Sunday, April 10, 2011

अन्‍ना आंदोलन के बारे में फेसबुक पर एक कांग्रेसी नेता से संवाद


फेसबुक पर बीते कुछ दिनों से अन्‍ना हजारे के बारे में काफी कुछ सामग्री आ रही है...मैं भी समय निकालकर उसे देख लेता हूं...सब ओर आवाजें अन्‍ना के समर्थन में उठ रही हैं और उन्‍हें बधाईयां दी जा रही हैं..
ऐसे में फेसबुक पर ही एक युवा कांग्रेसी नेता ने अन्‍ना हजारे के आंदोलन के संदर्भ में कुछ सवाल उठाये हैं...उन सवालों को देखकर कोई भी बिना बताये ये समझ जायेगा कि ऐसे प्रश्‍न किसी कांग्रेसी अंतरात्‍मा वाला व्‍यक्ति ही उठा सकता है...स्‍वामीभक्‍त और चाटुकार परंपरा की वाहक पार्टी के इन नेताजी से मेरा संवाद कुछ इस तरह रहा-

सबसे पहले उन्‍होंने कुछ सवाल रखे जिनका उत्‍तर देने का मैंने प्रयास किया है जो कि ये हैं:-

1- जब संसद में कोई लोकतान्त्रिक तरीके से चुन कर, लाखों लोगो के द्वारा निर्वाचित हो कर जाता है,तो भी उस पर लोगो को भरोसा नहीं होता ?

2- क्या चंद लोगो द्वारा नियुक्त व्यक्ति किस प्रकार भरोसे के काबिल हो सकता है ?

3- आजदी की लड़ाई की बात करना, जनता को भावनात्मक रूप से गुमराह करना नहीं है ?

4- क्या एक लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा ? हम सब खुद किसी न किसी रूप भ्रष्टाचार करते है किसी न किसी रूप में उसको समर्थन भी देते है, खुद में सुधार लाना होगा किसी लोकपाल बिल या कानून की जरूरत नहीं है ?

5- आज जो देश के जितने की बात कर रहे है, वो सत्ता में सुधार लाने, EVM मशीन, चुनावो में सुधार लाने की बात करने लगे है ? यह भाषा तो एक राजनितिक दल की तरह लगती है.
?

इसके पश्‍चात इन प्रश्‍नों के जवाब मैंने दिये जो इस प्रकार हैं:-

1- 'लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर'; कितने लोग लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर संसद में पहुंचते हैं...कम से कम मैंने तो अपने स्‍थानीय लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र और निकट के क्षेत्रों में भी ऐसा नहीं देखा...कोई मसल पावर इस्‍तेमाल कर रहा है, कोई सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रहा है, कोई दूसरे हथकंडे अपना रहा है.....हालांकि जनता को भी हमें और शिक्षित और जगरूक बनाने की जरूरत है....बाकी भरोसे की आप बात कर रहे हैं तो पूरी तरह देखभालकर भरोसा करके जिस औरत के साथ सात फेरे लेकर आप पति बनते हैं और बाद में वो आपके पड्रौसी के साथ सोये तो ऐसे में भरोसा कहां काम आयेगा...

‎2- 'चंद लोगों द्वारा नियुक्‍त व्‍यक्ति' के बारे में मैं बस इतना कहूंगा कि जिसे भी आप संबोधित कर रहे हैं वो चंद लोगों द्वारा तो नियुक्‍त है....वरना इस देश में एक विदेशी महिला अपनी मनमर्जी से किसी को भी सिंहासन पर बैठा देती है और जनता को मूक रहकर ये अपमान झेलना पड़ता है...पर जनता अब और नहीं सहेगी

3- क्‍या देश का प्रधानमंत्री जब देश के इतिहास के सबसे बड़े घोटालों के बारे में पूछने पर कहता है कि मुझे कुछ पता ही नहीं तो क्‍या ये जनता को गुमराह करना नहीं है; और आजादी की लड़ाई गोरी चमड़ी वाले यूरोपियन्‍स के खिलाफ लड़ी गई थी...तो क्‍या देश में दुबारा से वो हालात नहीं बन गए हैं ?

4- एक बिल से भ्रष्‍टाचार समाप्‍त होगा या नहीं ये तो भविष्‍य के गर्भ में है....पर यदि कानून बन भी रहा है तो उस पर इतना तिलमिलाना क्‍यों....और ओम्‍बुड्समैन प्रणाली के अच्‍छे परिणाम बहुत से देशों में देखने को मिले हैं जहां ओम्‍बुड्समैन हैं....और ऐसे समय में जब घोटालों की बाढ़ आयी हुई है और 'ईमानदार' और 'भले आदमी' की छवि ओढ़ एक व्‍यक्ति चालीस चोरों का सरदार बना बैठा है ऐसे में एक व्‍यक्ति ने पूरे देश की जनता में उम्‍मीद का संचार किया है...चलिए मान लें कानून से कोई परिवर्तन ना भी आये पर देश के अनगिनत लोगों को एक प्रेरणादायी मसीहा मिला है और हर एक सफर की शुरूआत पहले कदम से ही तो होती है...यदि आप जैसे नकारात्‍मक सोच के लोग ही हिंदुस्‍तान में रहते तो शायद विदशी हाथों में हिंदुस्‍तान का रिमोट कंट्रोल नहीं होता बल्कि यहां के लिए कानून इटली या यूरोप में बैठे लोग ही बना रहे होते

5- देश तब भी जीता था जब इंदिरा को राजनारायण ने धूल चटाई थी और लोकनायक ने हिंदुस्‍तान की धरती पर संपूर्ण क्रांति की हुंकार भरी थी पर हर परिवर्तन में समय लगता है...वो आग अब भी नहीं बुझी है; क्‍या सुधार की बात करना राजनीति है...ऐसे में तो आप जैसे लोग उस गरीब आदमी की बात को भी राजनीति करार देंगे जो अपने लिए सरकार से दो वक्‍त की रोटी मांग रहा है और चुनाव सुधारों की बात पर तिलमिलाने का मतलब है साफ-सुथरे चुनावों से परहेज; और ऐसा वे ही करते हैं जो जनता से डरते हैं कि यदि कहीं साफ-सुथरे चुनावों की परिपाटी चल पड़े तो देश से इटैलियन्‍स का बोरा-बिस्‍तरा ना बंध जाए

नेताजी जैसा कि आपके परिचय में लिखा है आप इंडियन नेशनल कांग्रेस से जुडे हुए हैं और चूंकि केंद्र में आपकी सरकार है जिसने 6 महीने में ही पिछले 60 सालों के घोटालों का रिकॉर्ड तोड़कर एक भ्रष्‍टतम सरकार का तमगा तो जीत ही जीत लिया है ऐसे में दलालों और स्‍वामीभक्तों से भरी पार्टी के लोगों से यही उम्‍मीद की जा सकती है, मेरा सुझाव है कि आप स्‍वयं भी आत्‍ममंथन करें कि आजादी के पहले और आजादी के बाद भी कांग्रेस पार्टी से ऐसे लोग जुड़े रहे जिन्‍होंने देश के लिए क्‍या कुछ नहीं किया परंतु फिलहाल जो स्थित है उसे सब देशवासी देख ही रहे हैं... मेरे ख्‍याल में आप जैसा बुद्धिजीवी राजनेता इस बात को भलीभांति समझते है और आप जैसे युवा नेताओं से ही उम्‍मीदें हैं...यदि नेता वर्ग में से ही कोई व्‍यक्ति परिवर्तन की अलख जगाए तो शायद जनता उसे हजारे से भी ऊपर उठा देगी....पर माफ कीजिएगा नेताजी आपने प्रथम पंक्ति में जिस लोकतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके की आप बात कर रहे हैं वो कम से कम आपकी पार्टी की परंपरा तो नहीं है और जो प्रधानमंत्री आपने दिया है वो किस लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर आया है इसका जवाब आप बेहतर दे पाएंगे...और जिस लोकतांत्रिक तरीके से उसकी सरकार बचाई गई उससे भी सभी वाकिफ हैं.... आपने अच्‍छे प्रश्‍न उठाए जवाब लिखकर अच्‍छा लगा, जवाब लिखने का उद्देश्‍य आपको टारगेट करना नहीं था केवल वर्तमान भ्रष्‍ट तंत्र पर जो उंगली सारे देश ने उठाई है उसी को संदर्भित करना था... आपके स्‍वच्‍छ, सफल, जनविश्‍वास से भरे राजनीतिक भविष्‍य के लिए मेरी ओर से बहुत बहुत शुभकामनाएं.

इस सारे संवाद को यहां प्रकाशित करने का मेरा इतना उद्देश्‍य-भर था कि 'विदेशी चरणों की चाटुकार' परंपरा वाले व्‍यक्ति ही इस लोक की राह का असली रोड़ा बने हुए हैं जिन्‍होंने अपना एक स्‍वामीभक्‍त तंत्र विकसित कर सत्‍ता की चाबी हासिल कर ली है और देश का असली गेम बजाने में लगे हुए हैं...ऐसे लोग अन्‍ना और इस देश की भाषा कभी नहीं समझ पायेंगे पर जिस दिन ये शुरूआत रंग लायेगी तब शायद देश के रहनुमाओं का नाम लेते हुए शर्म महसूस नहीं होगी

Thursday, April 07, 2011

क्‍या अन्‍ना दूसरे जयप्रकाश साबित होंगे?

अन्‍ना हजारे के आंदोलन के चलते कुछ लोग जयप्रकाश की बात फिर से करने लगे हैं...जिनमें दोनों ही तरह के सुर है...कुछ का कहना है कि जब जयप्रकाश जैसे नेता की संपूर्ण क्रांति की लहर भी कोई बदलाव नहीं ला सकी ऐसे में जयप्रकाश के समय से ही चली आ रही मांग को अन्‍ना कैसे मनवा पाएंगे जब पूरा देश क्रिकेट की जीत के नशे में मदमस्‍त हो और मौजूदा सरकार ने भारत की अब तक की भ्रष्‍टतम सरकार का मेडल पहन रखा हो और जिसका नेतृत्‍व एक ऐसा प्रधानमंत्री कर रहा हो जिसे अब तक मीडिया और विपक्ष द्वारा की गई सरेआम बेइज्‍जती पर जरा भी शर्म नहीं आती हो और जो एक ही रटा-रटाया जवाब देना जानता हो- मुझे कुछ नहीं पता.... और ऐसी जनता जिसका एक विदेशी परिवार के सदस्‍य को युवराज कहे जाते समय खून ही नहीं खौलता हो...और तमाम भ्रष्‍टाचार या कहें भ्रष्‍टाचार के वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाने वाली सरकार के प्रधानमंत्री के बारे में लोग कहते हुए मिल जाते हैं कि- बेचारा वो तो भला और ईमानदार है....
जनता को कुछ नहीं चाहिए उसे तो चालीस चोरों का सरदार भला और ईमानदार दिखना चाहिए फिर वो चालीस चोरों को भी स्‍वीकार कर लेगी...और गोरी चमड़ी के प्रति आदर तो जीन में है इसलिए हर जगह राहुल बाबा की जय है...ये कोई नहीं सोचना चाहता कि अभी तो हिंदुस्‍तान में फिर भी काली कमाई करने वाले मीडिया में आने के कारण कहने को ही सही पुलिस की गिरफ्त में हैं...युवराज के गद्दीनशीं होने और रामराज्‍य आने के बाद तो शायद पता भी ना चले कि इटली में बैठकर कौन भारत का गेम बजा रहा है और ना पुलिस ना इंटरपोल उसे पहचान पा रही है
पर फिलहाल भारत वर्ल्‍ड-कप जीता है और शायद आगामी दिनों में इस बात पर भी देशव्‍यापी आंदोलन हो जाए कि सरकार सचिन को भारत-रत्‍न क्‍यों नहीं दे रही है वैसे फिलहाल आईपीएल के कारण इस आंदोलन को थोड़ा आगे बढ़ाना ज्‍यादा मुनासिब लग रहा है..
हालांकि अन्‍ना को अच्‍छा समर्थन मिल रहा है और खासकर मीडिया कवरेज के कारण वे पूरे देश में सुर्खियों में हैं....और कम से कम यही अच्‍छी बात है....दूसरी तरफ युवाओं में उनके प्रति समर्थन की उम्‍मीद मुझे है...कम से कम वे इस बात को जरूर समझ रहे हैं और उनको इस वर्ग से समर्थन मिल भी रहा है...और आगे ये और बढ़ेगा ऐसी उम्‍मीद सबको है...
पर समाज के हर तबके से अन्‍ना को व्‍यापक समर्थन मिल पाना फिलहाल के समय में संभव नहीं दिखता है....और खासकर जब ऐसा कहा जा रहा है कि भ्रष्‍ट भारत में बहुसंख्‍यक समाज भ्रष्‍ट हो चुका है तब वही समाज कैसे अपने ही खिलाफ उठ खड़ा होगा...मेरे ख्‍याल में भ्रष्‍टाचार और ईमानदारी की परिभाषाओं के फेर में पड़ने की कोई जहमत नहीं उठाना चाहता हर व्‍यक्‍ित और वर्ग के अपने हित हैं और सभी अपने हितों की लड़ाई लड़ने में व्‍यस्‍त हैं...वैसे भी बढ़ती महंगाई और भौतिकतावादी युग में पीछे कोई नहीं रहना चाहता...सभी कैसे भी करके जल्‍दी आगे बढ़ने की होड़ में व्‍यस्‍त हैं...ये अनुभव अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में किया होगा कि सिस्‍टम कैसे व्‍यक्ति को भ्रष्‍ट बनाता है....हालांकि ईमानदारी अभी बची हुई है पर बहुत थोड़ी जैसे चिडि़याघर तक सिमटा वन्‍य-जीवन....फिर भी हरिशंकर परसाई की इस उक्ति को कोई नहीं झुठला सकता कि- 'ईमानदार तभी तक ईमानदार है जब तक उसे बेईमान होने का मौका नहीं मिला'