Friday, August 13, 2010

बेचारा कौन है प्रधानमंत्री या देश ?

अफगानिस्‍तान में तालिबान के भरपूर रूप से हावी होने के बावजूद शायद काबुलवासियों को ये तो गलतफहमी होगी कि हमारे देश में न सही काबुल ही में एक हामिद करजई नाम का व्‍यक्ति गद्दीनशीं है.....पर दिल्‍लीवासियों को शायद ये भी गलतफहमी ना हो.....उनके दिमाग में शायद दो ही तस्‍वीरें उभरती होंगी....एक उस भद्र और महान यूरोपियन महिला की जिसने त्‍याग और महानता का ऐसा पाठ हिंदुस्‍तानियों को पढ़ाया जिसके लिए शायद भविष्‍य में नोबल पुरस्‍कार समिति तक पश्‍चाताप करते हुए कहे कि उन्‍हें हम नोबल भले ना दे पाये हों सही मायने में नोबल का भी उनके लिए कोई महत्‍व नहीं.....दूसरी तस्‍वीर है विकास की मशाल थामे हुए एक ऐसी महिला की जिसके दामन पर कुछ स्‍वार्थी और विरोधी तबके के लोग कॉमनवेल्‍थ की कीचड़ उछालने में लगे पड़े हैं पर फिर भी मुझे विश्‍वास है कि एक दिन दिल्‍ली उनके नेतृत्‍व में शंघाई और सिंगापुर को पीछे छोड़ेगा अभी भले सड़कों के गढ्ढे मीडिया चिरकुटों को अफवाह फैलाने का मसाला देते हों......
अब बात आती है एक बेचारे व्‍यक्ति की....जिसे ऑ‍फीशियली तो जनरल नॉलेज की किताबों में बच्‍चे प्रधानमंत्री के नाम से जानते होंगे....पर जिन्‍हें अपनी ही पार्टी या गठबंधन के लोग प्रधानमंत्री नहीं मानते...और शायद वे खुद भी अपने बारे में ऐसे ही सोचते होंगे...
कुछ दिनों पहले मनमोहन की जब ओबामा से मुलाकात हुई तो अगले दिन अखबार में छपा कि ओबामा कह रहे हैं कि- जब मनमोहन बोलते हैं तब दुनिया सुनती है....
पर क्‍या वाकई मनमोहन बोलते हैं.....
उन्‍हें बोलने की क्‍या जरूरत है....वे बहुत बड़े अर्थशास्‍त्री हैं....वे देश के प्रधानमंत्री हैं....उनको महंगाई दूर करनी है....वे काम के बोझ के मारे हैं...उनको इतनी फुर्सत कहां...हालांकि बेचारे बूढ़े जरूर हो गए हैं पर जब तक महान युवराज की ताजपोशी नहीं हो जाती उनको आराम की इजाजत नहीं है
बोलने के लिए बहुत लोग हैं- अभिषेक सिंघवी, कपिल सिब्‍बल, मनीष तिवारी, चिदंबरम....इतनी लंबी चौड़ी टीम है....और मीडिया या विपक्ष ज्‍यादा कांय-कांय करें तो प्रणव मुखर्जी जैसे संकटमोचक भी तो हैं...
पर जितने भले प्रधानमंत्री हैं उससे भले इस देश के लोग हैं....कहीं भी आपको ये सुनने को मिल जाएगा....बेचारा बड़ा ईमानदार है या बेचारा बड़ा भला है....बाकी सब खूबियां तो ठीक पर ये 'बेचारा' शब्‍द सुनकर बड़ी कोफ्त होती है....
15 अगस्‍त आ रहा है....एक बार फिर 'बेचारे' प्रधानमंत्री लालकिले से लिखा-लिखाया भाषण पढ़कर सुना देंगे....उनके भाषण को सुनकर मुझे अपने स्‍कूल के दिनों की याद आती है....जब टीचर को सुनाने के लिए हम रट्टा लगाकर जाते थे....पर चूंकि वे प्रधानमंत्री हैं तो उन्‍हें रट्टा मारने की जरूरत नहीं वे आराम से कागज पर लिखे को पढ़कर जनता को सुना सकते हैं....
रस्‍म-अदायगी भर करने के लिए मनमोहन कुर्सी पर जमे हैं....थके से, युवराज के इंतजार में कि कब उन्‍हें रिटायरमेंट नसीब हो...अजीब लगता है जब लोग कहते हैं कि वे एक महान अर्थशास्‍त्री हैं....देश में उच्‍च-शिक्षा का हाल बुरा है....आप यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरी करिए, छात्रों को खूब पढ़ाईये अर्थशास्‍त्र....ये प्रधानमंत्रीगिरी आपका काम नहीं बाबू....पर वे जमे हैं क्‍योंकि वे वफादार हैं...और वफादार की अंतरात्‍मा मरती नहीं है बल्कि उसके गले में वफादारी का पट्टा तभी पहनाया जाता है जब खूब जांच-परख कर ये पता कर लिया जाता है कि अंतरात्‍मा जैसी चीज भगवान ने उसमें फिट ही नहीं की...
फिलहाल इस 'बेचारे' देश को आने वाले स्‍वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

10 comments:

venu said...

bahut sunder dhang se aapne apni baat kahi hai , yeh logo ki galat soch par kada prahaar hai ....

चिट्ठाप्रहरी टीम said...

खुल गयी पोल
अच्छी प्रस्तुती के लिये आपका आभार


खुशखबरी

हिन्दी ब्लाँग जगत के लिये ब्लाँग संकलक चिट्ठाप्रहरी को शुरु कर दिया गया है । आप अपने ब्लाँग को चिट्ठाप्रहरी मे जोङकर एक सच्चे प्रहरी बनेँ , कृपया यहाँ एक चटका लगाकर देखेँ>>

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छी रचना!

Suresh Chiplunkar said...

प्रधानमंत्री जी नहीं बोलते तो क्या हुआ… भुवनेश शर्मा भी कहाँ लिखते हैं… :)

देखिये न, जुलाई में सिर्फ़ दो पोस्ट और अगस्त आधा बीत गया और एक पोस्ट… मनमोहन इससे अधिक तो बोल ही लेते होंगे… :) :) :)

राम त्यागी said...

करारा व्यंग्य !!
वैसे Newsweek magzine ने मनमोहन को लिस्ट किया है अभी अभी ....

क्या कर सकते है - राजनीती के गलियारे कूटनीति से भरे पड़े है और एक युवराज के लिए ऐसे कई प्यादे चले जाते है इस शतरंज में ...

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

अछि प्रस्तुति.

ZEAL said...

.
भुवनेश जी,

ये कुर्सी बहुत बुरी चीज़ है। जो एक बार बैठ जाता है वो उठ कर कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पता।

क्यूंकि--

आस-पास खड़े लोग जो पहले ही अपनी आत्मा बेच चुके हैं , वो किसी को खड़े होने नहीं देना चाहते।

जब तक ये कुर्सी पर जमे रहेंगे , देश भी मृतप्राय होकर एकदम ठंडा-ठंडा जमा रहेगा । कभी तरक्की नहीं कर सकेगा।

..

Parul said...

bechara to aam aadmi hai :)

KK Yadava said...

जबरदस्त लिखा जी...साधुवाद.

वृक्षारोपण : एक कदम प्रकृति की ओर said...

भुवनेश जी,

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें।

आपका जीवन

सुख, शान्ति,

स्वास्थ्य

एवं समृद्धि से परिपूर्ण हो।



इस अवसर पर एक वृक्ष लगायें।

इस अवसर को यादगार बनायें॥



पृथ्वी के शोभाधायक, मानवता के संरक्षक, पालक, पोषक एवं संवर्द्धक वृक्षों का जीवन आज संकटापन्न है। वृक्ष मानवता के लिये प्रकृति प्रदत्त एक अमूल्य उपहार हैं। कृपया अपने जन्मदिवस के शुभ अवसर पर एक वृक्ष लगाकर प्रकृति-संरक्षण के इस महायज्ञ में सहभागी बनें।