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Tuesday, July 03, 2007

जाओ नहीं देते ताज को वोट क्‍या कल्‍लोगे

ताज ने तो स्‍साला नाक में ही दम कर दिया। अखबार उठा के देखो तो ताज, इंटरनेट पर जाओ तो ताज और अब तो खुद को देशप्रेमी कहने वाले कुछ लोग सड़क पर भी हल्‍ला मचाते दिख जायेंगे कि ताज को वोट दो, वोट दो। यार हमारी मंद अकल में तो ये बातें समझ में ही नहीं आतीं कि ताज को वोट देने से कैसे देश का गौरव बढ़ जाता है? क्‍यों यह इमारत मोहब्‍बत की मिसाल है? देशप्रेम का इससे क्‍या लेना-देना है? खैर जब लोग कह रहे हैं तो कुछ सोचकर ही कह रहे होंगे।

भई अपनी अल्‍पबुद्धि से जब हमने विचार किया कि क्‍यों ताज को वोट दिया जाय तो पता चला कि कोई सेवन वंडर्स फाउंडेशन है जो दुनिया भर के कुछ चुनिंदा स्‍मारकों की कोई लिस्‍ट-फिस्‍ट बना रहा है और लोगों से वोटिंग करने को कह रहा है। अब देशभर में हल्‍ला हो रहा है कि हमारा ताज तो इस लिस्‍ट में आना ही चाहिए, नहीं तो देश की नाक कट जायगी। मेरी समझ में ये नहीं आता कि क्‍यों देश की नाक विदेशी सर्टिफिकेट से ही जुड़ती है। जब सबको पता है कि ताज सौदर्य का और मुहब्‍बत का प्रतीक है तो ऐसी इमारत को विश्‍व की अन्‍य खंडहर और भुतहा इमारतों से होड़ करने की क्‍या जरूरत आन पड़ी? पर वही गुलाम मानसिकता ! किसी विदेशी ने कहा कि बेटा करो वोटिंग तभी हम मानेंगे कि तुम्‍हारा ताज वाकई कुछ है तो हम हो गये शुरू। और फिर है कौन ये सेवन वंडर्स फाउंडेशन जिसे ताज को सर्टिफिकेट देने का ठेका मिल गया। यदि कल को मैं कोई फाउंडेशन बना लूं और कहूं कि भैया करो वोट कि कौन सी इमारत स्‍थापत्‍य की दृष्टि से विश्‍व में सर्वोत्‍तम है। पर इसके लिए औकात भी चाहिए जो मेरी है नहीं। पर ऐसे किसी संगठन का कोई अधिकारिक आधार है क्‍या? यूनेस्‍को तक से उसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं।


ताज को पता नहीं क्‍यों लोग सौदर्य, मुहब्‍बत और प्रेम की निशानी बताते हैं। मेरे ख्‍याल से तो ये इमारत मूर्खता और अहंकार का प्रतीक है। शाहजहां के पास दौलत थी तो उसने दुनिया को दिखाया कि मुझसे ज्‍यादा प्रेम आज तक किसी ने अपनी महबूबा से नहीं किया। यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि आज भी लोग शाहजहां के मुहब्‍बत के किस्‍से बड़े फख्र से सुनते हैं और ताज को उसके अमर प्रेम का प्रतीक बताते हैं। मतलब जो अपनी मुहब्‍बत को दौलत में तौल दे, महंगी और सुंदर इमारत बनवा दे उसका प्रेम महान। हम जैसे लोग जो अपनी गर्लफ्रेंड को फाइवस्‍टार में एक बार डिनर भी न करा सकें, उनका प्रेम झूठा। इस हिसाब से तो नंबर दो की कमाई वाले नेता, अफसर जो अनाप-शनाप पैसा कॉलगर्ल्‍स पे लुटाते हैं और रखैलें रखते हैं, उनका प्‍यार भी महान। पर यहां प्‍यार कहां होता है पता ही नहीं चलता। साहिर लुधियानवी ने ताज के बारे में बिलकुल सही कहा है कि ‘एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्‍बत का मजाक उड़ाया है’। सुमित्रानंदन पंत ने भी इसे देखकर कह दिया कि ‘हाय, मृत्‍यु का ऐसा सुंदर स्‍मारक और जीवन की ऐसी अवहेलना’।


ताज का निर्माण पूरा होने के बाद इसके वास्‍तुकार और निर्माण से जुड़े लोगों के हाथ काट दिये गये थे ताकि वे लोग इतनी खूबसूरत इमारत दुनिया में कहीं और न बना सकें। ऐसे में यह इमारत एक शासक की मुहब्‍बत की दास्‍तां बयां करती है या क्रूरता और अहंकार की? सुना है इसे बनाने में सोलह वर्ष का समय लगा था और अपार धन इसके निर्माण पर खर्च हुआ। ऐसे में यह इमारत प्रतीक है धन और समय की बर्बादी का। जनता का जो पैसा उसके कल्‍याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए था, वह एक अहंकारी और मूर्ख बादशाह ने निर्जीव पत्‍थर की इमारत बनाने में लुटा दिया। हमारे बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि दूसरे के साथ बुरा करने वालों का कभी भला नहीं होता। वही हुआ भी। उसी के बेटे के कारण अपने जीवन के अंतिम वर्ष उसने कैद में गुजारे। चीन की महान दीवार के निर्माणकर्ता मिंग साम्राज्‍य का पतन होने में भी ज्‍यादा समय नहीं लगा। जिस दीवार पर के निर्माण के लिए उन्‍होंने किसानों से अनाप-शनाप लगान वसूला, उन्‍हीं के विद्रोह के कारण वह साम्राज्‍य धूल में मिल गया। पिरामिड बनाने वाली सभ्‍यता का पता ही न चला। रोम के कोलोसियम में क्रूर खेलों को देखने की शौकीन सभ्‍यता दफन हो गई।


वैसे मुझे ताजमहल से और शाहजहां से कोई दुश्‍मनी नहीं है। वाकई इसका स्‍थापत्‍य बेजोड़ है। संगमरमर का ऐसा सुंदर स्‍मारक संसार भर में नहीं है। पर मेरी आपत्ति इस बात को लेकर है कि लोग इसे राष्‍ट्रगौरव के साथ जोड़ने पर तुले हुए हैं। ताजमहल का नाम लिस्‍ट में आयेगा तो राष्‍ट्रगौरव बढ़ेगा वरना नाक के कट के गिर जाने का खतरा है। राष्‍ट्र का सारा गौरव मानो संगमरमर के पत्‍थरों में दबा पड़ा है। जब भी गौरव कुछ कम हुआ निकालकर कमी पूरी कर लेंगे। अखबार में आज बड़ी मजेदार बात पढ़ी। लिखा था- ‘बहादुर हिंदुस्‍तानियों ने देशप्रेम और गौरव के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया था और हम आपको सिर्फ ताज को वोट देने के लिए कह रहे हैं’। 1947 के बाद से अब तक के वर्षों में खूब प्रगति हो गई। तब आदमी को देशप्रेम के लिए जान तक न्‍यौछावर करनी पड़ती थी। पर आज के युग में सब आसान हो गया है। बस एक एस.एम.एस करो और हो गया साबित कि आपमें ही है देशप्रेम का सच्‍चा जज्‍बा। यदि आपके पास इंटरनेट कनेक्‍शन है तो आपसे बड़ा देशभक्‍त तो कोई है ही नहीं। बस थोड़ी वोटिंग-सोटिंग कर डालो एक साइट खोल के। पर विडंबना ये है कि देश के उन करोड़ों लोगों के बारे में तो सोचिए जो मोबाइल और इंटरनेट तो क्‍या अपने लिए रोटी तक ‘अफोर्ड’ नहीं कर पाते। वे कैसे अपने देशप्रेम को साबित करें?

Thursday, April 26, 2007

इस हार में संभावनाएं तो बहुत हैं

क्रिकेट के खेल में मेरी कभी कोई खास रुचि नहीं रही, हालांकि घर की छत पर और मुहल्‍ले में क्रिकेट खेला भी बहुत है। टीवी पर मैच भी खूब देखे हैं। पर कुछ समय से क्रिकेट में रुचि लेना लगभग बंद ही कर दिया था। कभी-कभार यदि मैच चल रहा हो तो स्‍कोर अवश्‍य देख लेता हूं। क्रिकेट पर होने चर्चा-परिचर्चा में भी अपना कोई दखल नहीं। इसका कारण यह धारणा भी है कि जो इंसान दिमाग से जितना ज्‍यादा पैदल होगा, वो उतना ही ज्‍यादा क्रिकेट पर अपना ज्ञान बघारकर खुद को तीस-मारखां साबित करने की कोशिश करेगा और ये जानते हुए भी मैं ऐसा करता हूं तो मेरी गिनती भी इनमें ही होनी है। वैसे भी भारत में अनगिनत ऐसे भी महारथी मिल जायेंगे जिन्‍हें शायद अपने प्रधानमंत्री का नाम तक मालूम न हो पर पूरी क्रिकेट टीम के सदस्‍यों के नाम जरूर गिना देंगे। अतिरिक्‍त खिलाडि़यों और कोच फिजियो आदि-आदि सहित। हमारे देश में क्रिकेट से एक बात अवश्‍य पॉजिटिव हुई है- वो है परिचर्चा करने के लिए मुद्दा। सोनियाजी के लाडले मन्‍नू भाई ने पाकिस्‍तान के बारे में कोई मसखरा बयान न दिया हो, अटलजी या जार्ज फर्नांडीज ने कोई मजाक न भी किया हो, महंगाई बढ़ भी रही हो तब भी लोगों के पास चर्चा करने के लिए एक रेडीमेड मुद्दा तैयार रहता है- क्रिकेट। ये कतई जरूरी नहीं कि क्रिकेट का सीजन भी चल ही रहा हो, क्‍योंकि चर्चा का सीजन तो बारामासी है। अब हमारे मुहल्‍ले के लल्‍लू पानवाले को ही लीजिए। धोनी के पास किस ब्रांड की कितनी मोटरसाइकिल हैं, वह बालों में हेयर-जैल कौन सी लगाता है, उसे सब पता है। इसलिए वह भी आजकल अपने धोनी कट बालों में वही हेयर-जैल लगाता है। इसलिए अपन तो हमेशा उसकी दुकान से जरा बच के निकलते हैं। वैसे भी अपना सामान्‍य ज्ञान वैसे ही सीमित है अगर उस क्रिकेट परिचर्चा में किसी ने फंसा लिया तो गलती से जो दो-चार लोग पढ़ा-लिखा समझते है उनके सामने भी कलई खुल जाएगी। पर बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाएगी की तर्ज पर मैं कभी-कभार ऐसे लोगों के बीच फंस ही जाता हूं। एक बार एक गांव में मैं फंस गया। गांव के लड़कों के साथ मैं बैठा हुआ था। सब इधर-उधर की हांक रहे थे। मैं भी हांके जा रहा था। मैं हांकने वालों के बीच खुद को कुछ सुविधाजनक महसूस कर रहा था। कारण, मैं शहर का निवासी और वे गांव के गंवार। बाहरी दुनिया की बातें, नयी तकनीकें आदि के बारे में मैं उनसे ज्‍यादा ही जानता था। इसलिए मेरी बातों से उनकी पट नहीं पड़ पा रही थी। तभी उन्‍होंने एक दांव चला। वे बातचीत को क्रिकेट पर ले आए। क्रिकेट के बारे में अपना ज्ञान ज्‍यादा से ज्‍यादा प्राइमरी तक ही है पर वे तो शायद पी.एच.डी. थे। न भी हों तो मुझ जैसे को झेलाना क्‍या मुश्किल काम है। वे सब मुझ पर पिल पड़े और मेरी बेचारी सूरत पर हारमानी के भाव तैरने लगे। तब से मैं गांव के लड़कों से विशेषकर बचकर निकलता हूं। यदि फंस गया तो उनके एक ही दांव से मेरी सारी स्‍मार्टनेस हवा हो जाएगी।

बहरहाल कल टीवी खोली तो पता लगा कि हमारे वीर-सूरमा विदेशी धरती से भारत का परचम लहराकर लौटे हैं। मन ही मन अत्‍यधिक प्रसन्‍नता हुई पर थोड़ी ग्‍लानि भी हुई भारतीय मीडिया के रूखे और अभद्र व्‍यवहार पर। खिलाडि़यों का अभिनंदन तो दूर वे लोग- ‘पिटकर आ गए’ और ‘शर्म करो’ जैसे संबोधनों का भी प्रयोग कर रहे थे। खैर मीडिया को जाने दीजिए उनका व्‍यवहार तो हमेशा से ही गैर जिम्‍मेदाराना रहा है।

हमारे खिलाडि़यों ने इस बार फिर साबित कर दिया कि पश्चिम के सामने स्‍वामी विवेकानंद ने जो विचार रखे थे वे आज की पीढ़ी के समय में भी अप्रासंगिक नहीं हुए हैं और हमारे खिलाडि़यों ने विश्‍व कप में दूसरे, दबे-कुचले, वर्षों से किसी टूर्नामेंट को जीतने की आस लगाए लोगों को मौका देकर फिर उसी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की महान भावना को चरितार्थ किया है। मैं शायद यहां गलती कर रहा हूं। हमारे खिलाड़ी शायद अभी उस भावना को आत्‍मसात करने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं इसलिए उन्‍होंने शुरूआत ‘एशिया कुटुंबकम’ से की है। अंग्रेजी में एक कहावत भी है- ‘चैरिटी बिगंस एट होम’। सो हमारे शूरवीरों ने एक बड़े भाई के दायित्‍व का निर्वहन करते हुए उनके उज्‍जवल भविष्‍य को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें आगे जाने का मौका दिया है। साथ ही एक भाई जो पहले ही दौर में अपनी असफलता से निराश होकर टूट चुका था उसका साथ भी बखूबी निभाया है। जब हमारे बम बनाने पर वे बम बनाते हैं तो उनके असफल होने पर हमें भी असफल हो जाना चाहिए। जो नियम शस्‍त्रीकरण के खेल में लागू होते हैं वे क्रिकेट में भी लागू होने चाहिए। जब भी हमारी उनसे लड़ाई होती है तो यह क्रिकेट का खेल ही हमें फिर से एक-दूसरे के निकट लाने में मदद करता है। शांति प्रक्रिया के आगे बढ़ते रहने के लिए आवश्‍यक है हम कम से कम क्रिकेट में तो एक-दूसरे से सामंजस्‍य और बराबरी बनाये रखें। कल को यदि भारतीय टीम विश्‍वकप ले आती और पाकिस्‍तान की टीम बैरंग लौटती तो पाकिस्‍तान हम पर आरोप लगा सकता था कि- “भारत एशिया में खुद का प्रभुत्‍व जमाने की कोशिश में है और इससे हमारे हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।” तब हमारे मन्‍नू भाई को मजबूरी में यह कहना पड़ता कि हम एक साझा समूह बनाने जा रहे हैं जो इस बात की निगरानी करेगा कि वे कौन से कारण हैं जिनसे हमारी टीम जीत रही है और वे कौन से उपाय हो सकते हैं जिनसे दोनों टीमों का स्‍तर बराबर लाया जा सके। परंतु हमारे शूरवीरों ने मन्‍नू भाई को इस दुविधा से बचा लिया है वैसे भी उनके पास समय की कमी है यदि ऐसी कूटनीतिक बातों में ही उनका सारा समय खप गया तो विकास दर का क्‍या होगा?

विकास दर आगे बढ़ रही है। अर्थव्‍यवस्‍था आगे बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में हर भारतीय का कर्तव्‍य है कि वह भी यथासंभव देश के प्रति अपने कर्तव्‍य का पालन करे और देश को और आगे ले जाए। सो क्रिकेट टीम की भूमिका मैदान के साथ-साथ अर्थव्‍यवस्‍था के लिए भी महत्‍वपूर्ण हो जाती है। जब देशवासी क्रिकेट के बुखार में तप रहे हों और काम-धाम छोड़ टेलिविजन के सामने बैठे हों और इस प्रकार विकास दर की मट्टी पलीद करने तुले हों तब हमारे शूरमाओं का ये कर्तव्‍य हो जाता है कि उन्‍हें समझाएं कि जाओ भैया अपना-अपना काम करो काहे को टाइम खोटी करते हो। पर मजाल है हमारे क्रिकेट-प्रेमी टीवी बंद कर दें। तो ऐसे नालायकों को समझाने के लिए मजबूरी में हमारी पूरी टीम को ही यहां आना पड़ा। अब अर्थव्‍यवस्‍था को कोई खतरा नहीं है। बच्‍चे भी फिर से परीक्षाओं में व्‍यस्‍त हो गए हैं और उनके अभिभावकों को उनके भविष्‍य का डर अब नहीं सता रहा है। यही प्रतिभावान बच्‍चे कल को हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को और ऊंचाईयों पर ले जाएंगे। इस प्रकार अप्रत्‍यक्ष रूप से हमारे क्रिकेटरों ने देश के लिए जो योगदान दिया है उसे नकारा नहीं जा सकता। हालांकि हमारे शूरमा इतने कायर भी नहीं कि वे हर काम पर्दे के पीछे ही रहकर करें। भई जब अर्थव्‍यवस्‍था प्रगति करेगी, नये उद्योग लगेंगे और उनसे जो उत्‍पाद निकलेंगे, उनको जनता तक पहुंचाने का काम भी किसी को करना पड़ेगा। और वैसे भी आजकल मॉडल्‍स की कमी है। जो हैं वो फिल्‍मों में व्‍यस्‍त हैं। सो क्रिकेटर, जो कि उत्‍पादन से लेकर उपभोक्‍ता तक एक महत्‍वपूर्ण कड़ी हैं, इस आर्थिक प्रक्रिया के चरण में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

क्रिकेट खेलने के कारण खिलाडि़यों का ब‍हुत सा समय यूं ही बर्बाद हो जाता है। इसलिए उन्‍होंने एक नयी नीति को अमल में लाना शुरू किया है। जब भी वे किसी श्रृंखला में खेलेंगे, जल्‍दी से जल्‍दी वहां अपना काम खतम करेंगे(हारेंगे) और वापस अपने काम पर लग जाएंगे। इस नीति का भारत को बहुत राजनयिक लाभ मिलेगा। मन्‍नू भाई बुश से कहेंगे कि आओ भई एक मैत्री क्रिकेट श्रृंखला हो जाए। बुश कहेंगे पहले बताओ मेरा फायदा क्‍या है? मन्‍नू भाई कहेंगे कि फायदा आपका ही आपका है। आप महाशक्ति होकर भी क्रिकेट में कुछ नहीं हैं, हम आपसे मैच हारेंगे और हमें दो-चार श्रृंखला हराने से शायद आपको आई.सी.सी. से मान्‍यता भी मिल जाए। ज्‍यादा हुआ तो हमारे एक-दो खिलाड़ी यदि गलती से अच्‍छा खेले तो आप उन्‍हें ग्रीन कार्ड देकर अपने पास रख लीजिएगा। फिर आप क्रिकेट की भी महाशक्ति हो जाएंगे। इससे हमारे संबंध अमेरिका से और ज्‍यादा प्रगाढ़ होंगे। शायद वो हमसे रक्षा तकनीक समझौता कर ले और आतंकवाद के खिलाफ हमें साझा सहयोगी बना ले। ऐसा न भी करे तो कम से कम चीन की बजाय हमारे यहां अधिक निवेश करने लग जाए।

नीति का एक पहलू यह भी है कि भारत क्रिकेट में कमजोर टीमों से हारेगा तो इससे उन टीमों के मनोबल में वृद्धि होगी और इस प्रकार क्रिकेट में और भी नयी टीमें आयेंगी जो भारत को हराकर शायद टेस्‍ट क्रिकेट खेलने का दर्जा भी पा जायें जो उन्‍हें अन्‍यथा नहीं मिलेगा। इस प्रकार भारत विश्‍व में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। आगे ऐसा भी संभव है कि भारत इन छोटे-छोटे देशों से हारने के एवज में उनसे मुक्‍त व्‍यापार समझौता कर ले और भारत का विदेशी व्‍यापार नयी ऊंचाईयां छूने लगे।

भई संभावनाएं तो बहुत हैं पर जनता कुछ समझ ही नहीं रही है।