संगीत, स्वार्थी किरदारों की आपसी लड़ाई और धुंआधार प्रचार इन सब चीजों का प्रयोग वे खुलकर अपनी फिल्मों में करते आए हैं। उनकी खासियत या कहें कौशल कि वे व्यावसायिक रूप से औसत दर्जे की फिल्म बनाकर सिनेमाघर में लोगों को खींच ही लाते हैं। फिल्म की कहानी बहुत दमदार तो नहीं पर अंत तक दर्शक को बांधे रखती है। कहानी के हिसाब से किरदारों का प्रयोग बढि़या तरीके से निर्देशकद्वय ने किया है। फिल्म के गाने टीवी के प्रोमो के हिसाब से तो बहुत अच्छे हैं पर फिल्म में ठूंसे हुए हैं। तेज गति से भागती फिल्म में गाने बोर ही करते हैं। फिल्म के अंत में तेज संगीत के साथ कारों की रेस दिखाई जाती है। इसे देखकर लगता है अब्बास-मस्तान ने अपनी थ्रिलर शैली और मसाला सिनेमा का कॉकटेल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
प्रीतम चक्रबर्ती जैसे संगीत के लिए जाने जाते हैं वैसा ही उन्होंने इस फिल्म में भी दिया है। गानों के वीडियोज प्रभावित करते हैं पर फिल्म में सिचुएशन के हिसाब से नहीं लगते। कुमार तौरानी की यह फिल्म भीड़ खींचने में कामयाब हो रही है। हालांकि इस हफ्ते रिलीज हुई ‘वन टू थ्री’ इसे कड़ी टक्कर देगी। जिंदगी की रेस दिखाकर फिल्म को पैसे कमाने की रेस में दौड़या गया है और काफी हद तक यह सफल भी है।