Wednesday, June 01, 2011

स्‍वाभिमान मंच या संदेहास्‍पद मंच

स्‍वामी रामदेव के मैसेज लगातार सभी मोबाइल फोनों पर आ रहे हैं कि दिल्‍ली सत्‍याग्रह में भाग लें या फिर फलां नंबर पर मिसकॉल करें...
मिशन 2014 की तैयारी चल रही है...फिलहाल काला धन रामदेव के एजेंडे में है....अन्‍ना हजारे के भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन के बाद बाबा कुछ भौंचक्‍के से थे...उनके समर्थक कहते रहे कि उनकी उगाई फसल अन्‍ना ने काट ली है...

फिलहाल बाबा ने नया पैंतरा खेला है....खुद को अन्‍ना से अलग दिखाने का...वे प्रधानमंत्री और मुख्‍य न्‍यायाधीश को प्रस्‍तावित लोकपाल बिल से बाहर रखने की बात कर रहे हैं....उधर सोनियापूजक भी उनके खिलाफ अभी कोई बयान नहीं दे रहे हैं....

पहले वे सोनिया के विदेशी मूल पर बहुत हल्‍ला मचाते रहे...मेरे एक मित्र ने कहा कि यदि चुनाव के बाद उनके हाथ कुछ सीटें आईं तो वे भी पवार और लालू के सुर में बोल रहे होंगे....क्‍योंकि सत्‍तासुख भी तो भोगना है और बाबा को भी ये पता होगा कि फिलहाल तो उनके लिए इतना ही बहुत है कि उनकी पार्टी कुछ सीटें यदि झटक भी लेती है तो बहुमतधारी दल से कुछ सौदेबाजी ही कर लें...

स्‍वामी ने मुद्दा अच्‍छा पकड़ा है भ्रष्‍टाचार और काले धन का....पर फिलहाल तो वे यही रणनीति बना रहे होंगे कि अन्‍ना कंपनी को हटाकर खुद परिदृश्‍य में मुख्‍य सौदेबाज की भूमिका में आ जाए....सौदेबाज शब्‍द यहां इसलिए ठीक है क्‍योंकि उनके तेवर भी कुछ इसी प्रकार दिखाई दे रहे हैं और उन्‍हें अभी संभल-संभलकर अपनी राजनीतिक चालें चलनी हैं ताकि बेवजह वे कांग्रेस से टकराव मोल ना लें....प्रधानमंत्री और मुख्‍य न्‍यायाधीश के मुद्दे पर उनका जो रुख है उससे कांग्रेस को अन्‍ना के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद ही‍ मिलेगी.... वैसे बाबा आगे चलकर और भी बहुत कुछ कह सकते हैं....

पर बाबा की एक बात बहुत आपत्तिजनक है कि 'प्रधानमंत्री और मुख्‍यन्‍यायाधीश का पद बहुत गरिमापूर्ण है'.....तो क्‍या बाकी सारे पदों पर टुच्‍चों के बैठने से कोई फर्क नहीं पड़ता ?....क्‍या बाकी पद गरिमापूर्ण नहीं हैं या उन पदों की गरिमा की धज्जियां उड़ाने से कोई फर्क नहीं पड़ता....देश भी जानता है कि जिस प्रकार का व्‍यक्ति प्रधानमंत्री पद पर बैठा है उससे उस पद की गरिमा कितनी बढ़ रही है....राजनीति में जिसे चोर दरवाजा कहा जाता है वहां से आकर बिना जनता के सामने आये घोर अलोकतांत्रिक तरीके से किसी व्‍यक्ति को प्रधानमंत्री पद पर बैठा दिया जाता है और फिर भी उस पद के साथ 'गरिमापूर्ण' जैसे शब्‍द जुड़े रह पाते हैं ये तो समझ से परे है....पर शायद बाबा स्‍वयं के लिए भी तो रास्‍ते खुले रखना चाहते होंगे

स्‍वामी रामदेव स्‍वयं भ्रष्‍टाचार के विरोध में हैं और उनका स्‍वाभिमान मंच भी भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा करके चुनावी समर में कूदने की तैयारी में है....परंतु यह बात काफी समय से कही जाती रही है कि बाबा अपने राजनीतिक संगठन के लिए ईमानदार लोग कहां से लाएंगे....
मेरे स्‍वयं के जिले और शहर में बाबा का संगठन देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि वाकई राजनीति में ईमानदारी और जनसेवा की भावना वाले लोग इससे जुड रहे हैं....और कमोबेश पूरे हिंदुस्‍तान में यही स्थिति होगी....बीजेपी का पार्टी विद डिफरेंस का मतलब ये रहा कि कांग्रेसी छुपछुपाकर खाते हैं और हम तो खुल्‍लमखुल्‍ला खाएंगे....बाबा के स्‍वाभिमान मंच के सदस्‍यों को देखकर लगता है कि ये कांग्रेसी और भाजपाईयों के भी बडे भाई साबित ना हों....फिलहाल तो बाबा को अपने संगठन में ही झांकना चाहिए तब जनता से आकर बात करनी चाहिए और यदि वे स्‍वयं आश्‍वस्‍त नहीं होते हैं तो उन्‍हें अपने चूरन-चटनी और तेल-साबुन वाले बिजनेस में ही खुश रहना चाहिए....वरना बाबा खुद भी जनता के सामने संदेहास्‍पद ही होकर रह जाएंगे और यही जनता बाबा की चुनाव में लुटिया डुबा देगी....

4 comments:

Gyandutt Pandey said...

भड़भड़िया है और शायद फ्रॉड भी!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बाबा व्यापारी है और व्यापारी आज कल सीधे राजनीति में आना चाहते हैं। बाबा आ रहे हैं तो उस में उन की गलती क्या है? जनता के लिए यही उचित है कि उन से आशाएँ न जगाए।

प्रवीण पाण्डेय said...

हम तो उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब पहला सार्थक निष्कर्ष निकलेगा।

ravikumarswarnkar said...

सही...