Sunday, December 31, 2006

नंबरप्लेट का ओहदा

मैं प्राय: शाम के समय सड़क पर टहलने के लिए निकलता हूं। सड़क से गुजर रहे बेतरतीब वाहनों की भीड़ के बीच अक्सर मेरी नजर उनकी नंबरप्लेट पर पड़ जाती है। नंबरप्लेट का वाहन में केवल इतना सा महत्व है कि उस पर परिवहन विभाग द्वारा प्रदत्त पंजीयन क्रमांक अंकित रहता है। परंतु अक्सर पाया जाता है कि नंबरप्लेट पर नंबरों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है और उसके अलावा वहाँ बड़े-बड़े रंगीन अक्षरों में कुछ लिखा रहता है। इन रंगीन अक्षरों से नंबरप्लेट के ओहदे का पता चलता है। आजकल इसी कारण नेमप्लेट से ज्यादा फ़ैशन नंबरप्लेट का है क्योंकि चलते-फ़िरते कहीं भी ये लोगों से आपका सहज ही परिचय कराती है। अधिकांशत: देखा गया है कि ओहदेदार नंबरप्लेट्स को दो पहियों पर ही सवारी करने की आदत होती है। चार-पहियों की नंबरप्लेट्स इन दो पहियों पर सवारी करने वाली नंबरप्लेट्स से ओहदे में अक्सर कमतर ही होती हैं।

ज्यादातर ओहदेदार नंबरप्लेट्स पुलिस विभाग से ताल्लुक रखती हैं। 'ताल्लुक रखने' का मतलब है कि जितनी नंबरप्लेट्स पुलिस विभाग में पदस्थ होती हैं उससे ज्यादा ताल्लुक रखने वाली नंबरप्लेट्स सड़कों पर दौड़ती-भागती नजर आ जाती हैं। 'ताल्लुकदार नंबरप्लेट' का अलग ही रौब होता है। जब ये चार की बजाय दो पहियों पर हो तब तो ये इस प्रकार लहरा के चलती हैं जैसे आशिक-मिजाज लड़के लड़कियों को कट मारते हैं। वैसे रास्ता खाली कराने के लिए ये सायरन की बजाय सर्वप्रिय और सर्वप्रचलित गालियों का ही प्रयोग करती हैं।
पुलिस विभाग के अलावा नंबरप्लेट्स कई और विभागों से भी ताल्लुक रखती हैं। जिनमें से अधिकांश पत्रकार, वकील आदि होते हैं। ऐसी नंबरप्लेट्स का भी अच्छा-खासा रौब होता है। यदि राह चलते किसी पत्रकार नंबरप्लेट को पुलिस रोक ले तो अगले दिन अखबार में खबर छपती है- "शहर की यातायात व्यवस्था भगवान भरोसे।" या फ़िर "पुलिस द्वारा अवैध वसूली जोरों पर।"

कभी-कभार जब मैं हाईवे से गुजरता हूँ तो मुझे कुछ देशभक्त नंबरप्लेट भी दिखाई दे जाती हैं। जिन पर हमारे राष्ट्रध्वज के तीन रंग दिखलाई पड़ते हैं। मेरे दिल को इस बात से तसल्ली हो जाती है कि भारत में अभी भी देशभक्त खत्म नहीं हुए। परंतु कभी-कभी एक राजनैतिक दल के लोग इन तीन रंगों से अपनी पार्टी और उससे ज्यादा अपना विज्ञापन कर लेते हैं। खैर जो भी हो हमारे तिरंगे को गाड़ी की नंबरप्लेट में ही सर छुपाने की जगह मिल जाती है ये क्या कम है।

मेरे जिले में कुछ समय पहले एक विधायक हुए। उनके विधायक होने का परिणाम यह हुआ कि उनकी सभी पहचान वाली नंबरप्लेट्स विधायक बन गईं। सड़कों पर विधायक ही विधायक दौड़ने लगे। विधायक साब ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे तो खेतों में चलने वाले ट्रैक्टर भी विधायक बन गये। अक्सर ये ट्रैक्टर शहर में तफ़रीह के लिए आया करते तो यातायात पुलिस विधायकजी को ससम्मान रास्ता देने के लिए खड़ी मिलती। कुछ समय बाद विधायकजी मंत्री पद से नवाजे गए। उस दिन के बाद सड़कें मंत्रियों से पटी दिखने लगीं। हर कोई नंबरप्लेट ऐंठ के कहती- "अरे रास्ता छोड़ो! देखते नहीं मंत्रीजी की सवारी आ रही है।" भवन-निर्माण सामग्री ले जाने वाले ट्रैक्टर-ट्राली भी कहाँ पीछे रहते। जगह-जगह मंत्रीजी भवन-निर्माण सामग्री ढोते नजर आते। कुछ साल बाद सरकार बदल जाने से मंत्रीजी घर बैठे हुए हैं और उनकी नंबरप्लेट को पूर्वमंत्री के ओहदे से ही संतोष करना पड़ रहा है। हालाँकि वह नंबरप्लेट पूरी तरह आशान्वित है कि अगले चुनाव में उस पर से 'पूर्व' का धब्बा जरूर हटेगा।

नंबरप्लेट्स ने हमारे समाज की पहचान उस 'जाति-व्यवस्था' को पुन:स्थापित करने में भी बहुत योगदान दिया है, जो काफ़ी समय से अपनी पहचान खोती जा रही है। नंबरप्लेट्स ने जाति-व्यवस्था को पुन: उसी रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें वह पहले हुआ करती थी। उच्च श्रेणी की नंबरप्लेट्स ही अब शान से सड़क पर लहराती हुई चलती हैं क्योंकि निम्न श्रेणी के वाहनों यानी सायकिल वालों को नंबरप्लेट लगाने का अधिकार अभी नहीं मिल पाया है।

आज की व्यवस्था में मेरे स्कूटर की नंबरप्लेट खुद को हीन समझने लगी है। इसलिए मुझे लगता है उसका मेक-अप करने का वक्त आ गया है। पर उलझन यह है कि उस पर क्या चिपकाऊँ? चूँकि मैं कानून का छात्र हूँ और मोटरयान अधिनियम के अनुसार ये सब कृत्य अवैध श्रेणी में आते हैं। इसलिए किसी लफ़ड़े में पड़ने की बजाय मैं अपनी नंबरप्लेट को दिलासा देता हूं कि- "मेरे साथ तुम्हें भी एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका का निर्वहन करना चाहिए।"
पर उस समय मेरे कान खड़े हो जाते हैं जब मेरी समझदार नंबरप्लेट मुझ पर हँसती है- "कैसा कानून पढ़े हो, जो कानून तोड़ना तक नहीं सीखे!"

Saturday, December 09, 2006

नववर्ष महोत्सव के लिए आपकी रचनाएँ आमंत्रित हैं

हिंदी कविता की ऑनलाइन पत्रिका 'अनुभूति' के 'नववर्ष महोत्सव' के लिए सभी हिंदी चिट्ठाकारों/रचनाकारों की रचनाएँ आमंत्रित हैं। पत्रिका में ९ दिसंबर से ३१ दिसंबर तक नववर्ष महोत्सव के दौरान कवियों की रचनाओं का प्रकाशन किया जा रहा है। सभी रचनाकारों से अनुरोध है कि वे 'नववर्ष' विषय से संबंधित अपनी-अपनी रचनाएँ 'अनुभूति' में प्रकाशनार्थ भेजें। रचनाएँ २० दिसंबर से पहले अवश्य पहुँचनी चाहिए। अपनी रचनाएँ इस पते पर भेजें-
teamanuatanubhti-hindi.org


हिंदी की ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिका 'अभिव्यक्ति' के 'नववर्ष विशेषांक' के लिए भी हिंदी चिट्ठाकारों और लेखकों की रचनाएँ आमंत्रित हैं। रचनाएँ किसी भी श्रेणी में भेजी जा सकती हैं- कहानी, निबंध,लेख आदि। श्रेणियाँ पत्रिका के मुखपृष्ठ पर सबसे ऊपर दी हुई हैं। विषय रहेगा 'नववर्ष'। रचनाएँ पहुँचाने की अंतिम तिथि है २० दिसंबर। अपनी रचनाएँ इस पते पर भेजें-
teamabhiatabhivyakti-hindi.org

सभी हिन्दी चिट्ठाकारों/रचनाकारों से आग्रह है कि 'अनुभूति' और 'अभिव्यक्ति' के इस नववर्ष कार्यक्रम में शामिल हों और नूतन वर्ष पर अपनी रचनाओं से हिंदी वेब-जगत को समृद्ध करें।

"सागर भाई को हँसाना है" -हास्य एवं मनोरंजन मंत्रालय से साभार

आजकल हमारे गिरिराज जोशीजी "कविराज" ने हमें एक महत्वपूर्ण कार्य सौंप रखा है। हुआ यूँ कि सागर नाहरजी ने मजाक-मजाक में उनसे कह दिया कि कभी-कभार कुछ हल्की-फ़ुल्की कवितायें भी लिखा कीजिए। वैसे भी आजकल हास्य-रस संबंधित रचनाओं का मौसम चल रहा है। हर टीवी चैनल पर हास्य कवियों का ही बोलबाला है। पर हमारे कविराज जरा चतुर किस्म के प्राणी हैं। उन्होंने सारे चिट्ठा जगत में मुनादी करवा दी है कि हास्य और मनोरंजन मंत्रालय भुवनेश शर्मा के पास है इसलिए सभी लोग, जो नाहरजी के समान गंभीर रचनाओं से त्रस्त हैं, वहीं संपर्क करें। वैसे मैं व्यंग्य मंत्रालय का प्रभार लेने के पक्ष में था पर देखा वहाँ कम्पटीशन कुछ ज्यादा है, सो मैंने कविराज से कहा भैया हास्य मंत्रालय का बोर्ड ही टाँग दो। वैसे भी ये मलाईदार मंत्रालय है। क्या पता कल को कोई टीवी चैनल वाला अपना चिट्ठा पढ़ ले और बैठे-बिठाये हस्ती का दर्जा मिल जाये। पर मैं स्टार वालों के आने के इंतजार में हूँ। सुना है कि वहाँ सिद्धू पाजी की सीट खाली हो गई है।

कविराजजी ने अपनी पोस्ट "सागर भाई को हँसाना है" में हमारी आपस की बातचीत उजागर कर दी और यह रहस्य सभी के सामने खुल गया कि हमारी रचनाएँ मौलिक न होकर कहीं से मारी हुई होती हैं। अब जब रहस्य खुल ही गया है कि जब सारी पोस्ट कहीं से चुरा के कापी-पेस्ट की गई हैं तो यह भी बताना पड़ेगा कि हमने यह महान कला कहाँ से सीखी।
आजकल जिसे देखो वो ऑरकुट देव का भक्त है। जरा समय मिला नहीं कि भग्वद्‍भक्ति में हो गए लीन। दूसरों के प्रोफ़ाइल देखना, "हाय", " "वाना बी फ़्रेंड" जैसे वाक्य दूसरों की स्क्रैपबुक में छोड़ना, पूजा-पाठ के सामान्य तरीके हैं। पर एक तरीका जिसको ऑरकुट पर कुछ विद्वान पंडित लोग प्रयोग करते हैं, वह है दूसरों की स्क्रैपबुक में झाँकना और उसमें से कुछ माल चुराकर तीसरे की स्क्रैपबुक में पेस्ट कर देना। ऐसे ही एक विद्वान पंडित हमारे मित्र हैं। एक दिन उन्होंने जब हमारा मूड कुछ उखड़ा देखा तो मानसिक शांति के लिए वे हमें ऑरकुट देव के मंदिर ले गए। मंदिर जाने में अपन को कुछ खास रुचि नहीं पर उन्होंने जब कुछ अप्सराओं से हमारी मित्रता कराई तो हमें इस मंदिर की सार्थकता का एहसास हुआ। उसके बाद हम भी करोडों भक्तों की तरह ऑरकुट देव की आराधना में लीन रहने लगे। एक दिन हमारे पंडितजी मंदिर में कुछ विशेष ढंग से पूजा-अर्चना करते दिखे। वे कुछ पंक्तियाँ एक भक्त की स्क्रैपबुक में से चुराकर कुछ अन्य भक्तजनों को पेस्ट रहे थे। पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार थीं-

ऑरकुट बिना चैन कहाँ रे,
स्क्रैपिंग बिना चैन कहाँ रे,
सोना नहीं चाँदी नहीं,
ऑरकुट तो मिला,
अरे स्क्रैपिंग कर ले...

हमने पूछा पंडितजी इस विशेष पूजा का का कोई विशेष प्रयोजन है क्या? उन्होंने कहा- "अरे तुम भी बस दूसरों को स्क्रैप ही लिखना जानते हो। सही माल तो ये है। दूसरों की स्क्रैपबुक में से कापी करो और पेस्ट करो। खालीपीली लिखने के झंझट से मुक्ति और थोड़े टाइम में कई लोगों को भेजो। क्यों दिमाग पर जोर डालते हो।"
पंडितजी की बात हमारी समझ में आ गई। दिमाग पर जोर न डालते हुए दूसरों को इम्प्रेस करने का सस्ता और टिकाऊ तरीका मिल गया। तभी एक दिन दूसरों के प्रोफ़ाइल्स में झाँकते हुए हमे कविराज के दर्शन हो गए और हमारी उनसे मित्रता हो गई। उनके माध्यम से हमें चिट्ठाजगत के बारे में जानने का अवसर प्राप्त हुआ। कुछ ही दिन बाद कविराज ने हमें भी इस बहती गंगा में कुदा लिया, कहा- "आप भी चिट्ठा लिखें।" अब चूँकि लिखने का अपना कभी अनुभव नहीं रहा। नोट्स दूसरों के फ़ोटोकापी करवा के पढ़ते हैं। इम्तहान में उतना ही लिखते हैं जितने से पास हो जाएँ। ज्यादा लिखने से हाथ दुखता है न। सो हमने इस संबंध में सलाह लेने के लिए अपने पंडितजी को फ़ोन घुमाया।
पंडितजी को जब हमने चिट्ठा-लेखन नामक विधा के बारे में बताया तो वे हड़बड़ाते हुए हमारे घर आए और पसीना पोंछते हुए बोले- "दिखाओ तो यार क्या बताया था तुमने फ़ोन पे।"
हमने तुरंत उन्हें कविराज के चिट्ठे का दर्शन कराया और पूछा कि हमें चिट्ठा लेखन के बारे में कुछ टिप्स दीजिए। पंडितजी जो इंटरनेट के मामले में स्वयंभू पंडित थे इस नयी बला को देखकर सोच में पड़ गये। उन्होंने हमें कुछ दिन इंतजार करने को कहा। एक दिन पंडितजी ने हमें बुलाया और आशीर्वाद दिया कि आप निर्भय होकर चिट्ठा लेखन में कूदें। अब कोई समस्या नहीं है। हमने पूछा- "पर पंडितजी उसमें लिखेंगे क्या? हमें तो कुछ लिखना आता ही नहीं"
पंडितजी ने कहा- "कापी-पेस्ट करना तो याद है न कि भूल गये?"
हम- "पंडितजी इतनी अच्छी चीज को कोई भूलता है क्या?"
पंडितजी- "तो फ़िर ये लिंक लो और शुरू कर दो।"

पंडितजी ने बड़े अथक परिश्रम से कुछ ऐसे हिंदी चिट्ठों की लिंक दीं जो शौकिया तौर पर शुरू किये गये थे और शौक पूरा होने पर बंद पड़े हुए थे। हमने प्रसाद-स्वरूप वह लिंक ग्रहण कीं और उनका मैटर अपने चिट्ठे में चिपकाना शुरू कर दिया। उस दिन के बाद से आज तक यह क्रम अनवरत रूप से जारी है और आगे भी जारी रहता। पर इसी बीच हमें हास्य एवंमनोरंजन मंत्रालय का कार्यभार सँभालना पड़ गया। इसलिए आज का यह चिट्ठा मंत्रालय के एक कर्मचारी से लिखवाया गया है। और टिप्पणियों की संख्या के आधार पर उसकी वेतनवृद्धि करने की भी हमारी योजना है। इसलिए सागरजी से आग्रह है कि उस कर्मचारी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इतनी जोर का ठहाका लगायें कि उसकी गूँज आंध्र प्रदेश से मध्य प्रदेश तक हो।

साथ ही चिट्ठाकार बंधुओं के लिए खुशखबरी है कि हमारे मंत्रालय में शीघ्र ही नयी नियुक्तियाँ होने वाली हैं। इसलिए ऐसे उम्मीदवार जो स्वतंत्र रूप से अपने-अपने चिट्ठों में हास्य और मनोरंजन का इस्तेमाल करते हैं, हमसे संपर्क करें। यदि बाद में कोई चिट्ठाकार हास्य और मनोरंजन का प्रयोग अपने चिट्ठे में करता पाया गया तो मंत्रालय के विशेषाधिकार हनन के मामले में उस पर मुकदमा चलाया जायेगा। इसलिए अपने उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय में होने वाली नियुक्तियों के लिए संपर्क करें। नियुक्ति के लिए किसी प्रकार का कोई फ़ार्म आदि भरने संबंधी औपचारिकता नहीं रखी गई है। नियुक्तियों में पूरी पारदर्शिता बरती जायेगी। यदि आप मंत्रालय में नियुक्ति के इच्छुक हैं तो हमें बस एक मेल करें। आपको एक बैंक अकाउंट नंबर दिया जायेगा। वहाँ आपको मात्र साढ़े नौ लाख रुपये जमा करने होंगे। चिट्ठाकारों से इतर उम्मेदवारों के लिए रेट दस लाख है पर चिट्ठा-जगत से पुराने संबंधों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए पचास हजार की विशेष छूट दी गई है। बैंक में पैसा जमा करने के पश्चात नियुक्ति-पत्र का इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। सीधे आकर अपना स्थान ग्रहण करें।