Saturday, February 13, 2010

इन्‍दिरा का समाजवादी चलतारा- बाबू विद्याराम गुप्‍ता

मेरे गुरू बाबू विद्यारामजी गुप्‍ता, जिनका परिचय मैं पिछली पोस्‍ट में दे चुका हूं, द्वारा रचित कविताओं को इन्‍टरनेट पर लाने के उद्देश्‍य से उनकी कविताओं को अपने ब्‍लॉग पर प्रकाशित करने का आरंभ इस पोस्‍ट से कर रहा हूं...आज उनकी एक कविता हाथ लगी जिसे मैं यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं ...आगे भी उनकी कविताओं से आप रूबरू होते रहेंगे....


इन्‍दिरा का समाजवादी चलतारा

जवाहर के छप्‍पर में, इन्‍द्रा के चौके में,
समाजवाद पक रहा है
पका तो लिया है जरूर,
अभी खानसामा चख रहा है।

हर राजधानी में ,
हर मिनिस्‍टर लगाकर बैठा है दुकान
समाजवाद का पकवान तो बिक भी गया,
बन्‍द होने को है दुकान।

खरीदना है तो जल्‍दी कर,
अभी तो बहुत सस्‍ती दर है
देश में कदर नहीं तो क्‍या,
विदेशों के बहुत आर्डर हैं।

दुकान लूटने की जुर्रत ना करना,
फौज अभी बुलाई है
देश की हिफाजत को नहीं,
तुमसे लुटेरों को बनाई है।

भूख, भूखों की बात करने का एकाधिकार
इन्‍द्रा पर है,
सियासत की दीगर दुकानें
दिवालियागुजर चंदा परहैं।

दल-बदल, बिल न बदल, सब जगह ही दलदल,
बीच से चलेगा, मर के रहेगा, चल इन्‍द्रा के अगल-बगल।


- 23-1-1972 को लिखी गई

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