
भावुकता अंगूर लता से
खींच कल्पना की हाला
कवि साकी बनकर आया है
भरकर कविता का प्याला
कभी न कण भर खाली होगा
लाख पिएं, दो लाख पिएं
पाठकगण हैं पीने वाले
पुस्तक मेरी मधुशाला।
बरस में एक बार ही
जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही बाजी लगती
जगती दीपों की माला,
दुनियां वालों, किंतु, किसी दिन
आ मदिरालय में देखो
दिन को होली, रात दिवाली
रोज मनाती मधुशाला!
मुसलमान औ’ हिंदू हैं दो
एक, मगर, उनका प्याला
एक, मगर, उनका मदिरालय
एक, मगर, उनकी हाला,
रहते एक न जब तक
मस्जिद-मंदिर में जाते,
लड़वाते हैं मस्जिद-मंदिर
मेल कराती मधुशाला!
मेरे शव पर वह रोए, हो
जिसके आंसू में हाला,
आह भरे वह, जो हो सुरभित
मदिरा पीकर मतवाला,
दे मुझको कंधा वे, जिनके
पद मद-डगमग होते हों,
और जलूं उस ठौर, जहां पर
कभी रही हो मधुशाला!
अपने युग में सबको अनुपम
ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अद्भुत
ज्ञात हुआ अपना प्याला,
भी वृद्धों से जब पूछा
एक यही उत्तर पाया
अब न रहे वे पीने वाले
अब न रही वह मधुशाला!
(विख्यात कवि हरिवंशराय बच्चन की रचना ‘मधुशाला’ से साभार।)
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