Wednesday, December 30, 2009

रिमोट कंट्रोल से ही चल पायेगा ये लोकतंत्र

आज के दैनिक भास्‍कर में वेदप्रताप वैदिक ने भारतीय राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भूमिका के बारे में लिखा है...उनकी भूमिका और प्रबल हो ऐसा लोकतंत्र और राष्‍ट्र दोनों के हित में है ऐसा वे कहते हैं...साथ ही सबसे बड़ा मुद्दा उन्‍होंने उठाया है दोनों पार्टियों के अंदर के आंतरिक लोकतंत्र का...उन्‍होंने भारतीय जनता के ऊपर थोपे हुए नेता जो कि जनता के अपने नहीं हैं, द्वारा शासन किये जाने की विडंबना पर चिंता व्‍यक्‍त करने के साथ बताया है कि इन नेताओं का रिमोट कंट्रोल कहीं और ही है.

वैदिकजी की बात से असहमत होने की कोई वजह नहीं है परंतु जो बातें उन्‍होंने कहीं यदि ऐसा वाकई में संभव हो जाए और गांधी परिवार कांग्रेस को एवं अन्‍य पार्टियों के अपने-अपने रिमोट कंट्रोलर उन्‍हें रिमोट कंट्रोल से संचालित करने की बजाय खुला छोड़ दे और आंतरिक लोकतंत्र विकसित होने देने लायक परिस्थितियां उत्‍पन्‍न हो सकें तब क्‍या स्थिति होगी क्‍या इसकी कल्‍पना नहीं की जानी चाहिए?.....हालांकि जो रिमोट कंट्रोल वाली कहावत है वह केवल कांग्रेस में ही नहीं है...ऐसा दल जिसका केवल एक ही सांसद या दो-चार ही एमएलए होंगे वहां भी यही स्थिति देखने मिलेगी.

एक साधारण व्‍यक्ति जो थोड़ी-बहुत राजनीति में दिलचस्‍पी लेता है वह भी निश्चित रूप से इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचेगा कि हर पार्टी में जो आका बैठा हुआ है यदि उसकी पार्टी पर पकड़ ढीली हो जाए या उसके बिना पार्टी की कल्‍पना करके देखें तो हमें केवल और केवल अराजकता नजर आयेगी...हां कुछ समय के लिए ये हो सकता है कि यदि उनके पास सत्‍ता है तो वे अपने हितों को ध्‍यान में रखकर एक-दूसरे से चिपके रहें....पर अंतत: सिर-फुटौव्‍वल ही होना है...उदाहरण देने की यहां आवश्‍यकता यों नहीं कि ये सभी बातें लोगों ने विगत काफी समय से अनुभव की ही होंगी....हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र ही इस प्रकार का है कि हम कभी विचारधारा को तवज्‍जो दे ही नहीं सकते...हमें कोई मसीहा चाहिए, हमें चमत्‍कारिक नेता चाहिए, हमारी आस्‍थाओं में सामंतवाद अभी भी जिंदा है....व्‍यक्तिपूजा से दूर हम रह नहीं सकते.... ऐसी स्थिति में सत्‍ता की चाबी जनता से कुछेक लोगों या परिवारों तक पहुंच जाना सहज ही है...फिर वे चाहे उसका कैसा ही दुरुपयोग करें...हम एक व्‍यक्ति विशेष को इतना शक्तिशाली बना देते हैं कि पार्टी में बाकी लोगों को यदि अपना अस्तित्‍व कायम रखना है तो उसको शीश नवाना ही पड़ेगा, इसीलिए कोई पार्टी व्‍यक्ति-विशेष के रिमोट से संचालित उपकरण बनकर रह जाती है.....

जब ऐसी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र लागू कर दिया जाए तो इतने मतभेद उभरकर सामने आयेंगे कि उसका हाल जनता पार्टी जैसा हो जाएगा...जैसा आज लोगों को पता ही नहीं कि कौन सी जनता पार्टी जनता पार्टी है और बाकी जनता पार्टियां जाने कितने व्‍यक्ति-विशेषों की तिजोरियों में बंद हैं...

बड़ी ही विचित्र विरोधाभासी स्थिति है....जैसा कि वैदिक कहते हैं कि सही मायने में लोकतंत्र स्‍थापित होने के लिए जरूरी है कि पार्टियों में भी आंतरिक लोकतंत्र हो....वाकई ये एक आदर्श स्थिति है...परंतु हमारी भारतभूमि पर रोना ये है कि यदि ऐसा आंतरिक लोकतंत्र पार्टियों में हो जाए तो ये सब लड़-झगड़कर लोकतंत्र का सब रायता ही फैला दें...और पार्टी के इतने टुकड़े कर दें कि पता ही ना चले कि हम किस पार्टी और किस आंतरिक लोकतंत्र की बात कर रहे थे... इसलिए कम से कम रिमोट कंट्रोल से ही सही और दिखावे के लिए ही सही लोकतंत्र तो चल ही रहा है...बाकी वैदिकजी के लेख पर यही कहा जा सकता है कि 'दिल के खुश रखने को वैदिकजी ये खयाल अच्‍छा है'

Friday, December 11, 2009

आज नये लुटेरों को चुनने का पर्व है

अव्‍वल तो अपन ज्‍यादा बुद्धिजीवी चोचलों में फंसने के बजाय और क्‍यों हर किसी को वोट का इस्‍तेमाल करना चाहिए की बहस में पड़ने से इतर वोट डाल आते हैं....हमारे कुछ घनिष्‍ठों के बहिष्‍कारपूर्ण रवैये के बावजूद ...अब कोई वोट दे या ना दे हमारी बला से, हमने ठेका ना ले रखा दूसरों को जागरूक करने का...पिछले लोकसभा चुनाव में एक नया फैशन चला कि मतदान केंद्र जाकर अपनी पहचान प्रदर्शित कर हस्‍ताक्षर करो, उंगली पर स्‍याही लगवाओ और बिना वोट डाले ही आ जाओ...सो हम फैशन के मारों ने वो भी करके देख लिया....बाद में अखबारों से पता भी लगा कि फलां जगह इतनी डंपिंग हुई फलां जगह फलां के लोगों ने कब्‍जा कर दूसरों को वोट ना डालने दिया....सब कुछ हुआ और हम बड़े प्रसन्‍न कि हां भाई कम से कम हम जैसे जागरूक लोगों ने तो बहुत हटके और कुछ नया टाइप का काम किया लोकतंतर के वास्‍ते...अब ऐसे लोगों की संख्‍या यदि बढ़ेगी तो जरूर कुछ बात बनेगी...सरकार की भी बात कुछ खोपड़ी में आयेगी....पर उक्‍त चुनाव में जीत का अंतर डेढ़ लाख देखकर और हम जैसे फैशनबाजों की संख्‍या दहाई से तिहाई ना होते देखकर अपना उत्‍साह भी ठंडा....

अब आज से पिछले वाले नगर-निकाय के चुनावों का हाल...वार्ड में स्‍थानीय मंत्रीजी दिनभर अपनी लालबत्‍ती लगाकर घूमते रहे...सैकड़ों वोटरों को पहली बार ज्ञान हुआ कि हम इस वार्ड में आज के लिए मतदाता नहीं रहे...हो सकता है कल कोई दूसरे चुनाव हों तो दुबारा हमारा नाम आ जाए...फिर वोटों की गिनती का भी अपना अलग ही तौरतरीका है....मतगणना केंद्र से खबर निकली कि फलां जीत गए...पता लगा कि जीत की घोषणा गलती से हो गई...दुबारा गिनती में मंत्रीजी के चहेते विजयी होकर निकले

बहरहाल आज अपने लिए चैन है, बर्षों बाद लगा कि सुबह से शाम तक बिजली मिलना किसे कहते हैं इसलिए ठाठ से ब्‍लॉगिंग कर रहे हैं...और छुट्टी का आनंद ले रहे हैं...अभी थोड़ा काम से बाहर निकले तो पता लगा कि शहर में जगह-जगह मुख्‍य मार्गों के आसपास भी जो मतदान केंद्र बने हैं उसके आसपास पत्‍थर रखकर, हाथठेले अड़ाकर सारा यातायात बंद....सारे बाजार बंद...सारे यातायात के साधन बंद....भाई शांतिपूर्ण मतदान जो कराना है...फिर मतदाता भले ही शांतिपूर्ण ढंग से वोट डालने को तैयार हो पर हमें तो शांति की सही परिभाषा ही लागू करनी है...भले हमें कहीं जाना है और हम इंतजार कर रहे हैं कि कब शाम हो और सब कुछ सामान्‍य हो...इतने में एक सज्‍जन मिले मुहल्‍ले में पूछने लगे कि वोट नहीं डाले क्‍या...हमने कहा डालकर भी क्‍या होगा...सो हमें अकल बताने लगे कि वोट तो जरूर देना चाहिए....एक झन्‍नाटेदार झापड़ देने की विकट इच्‍छा होते हुए भी उसे जब्‍त करके हमने टरकाने के लिए कहा कि शाम तक डाल ही आयेंगे...वरना और जब्‍त करना पड़ता....वैसे भी हिंदुस्‍तान के सबसे बुरे लोकतंत्र जिसे लुभावने शब्‍दों में सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम से पुकारा जाता है, में आपकी जब्‍त करने की गजब की ताकत होनी चाहिए...तभी आप यहां जिंदा रह सकते हैं..

मुझे तो लगता है पाश की जो कविता है 'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' उसे केवल यहीं लिखा जा सकता था।