Sunday, August 14, 2011

ए कंपनी बनाम मनमोहन की मनी कंपनी

आज सुबह पढ़ा कि महाराष्‍ट्र के एक पत्र में राहुल गांधी की गुमशुदगी के बारे में विज्ञापन छपा है... महाराष्‍ट्र के किसान इस मसीहा को ढूंढ़ रहे हैं पर मसीहा का कहीं अता-पता नहीं मिल रहा है... पर किसानों से बड़ी चिंता कांग्रेस को है कि अन्‍ना की ए कंपनी की गुंडागर्दी, ब्‍लैकमेलिंग, फिरौती की घटनाओं से कैसे निपटे.... पर अन्‍ना छुट्टा सांड की तरह लोकतंत्र और भारत की सरकार को धमकाते फिर रहे हैं कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो.... ऐन आजादी महोत्‍सव के दिन अन्‍ना ने मार मचा रखी है... पर भले लोगों की भली सरकार गुंडों में मुंह कैसे लगे...

आज दिन में कांग्रेस का एक प्रवक्‍ता मनमोहन सिंह को 120 करोड़ लोगों का प्रधानमंत्री बता रहा था तो लग रहा था कि कॉमड़ी सर्कस जैसे कार्यक्रमों की तो जरूरत ही नहीं... सरदारों पे बने जोक्‍स तो हम सुनते ही रहते हैं पर ये वाला बेस्‍ट लगा... हालांकि मनमोहन सिंह को शायद ये भी पता नहीं होगा कि वे किसके और कब तक ? प्रधानमंत्री हैं.... क्‍योंकि जैसा कि सभी जानते हैं कि उन्‍हें कुछ पता नहीं रहता... वे खुद ही बोलते पाये जाते हैं कि उन्‍हें कुछ नहीं पता... इस सबके बावजूद उनकी एक और खूबी है कि देश को और जनता तक को भी उनका पता नहीं रहता... हां कभी-कभार वो बंद कमरे में अंग्रेजी बोलने वाले पत्रकारों के कान में फुसफुसाकर जरूर जनता को बताते हैं कि वे कहीं लापता नहीं हुए हैं...

वैसे कांग्रेसी स्‍वयं भी उन्‍हें अपना प्रधानमंत्री मानते हैं या नहीं ये चर्चा पुरानी हो चुकी है... नयी बात ये है कि खुद को बहुत बड़ा गांधीवादी बताने वाले अन्‍ना से बड़े गांधीवादी स्‍वयं हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं... गांधी परिवार के सच्‍चे सेवक तो असली मायने में वही हैं तो हुए ना वे सच्‍चे गांधीवादी...

अन्‍ना पूछते हैं किस मुंह से प्रधानमंत्री लाल किले पर जायेंगे... जिस मुंह से वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए हैं... और जिस मुंह से वे रामराज्‍य लाने के लिए तैयार बैठे युवराज के लिए गद्दी छोड़ने की बात करते हैं जैसे वे भरत हों और गद्दी उनके बाप दशरथ की हो... पर गद्दी संभालने वालों को फुर्सत नहीं है इसलिए मनमोहन सिंह उसी मुंह से कुर्सी से चिपके हुए हैं और तब तक चिपके रहेंगे जब तक उन्‍हें गद्दी छोड़ने का आदेश नहीं मिलता...

ऐसे में किसी कांग्रेसी का ये कहना कि मनमोहन से ऐसी बातें पूछना लोकतंत्र का, तिरंगे का, देश का अपमान है.... पर बिना चुनाव लड़ने वाले शख्‍स को एक सौ बीस करोड़ लोगों पर थोपना किसी का अपमान नहीं है... जब अमेरिका शांतिपूर्ण-प्रदर्शनों से निपटने के लिए शांति बरतने की सलाह देता है तो कांग्रेस को गुस्‍सा आता है... पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर डंडे बरसाने वाली कांग्रेस अपने चरित्र से खुद दूसरों को ऐसा कहने का मौका देने से कब चूक रही है... और ना ही उनके आग उगलने वाले नेता जो रामदेव प्रकरण के बाद सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि अन्‍ना ने ऐसा किया तो उनका भी वही हश्र होगा.... वैसे भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण को सीआईए का एजेंट तक बताने वाली कांग्रेस कल को अन्‍ना को आईएसआई एजेंट बताने लगे तो भी कोई अचरज की बात नहीं है...

अन्‍ना के ट्रस्‍टों का हिसाब-किताब नहीं बताने पर आपत्ति जताने वाली कांग्रेस के आका जनता की गाढ़ी कमाई से कितनी बार और किन देशों मे क्‍या करने जाते हैं इसे बताना उन्‍हें फिजूल लगता है... किस देश में किस बीमारी का इलाज सोनिया गांधी का चल रहा है इसे बताना जरूरी नहीं समझा जाता भले ही उसमें पैसा जनता का खर्च हो... राजीव गांधी फाउंडेशन के नाम पर कहां से पैसा आता है और कितनी संपत्ति सरकारी रसूख के चलते फाउंडेशन के नाम पर कब्‍जायी जा चुकी है इसका हिसाब कभी किसी को नहीं दिया जाता...

पर सबसे मजेदार हरकतें तो हमारे थोपे हुए प्रधानमंत्री जी करते हैं कल को लालकिले से वे ये घोषणा कर सकते हैं कि हम 100 दिनों में भ्रष्‍टाचार खतम कर देंगे.... जैसा कि जनता जानती है वे पहले भी 100 दिनों की समयसीमा में ही बहुत सी समस्‍याओं को निपटा चुके हैं...

अन्‍ना को ए कंपनी कहने वालों के प्रधानमंत्री को आज भ्रष्‍टों का मुखिया और आजाद भारत की सबसे भ्रष्‍ट सरकार का प्रधान कहा जाता है तब वे स्‍वयं अपने ही शब्‍दों में फरमाते हैं कि- मैं उतना दोषी नहीं हूं जितना मुझे बताया जा रहा है.... ऐसे में मनमोहन सिंह एंड कंपनी को मनमोहन की मनी कंपनी कहना ज्‍यादा परफेक्‍ट लगता है... वैसे भी नोटों के बिस्‍तर पर सोने और सोने के ताबूत में दफन होने का सपना देखने वालों के लिए तो गालिब ने शायद ये शेर नहीं लिखा था-

काबा किस मुंह से जाओगे गालिब,
शर्म तुमको मगर नहीं आती

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कांग्रेस जो कुछ कह रही है वह देसी-बिदेसी पूंजीपतियों और भूस्वामियों के लुटेरे गठजोड़ का भारत में सेवक नं.1 बने रहने की कवायद भर है। दूसरे राजनैतिक दल कांग्रेस की आलोचना तो कर रहे हैं लेकिन खुल कर अन्ना की मुहिम के साथ नहीं आ रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के नं.1 के स्थान से लुढ़कने पर गठजोड़ का सेवक नं.1 बन जाने का लालच है।
असंगठित जनता अन्ना को हसरत भरी नजरों से निहार रही है।
अन्ना टीम को भी समझना चाहिए कि देश की शोषित जनता को संगठित किए बिना केवल प्रचार माध्यमों के भरोसे जुटाई गई भीड़ से काम नहीं चलेगा।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

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ePandit said...

बहुत अच्छी तरह धोया भुवनेश भाई।

मनमोहना ऍण्ड कम्पनी को देखकर एक कहानी याद आती है जिसमें एक चोरों का सरदार साधु का भेष बनाकर रहता था ताकि किसी को उस पर शक न हो।

दीपक बाबा said...

सलाम साहेब...

Virendra Kumar Sharma said...

GOOD JOB BUDDY PLACE ON LINE ORDER FOR BOOKS IN HINDI ,GO TO GOOGLE .

ALL THE THIEVES ARE NOW GONE .THANKS TO MANMOHAN AND RAHUL .