Sunday, August 14, 2011

ए कंपनी बनाम मनमोहन की मनी कंपनी

आज सुबह पढ़ा कि महाराष्‍ट्र के एक पत्र में राहुल गांधी की गुमशुदगी के बारे में विज्ञापन छपा है... महाराष्‍ट्र के किसान इस मसीहा को ढूंढ़ रहे हैं पर मसीहा का कहीं अता-पता नहीं मिल रहा है... पर किसानों से बड़ी चिंता कांग्रेस को है कि अन्‍ना की ए कंपनी की गुंडागर्दी, ब्‍लैकमेलिंग, फिरौती की घटनाओं से कैसे निपटे.... पर अन्‍ना छुट्टा सांड की तरह लोकतंत्र और भारत की सरकार को धमकाते फिर रहे हैं कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो.... ऐन आजादी महोत्‍सव के दिन अन्‍ना ने मार मचा रखी है... पर भले लोगों की भली सरकार गुंडों में मुंह कैसे लगे...

आज दिन में कांग्रेस का एक प्रवक्‍ता मनमोहन सिंह को 120 करोड़ लोगों का प्रधानमंत्री बता रहा था तो लग रहा था कि कॉमड़ी सर्कस जैसे कार्यक्रमों की तो जरूरत ही नहीं... सरदारों पे बने जोक्‍स तो हम सुनते ही रहते हैं पर ये वाला बेस्‍ट लगा... हालांकि मनमोहन सिंह को शायद ये भी पता नहीं होगा कि वे किसके और कब तक ? प्रधानमंत्री हैं.... क्‍योंकि जैसा कि सभी जानते हैं कि उन्‍हें कुछ पता नहीं रहता... वे खुद ही बोलते पाये जाते हैं कि उन्‍हें कुछ नहीं पता... इस सबके बावजूद उनकी एक और खूबी है कि देश को और जनता तक को भी उनका पता नहीं रहता... हां कभी-कभार वो बंद कमरे में अंग्रेजी बोलने वाले पत्रकारों के कान में फुसफुसाकर जरूर जनता को बताते हैं कि वे कहीं लापता नहीं हुए हैं...

वैसे कांग्रेसी स्‍वयं भी उन्‍हें अपना प्रधानमंत्री मानते हैं या नहीं ये चर्चा पुरानी हो चुकी है... नयी बात ये है कि खुद को बहुत बड़ा गांधीवादी बताने वाले अन्‍ना से बड़े गांधीवादी स्‍वयं हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं... गांधी परिवार के सच्‍चे सेवक तो असली मायने में वही हैं तो हुए ना वे सच्‍चे गांधीवादी...

अन्‍ना पूछते हैं किस मुंह से प्रधानमंत्री लाल किले पर जायेंगे... जिस मुंह से वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए हैं... और जिस मुंह से वे रामराज्‍य लाने के लिए तैयार बैठे युवराज के लिए गद्दी छोड़ने की बात करते हैं जैसे वे भरत हों और गद्दी उनके बाप दशरथ की हो... पर गद्दी संभालने वालों को फुर्सत नहीं है इसलिए मनमोहन सिंह उसी मुंह से कुर्सी से चिपके हुए हैं और तब तक चिपके रहेंगे जब तक उन्‍हें गद्दी छोड़ने का आदेश नहीं मिलता...

ऐसे में किसी कांग्रेसी का ये कहना कि मनमोहन से ऐसी बातें पूछना लोकतंत्र का, तिरंगे का, देश का अपमान है.... पर बिना चुनाव लड़ने वाले शख्‍स को एक सौ बीस करोड़ लोगों पर थोपना किसी का अपमान नहीं है... जब अमेरिका शांतिपूर्ण-प्रदर्शनों से निपटने के लिए शांति बरतने की सलाह देता है तो कांग्रेस को गुस्‍सा आता है... पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर डंडे बरसाने वाली कांग्रेस अपने चरित्र से खुद दूसरों को ऐसा कहने का मौका देने से कब चूक रही है... और ना ही उनके आग उगलने वाले नेता जो रामदेव प्रकरण के बाद सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि अन्‍ना ने ऐसा किया तो उनका भी वही हश्र होगा.... वैसे भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण को सीआईए का एजेंट तक बताने वाली कांग्रेस कल को अन्‍ना को आईएसआई एजेंट बताने लगे तो भी कोई अचरज की बात नहीं है...

अन्‍ना के ट्रस्‍टों का हिसाब-किताब नहीं बताने पर आपत्ति जताने वाली कांग्रेस के आका जनता की गाढ़ी कमाई से कितनी बार और किन देशों मे क्‍या करने जाते हैं इसे बताना उन्‍हें फिजूल लगता है... किस देश में किस बीमारी का इलाज सोनिया गांधी का चल रहा है इसे बताना जरूरी नहीं समझा जाता भले ही उसमें पैसा जनता का खर्च हो... राजीव गांधी फाउंडेशन के नाम पर कहां से पैसा आता है और कितनी संपत्ति सरकारी रसूख के चलते फाउंडेशन के नाम पर कब्‍जायी जा चुकी है इसका हिसाब कभी किसी को नहीं दिया जाता...

पर सबसे मजेदार हरकतें तो हमारे थोपे हुए प्रधानमंत्री जी करते हैं कल को लालकिले से वे ये घोषणा कर सकते हैं कि हम 100 दिनों में भ्रष्‍टाचार खतम कर देंगे.... जैसा कि जनता जानती है वे पहले भी 100 दिनों की समयसीमा में ही बहुत सी समस्‍याओं को निपटा चुके हैं...

अन्‍ना को ए कंपनी कहने वालों के प्रधानमंत्री को आज भ्रष्‍टों का मुखिया और आजाद भारत की सबसे भ्रष्‍ट सरकार का प्रधान कहा जाता है तब वे स्‍वयं अपने ही शब्‍दों में फरमाते हैं कि- मैं उतना दोषी नहीं हूं जितना मुझे बताया जा रहा है.... ऐसे में मनमोहन सिंह एंड कंपनी को मनमोहन की मनी कंपनी कहना ज्‍यादा परफेक्‍ट लगता है... वैसे भी नोटों के बिस्‍तर पर सोने और सोने के ताबूत में दफन होने का सपना देखने वालों के लिए तो गालिब ने शायद ये शेर नहीं लिखा था-

काबा किस मुंह से जाओगे गालिब,
शर्म तुमको मगर नहीं आती

Wednesday, July 20, 2011

लो अब गूगल एडसेंस में भी दलाली

कमाने के अवसर अनगिनत हैं यदि बंदा थोड़ा अपनी अकल खपाये...गूगल एडसेंस के विज्ञापनों से कमाई बहुतेरे ब्‍लॉगरों के लिए अतिरिक्‍त आय का साधन बन गया है वहीं बहुत से ब्‍लॉगर अब भी इस अरमान को संजोये बैठे हैं कि कब गूगल एडसेंस उनके आवेदन को स्‍वीकार करे और वे कंप्‍यूटर पर बैठे-बैठे ही अपने खाते में डॉलर जमा होते हुए देखें

हालांकि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के लिए तो ये अभी-भी दूर की ही कौड़ी है क्‍योंकि हिन्‍दी अभी तक गूगल की विज्ञापन सेवा एडसेंस की समर्थित भाषाओं की सूची में नहीं है...हालांकि कुछ ब्‍लॉग्‍स पर अभी भी विज्ञापन नजर आ रहे हैं जिसका कारण है ब्‍लॉग्‍स पर सर्च इंजन से ट्रैफिक जुगाड़ने हेतु अंग्रेजी कीवर्ड्स की उपस्थिति...फिर भी आमदनी नगण्‍य ही है क्‍योंकि अव्‍वल तो ये विज्ञापन ब्‍लॉग पर दिखते ही नहीं और यदि दिखते भी हैं तो आने वाले पाठक इन पर क्लिक नहीं करते...मेरा तो अनुभव यही है बाकी वे लोग बतायें जो इससे यदि वाकई में कुछ कमाई कर रहे हैं

हालांकि आजकल गूगल अपने कुछ विज्ञापनों को हिन्‍दी में भी दिखा रहा है खासकर आजकल बंबई-पूना की सैर कराने वाले विज्ञापन ही हिन्‍दी में ज्‍यादा नजर आ रहे हैं जिन पर शायद ही कोई क्लिक करता होगा...क्‍योंकि हिन्‍दी चिट्ठों पर ज्‍यादातर ट्रैफिक हिन्‍दुस्‍तान से ही आता है...एक और एलआईसी का कराड़पति बनाने वाला विज्ञापन है जो कभी-कभार नजर आता है...ऐसे ही इक्‍के-दुक्‍के विज्ञापन नजर आते हैं फिलहाल हिन्‍दी में...वैसे गुजराती और मराठी भाषाओं के विज्ञापन भी इन इक्‍के-दुक्‍के विज्ञापनों की जमात मे शामिल हैं...

मेरे एक मित्र जिन्‍हें मोबाइल से ब्‍लॉगिंग का शौक है हाल ही में एडसेंस से परिचित हुए हैं और मोबाइल ब्‍लॉगिंग छोड़कर लैपटाप पर हाथ आजमा रहे हैं ताकि अपने अंग्रेजी ब्‍लॉग पर ट्रैफिक बढ़ाकर विज्ञापनों से कमाई की जा सके... उन्‍होंने दो-तीन बार एडसेंस के लिए आवेदन किया पर हर बार उनका आवेदन निरस्‍त हो गया...बेचारे बड़े दुखी थे...गूगल पर उन्‍हें गुस्‍सा भी आ रहा था कि गूगल सबको पैसा कमाने दे रहा है पर उनसे कन्‍नी काट रहा है...मैंने उनको सुझाव दिया कि विज्ञापन प्रदान करने वाली भारतीय सेवाओं जैसे एड्स फॉर इंडियंस या अन्‍य एफिलिएट प्रोग्राम में क्‍यों नहीं रजिस्‍टर कराते वे भी कुछ ना कुछ दे ही देंगे....पर उन्‍हें तो केवल गूगल के ही विज्ञापन चाहिए थे...वे खोजते रहे..उनको कुछ पता लगा तो उन्‍होंने बताया कि कुछ लोग नेट पर गूगल अकाउंट बनाकर देते हैं और उसका आपसे कुछ पैसा भी लेते हैं...मैंने कहा मुझे तो इसकी जानकारी है नहीं यदि ऐसा है तो एक बार कोशिश कर डालिए...उन्‍होंने संबंधित सेवा प्रदान करने वाले व्‍यक्ति से संपर्क कर उसे पैसा भी भेज दिया परंतु आज तक उसकी तरफ से कोई उत्‍तर नहीं मिला है...मेरे मित्र का कहना है कि इंटरनेट पर सक्रिय इस प्रकार के ठगों का काम मजे में चल रहा है और लोग उनके चंगुल में आकर पैसे भी गंवा रहे हैं....शायद लोगों से पैसे ऐंठने का ये भी एक तरीका है... क्‍योंकि बहुतेरे आवेदन जो एडसेंस को भेजे जाते हैं वे निरस्‍त ही हो जाते हैं....और बढि़या ट्रैफिक और विजिटर्स पाने वाले ब्‍लॉगर्स जल्‍द से जल्‍द इस एकाउंट की चाबी चाहते हैं....हालांकि मेरा मानना है कि शायद ही लोगों का काम बनता हो उनका पैसा तो लालच मे आकर पानी में ही बह जाता है....क्‍योंकि गूगल के नियम व शर्तें बहुत सख्‍त हैं....बहरहाल मेरे मित्र बेचारे दुखी हैं विज्ञापन ना जुटा पाने और पैसे डूबने के कारण...फिलहाल उन्‍होंने शादी-ब्‍याह कराने वाले किसी एफिलिएट विज्ञापन के लिए आवेदन किया है और तुरंत ही उन्‍हें एप्रूवल भी मिल गया....देखते हैं बेचारे इतनी मेहनत के बाद भी कुछ कमा पाते हैं या नहीं...

Tuesday, July 19, 2011

भ्रष्‍टाचार का कांग्रेस ब्रांड अचार : कुछ मजेदार तस्‍वीरें

अन्‍ना के आंदोलन और रामदेव प्रकरण के बाद से ही इंटरनेट पर कांग्रेस पार्टी, उसकी यूरोपियन हाईकमांड, मनमोहन और दिग्विजय सिंह की भयंकर तरीके से भद्द पिटी है...कांग्रेस पर चुटकुले, एसएमएस और तो व्‍यंग्‍यात्‍मक तस्‍वीरें रोज ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर देखने को मिल जाती हैं....कुछ तस्‍वीरें तो ऐसी हैं जिन्‍हें यहां प्रकाशित भी नहीं किया जा सकता...प्रस्‍तुत हैं एक झलक-


Thursday, June 02, 2011

कनिमोझी का फेसबुक प्रोफाइल Funny Facebook profile of Kanimozhi

अभी-अभी इनबॉक्‍स में एक मजेदार मेल मिला जिसमें 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की आरोपी और फिलहाल तिहाड़ जेल में कैद कनिमोझी का मजेदार फेसबुक प्रोफाइल दिखाया गया है...

अपने पिता करुणानिधि को लिखे एक संदेश में वे कह रही हैं-
"Appa, I prefer being in Tihar than Chennai Central Jail.....less mosquitoes, less humidity and Raja for company" :)

चित्र को बड़ा करने के लिए उस पर क्लिक करें-

Wednesday, June 01, 2011

स्‍वाभिमान मंच या संदेहास्‍पद मंच

स्‍वामी रामदेव के मैसेज लगातार सभी मोबाइल फोनों पर आ रहे हैं कि दिल्‍ली सत्‍याग्रह में भाग लें या फिर फलां नंबर पर मिसकॉल करें...
मिशन 2014 की तैयारी चल रही है...फिलहाल काला धन रामदेव के एजेंडे में है....अन्‍ना हजारे के भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन के बाद बाबा कुछ भौंचक्‍के से थे...उनके समर्थक कहते रहे कि उनकी उगाई फसल अन्‍ना ने काट ली है...

फिलहाल बाबा ने नया पैंतरा खेला है....खुद को अन्‍ना से अलग दिखाने का...वे प्रधानमंत्री और मुख्‍य न्‍यायाधीश को प्रस्‍तावित लोकपाल बिल से बाहर रखने की बात कर रहे हैं....उधर सोनियापूजक भी उनके खिलाफ अभी कोई बयान नहीं दे रहे हैं....

पहले वे सोनिया के विदेशी मूल पर बहुत हल्‍ला मचाते रहे...मेरे एक मित्र ने कहा कि यदि चुनाव के बाद उनके हाथ कुछ सीटें आईं तो वे भी पवार और लालू के सुर में बोल रहे होंगे....क्‍योंकि सत्‍तासुख भी तो भोगना है और बाबा को भी ये पता होगा कि फिलहाल तो उनके लिए इतना ही बहुत है कि उनकी पार्टी कुछ सीटें यदि झटक भी लेती है तो बहुमतधारी दल से कुछ सौदेबाजी ही कर लें...

स्‍वामी ने मुद्दा अच्‍छा पकड़ा है भ्रष्‍टाचार और काले धन का....पर फिलहाल तो वे यही रणनीति बना रहे होंगे कि अन्‍ना कंपनी को हटाकर खुद परिदृश्‍य में मुख्‍य सौदेबाज की भूमिका में आ जाए....सौदेबाज शब्‍द यहां इसलिए ठीक है क्‍योंकि उनके तेवर भी कुछ इसी प्रकार दिखाई दे रहे हैं और उन्‍हें अभी संभल-संभलकर अपनी राजनीतिक चालें चलनी हैं ताकि बेवजह वे कांग्रेस से टकराव मोल ना लें....प्रधानमंत्री और मुख्‍य न्‍यायाधीश के मुद्दे पर उनका जो रुख है उससे कांग्रेस को अन्‍ना के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद ही‍ मिलेगी.... वैसे बाबा आगे चलकर और भी बहुत कुछ कह सकते हैं....

पर बाबा की एक बात बहुत आपत्तिजनक है कि 'प्रधानमंत्री और मुख्‍यन्‍यायाधीश का पद बहुत गरिमापूर्ण है'.....तो क्‍या बाकी सारे पदों पर टुच्‍चों के बैठने से कोई फर्क नहीं पड़ता ?....क्‍या बाकी पद गरिमापूर्ण नहीं हैं या उन पदों की गरिमा की धज्जियां उड़ाने से कोई फर्क नहीं पड़ता....देश भी जानता है कि जिस प्रकार का व्‍यक्ति प्रधानमंत्री पद पर बैठा है उससे उस पद की गरिमा कितनी बढ़ रही है....राजनीति में जिसे चोर दरवाजा कहा जाता है वहां से आकर बिना जनता के सामने आये घोर अलोकतांत्रिक तरीके से किसी व्‍यक्ति को प्रधानमंत्री पद पर बैठा दिया जाता है और फिर भी उस पद के साथ 'गरिमापूर्ण' जैसे शब्‍द जुड़े रह पाते हैं ये तो समझ से परे है....पर शायद बाबा स्‍वयं के लिए भी तो रास्‍ते खुले रखना चाहते होंगे

स्‍वामी रामदेव स्‍वयं भ्रष्‍टाचार के विरोध में हैं और उनका स्‍वाभिमान मंच भी भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा करके चुनावी समर में कूदने की तैयारी में है....परंतु यह बात काफी समय से कही जाती रही है कि बाबा अपने राजनीतिक संगठन के लिए ईमानदार लोग कहां से लाएंगे....
मेरे स्‍वयं के जिले और शहर में बाबा का संगठन देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि वाकई राजनीति में ईमानदारी और जनसेवा की भावना वाले लोग इससे जुड रहे हैं....और कमोबेश पूरे हिंदुस्‍तान में यही स्थिति होगी....बीजेपी का पार्टी विद डिफरेंस का मतलब ये रहा कि कांग्रेसी छुपछुपाकर खाते हैं और हम तो खुल्‍लमखुल्‍ला खाएंगे....बाबा के स्‍वाभिमान मंच के सदस्‍यों को देखकर लगता है कि ये कांग्रेसी और भाजपाईयों के भी बडे भाई साबित ना हों....फिलहाल तो बाबा को अपने संगठन में ही झांकना चाहिए तब जनता से आकर बात करनी चाहिए और यदि वे स्‍वयं आश्‍वस्‍त नहीं होते हैं तो उन्‍हें अपने चूरन-चटनी और तेल-साबुन वाले बिजनेस में ही खुश रहना चाहिए....वरना बाबा खुद भी जनता के सामने संदेहास्‍पद ही होकर रह जाएंगे और यही जनता बाबा की चुनाव में लुटिया डुबा देगी....

Saturday, May 07, 2011

शहीद ओसामा...कारवां बढ़ रहा है दिग्विजय का...जय हो

दिग्विजय सिंह की ओसामा के बारे में बयानबाजी के बाद से जो कुछ हुआ उसके बारे में भास्‍कर का कहना है-

गौरतलब है कि इस पूरे मुद्दे को सबसे पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा हवा दी गई थी।

बाकी खबर यहां पर है-

शुक्र है दिग्‍गी अब हमारे मुख्‍यमंत्री नहीं रहे नहीं तो प्रदेशभर में शोक घोषित करवाते.......

Tuesday, May 03, 2011

मुल्‍ला दिग्विजय अब ओसामा पर चादर कैसे चढ़ाएंगे ?


दुनिया भर में भले जश्‍न हो रहे हों पर दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद उनके समर्थकों में शोक की लहर व्‍याप्‍त है...

हिंदुस्‍तान में उनके सबसे बड़े समर्थक और कांग्रेस पार्टी के महासचिव और सबसे बढ़कर हिंदुस्‍तान के भावी युवराज के खासमखास दिग्‍गी ओसामा को ओसामा संबोधित करने-भर से खफा हैं, उनका कहना है कि उनके प्‍यारे 'ओसामाजी' के साथ अमेरिका ने अच्‍छा नहीं किया और नाहक ही उसे मारकर पानी में डुबो दिया....वैसे भी उनके अनुसार ये तय करने का हक अम‍ेरिका या किसी को नहीं है कि ओसामा दुनिया का एक खूंखार आतंकवादी था....हो सकता है ये हिंदूवादी ताकतों का दुष्‍प्रचार हो सकता है कि अमेरिका पर हमले में 'ओसामाजी' का हाथ था....हां उसके बदले में यदि अमेरिका भगवा आतंकवाद से निपटने का कोई काम करता तो कम से कम इस दुनिया को सुरक्षित और आतंकरहित बनाने की दिशा में कुछ हो सकता था...पर हाय रे सीआईए इसको ये भी नजर नहीं आता कि असली आतंकी कहां छुपे बैठे हैं...

दिग्विजय, जो कि एक बहुत छोटी-सी जगह का एक छुटभैया नेता हुआ करता था और जो मध्‍यप्रदेश के दुर्भाग्‍य से उसका दो बार मुख्‍यमंत्री रह चुका है अब कांग्रेस पार्टी की अल्‍पसंख्‍यक पॉलिटिक्‍स का अगुवा बनने तुला हुआ है, बिहार को पंद्रह-साल में आदिम-युग में पहुंचा देने वाले लालू को वहां की जनता फिर भी स्‍वीकार कर सकती है...परंतु यदि आगामी विधानसभी चुनाव में दिग्‍गी प्रदेश में वापस आ गया तो 10 साल में मध्‍यप्रदेश को पूरी तरह बर्बाद कर देने वाले दिग्‍गी से नाराज यहां की जनता तीसरी बार भी शिवराज सिंह को ही मुख्‍यमंत्री बनायेगी....लोग कहते हैं कि अपशब्‍दों का प्रयोग करना हो, किसी को बुरा-भला कहना हो, किसी भद्र व्‍यक्ति पर लांछन लगाना हो तो इटैलियन मैडम इसी को आगे कर देती है....लोग नाहक की बदनाम करते हैं मैडम को कि उन्‍हीं की शह पर उनका ये सिपाही आग उगलता है....पर त्‍याग की जीवंत मूर्ति और हिंदुस्‍तान के भावी युवराज की मां, इस हिसाब से तो उन्‍हें राजमाता का संबोधन भी मिलना चाहिए, को इस प्रकार से लांछित करने वाले लोग और खासकर हिंदू लोग ये भूल जाते हैं कि उन्‍हीं की वजह से मैडम की सरकार की कितनी किरकिरी होती है और देश को आतंकवाद का दंश झेलना पड़ता है और उनकी सरकार को बुरा-भला कहा जाता है....

पर भला हो दिग्विजय का जिनके कारण हमको आंखें खोलने की वजह मिलती है कि मुंबई हमलों में मारे गए पुलिस अधिकारियों को बेचारे और मासूम कसाब ने नहीं मारा था...हालांकि अभी वे खोजबीन में जुटे हैं शायद आगे इस तरह के तथ्‍य भी सामने आएं कि कसाब का असली नाम केशव है और वो मासूम तो गलती से आतंकवाद और बम बनाने की ट्रेनिंग देने वाले हिंदू संगठनों से जुड़ गया वरना असल में वो तो एक मोहरा है जिसे जबरदस्‍ती बंदूक पकड़ा दी गई थी...और पूरी कार्यवाही को हिंदूस्‍तान में ही कहीं बैठे उसके आका लाइव देख रहे थे...

फिलहाल तो दिग्विजय सोच रहे होंगे कि पाकिस्‍तान में न सही भारत में ही सही....उनके प्‍यारे ओसामाजी की कोई मजार होती तो शायद वे उसके उर्स में चादर चढ़ाकर करके अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं को तो निभा पाते.....एक बेचारे धार्मिक व्‍यक्ति को इस भगवा देश में ये भी नसीब नहीं...

Sunday, May 01, 2011

Will Julion Assange name Moneymohan again? क्‍या स्विस बैंक खुलासों में मनमोहन का नाम आयेगा ?

जूलियन असांजे महोदय ने घोषणा की है कि वे जल्‍द ही स्विसबैंक खाताधारी भारतीयों का नाम उजागर करने वाले हैं...विगत समय में उन्‍होंने मनमोहन सिंह पर तीखे हमले किये हैं और आगे भी कर सकते हैं...
परंतु जब उन्‍होंने घोषणा कर ही दी है तो क्‍या वे मनमोहन सिंह का नाम भी लेंगे...मैं इस बारे में अनुमान लगाता हूं तो लगता है कि मनमोहन अवश्‍य ही उस लिस्‍ट में नहीं होंगे...पर शायद उनकी सरकार में शामिल अन्‍य लोग जरूर मेरिट में होंगे......जिनमें से एक उस शख्‍स का नाम लिया जा रहा है जिन पर अन्‍ना ने अपना गुस्‍सा निकाला था...इस बारे मे जरूर संशय लगता है कि जूलियन ऐसा खुलासा करेंगे या नहीं

हालांकि लोग भी मनमोहन को मनीमोहन और भ्रष्‍टों का सरदार कहने से नहीं चूक रहे हैं....और सीबीआई का बड़े नामों पर शिकंजा कसना भी उनके लिए राहत की बात साबित नहीं हो रही है...

जूलियन महोदय ने बताया था कि स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए 10 लाख डॉलर की जरूरत होती है यानी लगभग साढ़े चार करोड़ रुपये....वैसे देखा जाए तो ये एक बहुत बड़ी रकम है...पर दूसरी तरफ एक वर्ग के लिए ये एक काफी छोटी रकम है...कम से कम भारतीय लोकतंत्र के मंदिर संसद में बैठने वालों के लिए तो...और यदि ये लोग चाहें तो मिलकर स्विस बैंक एसोसिएशन से भी धनी एसोसिएशन का गठन कर सकते हैं...

अभी थोड़ी देर पहले ही इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा AIEEE का पर्चा लीक हुआ है....पुदुच्‍चेरी के उपराज्‍यपाल पद पर बैठे व्‍यक्तियों से पूछताछ हो रही है...इधर मीडिया भ्रष्‍टाचार के खिलाफ शंखनाद पर मीडिया का आक्रामक रुख कायम है जबकि बहुत से मीडिया हाउसेस में लगा पैसा कहां से आ रहा है इसकी तह में भी जाना जरूरी जान पड़ता है....

जूलियन असांजे किसी का नाम लें या ना लें...काला धन स्विस बैंक जाये या इटली या कहीं और...फिलहाल तो बस धूमिल की यही पंक्तियां याद आ रही हैं-

हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है......

Sunday, April 10, 2011

अन्‍ना आंदोलन के बारे में फेसबुक पर एक कांग्रेसी नेता से संवाद


फेसबुक पर बीते कुछ दिनों से अन्‍ना हजारे के बारे में काफी कुछ सामग्री आ रही है...मैं भी समय निकालकर उसे देख लेता हूं...सब ओर आवाजें अन्‍ना के समर्थन में उठ रही हैं और उन्‍हें बधाईयां दी जा रही हैं..
ऐसे में फेसबुक पर ही एक युवा कांग्रेसी नेता ने अन्‍ना हजारे के आंदोलन के संदर्भ में कुछ सवाल उठाये हैं...उन सवालों को देखकर कोई भी बिना बताये ये समझ जायेगा कि ऐसे प्रश्‍न किसी कांग्रेसी अंतरात्‍मा वाला व्‍यक्ति ही उठा सकता है...स्‍वामीभक्‍त और चाटुकार परंपरा की वाहक पार्टी के इन नेताजी से मेरा संवाद कुछ इस तरह रहा-

सबसे पहले उन्‍होंने कुछ सवाल रखे जिनका उत्‍तर देने का मैंने प्रयास किया है जो कि ये हैं:-

1- जब संसद में कोई लोकतान्त्रिक तरीके से चुन कर, लाखों लोगो के द्वारा निर्वाचित हो कर जाता है,तो भी उस पर लोगो को भरोसा नहीं होता ?

2- क्या चंद लोगो द्वारा नियुक्त व्यक्ति किस प्रकार भरोसे के काबिल हो सकता है ?

3- आजदी की लड़ाई की बात करना, जनता को भावनात्मक रूप से गुमराह करना नहीं है ?

4- क्या एक लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा ? हम सब खुद किसी न किसी रूप भ्रष्टाचार करते है किसी न किसी रूप में उसको समर्थन भी देते है, खुद में सुधार लाना होगा किसी लोकपाल बिल या कानून की जरूरत नहीं है ?

5- आज जो देश के जितने की बात कर रहे है, वो सत्ता में सुधार लाने, EVM मशीन, चुनावो में सुधार लाने की बात करने लगे है ? यह भाषा तो एक राजनितिक दल की तरह लगती है.
?

इसके पश्‍चात इन प्रश्‍नों के जवाब मैंने दिये जो इस प्रकार हैं:-

1- 'लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर'; कितने लोग लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर संसद में पहुंचते हैं...कम से कम मैंने तो अपने स्‍थानीय लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र और निकट के क्षेत्रों में भी ऐसा नहीं देखा...कोई मसल पावर इस्‍तेमाल कर रहा है, कोई सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रहा है, कोई दूसरे हथकंडे अपना रहा है.....हालांकि जनता को भी हमें और शिक्षित और जगरूक बनाने की जरूरत है....बाकी भरोसे की आप बात कर रहे हैं तो पूरी तरह देखभालकर भरोसा करके जिस औरत के साथ सात फेरे लेकर आप पति बनते हैं और बाद में वो आपके पड्रौसी के साथ सोये तो ऐसे में भरोसा कहां काम आयेगा...

‎2- 'चंद लोगों द्वारा नियुक्‍त व्‍यक्ति' के बारे में मैं बस इतना कहूंगा कि जिसे भी आप संबोधित कर रहे हैं वो चंद लोगों द्वारा तो नियुक्‍त है....वरना इस देश में एक विदेशी महिला अपनी मनमर्जी से किसी को भी सिंहासन पर बैठा देती है और जनता को मूक रहकर ये अपमान झेलना पड़ता है...पर जनता अब और नहीं सहेगी

3- क्‍या देश का प्रधानमंत्री जब देश के इतिहास के सबसे बड़े घोटालों के बारे में पूछने पर कहता है कि मुझे कुछ पता ही नहीं तो क्‍या ये जनता को गुमराह करना नहीं है; और आजादी की लड़ाई गोरी चमड़ी वाले यूरोपियन्‍स के खिलाफ लड़ी गई थी...तो क्‍या देश में दुबारा से वो हालात नहीं बन गए हैं ?

4- एक बिल से भ्रष्‍टाचार समाप्‍त होगा या नहीं ये तो भविष्‍य के गर्भ में है....पर यदि कानून बन भी रहा है तो उस पर इतना तिलमिलाना क्‍यों....और ओम्‍बुड्समैन प्रणाली के अच्‍छे परिणाम बहुत से देशों में देखने को मिले हैं जहां ओम्‍बुड्समैन हैं....और ऐसे समय में जब घोटालों की बाढ़ आयी हुई है और 'ईमानदार' और 'भले आदमी' की छवि ओढ़ एक व्‍यक्ति चालीस चोरों का सरदार बना बैठा है ऐसे में एक व्‍यक्ति ने पूरे देश की जनता में उम्‍मीद का संचार किया है...चलिए मान लें कानून से कोई परिवर्तन ना भी आये पर देश के अनगिनत लोगों को एक प्रेरणादायी मसीहा मिला है और हर एक सफर की शुरूआत पहले कदम से ही तो होती है...यदि आप जैसे नकारात्‍मक सोच के लोग ही हिंदुस्‍तान में रहते तो शायद विदशी हाथों में हिंदुस्‍तान का रिमोट कंट्रोल नहीं होता बल्कि यहां के लिए कानून इटली या यूरोप में बैठे लोग ही बना रहे होते

5- देश तब भी जीता था जब इंदिरा को राजनारायण ने धूल चटाई थी और लोकनायक ने हिंदुस्‍तान की धरती पर संपूर्ण क्रांति की हुंकार भरी थी पर हर परिवर्तन में समय लगता है...वो आग अब भी नहीं बुझी है; क्‍या सुधार की बात करना राजनीति है...ऐसे में तो आप जैसे लोग उस गरीब आदमी की बात को भी राजनीति करार देंगे जो अपने लिए सरकार से दो वक्‍त की रोटी मांग रहा है और चुनाव सुधारों की बात पर तिलमिलाने का मतलब है साफ-सुथरे चुनावों से परहेज; और ऐसा वे ही करते हैं जो जनता से डरते हैं कि यदि कहीं साफ-सुथरे चुनावों की परिपाटी चल पड़े तो देश से इटैलियन्‍स का बोरा-बिस्‍तरा ना बंध जाए

नेताजी जैसा कि आपके परिचय में लिखा है आप इंडियन नेशनल कांग्रेस से जुडे हुए हैं और चूंकि केंद्र में आपकी सरकार है जिसने 6 महीने में ही पिछले 60 सालों के घोटालों का रिकॉर्ड तोड़कर एक भ्रष्‍टतम सरकार का तमगा तो जीत ही जीत लिया है ऐसे में दलालों और स्‍वामीभक्तों से भरी पार्टी के लोगों से यही उम्‍मीद की जा सकती है, मेरा सुझाव है कि आप स्‍वयं भी आत्‍ममंथन करें कि आजादी के पहले और आजादी के बाद भी कांग्रेस पार्टी से ऐसे लोग जुड़े रहे जिन्‍होंने देश के लिए क्‍या कुछ नहीं किया परंतु फिलहाल जो स्थित है उसे सब देशवासी देख ही रहे हैं... मेरे ख्‍याल में आप जैसा बुद्धिजीवी राजनेता इस बात को भलीभांति समझते है और आप जैसे युवा नेताओं से ही उम्‍मीदें हैं...यदि नेता वर्ग में से ही कोई व्‍यक्ति परिवर्तन की अलख जगाए तो शायद जनता उसे हजारे से भी ऊपर उठा देगी....पर माफ कीजिएगा नेताजी आपने प्रथम पंक्ति में जिस लोकतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके की आप बात कर रहे हैं वो कम से कम आपकी पार्टी की परंपरा तो नहीं है और जो प्रधानमंत्री आपने दिया है वो किस लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर आया है इसका जवाब आप बेहतर दे पाएंगे...और जिस लोकतांत्रिक तरीके से उसकी सरकार बचाई गई उससे भी सभी वाकिफ हैं.... आपने अच्‍छे प्रश्‍न उठाए जवाब लिखकर अच्‍छा लगा, जवाब लिखने का उद्देश्‍य आपको टारगेट करना नहीं था केवल वर्तमान भ्रष्‍ट तंत्र पर जो उंगली सारे देश ने उठाई है उसी को संदर्भित करना था... आपके स्‍वच्‍छ, सफल, जनविश्‍वास से भरे राजनीतिक भविष्‍य के लिए मेरी ओर से बहुत बहुत शुभकामनाएं.

इस सारे संवाद को यहां प्रकाशित करने का मेरा इतना उद्देश्‍य-भर था कि 'विदेशी चरणों की चाटुकार' परंपरा वाले व्‍यक्ति ही इस लोक की राह का असली रोड़ा बने हुए हैं जिन्‍होंने अपना एक स्‍वामीभक्‍त तंत्र विकसित कर सत्‍ता की चाबी हासिल कर ली है और देश का असली गेम बजाने में लगे हुए हैं...ऐसे लोग अन्‍ना और इस देश की भाषा कभी नहीं समझ पायेंगे पर जिस दिन ये शुरूआत रंग लायेगी तब शायद देश के रहनुमाओं का नाम लेते हुए शर्म महसूस नहीं होगी

Thursday, April 07, 2011

क्‍या अन्‍ना दूसरे जयप्रकाश साबित होंगे?

अन्‍ना हजारे के आंदोलन के चलते कुछ लोग जयप्रकाश की बात फिर से करने लगे हैं...जिनमें दोनों ही तरह के सुर है...कुछ का कहना है कि जब जयप्रकाश जैसे नेता की संपूर्ण क्रांति की लहर भी कोई बदलाव नहीं ला सकी ऐसे में जयप्रकाश के समय से ही चली आ रही मांग को अन्‍ना कैसे मनवा पाएंगे जब पूरा देश क्रिकेट की जीत के नशे में मदमस्‍त हो और मौजूदा सरकार ने भारत की अब तक की भ्रष्‍टतम सरकार का मेडल पहन रखा हो और जिसका नेतृत्‍व एक ऐसा प्रधानमंत्री कर रहा हो जिसे अब तक मीडिया और विपक्ष द्वारा की गई सरेआम बेइज्‍जती पर जरा भी शर्म नहीं आती हो और जो एक ही रटा-रटाया जवाब देना जानता हो- मुझे कुछ नहीं पता.... और ऐसी जनता जिसका एक विदेशी परिवार के सदस्‍य को युवराज कहे जाते समय खून ही नहीं खौलता हो...और तमाम भ्रष्‍टाचार या कहें भ्रष्‍टाचार के वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाने वाली सरकार के प्रधानमंत्री के बारे में लोग कहते हुए मिल जाते हैं कि- बेचारा वो तो भला और ईमानदार है....
जनता को कुछ नहीं चाहिए उसे तो चालीस चोरों का सरदार भला और ईमानदार दिखना चाहिए फिर वो चालीस चोरों को भी स्‍वीकार कर लेगी...और गोरी चमड़ी के प्रति आदर तो जीन में है इसलिए हर जगह राहुल बाबा की जय है...ये कोई नहीं सोचना चाहता कि अभी तो हिंदुस्‍तान में फिर भी काली कमाई करने वाले मीडिया में आने के कारण कहने को ही सही पुलिस की गिरफ्त में हैं...युवराज के गद्दीनशीं होने और रामराज्‍य आने के बाद तो शायद पता भी ना चले कि इटली में बैठकर कौन भारत का गेम बजा रहा है और ना पुलिस ना इंटरपोल उसे पहचान पा रही है
पर फिलहाल भारत वर्ल्‍ड-कप जीता है और शायद आगामी दिनों में इस बात पर भी देशव्‍यापी आंदोलन हो जाए कि सरकार सचिन को भारत-रत्‍न क्‍यों नहीं दे रही है वैसे फिलहाल आईपीएल के कारण इस आंदोलन को थोड़ा आगे बढ़ाना ज्‍यादा मुनासिब लग रहा है..
हालांकि अन्‍ना को अच्‍छा समर्थन मिल रहा है और खासकर मीडिया कवरेज के कारण वे पूरे देश में सुर्खियों में हैं....और कम से कम यही अच्‍छी बात है....दूसरी तरफ युवाओं में उनके प्रति समर्थन की उम्‍मीद मुझे है...कम से कम वे इस बात को जरूर समझ रहे हैं और उनको इस वर्ग से समर्थन मिल भी रहा है...और आगे ये और बढ़ेगा ऐसी उम्‍मीद सबको है...
पर समाज के हर तबके से अन्‍ना को व्‍यापक समर्थन मिल पाना फिलहाल के समय में संभव नहीं दिखता है....और खासकर जब ऐसा कहा जा रहा है कि भ्रष्‍ट भारत में बहुसंख्‍यक समाज भ्रष्‍ट हो चुका है तब वही समाज कैसे अपने ही खिलाफ उठ खड़ा होगा...मेरे ख्‍याल में भ्रष्‍टाचार और ईमानदारी की परिभाषाओं के फेर में पड़ने की कोई जहमत नहीं उठाना चाहता हर व्‍यक्‍ित और वर्ग के अपने हित हैं और सभी अपने हितों की लड़ाई लड़ने में व्‍यस्‍त हैं...वैसे भी बढ़ती महंगाई और भौतिकतावादी युग में पीछे कोई नहीं रहना चाहता...सभी कैसे भी करके जल्‍दी आगे बढ़ने की होड़ में व्‍यस्‍त हैं...ये अनुभव अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में किया होगा कि सिस्‍टम कैसे व्‍यक्ति को भ्रष्‍ट बनाता है....हालांकि ईमानदारी अभी बची हुई है पर बहुत थोड़ी जैसे चिडि़याघर तक सिमटा वन्‍य-जीवन....फिर भी हरिशंकर परसाई की इस उक्ति को कोई नहीं झुठला सकता कि- 'ईमानदार तभी तक ईमानदार है जब तक उसे बेईमान होने का मौका नहीं मिला'