ताज ने तो स्साला नाक में ही दम कर दिया। अखबार उठा के देखो तो ताज, इंटरनेट पर जाओ तो ताज और अब तो खुद को देशप्रेमी कहने वाले कुछ लोग सड़क पर भी हल्ला मचाते दिख जायेंगे कि ताज को वोट दो, वोट दो। यार हमारी मंद अकल में तो ये बातें समझ में ही नहीं आतीं कि ताज को वोट देने से कैसे देश का गौरव बढ़ जाता है? क्यों यह इमारत मोहब्बत की मिसाल है? देशप्रेम का इससे क्या लेना-देना है? खैर जब लोग कह रहे हैं तो कुछ सोचकर ही कह रहे होंगे।
भई अपनी अल्पबुद्धि से जब हमने विचार किया कि क्यों ताज को वोट दिया जाय तो पता चला कि कोई सेवन वंडर्स फाउंडेशन है जो दुनिया भर के कुछ चुनिंदा स्मारकों की कोई लिस्ट-फिस्ट बना रहा है और लोगों से वोटिंग करने को कह रहा है। अब देशभर में हल्ला हो रहा है कि हमारा ताज तो इस लिस्ट में आना ही
चाहिए, नहीं तो देश की नाक कट जायगी। मेरी समझ में ये नहीं आता कि क्यों देश की नाक विदेशी सर्टिफिकेट से ही जुड़ती है। जब सबको पता है कि ताज सौदर्य का और मुहब्बत का प्रतीक है तो ऐसी इमारत को विश्व की अन्य खंडहर और भुतहा इमारतों से होड़ करने की क्या जरूरत आन पड़ी? पर वही गुलाम मानसिकता ! किसी विदेशी ने कहा कि बेटा करो वोटिंग तभी हम मानेंगे कि तुम्हारा ताज वाकई कुछ है तो हम हो गये शुरू। और फिर है कौन ये सेवन वंडर्स फाउंडेशन जिसे ताज को सर्टिफिकेट देने का ठेका मिल गया। यदि कल को मैं कोई फाउंडेशन बना लूं और कहूं कि भैया करो वोट कि कौन सी इमारत स्थापत्य की दृष्टि से विश्व में सर्वोत्तम है। पर इसके लिए औकात भी चाहिए जो मेरी है नहीं। पर ऐसे किसी संगठन का कोई अधिकारिक आधार है क्या? यूनेस्को तक से उसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। ताज को पता नहीं क्यों लोग सौदर्य, मुहब्बत और प्रेम की निशानी बताते हैं। मेरे ख्याल से तो ये इमारत मूर्खता और अहंकार का प्रतीक है। शाहजहां के पास दौलत थी तो उसने दुनिया को दिखाया कि मुझसे ज्यादा प्रेम आज तक किसी ने अपनी महबूबा से नहीं किया। यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि आज भी लोग शाहजहां के मुहब्बत के किस्से बड़े फख्र से सुनते हैं और ताज को उसके अमर प्रेम का प्रतीक बताते हैं। मतलब जो अपनी मुहब्बत को दौलत में तौल दे, महंगी और सुंदर इमारत बनवा दे उसका प्रेम महान। हम जैसे लोग जो अपनी गर्लफ्रेंड को फाइवस्टार में एक बार डिनर भी न करा सकें, उनका प्रेम झूठा। इस हिसाब से तो नंबर दो की कमाई वाले नेता, अफसर जो अनाप-शनाप पैसा कॉलगर्ल्स पे लुटाते हैं और रखैलें रखते हैं, उनका प्यार भी महान। पर यहां प्यार कहां होता है पता ही नहीं चलता। साहिर लुधियानवी ने ताज के बारे में बिलकुल सही कहा है कि ‘एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्बत का मजाक उड़ाया है’। सुमित्रानंदन पंत ने भी इसे देखकर कह दिया कि ‘हाय, मृत्यु का ऐसा सुंदर स्मारक और जीवन की ऐसी अवहेलना’।
ताज का निर्माण पूरा होने के बाद इसके वास्तुकार और निर्माण से जुड़े लोगों के हाथ काट दिये गये थे ताकि वे लोग इतनी खूबसूरत इमारत दुनिया में कहीं और न बना सकें। ऐसे में यह इमारत एक शासक की मुहब्बत की दास्तां बयां करती है या क्रूरता और अहंकार की? सुना है इसे बनाने में सोलह वर्ष का समय लगा था और अपार धन इसके निर्माण पर खर्च हुआ। ऐसे में यह इमारत प्रतीक है धन और समय की बर्बादी का। जनता का जो पैसा उसके कल्याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए था, वह एक अहंकारी और मूर्ख बादशाह ने निर्जीव पत्थर की इमारत बनाने में लुटा दिया। हमारे बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि दूसरे के साथ बुरा करने वालों का कभी भला नहीं होता। वही हुआ भी। उसी के बेटे के कारण अपने जीवन के अंतिम वर्ष उसने कैद में गुजारे। चीन की महान दीवार के निर्माणकर्ता मिंग साम्राज्य का पतन होने में भी ज्यादा समय नहीं लगा। जिस दीवार पर के निर्माण के लिए उन्होंने किसानों से अनाप-शनाप लगान वसूला, उन्हीं के विद्रोह के कारण वह साम्राज्य धूल में मिल गया। पिरामिड बनाने वाली सभ्यता का पता ही न चला। रोम के कोलोसियम में क्रूर खेलों को देखने की शौकीन सभ्यता दफन हो गई।
वैसे मुझे ताजमहल से और शाहजहां से कोई दुश्मनी नहीं है। वाकई इसका स्थापत्य बेजोड़ है। संगमरमर का ऐसा सुंदर स्मारक संसार भर में नहीं है। पर मेरी आपत्ति इस बात को लेकर है कि लोग इसे राष्ट्रगौरव के साथ जोड़ने पर तुले हुए हैं। ताजमहल का नाम लिस्ट में आयेगा तो राष्ट्रगौरव बढ़ेगा वरना नाक के कट के गिर जाने का खतरा है। राष्ट्र का सारा गौरव मानो संगमरमर के पत्थरों में दबा पड़ा है। जब भी गौरव कुछ कम हुआ निकालकर कमी पूरी कर लेंगे। अखबार में आज बड़ी मजेदार बात पढ़ी। लिखा था- ‘बहादुर हिंदुस्तानियों ने देशप्रेम और गौरव के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया था और हम आपको सिर्फ ताज को वोट देने के लिए कह रहे हैं’। 1947 के बाद से अब तक के वर्षों में खूब प्रगति हो गई। तब आदमी को देशप्रेम के लिए जान तक न्यौछावर करनी पड़ती थी। पर आज के युग में सब आसान हो गया है। बस एक एस.एम.एस करो और हो गया साबित कि आपमें ही है देशप्रेम का सच्चा जज्बा। यदि आपके पास इंटरनेट कनेक्शन है तो आपसे बड़ा देशभक्त तो कोई है ही नहीं। बस थोड़ी वोटिंग-सोटिंग कर डालो एक साइट खोल के। पर विडंबना ये है कि देश के उन करोड़ों लोगों के बारे में तो सोचिए जो मोबाइल और इंटरनेट तो क्या अपने लिए रोटी तक ‘अफोर्ड’ नहीं कर पाते। वे कैसे अपने देशप्रेम को साबित करें?