरी कहें या कुछ और पर अब एक आदत-सी बन गई है....पहले मैं चाहे जिस व्‍यक्ति के चरण-स्‍पर्श नहीं कर पाता था....जिस व्‍यक्ति की मैं दिल से इज्‍जत करता था और जो मुझे इस काबिल लगता था उसके ही चरणों में झुकता था...इसीलिए मुझे इस परंपरा का पालन करने की कोई बड़ी खास जरूरत नहीं होती थी....ये भी गलतफहमी थी कि जिन गिने-चुने व्‍यक्तियों के मैं पैर छूता हूं जिनको इस काबिल समझता हूं उनके पैर ना भी छुऊं तो वे इतने समझदार हैं कि वे इसे अन्‍यथा कतई नहीं लेंगे....पर शायद ऐसा नहीं है....बाकियों के पैर छूने की गलती तो शायद मैं कभी-कभार मजबूरी में ही करता था....हालांकि रिश्‍तेदारों की गिनती इसमें शामिल नहीं है...उनके पैर तो हमें छूना ही है....
पर स्‍टूडेंट लाइफ के बाद से सामाजिक जीवन में जो गहराई से घुसपैठ हुई उसके बाद से मैंने इसे बहुत बड़ा मुद्दा मानना बंद कर दिया....जो भी बड़ा है, बुजुर्ग है, सीनियर है उसके पैर छूने से पहले और ना ही बाद में सोचने की कुछ जरूरत पड़ती है...बस छू लेते हैं...भला ही सामने वाला कुछ भी हो....और वैसे भी ये ढोंगी समाज ढोंग करने को ही मान्‍यता देता हो और वे ढोंगी ही आपके बुजुर्ग और सम्‍माननीय लोगों की कतार में हों तो ऐसे में आदमी के पास रास्‍ता ही क्‍या बचता है....खैर छोटी-सी बात को ज्‍यादा गंभीरता की ओर ना ले जाकर अपना बस इरादा है छोटी सी बात को कहना कि चलो कम से कम इस आदत से एक बात तो हुई कि लोगों का अपने बारे में नजरिया बेहतर बना...
हालांकि फिर भी बहुत से लोग हैं जिनका मैं दिल से सम्‍मान करता हूं और इसी कारण से उनके चरणस्‍पर्श जरूर करता हूं इसके बावजूद ऐसे बहुत से लोगों के भी चरणस्‍पर्श करता हूं जिनमें मन तो जूते देने का होता है पर उनसे संबंधों के आंकड़े इस कदर उलझे हैं कि ये सब करना ही पड़ता है...ये बात अलग है कि उन्‍होंने मेरे प्रति ऐसा कुछ नहीं किया कि मैं व्‍यक्तिगत कारणों से ऐसा सोचूं.....हालांकि पूरी तरह से इन सब चीजों का आदी नहीं हो पाया हूं पर कोशिश कर रहा हूं क्‍योंकि हिंदुस्‍तान में रहकर सौ में से निन्‍यानवे बेईमानों से हमको काम पड़ना है....और फिर आप ऐसे देश में रहते हैं जहां पैर छूने वाले और दुम हिलाने वाले प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति तक की नौकरी पा जाते हैं( जी हां नौकरी, क्‍योंकि असली कुर्सी पर जो है उसके तो ये सब चाकर ही हैं)...ऐसे देश में रहकर देश की परंपरा को थोड़ा-बहुत तो बजाना ही पड़ेगा...बाकी जिस दिन ये कला बहुत अच्‍छी तरह सीख गया उस दिन शायद मैं नेता भी बन जाऊंगा.

Friday, July 30, 2010

क्‍या आप अपनी मनपसंद फिल्‍में देख पाते हैं


आज दिन में टीवी पर 'वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' का रिव्‍यू आ रहा था शाम को सड़क पर टहलते समय पोस्‍टर भी दिखा...फिल्‍में अक्‍सर देखता नहीं हूं पर आसपास से, समाचारों से या एफ एम चैनलों पर आने वाली फिल्‍मों के गाने सुनकर इतना तो पता रहता ही है कि कौन-सी फिल्‍में रिलीज होने वाली हैं, क्‍या स्‍टार-कास्‍ट है, निर्देशन किसका है क्‍या थीम है...
खैर वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई का ट्रेलर जबसे देखा उसको देखने की इच्‍छा बनी हुई है...एक खास कारण ये भी कि उसमें प्राची देसाई अभिनय कर रही हैं जिनकी एक्टिंग के बारे में तो क्‍या कहें पर उनको पर्दे पर देखना बड़ा अच्‍छा लगता है बड़ी क्‍यूट हैं, फिल्‍म के गाने भी सुनने में और देखने में भी अच्‍छे लग रहे हैं.....पर एक तो शहर के फटीचर और टूटे-फूटे सिनेमाघर, ऊपर से आजकल साथ जाने वाला भी कोई नहीं.....दोस्‍त सब शहर से बाहर, बचे-खुचे व्‍यस्‍त....फिल्‍म देखने की किसी को फुर्सत नहीं....फिर भी साल-दो साल में शहर के किसी सिनेमाघर के दर्शन कर ही लेते हैं....
ऊपर से एक नया बवाल....जबसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍म देखी है तबसे शहर के सिनेमाघरों में जाने का मन बिलकुल भी नहीं होता....वैसे भी कौन-सा जाते ही थे....एक दिन गलती से चले गये...बहुत सी फिल्‍में देखने की इच्‍छा रहती है पर नहीं देखते...राजनीति छोड़नी नहीं थी सो एक छुट्टी वाले दिन चले गये....बड़ी मुश्किल से टिकट लेकर बालकनी में पहुंचे....एक भाईसाहब जो साथ आये थे उन्‍होंने कहा कि पिक्‍चर काफी निकल गई....बहुत देर तक बैठने की जगह ढूंढ़ते रहे....काफी समय बाद सोचा चलो नीचे हॉल में देखते हैं....वहां जगह मिल गई....कैटरीना कैफ को सोनिया गांधी समझकर फिल्‍म देखने आई ऑडियंस के हल्‍ले में सुनाई भी मुश्किल से दे रहा था..ऊपर से सिनेमाघर का साउंड सिस्‍टम और पिक्‍चर क्‍वालिटी भी बहुत धांसू थे...कुल मिलाकर पिक्‍चर तो खैर उतनी अच्‍छी लगी नहीं...पर उससे ज्‍यादा मलाल रहा बालकनी का टिकट लेकर हॉल में बैठकर पिक्‍चर देखने से...ऊपर से पिक्‍चर बहुत ध्‍यान लगाकर देखनी पड़ रही थी इतने घटिया साउंड सिस्‍टम और दर्शकों के हल्‍ले में....
बारहवीं में या कॉलेज में जब थे तब जरूर उन सिनेमाघरों की अहमियत हमारे लिए पीवीआर या एडलैब्‍स से कम नहीं थी...अब तो कोई पैसा देकर भी देखने को कहे तो सोचेंगे....
सीडी और डीवीडी भी फिल्‍म देखने का ठीक-ठाक जरिया है .... आज सुबह से सोच रहे हैं कि उड़ान की सीडी लेकर आयेंगे पर अब ब्‍लॉग लिखते समय याद आ रहा है कि सुबह ऐसा सोचा था....ठीक है एक आईडिया और है फिल्‍म देखने का, कुछ वेबसाइट ऑनलाइन फिल्‍म दिखाने की सुविधा भी देती हैं....गुलाल ऐसे ही देखी थी...तो सोचते हैं कि ऑनलाइन ही देखेंगे....पर ऑनलाइन भी साल या छह महीने में एकाध का औसत है...
आगे पीपली लाइव रिलीज होनी है....उसका भी इंतजार हो रहा है....
एक समस्‍या ये भी है कि फिल्‍म रिलीज के आसपास नहीं देख पाने से कुछ समय बाद देखने की इच्‍छा ही खतम हो लेती है....लगता है अब क्‍या देखें फिल्‍म में, देखने के लिए कुछ खास है ही नहीं....खास क्‍यों नहीं है इसका कारण भी सुन लीजिए...गाने सुन चुके, रिव्‍यू कई सारे पढ़ चुके, फिल्‍म की स्‍टोरी भी पता लग गई...अब कहीं फिल्‍म पिट गई या अपने टाइप की नहीं तो क्‍या देखना ऐसी फिल्‍म.....अपने टाइप की बोले तो जिन्‍हें लोग आजकल मल्‍टीप्‍लेक्‍स सिनेमा कहते हैं या छोटी स्‍टार-कास्‍ट और डिफरेंट सब्‍जेक्‍ट पे बनी फिल्‍में....मतलब शाहरुख, सलमान, रितिक टाइप बड़ी फिल्‍मों का तो अपन रिव्‍यू तक नहीं पढ़ते....क्‍यूंकि अपने लिए तो के.के.मेनन, विनय पाठक, राहुल बोस या कोंकणा सेन ही सब कुछ हैं....बाकी सो-काल्‍ड स्‍टार कहे जाने वालों की फिल्‍म में देखने लायक कुछ हुआ तो रिव्‍यू पढ़कर ही फारिग हो लेते हैं देखने की नौबत तो बहुत मुश्किल से आती है....
हालांकि फैमिली के साथ लिविंग रुम में हर टाइप की, गोविदा स्‍टायल हो या साउथ का नागार्जुन सबकी फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं...
पर हर बार नयी फिल्‍में रिलीज होती हैं...हम सोचते हैं कि अब देखेंगे या अबकी वीकेंड तो पक्‍का देखना ही है...पर हाय रे स्‍टार्स जिनकी बदकिस्‍मती से हम जैसे दर्शक उनको नसीब नहीं हो पाते... कारण शहर में कोई मल्‍टीस्‍क्रीन और सुविधायुक्‍त सिनेमाघर है नहीं, डीवीडी की दुकान तक जाने की जहमत हमने अरसे से उठाई नहीं और इंटरनेट भी हमारा इतना मरियल है कि बहुत जल्‍दी हांफने लगता है.....फिल्‍म रिलीज होकर पुरानी हो लेती है....फिर नयी फिल्‍में रिलीज होने का इंतजार करते हैं....फिर वो भी पुरानी हो जाती हैं....फिर इंतजार
लगता है आलसी प्रवृत्ति काम से लेकर मनोरंजन तक सबमें घुस गई है....चलूं अपने एक मित्र हैं उनसे कुछ टिप्‍स लूं....बेचारे बड़ी मेहनत करके बॉलीवुड की हर नयी रिलीज देखते हैं...काम भले रुक जाये पर फिल्‍म देखना नहीं छूटता...शायद उनसे कुछ सीखकर महीने में एकाध ही सही फिल्‍म देखने का लुत्‍फ तो मिले

Monday, February 15, 2010

अकेला राही- कविता

मैं स्‍वयं बढ़ता चलूंगा
और को मैं क्‍यों बुलाऊं

राह भी मैं खुद बनाऊं
चाल भी चलकर बताऊं
साथ में कोई न आये
राही चिन्‍ह का पत्‍थर बने
सदियों की सदियां गुजारे
दूसरा राही तब उसे
और थोड़ी दूर चलकर
वह भी चिन्‍ह का पत्‍थर बने

ऐसे युगों के बीतने पर
शाश्‍वतों की डग बने
फिर वहीं अवतार आयें
स्‍वयं चल कंटक डगर पर
शूल पग से सोख जायें
तब कहीं दुनियां चलेगी
सत्‍य शिव की राह पर

तू रोक मत डग खोदना
मत किसी की परवाह कर
स्‍वयं अकेला बढ़ता चल
और को तो मत बुला
ऐसे मेरे हैं विश्‍वास
मैं किसी को क्‍यों बुलाऊं

मैं स्‍वयं बढ़ता चलूंगा,
और को मैं क्‍यों बुलाऊं

- बाबू विद्यारामजी गुप्‍ता द्वारा दिनांक 2-2-1972 को रचित

Saturday, February 13, 2010

कुछ दिन तो जी लूं और

कुछ दिन तो जी लूं और
अब तक रही जिलाती मुझको
मां का अंक, पिता की उंगली
गुरू की शिक्षा, मित्र की बगली
नभ के तारे, नभ की बदली
यौवन की वह स्‍वयं कल्‍पना
आशा नव जीवन निर्माण की
भुजबल का व्‍यर्थ डींगना
रचने डग, नव निर्माण की
आशायें काफूर हुईं
अड़ी निराशा मध्‍य कंठ में
उसे निगल बाद करने जुगाली
दुनिया को सब स्‍वाद बताने
और मूर्खता पर पछताने
कुछ दिन तो जी लूं और

- बाबू विद्याराम गुप्‍ता द्वारा 26-11-1977 को रचित

इन्‍दिरा का समाजवादी चलतारा- बाबू विद्याराम गुप्‍ता

मेरे गुरू बाबू विद्यारामजी गुप्‍ता, जिनका परिचय मैं पिछली पोस्‍ट में दे चुका हूं, द्वारा रचित कविताओं को इन्‍टरनेट पर लाने के उद्देश्‍य से उनकी कविताओं को अपने ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने का आरंभ इस पोस्‍ट से कर रहा हूं...आज उनकी एक कविता हाथ लगी जिसे मैं यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं ...आगे भी उनकी कविताओं से आप रूबरू होते रहेंगे....


इन्‍दिरा का समाजवादी चलतारा

जवाहर के छप्‍पर में, इन्‍द्रा के चौके में,
समाजवाद पक रहा है
पका तो लिया है जरूर,
अभी खानसामा चख रहा है।

हर राजधानी में ,
हर मिनिस्‍टर लगाकर बैठा है दुकान
समाजवाद का पकवान तो बिक भी गया,
बन्‍द होने को है दुकान।

खरीदना है तो जल्‍दी कर,
अभी तो बहुत सस्‍ती दर है
देश में कदर नहीं तो क्‍या,
विदेशों के बहुत आर्डर हैं।

दुकान लूटने की जुर्रत ना करना,
फौज अभी बुलाई है
देश की हिफाजत को नहीं,
तुमसे लुटेरों को बनाई है।

भूख, भूखों की बात करने का एकाधिकार
इन्‍द्रा पर है,
सियासत की दीगर दुकानें
दिवालियागुजर चंदा परहैं।

दल-बदल, बिल न बदल, सब जगह ही दलदल,
बीच से चलेगा, मर के रहेगा, चल इन्‍द्रा के अगल-बगल।


- 23-1-1972 को लिखी गई

Tuesday, January 19, 2010

जिंदादिल जिंदगी के सफहों पर तजुर्बे की सुर्ख इबारत - बाबू विद्यारामजी गुप्‍ता

कहने को तो उनके व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व के बारे में एक संक्षिप्‍त-सा परिचय यहां रखा जा सकता है...परंतु उनके जीवन की किताब के सफहों से बहुत ज्‍यादा रूबरू होने का मौका मुझे नहीं मिल पाया है...और उनके बारे में जितना जान पाता हूं उससे ज्‍यादा जानने की उत्‍कंठा बार-बार जोर मारती रहती है...और जितना जान पाऊंगा उतना जान करके भी एक अफसोस रहेगा और ज्‍यादा ना जान पाने का और अंदर एक ये गर्वानुभूति भी साथ में रहेगी कि कम से कम जीवन में उन जैसे व्‍यक्तित्‍व को इतने निकट से जानने का और उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिल सका या यों कहें कि एक पूरा जीवन-दर्शन विकसित कर पाने के लिए उनके जैसा पथप्रदर्शक जीवन में मिला...

मैं बात कर रहा हूं मेरे सीनियर एडवोकेट और मेरे गुरू बाबू श्री विद्याराम गुप्‍ताजी के बारे में...जिनके सान्निध्‍य में मुझे वकालत के व्‍यवसाय को शुरू करने का अवसर मिला...विगत वर्ष से ही मैंने उनके साथ एक जूनियर के नाते काम शुरू किया...

कल कोटा,राजस्‍थान के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता श्री दिनेशराय द्विवेदीजी, जिन्‍हें मैं अपना गुरू और मार्गदर्शक भी मानता हूं, ने अपने ब्‍लॉग पर हिंदी के विख्‍यात साहित्‍यकार रांगेय राघवजी के बारे में लिखा था....कल रात ही मेरी उनसे बात हुई थी, मैंने उन्‍हें बताया भी था कि बाबू विद्यारामजी ने अपने छात्र जीवन में रांगेयजी के साथ आगरा में काफी समय बिताया...बाबूजी से ही कुछेक बार उनका नाम भी मैंने सुन रखा था. ...द्विवेदी सर ने बाबूजी से मिलने की और उनके बारे में जानने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी तो मैंने उन्‍हें सहर्ष मुरैना आने का निमंत्रण दे डाला...देखते हैं मेरे दोनों ही मार्गदर्शक और प्रेरणापुरूष शख्सियतों की मुलाकात कब संभव होती है....इस बहाने मुझे भी पहली बार द्विवदीजी से मिलने का सौभाग्‍य मिलेगा...खैर आज दिमाग में आया कि क्‍यों ना ये ब्‍लॉग ही बाकी लोगों के लिए बाबूजी से परिचित हो पाने का माध्‍यम बने...

अपने निवास स्‍ि‍थत कार्यालय में बाबूजी
बकौल पंडित नेहरू भारतवासियों के 'नियति के साक्षात्‍कार' वाले दिन से भी पहले 4 अगस्‍त सन् 1947 के दिन से लेकर अनवरत रूप से बाबूजी वकालत में आज भी 63 वर्षों से सक्रिय बने हुए हैं....छात्र जीवन के दिनों में भारत छोड़ो आंदोलन के समय से ही कम्‍युनिस्‍ट पार्टी से जुड़कर स्‍वाधीनता आंदोलन के लिए काम करने और काफी समय भूमिगत रहने से लेकर आजादी के बाद भी लंबे समय तक राजनीतिक गतिविधियों में पूरे जोर के साथ सन् 1977 तक सक्रिय रहने और उसी समय पार्टी और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था की कमियों के कारण मोहभंग होकर राजनीति छोड़ने तक उन्‍होंने एक लंबा सफर तय किया....शायद ही किसी को मालूम होगा कि सन् 1942 में बाबूजी ने ही पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी का कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में प्रवेश कराया...जब वे कॉलेज में साथ-साथ पढ़ाई कर रहे थे...बाद में किन्‍हीं कारणों से अटलजी संघ से जुड़ गए...

मध्‍यप्रदेश के उत्‍तरी छोर पर स्थित जिले मुरैना की तहसील अम्‍बाह में 1923 में बाबूजी का जन्‍म हुआ....छात्र जीवन का लंबा सफर ग्‍वालियर में गुजारने के बाद आगरा से एल.एल.बी की डिग्री लेकर बाबूजी ने अम्‍बाह कस्‍बे में ही आकर वकालत शुरू की...कुछ समय बाद जिला मुख्‍यालय पर आकर जिला अदालत पर अपने व्‍यवसाय में नाम कमाते हुए ग्‍वालियर उच्‍च न्‍यायालय में भी काफी वर्षों तक प्रैक्टिस करते रहने और सफलता के लगातार सोपान तय करने के बाद सन् 1972 में एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल होकर और महीनों बिस्‍तर पर पड़े रहकर अपनी अदम्‍य इच्‍छाशक्ति के बल पर फिर उठ खड़े हुए....उसके बाद से मुरैना जिला मुख्‍यालय पर लगातार सभी अदालतों दीवानी, फौजदारी, रेव्‍हेन्‍यू इत्‍यादि सभी में सफलता के उच्‍चतम पायदान पर पहुंचने के बाद मुरैना जिला अधिवक्‍ता परिषद् के वरिष्‍ठतम अधिवक्‍ता के तौर पर आज भी पक्षकारों को अपनी सेवायें दे रहे हैं....आसपास के कई जिलों में और मध्‍यप्रदेश उच्‍च न्‍यायालय ग्‍वालियर खंडपीठ में अपनी सफलता के झंडे गाढ़ने के पश्‍चात इस व्‍यवसाय के इतिहास पुरूष के रूप में उनका नाम उनके जीवित रहते ही लिया जाता है....जिन्‍हें यहां के अधिवक्‍तागण अधिवक्‍ता परिषद् के पितामह के नाम से भी संबोधित करते हैं....पिछले काफी समय से बाकी क्षेत्रों को छोड़कर केवल फौजदारी मुकदमों तक ही उन्‍होंने खुद को सीमित कर रखा है....और इस क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता को देखते हुए पूरे प्रदेश-भर की न्‍यायपालिका के लोग(जो उन्‍हें जानते हैं या जिन्‍होंने उनके बारे में सुना है) उनके सामने नतमस्‍तक हैं

हम जूनियर्स के साथ बाबूजी: बायें से- धर्मेंद्र तिवारीजी, बाबूजी और मैं

उनके व्‍यक्तित्‍व के कई आयाम हैं...जब वे किसी विषय पर बात करते हैं तो उन्‍हें सुनना एक बेहतरीन अनुभव होता है...प्रखर वक्‍ता और विद्वान होने के साथ-साथ उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का है....एक पूरे इतिहास को वे स्‍वयं में समेटे हुए हैं...उनकी भाषा शैली और उनकी कहावतें जिन्‍हें लोग अक्‍सर पहली बार ही सुनते हैं का भी एक निराला अंदाज है....एक और सबसे बड़ी बात है उनकी बोल्‍डनेस....जिस बिंदास तरीके से वे अपनी बात रखते हैं उनसे रूबरू होने वाले व्‍यक्ति को अहसास हो जाता है कि शायद ही वो अपने जीवन में ऐसे बोल्‍ड और स्‍पष्‍टवक्‍ता से रूबरू हुआ हो और आगे कभी होगा.... राजनीतिक सफर से विदा लेने के बावजूद सामाजिक रूप से आज भी वे सक्रिय हैं और अब भी उसी दमखम से बात करते हैं जैसे अपने युवाकाल में मंच से हजारों की भीड़ को संबोधित करते नजर आते थे....आज भी माइक पर उन्‍हें सुनना विरल अनुभव है हालांकि ऐसे मौके आजकल बिरले ही होते हैं....आज भी 87 वर्ष की उमर में सुबह पांच बजे उठकर रात तक लंबे समय तक काम करते रहने के बावजूद ऊर्जा से हर समय लबरेज नजर आते हैं.....लोग उनकी इस ऊर्जा का कारण पूछते हैं तो वे हंसकर कहते हैं- हम बस हंसते रहते हैं और काम करते रहते हैं...ज्‍यादा कुरेदने पर अक्‍सर वे इस पंक्ति को दोहरा देते हैं- 'जिंदगी जिदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्‍या खाक जिया करते हैं.'

वे अक्‍सर कहते हैं क‍ि एक वकील और सफल वकील बनने के लिए सबसे जरूरी है कि आपको मानव-मनोविज्ञान की गहरी समझ हो....उनके बारे में उनके कनिष्‍ठ अधिवक्‍तागण मजाक करते हैं कि वे आदमी का जूता देखकर बता सकते हैं कि फलां व्‍यक्ति कैसा है...और भले ही लोगों को अतिश्‍योक्ति लगे पर इस बात पर अविश्‍वास करना भी मुश्किल ही लगता है...बहुत से लोग उन्‍हें इन्‍हीं बातों के कारण बहुत बड़ा ज्‍योतिषी भी समझते हैं....

खैर एक और सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष है साहित्‍य के प्रति उनका प्रेम और उनका खुद का शोधकर्म और रचनाकर्म....चंबल के इस बीहड़ी इलाके में रहकर इस क्षेत्र का गांव-गांव वे घूमे हैं....बहुत कठिन मार्गों की यात्रा करके और अपने साथियों के राजनीतिक सफर में उनके चुनाव अभियान की जिम्‍मेदारी उठाने के साथ में यहां के लोगों को, गांवों को, उनकी कठिनाईयों को, बीहड़ी जीवन के आतंक को, उसके कारणों को, उसके प्रभावों को और उसके विविध पक्षों को जानने और समझने के लिए उन्‍होंने सैकड़ों किलोमीटर के क्षेत्र में आसपास के पड़ौसी राज्‍यों तक में भटकने का संघर्ष भी किया है....चंबल की डकैत समस्‍या पर इस शोध को को उन्‍होंने एक पुस्‍तक में संकलित किया है....पुस्‍तक का नाम है 'डाकू समस्‍या का अभिशाप- खोजपूर्ण विवेचन, कारण व हल'...प्रकाशन वर्ष है 1972....पुस्‍तक में उन्‍होंने इस समस्‍या की एतिहासिक पृष्‍ठभूमि में इसके कारण, इसकी उत्‍पत्‍ित और समस्‍या के बने रहने में विभिन्‍न कारकों के योगदान, यहां की जातीय संरचना, भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों जैसे विभिन्‍न पहलुओं की विवेचना के साथ जो सबसे महत्‍वपूर्ण बात प्रस्‍तुत की है वो है- इस समस्‍या के निदान के उपाय....

इसके अलावा उन्‍होंने विगत पांच-छह दशकों में समय-समय पर कविताएं भी लिखी हैं जो सैकड़ों की तादाद में हैं और अब तक अप्रकाशित हैं....अपनी काव्‍य-रचना में उन्‍होंने राजनीतिक और सामाजिक व्‍यंग्‍य के साथ-साथ हास्‍य और प्रेम जैसे विषयों पर भी कागज रंगे हैं साथ ही दुनियावी दर्शन और जीवन को प्रभावित करने वाले लगभग सभी पहलुओं पर उन्‍होंने अपने विचारों को कविता में पिरोया है....अंग्रेजी भाषा में रचित कविताओं से भी उनकी दशकों पुरानी डायरियां भरी पड़ी हैं....

अपने व्‍यस्‍त जीवन में कई विषयों पर लिख पाने और खासकर कानूनी विषयों पर लिख पाने के लिए बहुत सी बार उन्‍होंने सोचा...पर किन्‍हीं कारणों से ऐसी योजनाएं मूर्त रूप नहीं ले सकीं.... बहुत अधिक व्‍यस्‍तता और पारिवारिक जिम्‍मेदारियों से राहत पाने और पंद्रह वर्ष पहले हुई बाईपास सर्जरी के कारण अब उनका इरादा काम को धीरे-धीरे खतम करके केवल लेखन का है....हालांकि वे अपने इस इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए हर साल रिटायरमेंट की बात करते हैं और इस साल भी कर रहे हैं....पर सभी लोग जानते हैं कि उसका एक्‍सटेंशन होना है... और वे अपना काम बंद नहीं करने वाले....

इस वर्ष मेरा उनसे आग्रह है कि वे अपनी काव्‍य रचनाओं को प्रकाशित कराने हेतु कुछ समय निकालें....मैं स्‍वयं इसके लिए प्रयास कर रहा हूं...पर बहुत से देशज शब्‍दों और प्रूफ संबंधी बातों व अन्‍य पहलुओं को लेकर उनका बहुत-सा समय मुझे चाहिए होगा....देखते हैं बात कब तक आगे बढ़ती है और एक पुस्‍तक के रूप में उनके चाहने वालों के हाथ में कब तक पहुंचती है....वैसे प्रयास तो ये है कि इस वर्ष ये पुनीत कार्य संपन्‍न कर लिया जावे....साथ ही डकैत समस्‍या को लेकर भी उनकी पुस्‍तक पुनर्प्रकाशित करा ली जाये ऐसा भी प्रयास रहेगा....इंटरनेट पर भी उनके रचनाकर्म को लाने का प्रयास इस वर्ष रहेगा....जब मैंने उनसे इस बारे में एक बार बात की तो उन्‍होंने पुस्‍तक के प्रकाशन के पश्‍चात उसका विमोचन अपने छात्र-जीवन के साथी और मित्र अटलजी से कराने की बात कही....देखें कब और कितनी जल्‍दी ये सब संभव हो पाता है...

बाकी अंत में एक बात उन्‍हीं के शब्‍दों में कहना चाहूंगा जो वे अक्‍सर कहा करते हैं- हर आदमी में एक खुशबू होती है, आप कोशिश कीजिए और अपनी खुशबू दूर-दूर तक फैलाईये.....उनके साथ रह पाने पर उनकी खूशबू चरम रूप में महसूस कर पा रहा हूं....उनके स्‍वस्‍थ एवं सक्रिय बने रहने की कामना के साथ इन शब्‍दों की गति को यहीं विराम दे रहा हूं...

Saturday, January 16, 2010

अच्‍छा एक्‍टर होना ही सफल होना है

फलां व्‍यक्ति कैसा है....उसमें क्‍या अच्‍छा है...क्‍या खराब है इसका विश्‍लेषण सतत चलता रहता है उसके आसपास के जनमानस में....और एक ही व्‍यक्ति के बारे में सामान्‍यतया अलग-अलग राय बना लेते हैं लोग...जिनको उससे बेहतर रिस्‍पांस मिल रहा है उसके लिए वो बढि़या है...भले वो उसे केवल मतलब निकल जाने तक या मतलब का होने से ही ऐसा कहते है...बाकी कुछ लोग उसकी बुराई करते भी पाये जा सकते हैं...जरूरी नहीं कि उसमें बुराई हों भी ना.
जैसे एक आदमी ऑफिस में अच्‍छा बॉस हो सकता है पर बीवी के लिए अच्‍छा पति नहीं....
साधारणतया कहा जाता है कि जो व्‍यक्ति अच्‍छा इंसान होता है वो सभी के लिए अच्‍छा होता है....हो सकता है कुछ लोग उसे अपने माफिक ना पाकर उसे अच्‍छा ना भी कहें...
पर बहुमत ऐसे लोगों का ही है जिनका व्‍यवहार किसी व्‍यक्ति के प्रति एक तरह का है तो दूसरों के प्रति दूसरी तरह का, परिस्थिति के अनुसार भी व्‍यवहार में परिवर्तन संभव है....कई लोग काम के दिनों में बहुत चिढ़चिढे़ होते हैं और छुट्टी में बड़े खुशमिजाज इंसान की तरह पेश आते हैं...कई बातें हैं जो इंसानी व्‍यवहार पर प्रभाव डालती हैं..

पर भाई आजकल सेल्‍फ इंप्रूवमेंट बुक्‍स का जमाना है....कई लोग खुद के व्‍यवहार में सकारात्‍मक बदलाव की खातिर इनको आजमाते भी हैं....मैं तो मानता हूं ये सब बहुत मजबूत इच्‍छाशक्ति वाले लोगों के बस की बात है कि खुद की कमियां खोजकर, खुद पर कंट्रोल कर और आदतों में बदलाव लाकर खुद को बेहतर बनाने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं
पर ये तथ्‍य तो स्‍वीकार करना ही पड़ेगा कि ज्‍यादातर लोग अपनी आदतों से मजबूर होते हैं....वे खुद को बदल पाने में खुद को लाचार ही महसूस करते हैं या इसकी ओर ध्‍यान नहीं देते या उनको इस बारे में सोचने का वक्‍त ही नहीं..

इन सबके बीच सबसे महत्‍वपूर्ण बात जो हमारे अंदर घूमती रहती है कि हमें अपने प्रोफेशन में, दिनचर्या में और बाकी बहुत से कामों में बहुत से लोगों से डील करना होता है और अपना काम निकालना होता है....ऐसे में हमें खुद के लिए बेहतर नतीजे पाने के लिए क्‍या करना होगा?... ये सबसे ज्‍यादा जरूरी बात है....

हमें खुद को अलग-अलग परिस्थिति और अलग-अलग लोगों के सामने खुद का प्रिजेंटेशन ऐसा रखना होगा कि हमारा काम निकल जाए और सामने वाले से हम जो चाहते हैं वो पा सकें.....चूंकि हमारा जो प्रयास है वो सफलता के लिए हो रहा है सो उसके माफिक हमें खुद के व्‍यवहार में कुछ बातें शामिल करनी होंगी..

हमें ऐसे लोगों से भी काम निकालना है जिन्‍हें हम कतई पसंद नहीं करते...और ऐसे लोगों से भी जो बहुत ही अकड़ू और ढीठ मिजाज के होते हैं....पर हमारी मजबूरी है कि हमें उनके साथ काम करना है या उनके साथ रहना है...हर जगह हमें एक बैलेंस बनाकर चलना है....जिस व्‍यक्ति को हमें गाली देने का मन हो रहा है उसके साथ बहुत ही भद्र तरीके से व्‍यवहार कर हमें तालमेल बिठाना पड़ता है और जहां जरूरत स्‍ट्रेटफॉरवर्डनेस की है वहां वैसे ही बनना पड़ेगा, कभी जानबूझकर किसी को इग्‍नोर भी करना पड़ता है उसे कुछ समझाने हेतु और कभी जिनकी चांद पर जूते बजाने का मन होता है उनके चरण-स्‍पर्श भी करने पड़ सकते हैं.....

कुल मिलाकर लुब्‍बेलुआब ये है कि हमें सामने आने वाली परिस्थिति में से अपना रास्‍ता बनाते हुए निकल जाना है तो हमें उसके अनुरूप व्‍यवहार करना होगा....हम अक्‍सर नेताओं को गालियां देते हैं पर कभी नजर डालिए अपने आसपास के नेता प्रजाति के जीवों पर...कई बार जब हम उनसे मिलते हैं तो वे हमें अपने व्‍यवहार से, विनम्रता से गदगद कर देते हैं...वे वाकई में इंसान कैसे भी होने के बावजूद एक्‍टर बड़े कमाल के होते हैं....और यही स्किल उनकी सफलता का राज भी है..

हमें भी हम जैसे हैं, जो हैं के बजाय खुद को इस तरह से पेश करने की कला सीखनी चाहिए कि सामने वाले को वह जंचे...भले हम उससे बात तक नहीं करना चाहते पर उसे हमारी बातों से ऐसा लगे कि हम उससे बात करके, उससे मिलकर बड़े खुश हैं...उसे ऐसा एहसास हो कि हमने उसे बड़ी तवज्‍जो दी....बाकी चाहे अंदर से मन कह रहा हो कि लगाओ चार जूते साले की चांद में....नैतिकतावादी या आदर्शवादी टाइप की प्रजाति मेरी बातों से कुछ बवाल मचाने लायक मसाला खोज सकती है....पर सौ में से निन्‍यानवे बेईमानों के देश में आपको रहना है और इन्‍हीं के बीच में रहना है और इनसे ही काम निकालना है तो आपके लिए यही सही रास्‍ता है कि सबसे बनाकर चलें...नहीं तो खामखा आप अपने लिए रास्‍ते बंद कर लेंगे....
और रही गलत-सही की बात तो इस देश में इतना कुछ गलत हो रहा है कि भगवान के करे से भी नहीं रुकने वाला...हमें बस ऐसे में ये खयाल रखना है कि हम कहीं आदर्शवाद के चक्‍कर में पड़कर खुद का ही नुकसान ना कर बैठें और खुद को चिड़चिड़ा, अलग-थलग कहलाये जाने से बचा सकें.....
ऐसे में आपकी बेहतर एक्टिंग स्किल ही आपके अस्तित्‍व को बचा पायेगी. क्‍या खयाल है?

( उक्‍त विचारों में डेल कारनेगी के साहित्‍य और स्‍वयं के अनुभवों की बैठे-ठाले खिचड़ी बन गई है। बाकी आगे बहस की गुंजाइश है सो फुरसत मिलने पर...)