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Saturday, March 15, 2008

और भी रंग हैं जिंदगी के: ब्‍लैक एंड व्‍हाइट

सिनेमाघर में जाकर पता लगा कि ब्‍लैक एंड व्‍हाईट सुभाष घई की फिल्‍म है। ऐसा फिल्‍मकार जिसकी फिल्‍मों में बड़े स्‍टार, भव्‍य सेट्स, लार्जर दैन लाइफ कहानियां और मधुर संगीत होता है, इस बार लीक से हटकर कुछ प्रयोग कर रहा है यह जानकर अच्‍छा लगा। हालांकि शोमैन सुभाष की फिल्‍में मुझे कभी अच्‍छी नहीं लगीं पर उनकी फिल्‍मों का संगीत जरूर लुभाता है। पर इस बार उन्‍होंने अपनी शोमैन की छवि को बदलने का प्रयास किया है। वैसे भी पिछले काफी समय से उनके सितारे गर्दिश में ही चल रहे हैं और उनकी बड़े बजट की फिल्‍में पिट भी चुकी हैं। शायद यही कारण है कि वे चक दे इंडिया और तारे जमीं पर के समय में सामाजिक सरोकारों वाली फिल्‍मों पर सोचने लगे हैं।

फिल्‍म कहानी है एक मुस्लिम युवक नुमैर काजी(अनुराग सिन्‍हा) की जो अफगानिस्‍तान के किसी आतंकवादी शिविर से प्रशिक्षण लेकर दिल्‍ली आता है। वह एक फियादीन हमलावर है जो 15 अगस्‍त के दिन दिल्‍ली के लाल किले पर विस्‍फोट करने के मकसद से दिल्‍ली आया है। दिल्‍ली में वह चांदनी चौक में एक रिश्‍तेदार के यहां ठहरा हुआ है। फिल्‍म में अनिल कपूर एक उर्दू प्रोफेसर राजन माथुर की प्रभावी भूमिका में हैं साथ ही उर्दू शायर की भूमिका में गफ्फार भाई(हबीब तनवीर) भी हैं।

फिल्‍म के माध्‍यम से घई मुस्लिम आतंकवादियों को पैगाम देते नजर आए हैं कि हिंसा की इजाजत कोई धर्म नहीं देता। उन्‍होंने फिल्‍म के चरित्रों के माध्‍यम से उस संस्‍कृति को दिखाया है जिसे हम साझा संस्‍कृति कहते हैं और जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्मों के लोगों के लिए सम्‍मान है। मुहब्‍बत का संदेश देने वाली इस फिल्‍म के जरिए बहुत ही प्रासंगिक विषय को उठाया गया है। पर अच्‍छे विषय पर बनी फिल्‍म भी उतनी ही अच्‍छी होती तो एक बड़े दर्शक वर्ग तक इसका पैगाम पहुंचता। सुभाष घई ने लीक से हटकर सार्थक सिनेमा बनाने की कोशिश में निराश किया है। एक अच्‍छा विषय ही फिल्‍म के अच्‍छे होने की गारंटी नहीं है बल्कि उसे दमदार तरीके से प्रस्‍तुत करना महत्‍वपूर्ण है।

फिल्‍म के नायक अनुराग सिन्‍हा ने अपनी पहली ही फिल्‍म में अभिनय से प्रभावित किया है। वैसे भी रंगमंच का अनुभव होने के कारण वे मंजे हुए कलाकार हैं। पर निर्देशक ने उनकी प्रतिभा का ठीक ढंग से इस्‍तेमाल नहीं किया है। अनिल कपूर हमेशा की तरह फॉर्म में हैं। हबीब तनवीर कम समय के लिए दिखे हैं। उनके जैसे कलाकार के लिए फिल्‍म में कोई स्‍कोप नहीं है। फिल्‍म का संगीत पक्ष भी कमजोर सा है। एक गीत मैं चला को छोड़कर बाकी कुछ खास नहीं हैं। सही कहा जाए तो फिल्‍म के सभी पक्षों पर भावुकता और नाटकीयता हावी है जबकि चित्रण पर ठीक से ध्‍यान नहीं दिया गया है। सुभाष घई को अपनी भूमिका ऐसे विषयों में निर्माता तक ही सीमित रखनी चाहिए। कम से कम ऐसी प्रयोगवादी फिल्‍मों में तो नहीं।