Sunday, April 29, 2007

कहां है लोकनायक का परिवार?

पिछले दिनों न्यूज चैनलों पर केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को कहते सुना कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण को नेता उन्होंने बनाया। यदि लालूजी न होते तो शायद हमारा देश इस महान नेता को कभी न जान पाता और यदि लालूजी न होते तो इमरजेंसी के दौर में देश में जो इंदिरा विरोधी आंदोलन हुआ, वह भी संभव नहीं हो पाता। कुल मिलाकर इंदिरा गांधी को चुनावों में शायद ही कोई धूल चटा पाता, यदि लालूजी इमरजेंसी के टाइम पे आंदोलन नहीं करते। वाह क्या अदा है। लालूजी की इस अदा पर ही तो मीडिया मर-मिटी है। पर इस बार कुछ ज्यादा ही मर-मिटी। इसीलिए लालूजी को अगले दिन कहना पड़ा कि- भाई तुम लोग तो बात का बतंगड़ बना दिया हो, ई हमने कब कहा था।

वैसे ध्यान देने वाली बात यहां ये है कि अतीत में गांधी परिवार द्वारा उन पर किये गये अहसानों के वे ऋणी हैं। तभी तो उसका ऋण आज तक चुका रहे हैं सोनियाजी की चाटुकारिता कर। भई आज के टाइम में ऐसे अच्छे लोग कहां मिलते हैं जो किसी का अहसान मानें और उसे चुकाएं भी! तभी तो मीडिया के सामने वे कह दिये कि यदि इंदिराजी ने इमरजेंसी न लगाई होती तो वे कभी नेता नहीं बन पाते। जो लोग इंदिराजी का नाम आने पर हमेशा एक ही राग अलापते हैं कि उन्होंने इमरजेंसी लगाकर लोकतंत्र का गला घोंट दिया, उन्हें सबसे पहले यह तो देख लेना चाहिए कि उनके इमरजेंसी लगाने के कारण ही हमारे लोकतंत्र को लालूजी जैसा एक महान नेता मिल सका। इससे लोकतंत्र को भी गति ही मिली। फिर भी कुछ लोग इंदिराजी को गरियाने से बाज नहीं आते। पर हमारे लालूजी को देखिए, उन्होंने यह कहकर दूध का दूध पानी का पानी कर दिया कि इस देश को कड़ाई की जरूरत है, इसलिए इमरजेंसी क्या गलत था। इसी इमरजेंसी के लगने के कारण ही लालू जैसे जनसेवकों को जनता की सेवा करने का मौका मिल सका। नहीं तो बेचारी जनता, जनता दल(अब जनता दलों) से बिना सेवा कराए ही रह जाती। वैसे लोकनायक का परिवार यदि सत्ता में होता तो शायद अब तक लालूजी के नेता बनने का श्रेय इंदिरा गांधी की बजाय उन्हें कबका दे दिया जाता, ससम्मान! पर यही तो विडंबना है कि उनके परिवार का कहीं अता-पता नहीं है।

Thursday, April 26, 2007

Madhushala by Harivanshrai Bachchan मधुशाला- हरिवंशराय बच्‍चन


भावुकता अंगूर लता से
खींच कल्‍पना की हाला
कवि साकी बनकर आया है
भरकर कविता का प्‍याला

कभी न कण भर खाली होगा
लाख पिएं, दो लाख पिएं
पाठकगण हैं पीने वाले
पुस्‍तक मेरी मधुशाला।

बरस में एक बार ही
जगती होली की ज्‍वाला,
एक बार ही बाजी लगती
जगती दीपों की माला,

दुनियां वालों, किंतु, किसी दिन
आ मदिरालय में देखो
दिन को होली, रात दिवाली
रोज मनाती मधुशाला!

मुसलमान औ’ हिंदू हैं दो
एक, मगर, उनका प्‍याला
एक, मगर, उनका मदिरालय
एक, मगर, उनकी हाला,

रहते एक न जब तक
मस्जिद-मंदिर में जाते,
लड़वाते हैं मस्जिद-मंदिर
मेल कराती मधुशाला!

मेरे शव पर वह रोए, हो
जिसके आंसू में हाला,
आह भरे वह, जो हो सुरभित
मदिरा पीकर मतवाला,

दे मुझको कंधा वे, जिनके
पद मद-डगमग होते हों,
और जलूं उस ठौर, जहां पर
कभी रही हो मधुशाला!

अपने युग में सबको अनुपम
ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अद्भुत
ज्ञात हुआ अपना प्‍याला,

भी वृद्धों से जब पूछा
एक यही उत्‍तर पाया
अब न रहे वे पीने वाले
अब न रही वह मधुशाला!

(विख्‍यात कवि हरिवंशराय बच्‍चन की रचना ‘मधुशाला’ से साभार।)

बच्‍चनजी की मधुशाला एवं अन्‍य रचनाएं ईपुस्‍तक के रूप में डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

भारत को चाहिए जादूगर और साधु- हरिशंकर परसाई


कुछ दिन पहले मैं शाहरुख खान द्वारा प्रस्‍तुत गेम शो देख रहा था। शाहरुख ‘फोन अ फ्रेंड’ के माध्‍यम से किसी प्रतियोगी की परिचित महिला से बात कर रहे थे। वह महिला शाहरुख से बात करने को पागल हुई जा रही थी। उसका कहना था कि यदि उसे मौका दिया जाए तो वह भारत के प्रधानमंत्री की बजाय शाहरुख से मिलना पसंद करेगी। शाहरुख ने पूछा यदि मैं प्रधानमंत्री बन गया तो भी क्‍या आप मुझसे मिलना पसंद करेंगी। उक्‍त महिला का जवाब था यदि आप प्रधानमंत्री बन जाओ तो फिर मैं आपसे नहीं मिलना चाहूंगी। स्‍पष्‍ट है आजकल के परिदृश्‍य में राजनेताओं को देखकर कोई उनसे मिलना क्‍यों पसंद करेगा। परंतु जो व्‍यक्ति (भले ही वह हमारी पसंद का न हो) हमारा और हमारे देश का नेतृत्‍व कर रहा है, उसके प्रति ऐसी घृणा तब तक ठीक नहीं है जब तक हम स्‍वयं लोकतंत्र में समुचित भागीदारी नहीं करते और अपनी इच्‍छानुसार जनप्रतिनिधियों को चुनकर नहीं भेजते। लोकतंत्र हम-आप जैसे लोगों पर ही टिका हुआ है। पर दुर्भाग्‍य की बात है कि हममें से अधिकांश लोगों ने अपना फिल्‍मी सितारों, क्रिकेटरों के यशगान को ही समर्पित कर रखा है। कुछ बची-खुची जो उपद्रवी जमात है उसे हमारे आजकल के महान संस्‍कृति रझकों ने अपने रथ में जोत रखा है। बाकी समय नेताओं और देश को गरियाकर अपने कर्तव्‍यों की इतिश्री कर हम अपने लोकतांत्रिक दायित्‍वों का निर्वहन कर धन्‍य हो लेते हैं। इस संबंध में मुझे हरिशंकर परसाई का एक लेख ‘भारत को चाहिए जादूगर और साधु’ याद आ रहा है जिसे मैं आपके लिए प्रस्‍तुत कर रहा हूं। पढि़ए और विचार कीजिए कि क्‍या हम लोग आज भी सब कुछ भगवान पर छोड़ तमाशे देखने में मगन हैं।


भारत को चाहिए जादूगर और साधु

हर 15 अगस्‍त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूं कि साल-भर में कितने बढ़े। न सोचूं तो भी काम चलेगा- बल्कि ज्‍यादा आराम से चलेगा। सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्‍त हैं और स्‍वस्‍थ हैं, वे धन्‍य हैं।

यह 26 जनवरी 1972 फिर आ गया। यह गणतंत्र दिवस है, मगर ‘गण’ टूट रहे हैं। हर गणतंत्र दिवस ‘गण’ के टूटने या नये ‘गण’ बनने के आंदोलन के साथ आता है। इस बार आंध्र और तेलंगाना हैं। अगले साल इसी पावन दिवस पर कोई और ‘गण’ संकट आयेगा।

इस पूरे साल में मैंने दो चीजें देखीं। दो तरह के लोग बढ़े- जादूगर और साधु बढ़े। मेरा अंदाज था, सामान्‍य आदमी के जीवन के सुभीते बढ़ेंगे- मगर नहीं। बढ़े तो जादूगर और साधु-योगी। कभी-कभी सोचता हूं कि क्‍या ये जादूगर और साधु ‘गरीबी हटाओ’ प्रोग्राम के अंतर्गत ही आ रहे हैं! क्‍या इसमें कोई योजना है?

रोज अखबार उठाकर देखता हूं। दो खबरें सामने आती हैं- कोई नया जादूगर और कोई नया साधु पैदा हो गया है। उसका विज्ञापन छपता है। जादूगर आंखों पर पट्टी बांधकर स्‍कूटर चलाता है और ‘गरीबी हटाओ’ वाली जनता कामधाम छोड़कर, तीन-चार घंटे आंखों पर पट्टी बांधे जादू्गर को देखती हजारों की संख्‍या में सड़क के दोनों तरफ खड़ी रहती है। ये छोटे जादूगर हैं। इस देश में बड़े बड़े जादूगर हैं, जो छब्‍बीस सालों से आंखों पर पट्टी बांधे हैं। जब वे देखते हैं कि जनता अकुला रही है और कुछ करने पर उतारू है, तो वे फौरन जादू का खेल दिखाने लगते हैं। जनता देखती है, ताली पीटती है। मैं पूछता हूं- जादूगर साहब, आंखों पर पट्टी बांधे राजनैतिक स्‍कूटर पर किधर जा रहे हो? किस दिशा को जा रहे हो- समाजवाद? खुशहाली? गरीबी हटाओ? कौन सा गन्‍तव्‍य है? वे कहते हैं- गन्‍तव्‍य से क्‍या मतलब? जनता आंखों पर पट्टी बांधे जादूगर का खेल देखना चा‍हती है। हम दिखा रहे हैं। जनता को और क्‍या चाहिए?

जनता को सचमुच कुछ नहीं चाहिए। उसे जादू के खेल चाहिए। मुझे लगता है, ये दो छोटे-छोटे जादूगर रोज खेल दिखा रहे हैं, इन्‍होंने प्रेरणा इस देश के राजनेताओं से ग्रहण की होगी। जो छब्‍बीस सालों से जनता को जादू के खेल दिखाकर खुश रखे हैं, उन्‍हें तीन-चार घंटे खुश रखना क्‍या कठिन है। इसलिए अखबार में रोज फोटो देखता हूं, किसी शहर में नये विकसित किसी जादूगर की।

सोचता हूं, जिस देश में एकदम से इतने जादूगर पैदा हो जाएं, उस जनता की अंदरूनी हालत क्‍या है? वह क्‍यों जादू से इतनी प्रभावित है? वह क्‍यों चमत्‍कार पर इतनी मुग्‍ध है? वह जो राशन की दुकान पर लाइन लगाती है और राशन नहीं मिलता, वह लाइन छोड़कर जादू के खेल देखने क्‍यों खड़ी रहती है?

मुझे लगता है, छब्‍बीस सालों में देश की जनता की मानसिकता ऐसी बना दी गयी है कि जादू देखो और ताली पीटो। चमत्‍कार देखो और खुश रहो।

बाकी काम हम पर छोड़ो।

भारत-पाक युद्ध ऐसा ही एक जादू था। जरा बड़े स्‍केल का जादू था, पर था जादू ही। जनता अभी तक ताली पीट रही है।
उधर राशन की दुकान पर लाइन बढ़ती जा रही है।
देशभक्‍त मुझे माफ करें। पर मेरा अंदाज है, जल्‍दी ही एक शिमला शिखर-वार्ता और होगी। भुट्टो कहेंगे- पाकिस्‍तान में मेरी हालत खस्‍ता। अलग-अलग राज्‍य बनना चाह रहे हैं। गरीबी बढ़ रही है। लोग भूखे मर रहे हैं।
हमारी प्रधानमंत्री कहेंगी- इधर भी गरीबी हट नहीं रही। कीमतें बढ़ती जा रही हैं। जनता में बड़ी बेचैनी है। बेकारी बढ़ती जा रही है।
तब दोनों तय करेंगे- क्‍यों न पंद्रह दिनों का एक और जादू हो जाए। चार-पांच साल दोनों देशों की जनता इस जादू के असर में रहेगी।(देशभक्‍त माफ करें- मगर जरा सोंचें)
जब मैं इन शहरों के इन छोटे जादूगरों के करतब देखता हूं तो कहता हूं- बच्‍चों, तुमने बड़े जादू नहीं देखे। छोटे देखे हैं तो छोटे जादू ही सीखे हो।

दूसरा कमाल इस देश में साधु है। अगर जादू से नहीं मानते और राशन की दुकान पर लाइन लगातार बढ़ रही है, तो लो, साधु लो।

जैसे जादूगरों की बाढ़ आयी है, वैसे ही साधुओं की बाढ़ आयी है। इन दोनों में कोई संबंध जरूर है।

साधु कहता है- शरीर मिथ्‍या है। आत्‍मा को जगाओ। उसे विश्‍वात्‍मा से मिलाओ। अपने को भूलो। अपने सच्‍चे स्‍वरूप को पहचानो। तुम सत्-चित्-आनन्‍द हो।

आनंद ही ब्रह्म है। राशन ब्रह्म नहीं। जिसने ‘अन्‍नं ब्रह्म’ कहा था, वह झूठा था। नौसिखिया था। अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचा कि अन्‍न नहीं ‘आनन्‍द’ ही ब्रह्म है।

पर भरे पेट और खाली पेट का आनन्‍द क्‍या एक सा है? नहीं है तो ब्रह्म एक नहीं अनेक हुए। यह शास्‍त्रोक्‍त भी है- ‘एको ब्रह्म बहुस्‍याम।’ ब्रह्म एक है पर वह कई हो जाता है। एक ब्रह्म ठाठ से रहता है, दूसरा राशन की दुकान में लाइन से खड़ा रहता है, तीसरा रेलवे के पुल के नीचे सोता है।
सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।

शक्‍कर में पानी डालकर जो उसे वजनदार बनाकर बेचता है, वह भी ब्रह्म है और जो उसे मजबूरी में खरीदता है, वह भी ब्रह्म है।

ब्रह्म, ब्रह्म को धोखा दे रहा है।

साधु का यही कर्म है कि मनुष्‍य को ब्रह्म की तरफ ले जाय और पैसे इकट्ठे करे; क्‍योंकि ‘ब्रह्म सत्‍यं जगन्मिथ्‍या।’

26 जनवरी आते आते मैं यही सोच रहा हूं कि ‘हटाओ गरीबी’ के नारे को, हटाओ महंगाई को, हटाओ बेकारी को, हटाओ भुखमरी को क्‍या हुआ?

बस, दो तरह के लोग बहुतायत से पैदा करें- जादूगर और साधु।

ये इस देश की जनता को कई शताब्‍दी तक प्रसन्‍न रखेंगे और ईश्‍वर के पास पहुचा देंगे।

भारत-भाग्‍य विधाता। हममें वह क्षमता दे कि हम तरह-तरह के जादूगर और साधु इस देश में लगातार बढ़ाते जायें।

हमें इससे क्‍या मतलब कि ‘तर्क की धारा सूखे मरूस्‍थल की रेत में न छिपे’(रवींद्रनाथ) वह तो छिप गयी। इसलिए जन-गण-मन अधिनायक! बस हमें जादूगर और पेशेवर साधु चाहिए। तभी तुम्‍हारा यह सपना सच होगा कि हे परमपिता, उस स्‍वर्ग में मेरा यह देश जाग्रत हो।(जिसमें जादू्गर और साधु जनता को खुश रखें)।

यह हो रहा है, परमपिता की कृपा से!


लेखक- हरिशंकर परसाई

काशी का अस्‍सी




बनारस के बारे में कहा जाता है- ‘जो मजा बनारस में; न पेरिस में न फारस में’।

इसी बनारस शहर और उसकी संस्‍कृति को रेखांकित करती हुई काशीनाथ सिंह की पुस्‍तक ‘काशी का अस्‍सी’ मैंने पिछले दिनों पढ़ी।

प्रसिद्ध संस्‍मरण लेखक काशीनाथ सिंह की इस किताब की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। बनारस शहर भारत ही नहीं विश्‍व भर में अपनी संस्‍कृति के कारण विख्‍यात है। मौज-मस्‍ती, फक्‍कड़पन, गालियां, भांग और पान यहां के जीवन का अंग हैं। अमिताभ बच्‍चन अपनी एक फिल्‍म में यहां के पान को खा लेने पर बंद अकल के खुलने का दावा तक करते हैं। इसी बनारस शहर और उसकी मस्‍ती, जिंदादिली का प्रतीक है ‘अस्‍सी’, जो कि कथानक का केंद्र बिंदु है। अस्‍सी के बारे में काशीनाथ सिंह तो यहां तक कहते हैं-

“अस्‍सी बनारस का मुहल्‍ला नहीं है। अस्‍सी ‘अष्‍टाध्‍यायी’ है और बनारस उसका ‘भाष्‍य’! पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से पूंजीवाद के पगलाए अमरीकी यहां आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी टीका हो जाए.........”

कहानी में अस्‍सी मुहल्‍ले के अन्‍य केंद्र-बिंदु हैं- ‘पप्‍पू की चाय की दुकान’ और तन्‍नी गुरू जैसे बिंदास पात्र। पोशाक के नाम पर गमछा, लंगोट, लुंगी और जनेऊ धारण किये हुए और पान चबाते हुए अपनी मस्‍ती में मस्‍त। चाय सुड़कते, भांग की मस्‍ती में एक-दूसरे से गपियाते, भरपूर गालियों का प्रयोग करते गर्मागर्म राजनीतिक बहसों में उलझे लोग बनारस की जीवंत संस्‍कृति का प्रतीक हैं। चाय की दुकान ही इनका सेमिनार हॉल, भाषण मंच यहां तक कि उनकी संसद है। उनके लिए दुनिया भर के नेता, विचारधाराएं, संस्‍कृतियां सब ब्रह्मांड के छोटे-छोटे पिंड हैं और उस ब्रह्मांड का केंद्र है अस्‍सी। दुनियां उनके ठेंगे पर!

“धक्‍के देना और धक्‍के खाना, जलील करना और जलील होना, गालियां देना और गालियां खाना औघड़ संस्‍कृति है। अस्‍सी की नागरिकता के मौलिक अधिकार और कर्तव्‍य। इसके जनक संत कबीर र‍हे हैं और संस्‍थापक औघड़ कीनाराम। गालियां इस संस्‍कृति की राष्‍ट्रभाषा हैं जिसमें प्‍यार और आशीर्वाद का लेन-देन होता है।”

और सबसे मजेदार बात तो यह है कि ये अस्‍सी मोहल्‍ला और उसके पात्र लेखक की कोई कल्‍पना नहीं है। किताब में शुरूआती तीन कहानियां तो बिल्‍कुल सच हैं जबकि बाकी दो में लेखक कल्‍पना की मिलावट कर अपनी बात सामने रखता है। आप बनारस के अस्‍सी में पप्‍पू चाय वाले की दुकान पर जाकर चाय पी सकते हैं, शायद वहीं आपको तन्‍नी गुरू और गया सिंह भी गपियाते मिल जायें।

कहानी और उपन्‍यास शैली में लिखी गयी किताब में काशीनाथ सिंह ने व्‍यंग्‍य, संस्‍मरण, रिपोर्ताज आदि सभी विधाओं का अच्‍छा सम्मिश्रण कर एक अलग ही संसार रच दिया है, इस मायने में कि पढ़ने वाले को लगे कि वह भी इन पात्रों के साथ बनारसी पान चबाते हुए गपिया रहा है। पुस्‍तक में उस मोहल्‍ले के प्रस्‍तुतीकरण ने मुझे बहुत प्रभावित किया इसलिए किताबें पढ़ते रहने के बावजूद पहली बार लगा कि क्‍यों न औरों को भी इस बारे में बताया जाए।

2002 में प्रकाशित इस पुस्‍तक के पिछले दस-बीस वर्षों में हुए राजनीतिक-सांस्‍कृतिक बदलाव पर कहानी के पात्रों की बेबाक टिप्‍पणियां और बहसें उस समय का एक अच्‍छा दस्‍तावेज भी पेश करती हैं, जिनसे पाठक रूबरू होना चाहेगा। 90 के दशक की मंडल-कमंडल की राजनीति, जाति और धर्म के नाम पर बंटते लोग! बनारस कैसे अछूता रहता! ‘हर-हर महादेव’ की जगह ‘जय श्रीराम’ ने ले ली। बकौल पांड़ेजी राजनीति की एक बानगी सुनिए-

“बहुत कुछ बदल गया है गुरूजी! नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश नारायण के लिए भीड़ नहीं जुटानी पड़ती थी। भीड़ अपने-आप आती थी। अब नेता भीड़ अपने साथ लेकर आता है- कारो में, जीपों में, बसों में, ट्रैक्‍टर में।”

हालांकि पिछले कुछ समय से काशी में भी बदलाव आ रहा है। भारतीय संस्‍कृति, संगीत, साहित्‍य, भाषा, कला आदि को सीखने के लिए बड़ी तादाद में विदेशी यहां आने लगे हैं। जाहिर है वे अपनी भी संस्‍कृति लेकर आते हैं। भंग के नशे में मस्‍त रहने वाले बनारस में अब ब्राउन शुगर, हेरोइन और चरस जैसे महंगे नशे पहुंच गए हैं। फिर भी नये जमाने की हवा से बनारस बहुत कुछ अछूता ही है। यहां के लोग अपनी ही मस्‍ती में मस्‍त रहने वाले हैं। दूसरों के सुख से न इन्‍हें कोई दुख है न दूसरों के दुख से कोई सुख-

“परेशान हो वह जिसे पड़ौसी के सुखों की चिंता हो; रात-दिन एक करे वह जिसे- बंगला चाहिए, कार चाहिए, पद और ओहदे चाहिए; मरे वह जो ईर्ष्‍या-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह का मारा हो। यहां तो अस्‍सी किसी भी वी.आई.पी. को पी.आई.जी.(पिग=सुअर) के बराबर भी नहीं समझता, समूचे त्रिकाल और त्रैलाक्‍य को अपने फोद पर लिए घूमता रहता है- छुट्टा सांड की तरह।”

पुस्‍तक का अंतिम अध्‍याय- ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ में लेखक ने बिरहियों की कथा के माध्‍यम से बाजार अर्थव्‍यवस्‍था और मशीनी यु्ग के कारण उत्‍पन्‍न समस्‍याओं को बड़े मजेदार ढंग से उठाया है। हवा-पानी भी अब बाजार की वस्‍तुओं में तब्‍दील हो रहे हैं। बाजार सबको निगल रहा है। यहां तक कि लोगों के होठों की हंसी को भी। बाजार चाहता है लोग समय को हंसने में व्‍यर्थ बर्बाद न कर काम में लगाएं। वे लोग जो कभी साथ बैठकर हंसते-खिलखिलाते अपनी मस्‍ती में मस्‍त रहते थे अब गायब होने लगे हैं। टेलिविजन, सी.डी., वीडियोगेम्‍स, कंप्‍यूटर ने लोगों को उनकी मर्जी से उन्‍हीं के घर में कैद कर दिया है। हंसने के लिए आदमी को टी.वी. का सहारा लेना पड़ रहा है। टी.वी स्‍क्रीन पर खड़ा आदमी आपको चुटकुला सुनाएगा, लोटपोट करेगा और कार्यक्रम खत्‍म होते ही आपकी हंसी गायब। इसी नकली हंसी को खरीदने के लिए आदमी दिन-रात काम करता है और शाम को वह वीडियो शॉप पर जाकर हंसी की सी.डी. खरीद लाता है। नींद की गोलियों की तरह हंसी का स्‍थान टी.वी. और वीडियो ले रहा है।

राजकमल पेपरबैक्‍स से प्रकाशित पचहत्‍तर रुपये की इस बेहतरीन पुस्‍तक को पढ़कर आप भी विचार कीजिए कि क्‍या हंसी वाकई म्‍यूजियम की चीज हो चुकी है या अब भी आपमें जिंदा है- वही जिंदादिल हंसी।

अन्तर्जाल पर हिन्दी की समृद्धि के लिए एक अपील

कल मीडिया विमर्श(पत्रकारिता पर त्रैमासिक पत्रिका) में जयप्रकाश मानसजी का हिन्दी चिट्ठाकारी पर लेख पढ़ा। 'मीडिया विमर्श' के पिछले अंक में भी अन्तर्जाल पर हिन्दी की उपस्थिति के बारे में विस्तारपूर्वक लेख दिया गया था। मानसजी ने बहुत ही अच्छे ढंग से एक आम पाठक और इंटरनेट प्रयोगकर्ता के लिए हिन्दी में चिट्ठालेखन के बारे में जानकारी दी है जिसके लिए उन्हें हार्दिक धन्यवाद।
आजकल जिस प्रकार से अन्तर्जाल पर हिन्दी शब्दों के प्रवाह की गति में तीव्रता आई है उस अनुपात में लोगों तक इसकी जानकारी नहीं पहुँच रही है। आज भी अधिकांश लोग इंटरनेट प्रयोग के लिए अंग्रेजी के ज्ञान को एक आवश्यक तत्व मानते हैं। उदाहरणार्थ मैं कभी-कभार जब अपने मुहल्ले के सायबर कैफ़े में जाता हूँ और हिन्दी चिट्ठे और हिन्दी साइट्स खोलता हूँ तो अधिकांश उपस्थित मेरे मित्र आदि कौतूहल से देखते हैं। कारण यह है कि लोगों को पता ही नहीं है कि इंटरनेट पर हिन्दी में बी.बी.सी हिन्दी और वेबदुनिया आदि के अलावा भी प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। और जब मैं किसी ऑनलाइन टूल का प्रयोग कर जब कोई पोस्ट लिखने बैठता हूं तो अक्सर लोग समझते हैं कि ये बंदा कोई बहुत बड़ा तकनीकी महारथी है जो अपना लिखा इंटरनेट पर डाल देता है। हालाँकि जो लोग काफ़ी समय से इंटरनेट प्रयोग कर रहे हैं और थोड़ा तकनीकी ज्ञान भी रखते हैं उन्हें इसकी जानकारी अवश्य होगी। परंतु फ़िर भी एक आम इंटरनेट प्रयोगकर्ता के लिए हिन्दी चिट्ठाकारी अजूबा ही है। हालाँकि मैं अक्सर अपने परिचितों को इस बावत् जानकारी देता रहता हूँ। साथ ही ऑरकुट पर भी लोग अक्सर मेरा हिन्दी साहित्य से संबंधित समूह और प्रोफ़ाइल देखकर हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में जानकारी लेने आते रहते हैं।

परंतु मानसजी का लेख पढ़ने के बाद खयाल आया कि क्यों न हिन्दी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों को हिन्दी चिट्ठाकारी और अन्तर्जाल पर हिन्दी की उपस्थिति के बारे में अवगत कराया जाये। प्रतीक पांडेजी ने बताया कि वे भी पहले 'हरिभूमि' में इस प्रकार का लेख लिख चुके हैं। तो मैंने सोचा कि क्यों न अपने इस विचार से सभी चिट्ठाकारों को अवगत कराया जाये जिससे वे सब भी अपने-अपने क्षेत्रों के समाचार माध्यमों के द्वारा लोगों तक इस जानकारी को पहुँचायें।

समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी चिट्ठाकारी की इस विधा को आसानी से आम इंटरनेट प्रयोगकर्ता और पाठक तक पहुँचाया जा सकता है और किसी प्रकार का कोई खर्चा आदि भी नहीं। हिन्दी में पाठकों की अपनी भाषा में दी गई जानकारी से आम पाठक भी जो इंटरनेट प्रयोग करते हैं उनमें इसके बारे में अवश्य ही उत्सुकता जाग्रत होगी कि आखिर हिन्दी में इंटरनेट पर किस प्रकार की गतिविधियाँ चल रही है। और वे सरल-सहज भाषा में इंटरनेट पर हिन्दी के प्रयोग और हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में जान सकेंगे जिससे कि वे अब तक अनजान थे।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात है कि कई अच्छे लेखक और स्वयं की अभिव्यक्ति को माध्यम की कमी के कारण दूसरों तक न पहुँचा सकने वाले भी चिट्ठा-लेखन के बारे में जानकर इसका लाभ उठा सकेंगे। और बेशक इससे हमारा हिन्दी चिट्ठा-जगत तो समृद्ध होगा ही।

इसलिए 'मेरा सभी चिट्ठाकारों से आग्रह है' कि वे अपने-अपने स्तर पर जहाँ तक संभव हो समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में हिन्दी चिट्ठाकारी और इंटरनेट पर हिन्दी की जानकारी हेतु कुछ न कुछ लिखें। साथ ही कुछ प्रमुख चिट्ठों और संजालों जैसे नारद,अक्षरग्राम,फ़ुरसतिया,रचनाकार,मेरा पन्ना,मेरा हिन्दी चिट्ठा आदि के बारे में भी बतायें और यथासंभव कुछ लिंक भी दें। इस प्रकार से लोगों को हिन्दी चिट्ठा लेखन के बारे में जानने में मदद मिलेगी और दी गई लिंक्स के माध्यम से वे चिट्ठा-जगत से सीधे जुड़ सकेंगे।

मायावती और बाजार में खड़ा दलित वोट-बैंक Mayavati and vote bank Politics

एक समय वह भी था जब मायावती मंच पर खड़े होकर कहती थीं, तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार।आज उन्‍हीं मायावती ने उत्‍तर-प्रदेश में उच्‍चजाति के 139 उम्‍मीदवारों को टिकट दिया है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मायावती की नजर इन जातियों के वोट बैंक पर पहले नहीं पड़ी। दरअसल यही उनकी(या कहें काशीराम की) सफलता का राज भी है कि वर्षों से उच्‍च-जाति की खिलाफत करने के कारण आज उत्‍तर-प्रदेश ही नहीं बाहर के प्रदेशों में रहने वाला दलित समुदाय भी चुनाव में आंख मूंदकर हाथी पर मुहर लगाता है(अब शायद बटन दबाता है)।

मायावती को, जो खुद एक दलित और बेहद पिछड़ी पृष्‍ठभूमि से आकर राजनीति में उच्‍च पायदान पर काबिज हुईं, बखूबी पता है कि दलित वोट बैंक को नोट बैंक में कैसे बदला जाता है। आज उनकी ब.स.पा. के वोट की कीमत शायद हिंदुस्‍तान के किसी भी राजनैतिक दल के टिकट से ज्‍यादा है और यह कीमत कोई भी लगा सकता है। भई सीधी सी बात है जिस उम्‍मीदवार का चुनाव-चिन्‍ह हाथी है, उसे दलित वर्ग से एकमुश्‍त वोट मिलते ही हैं। और यदि उम्‍मीदवार किसी दूसरी जाति से ताल्‍लुक रखता है तो दोनों जातियों के वोट एक साथ जुगाड़कर उसकी जीत की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। वहीं उसी निर्वाचन क्षेत्र से किसी दलित के खड़े होने पर दलितों को छोड़ अन्‍य जातियों के वोट उसे मिलने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। इसीलिए आज उच्‍च जाति के सेल्‍फ मेड नेताओं को एक ही राह नजर आती है। यदि एक बार ऊंची रकम लेकर बहिनजी के दरबार में पहुंच गये तो टिकट तो पक्‍का ही समझो। मायावती को चढ़ावा बेहद प्रिय है इसलिए वे खुलेआम मंच से पार्टी फंड के लिए अधिक से अधिक चंदा देने की बात तो करती ही हैं उनकी पार्टी की रैलियों में उनके पार्टी पदाधिकारी भी जी भरकर चंदा उगाहते हैं।

इस बार वे चुनाव में खड़ी भी नहीं हो रही हैं क्‍योंकि टिकट बांट-बांटकर(बेच-बेचकर) नोटों का जुगाड़ तो वे कर ही चुकी हैं। अब यदि परिणाम आने पर लगेगा कि उनके ग्राहकों ने तो वाकई मैदान मार लिया तो वे सत्‍ता-सुख भोग ही लेंगी, नहीं तो अपने महल में आराम फरमायेंगी। उनके लिए उनका वोट बैंक उस दुधारू पशु की तरह है जिसका मालिक हाट में खड़ा होकर उसकी रस्‍सी मनचाहे दाम देने वाले के हाथ में थमा देता है। सीधे शब्‍दों में कहें तो दलितों की नेता मायावती को दलित वोट बैंक की दलाली में ही अपना सुखमय भविष्‍य नजर आता है। पर इस प्रकार दलितों को सीढ़ी बनाकर कुर्सी पर काबिज होने वाले नेता दलितों का कितना भला करते हैं यह विचार करने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी कांग्रेस के चाणक्‍य कहे जाने वाले एक मंत्री पहले ही क्रीमीलेयर को पूरी मलाई खिलाकर दलितों-पिछड़ों सबका भला कर गंगा नहा चुके हैं।

असल विचार करने लायक बात यह है कि इस प्रकार एक पार्टी या जातिविशेष का वोट बैंक किसी भी ऐरे-गैरे के हाथों थमा देने से पहले से ही अपराधीकरण से त्रस्‍त भारतीय राजनीति में अपराधियों और बाहुबलियों का आना और आसान नहीं हो जाएगा?

क्‍या यह सब पूर्वनियोजित है?

पंजाब में पिछले दिनों चुनाव हुए और कांग्रेस को सत्‍ता से बेदखल कर प्रकाशसिंह बादल सत्‍तासीन हुए। हफ्ता भर भी नहीं बीता कि रोपड़ की एक अदालत ने मुख्‍यमंत्री और उनके परिवारजनों पर आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में अभियोग-पत्र दाखिल करने के आदेश दे दिए। प्रकाशसिंह बादल उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल और उनकी पत्‍नी पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 120(बी) और भ्रष्‍टाचार नियंत्रण अधिनियम की धारा 13 के तहत अभियोग-पत्र दाखिल भी किया जा चुका है। उधर बेचारे मुलायम सिंह अदालत के चक्‍कर काट रहे हैं कि किसी तरह चुनाव होने तक तो ये बला टले, हालांकि वे कितने बेचारे हैं ये सभी को पता है। पर माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय से उन्‍हें आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में कोई राहत नहीं मिली है।

पिछली बार जब मध्‍यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी सत्‍ता में आई और उमा भारती मुख्‍यमंत्री बनीं तब कुछ ही समय बाद हुबली की एक अदालत में वर्षों से लंबित मामला फिर खुल गया और उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी होने के कारण उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया। उसके बाद वे फिर मुख्‍यमंत्री तो नहीं बन पाईं, उल्‍टा भा.ज.पा. से जरूर निकाली जा चुकी हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि तीनों ही घटनाओं में फजीहत कांग्रेस की विरोधी पार्टी के नेताओं की हुई या हो रही है। पंजाब में अमरिंदर सिंह पांच साल मुख्‍यमंत्री रहे पर बादल के खिलाफ चार्जशीट ऐन उस समय दाखिल हुई जब वे सत्‍ता में आए। मध्‍य प्रदेश में कांग्रेस सत्‍ता से बाहर हुई और उमा भारती पहली बार अपने प्रदेश की गद्दी पर विराजमान हुईं। कुछ ही समय बाद उनके खिलाफ वर्षों से लंबित एक मामले में गैर जमानती वारंट जारी हो गया। और उधर उत्‍तर प्रदेश में तो एक कांग्रेसी सज्‍जन ने मुलायम के खिलाफ जनहित याचिका लगाकर अपना पार्टी-धर्म निभाया ही।

इन नेताओं के खिलाफ उपरोक्‍त मामलों को न भी देखें तो भी उनका राजनीतिक चरित्र जगजाहिर ही है और जो मामले दायर हुए उनका भी कोई आधार है। पर इन सबमें यह विचारणीय है कि इनकी उसी समय फजीहत हुई जब कांग्रेस और उनमें सत्‍ता के लिए दो-दो हाथ हुए। और कांग्रेस पार्टी सत्‍ता की कितनी भूखी है यह देश की जनता ने गुजरे समय में गोवा, बिहार और झारखंड के उदाहरणों से बखूबी जाना।

इस प्रकार की घटनाएं कांग्रेस के जगजाहिर चरित्र पर तो सवालिया निशान लगाती ही हैं उससे भी ज्‍यादा न्‍यायपालिका पर भी सवाल खड़े करती हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं के लिए उच्‍चतम न्‍यायालय या उच्‍च न्‍यायालयों पर सवाल उठाना तो ठीक नहीं होगा क्‍योंकि इन्‍हीं के कारण आज भी एक आम भारतवासी न्‍यायपालिका पर विश्‍वास करता है। परंतु जो मामले निचली अदालतों से संबंधित हैं, उनमें एक समय विशेष पर ही अदालत द्वारा कार्रवाई करना संदेह पैदा करता है। जिस देश में एक निचली अदालत द्वारा राष्‍ट्रपति और उच्‍चतम न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश के खिलाफ वारंट जारी कर दिया गया हो और मुख्‍य न्‍यायाधिपति द्वारा स्‍वयं निचली अदालतों में भ्रष्‍टाचार होने की बात स्‍वीकार की गयी हो, वहां इस प्रकार की घटनाएं भी मन में कहीं न कहीं संदेह को ही पुख्‍ता करती हैं।

इस हार में संभावनाएं तो बहुत हैं

क्रिकेट के खेल में मेरी कभी कोई खास रुचि नहीं रही, हालांकि घर की छत पर और मुहल्‍ले में क्रिकेट खेला भी बहुत है। टीवी पर मैच भी खूब देखे हैं। पर कुछ समय से क्रिकेट में रुचि लेना लगभग बंद ही कर दिया था। कभी-कभार यदि मैच चल रहा हो तो स्‍कोर अवश्‍य देख लेता हूं। क्रिकेट पर होने चर्चा-परिचर्चा में भी अपना कोई दखल नहीं। इसका कारण यह धारणा भी है कि जो इंसान दिमाग से जितना ज्‍यादा पैदल होगा, वो उतना ही ज्‍यादा क्रिकेट पर अपना ज्ञान बघारकर खुद को तीस-मारखां साबित करने की कोशिश करेगा और ये जानते हुए भी मैं ऐसा करता हूं तो मेरी गिनती भी इनमें ही होनी है। वैसे भी भारत में अनगिनत ऐसे भी महारथी मिल जायेंगे जिन्‍हें शायद अपने प्रधानमंत्री का नाम तक मालूम न हो पर पूरी क्रिकेट टीम के सदस्‍यों के नाम जरूर गिना देंगे। अतिरिक्‍त खिलाडि़यों और कोच फिजियो आदि-आदि सहित। हमारे देश में क्रिकेट से एक बात अवश्‍य पॉजिटिव हुई है- वो है परिचर्चा करने के लिए मुद्दा। सोनियाजी के लाडले मन्‍नू भाई ने पाकिस्‍तान के बारे में कोई मसखरा बयान न दिया हो, अटलजी या जार्ज फर्नांडीज ने कोई मजाक न भी किया हो, महंगाई बढ़ भी रही हो तब भी लोगों के पास चर्चा करने के लिए एक रेडीमेड मुद्दा तैयार रहता है- क्रिकेट। ये कतई जरूरी नहीं कि क्रिकेट का सीजन भी चल ही रहा हो, क्‍योंकि चर्चा का सीजन तो बारामासी है। अब हमारे मुहल्‍ले के लल्‍लू पानवाले को ही लीजिए। धोनी के पास किस ब्रांड की कितनी मोटरसाइकिल हैं, वह बालों में हेयर-जैल कौन सी लगाता है, उसे सब पता है। इसलिए वह भी आजकल अपने धोनी कट बालों में वही हेयर-जैल लगाता है। इसलिए अपन तो हमेशा उसकी दुकान से जरा बच के निकलते हैं। वैसे भी अपना सामान्‍य ज्ञान वैसे ही सीमित है अगर उस क्रिकेट परिचर्चा में किसी ने फंसा लिया तो गलती से जो दो-चार लोग पढ़ा-लिखा समझते है उनके सामने भी कलई खुल जाएगी। पर बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाएगी की तर्ज पर मैं कभी-कभार ऐसे लोगों के बीच फंस ही जाता हूं। एक बार एक गांव में मैं फंस गया। गांव के लड़कों के साथ मैं बैठा हुआ था। सब इधर-उधर की हांक रहे थे। मैं भी हांके जा रहा था। मैं हांकने वालों के बीच खुद को कुछ सुविधाजनक महसूस कर रहा था। कारण, मैं शहर का निवासी और वे गांव के गंवार। बाहरी दुनिया की बातें, नयी तकनीकें आदि के बारे में मैं उनसे ज्‍यादा ही जानता था। इसलिए मेरी बातों से उनकी पट नहीं पड़ पा रही थी। तभी उन्‍होंने एक दांव चला। वे बातचीत को क्रिकेट पर ले आए। क्रिकेट के बारे में अपना ज्ञान ज्‍यादा से ज्‍यादा प्राइमरी तक ही है पर वे तो शायद पी.एच.डी. थे। न भी हों तो मुझ जैसे को झेलाना क्‍या मुश्किल काम है। वे सब मुझ पर पिल पड़े और मेरी बेचारी सूरत पर हारमानी के भाव तैरने लगे। तब से मैं गांव के लड़कों से विशेषकर बचकर निकलता हूं। यदि फंस गया तो उनके एक ही दांव से मेरी सारी स्‍मार्टनेस हवा हो जाएगी।

बहरहाल कल टीवी खोली तो पता लगा कि हमारे वीर-सूरमा विदेशी धरती से भारत का परचम लहराकर लौटे हैं। मन ही मन अत्‍यधिक प्रसन्‍नता हुई पर थोड़ी ग्‍लानि भी हुई भारतीय मीडिया के रूखे और अभद्र व्‍यवहार पर। खिलाडि़यों का अभिनंदन तो दूर वे लोग- ‘पिटकर आ गए’ और ‘शर्म करो’ जैसे संबोधनों का भी प्रयोग कर रहे थे। खैर मीडिया को जाने दीजिए उनका व्‍यवहार तो हमेशा से ही गैर जिम्‍मेदाराना रहा है।

हमारे खिलाडि़यों ने इस बार फिर साबित कर दिया कि पश्चिम के सामने स्‍वामी विवेकानंद ने जो विचार रखे थे वे आज की पीढ़ी के समय में भी अप्रासंगिक नहीं हुए हैं और हमारे खिलाडि़यों ने विश्‍व कप में दूसरे, दबे-कुचले, वर्षों से किसी टूर्नामेंट को जीतने की आस लगाए लोगों को मौका देकर फिर उसी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की महान भावना को चरितार्थ किया है। मैं शायद यहां गलती कर रहा हूं। हमारे खिलाड़ी शायद अभी उस भावना को आत्‍मसात करने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं इसलिए उन्‍होंने शुरूआत ‘एशिया कुटुंबकम’ से की है। अंग्रेजी में एक कहावत भी है- ‘चैरिटी बिगंस एट होम’। सो हमारे शूरवीरों ने एक बड़े भाई के दायित्‍व का निर्वहन करते हुए उनके उज्‍जवल भविष्‍य को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें आगे जाने का मौका दिया है। साथ ही एक भाई जो पहले ही दौर में अपनी असफलता से निराश होकर टूट चुका था उसका साथ भी बखूबी निभाया है। जब हमारे बम बनाने पर वे बम बनाते हैं तो उनके असफल होने पर हमें भी असफल हो जाना चाहिए। जो नियम शस्‍त्रीकरण के खेल में लागू होते हैं वे क्रिकेट में भी लागू होने चाहिए। जब भी हमारी उनसे लड़ाई होती है तो यह क्रिकेट का खेल ही हमें फिर से एक-दूसरे के निकट लाने में मदद करता है। शांति प्रक्रिया के आगे बढ़ते रहने के लिए आवश्‍यक है हम कम से कम क्रिकेट में तो एक-दूसरे से सामंजस्‍य और बराबरी बनाये रखें। कल को यदि भारतीय टीम विश्‍वकप ले आती और पाकिस्‍तान की टीम बैरंग लौटती तो पाकिस्‍तान हम पर आरोप लगा सकता था कि- “भारत एशिया में खुद का प्रभुत्‍व जमाने की कोशिश में है और इससे हमारे हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।” तब हमारे मन्‍नू भाई को मजबूरी में यह कहना पड़ता कि हम एक साझा समूह बनाने जा रहे हैं जो इस बात की निगरानी करेगा कि वे कौन से कारण हैं जिनसे हमारी टीम जीत रही है और वे कौन से उपाय हो सकते हैं जिनसे दोनों टीमों का स्‍तर बराबर लाया जा सके। परंतु हमारे शूरवीरों ने मन्‍नू भाई को इस दुविधा से बचा लिया है वैसे भी उनके पास समय की कमी है यदि ऐसी कूटनीतिक बातों में ही उनका सारा समय खप गया तो विकास दर का क्‍या होगा?

विकास दर आगे बढ़ रही है। अर्थव्‍यवस्‍था आगे बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में हर भारतीय का कर्तव्‍य है कि वह भी यथासंभव देश के प्रति अपने कर्तव्‍य का पालन करे और देश को और आगे ले जाए। सो क्रिकेट टीम की भूमिका मैदान के साथ-साथ अर्थव्‍यवस्‍था के लिए भी महत्‍वपूर्ण हो जाती है। जब देशवासी क्रिकेट के बुखार में तप रहे हों और काम-धाम छोड़ टेलिविजन के सामने बैठे हों और इस प्रकार विकास दर की मट्टी पलीद करने तुले हों तब हमारे शूरमाओं का ये कर्तव्‍य हो जाता है कि उन्‍हें समझाएं कि जाओ भैया अपना-अपना काम करो काहे को टाइम खोटी करते हो। पर मजाल है हमारे क्रिकेट-प्रेमी टीवी बंद कर दें। तो ऐसे नालायकों को समझाने के लिए मजबूरी में हमारी पूरी टीम को ही यहां आना पड़ा। अब अर्थव्‍यवस्‍था को कोई खतरा नहीं है। बच्‍चे भी फिर से परीक्षाओं में व्‍यस्‍त हो गए हैं और उनके अभिभावकों को उनके भविष्‍य का डर अब नहीं सता रहा है। यही प्रतिभावान बच्‍चे कल को हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को और ऊंचाईयों पर ले जाएंगे। इस प्रकार अप्रत्‍यक्ष रूप से हमारे क्रिकेटरों ने देश के लिए जो योगदान दिया है उसे नकारा नहीं जा सकता। हालांकि हमारे शूरमा इतने कायर भी नहीं कि वे हर काम पर्दे के पीछे ही रहकर करें। भई जब अर्थव्‍यवस्‍था प्रगति करेगी, नये उद्योग लगेंगे और उनसे जो उत्‍पाद निकलेंगे, उनको जनता तक पहुंचाने का काम भी किसी को करना पड़ेगा। और वैसे भी आजकल मॉडल्‍स की कमी है। जो हैं वो फिल्‍मों में व्‍यस्‍त हैं। सो क्रिकेटर, जो कि उत्‍पादन से लेकर उपभोक्‍ता तक एक महत्‍वपूर्ण कड़ी हैं, इस आर्थिक प्रक्रिया के चरण में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

क्रिकेट खेलने के कारण खिलाडि़यों का ब‍हुत सा समय यूं ही बर्बाद हो जाता है। इसलिए उन्‍होंने एक नयी नीति को अमल में लाना शुरू किया है। जब भी वे किसी श्रृंखला में खेलेंगे, जल्‍दी से जल्‍दी वहां अपना काम खतम करेंगे(हारेंगे) और वापस अपने काम पर लग जाएंगे। इस नीति का भारत को बहुत राजनयिक लाभ मिलेगा। मन्‍नू भाई बुश से कहेंगे कि आओ भई एक मैत्री क्रिकेट श्रृंखला हो जाए। बुश कहेंगे पहले बताओ मेरा फायदा क्‍या है? मन्‍नू भाई कहेंगे कि फायदा आपका ही आपका है। आप महाशक्ति होकर भी क्रिकेट में कुछ नहीं हैं, हम आपसे मैच हारेंगे और हमें दो-चार श्रृंखला हराने से शायद आपको आई.सी.सी. से मान्‍यता भी मिल जाए। ज्‍यादा हुआ तो हमारे एक-दो खिलाड़ी यदि गलती से अच्‍छा खेले तो आप उन्‍हें ग्रीन कार्ड देकर अपने पास रख लीजिएगा। फिर आप क्रिकेट की भी महाशक्ति हो जाएंगे। इससे हमारे संबंध अमेरिका से और ज्‍यादा प्रगाढ़ होंगे। शायद वो हमसे रक्षा तकनीक समझौता कर ले और आतंकवाद के खिलाफ हमें साझा सहयोगी बना ले। ऐसा न भी करे तो कम से कम चीन की बजाय हमारे यहां अधिक निवेश करने लग जाए।

नीति का एक पहलू यह भी है कि भारत क्रिकेट में कमजोर टीमों से हारेगा तो इससे उन टीमों के मनोबल में वृद्धि होगी और इस प्रकार क्रिकेट में और भी नयी टीमें आयेंगी जो भारत को हराकर शायद टेस्‍ट क्रिकेट खेलने का दर्जा भी पा जायें जो उन्‍हें अन्‍यथा नहीं मिलेगा। इस प्रकार भारत विश्‍व में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। आगे ऐसा भी संभव है कि भारत इन छोटे-छोटे देशों से हारने के एवज में उनसे मुक्‍त व्‍यापार समझौता कर ले और भारत का विदेशी व्‍यापार नयी ऊंचाईयां छूने लगे।

भई संभावनाएं तो बहुत हैं पर जनता कुछ समझ ही नहीं रही है।

न्‍यायपालिका पर ताला क्‍यों नहीं लगा देते?

लोकतंत्र में ही जब चुनी हुई सरकारें लोकतंत्र के ही एक मजबूत स्‍तंभ न्‍यायपालिका का सम्‍मान तो दूर उसके विरोध में उतर आयें तो इस देश में लोकतंत्र पर गर्व करने वाले लोग हास्‍यास्‍पद लगने लगते हैं।

तमिलनाडु सरकार द्वारा 31 मार्च को बंद के आह्वान के क्‍या निहितार्थ लगायें जायें? क्‍या सरकारें नहीं चाहतीं कि संसद या सरकार से जुड़े मामले में न्‍यायपालिका कोई हस्‍तक्षेप करे? हालांकि यह उच्‍चतम न्‍यायालय का इस मामले का अंतरिम निर्णय है उसके बावजूद इस प्रकार का विरोध कतई उचित नहीं है। यदि एक बार को मान लें कि करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्‍यमंत्री की बजाय प्रधानमंत्री की गद्दी पर काबिज होते तो क्‍या वे इस निर्णय के खिलाफ देशव्‍यापी बंद का फरमान जारी करते? सरकारें जनता के हित में नीतियां बनाती हैं और जब जनता उपरोक्‍त प्रकार की किसी परिस्थिति में विरोध का रास्‍ता अख्तियार करे तो बात समझ में आती है। पर जब सरकारें इस मसले को अहम का प्रश्‍न बनाकर खुद ऐसे विरोध प्रदर्शनों पर उतारू हो जाएं तो क्‍या यह एक स्‍वस्‍थ लोकतंत्र के लिए शर्म का विषय नहीं है।

उधर स्‍वतंत्र भारत में अपने कठमुल्‍लापन जैसी नीतियों के लिए मशहूर पार्टी के नेता सीतराम येचुरी का कहना है कि संसद द्वारा सर्वसम्‍मति से पारित कानून पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्‍थगनादेश देना बहुत गंभीर मामला है। जब संविधान में न्‍यायपालिका को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया गया है और कहा गया है कि यह संसद द्वारा पारित किसी भी कानून की समीक्षा कर सकती है तब ऐसे मामले में न्‍यायपालिका द्वारा एक जनहित याचिका पर कोई निर्णय(निर्णय भी नहीं अंतरिम निर्णय) देना कैसे गंभीर हो जाता है ये समझ से परे है। जाति आधरित आरक्षण को एक बार को उचित भी ठहरा दें तो भी राजनीतिक दल जिस प्रकार क्रीमीलेयर को आरक्षण का लाभ देने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, उसी के उनकी नीयत से पर्दा उठ जाता है।

यहां एक बात जो उठ रही है वह ये है कि राजनेताओं के अनुसार जब 1992 में उच्‍चतम न्‍यायालय अन्‍य पिछड़ा वर्ग को नौकरियों में आरक्षण पर मुहर लगा चुका है तो उसे अब इसके विरोध में जाने का क्‍या हक है? पर शायद उन्‍होंने संविधान तक नहीं पढ़ा कि उच्‍चतम न्‍यायालय के लिए यह बाध्‍यकारी नहीं है कि पहले ऐसे किसी मामले में उसने जो निर्णय दिया, अब वह उसके खिलाफ नहीं जा सकता। कई बार अपने निर्णयों में माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने पूर्ववर्ती मामलों में दिये गए अपने निर्णय को पलटा भी है। तो इस बार क्‍या संसद उसे बताएगी कि उसे किस आधार पर निर्णय देना है। पिछले कुछ समय से न्‍यायपालिका और विधायिका के बीच तनातनी होती रही है। पर सरकार जो खुद किसी मामले में न्‍यायालय में पक्षकार है, उसके सदस्‍य खुद उस मामले में अपनी राय सार्वजनिक रूप से जाहिर करें और उसे नसीहत दें ये कितना उचित है? वैसे ऐसी सरकारों से भी क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है जिनके एक मंत्री को न्‍यायालय के निर्णय के कारण उम्रकैद की सजा भुगतनी पड़ रही हो।

ऊपर से कोई अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग फेडरेशन ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि उन्‍हें न्‍यायपालिका के हस्‍तक्षेप को मानने से इंकार कर देना चाहिए। जब किसी संगठन या वर्ग से ऐसी मांग उठने लगे तो बहुत हो चुका अब तो न्‍यायपालिका पर ताला ही लगा देना चाहिए।

Wednesday, April 18, 2007

रेख्‍ते में कविता – उदय प्रकाश


जैसे कोई हुनरमंद आज भी
घोड़े की नाल बनाता दिख जाता है
ऊंट की खाल की मशक में जैसे कोई भिश्‍ती
आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चांदनी चौक में
प्‍यासों को ठंडा पानी

जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू
मोतियाबिंद के लिए गुल बकावली का अर्क

शर्तिया मर्दानगी बेचता है
हिंदी अखबारों और सस्‍ती पत्रिकाओं में
अपनी मूंछ और पग्‍गड़ के
फोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमी

जैसे पहाड़गंज रेलवे स्‍टेशन के सामने
सड़क की पटरी पर
तोते की चोंच में फंसाकर बांचता है ज्‍योतिषी
किसी बदहवास राहगीर का भविष्‍य
और तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर
ढाका या नेपाल के किसी गांव की लड़की
करती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी
अपनी देह का

जैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा
ठीक गोधूलि के समय
भेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ
आज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्‍ठभूमि में
धरती का अंतिम अलगोझा

इत्तिला है मीर इस जमाने में
लिक्‍खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई-कोई
उसी रेख्‍ते में कविता

लेखक- उदय प्रकाश

Sunday, April 01, 2007

सौ चूहे खाकर चले अर्जुन सिंह हज करने

केंद्र सरकार की आरक्षण नीति फिर से सुर्खियों में है। इस बार माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने केंद्र सरकार से स्‍पष्‍ट कहा है कि 1931 के सर्वेक्षण पर अन्‍य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने का कोई आधार नहीं बनता। फिलहाल उच्‍चतम न्‍यायालय ने अगली सुनवाई की तारीख अगस्‍त में तय की है। पर सरकार के साथ सभी राजनैतिक दल पशोपेश में हैं कि अब अगला कदम क्‍या उठाया जाय?

आरक्षण नीति के वर्तमान समय के पैरोकार माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री जो कि मानव संसाधन विनाश की कसम खाकर ही शायद कुर्सी पर बैठे हैं, सामाजिक न्‍याय के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं यह बार-बार दुहराने की आवश्‍यकता नहीं है।

परंतु माननीय मानव संसाधन विनाश मंत्रीजी जो कि हमारे मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री भी रह चुके हैं, के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं जो मैं समझता हूं सभी को अवश्‍य पता होनी चाहिए। जिससे वे स्‍वयं निर्णय ले सकें कि माननीय मंत्रीजी सामाजिक न्‍याय और समाज में सभी को समान हक देने के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं।

माननीय मंत्रीजी शायद 1980 में इंदिरा गांधी के आशीर्वाद से हमारे प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने। मैं तो उस समय पैदा भी नहीं हुआ था। पर हमारे बड़े बुजुर्गों से जरूर उनकी कहानियां सुनने को मिल जाती हैं। अपने शासनकाल में इन्‍होंने जिस प्रकार एक जातिविशेष को संरक्षण दिया और उसे आगे बढ़ाया ये आपको यहां के किसी भी जानकार व्‍यक्ति से पता लग जायगा। अर्जुन सिंह चूंकि ठाकुर जाति से हैं इसलिए गतवर्ष के उनके अन्‍य पिछड़ा वर्ग को केंद्रीय उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं में आरक्षण देने के कदम से ठाकुर जाति के लोग विशेष रूप से इनसे रुष्‍ट हो गए हैं। ऐसे ही मेरे एक परिचित ठाकुर जाति के सज्‍जन उनके इस कदम से बड़े आहत थे और कह रहे थे कि अर्जु‍न सिंह की गिनती अब हम ठाकुरों में नहीं करते। वैसे इसमें कोई विशेष बात नहीं है क्‍योंकि जब अर्जुन सिंह ने उनके फायदे के लिए कोई कदम नहीं उठाया तो वे रुष्‍ट तो होने ही थे। पर फिर वे बीते दिनों की यादों में खो गए। कहने लगे वे भी क्‍या दिन थे जब प्रदेश में ठाकुरों की तूती बोलती थी। अर्जुन सिंह का उस समय का कार्यकाल ठाकुर जाति के लिए विशेष गौरव का काल था। इसलिए नहीं कि अर्जुन सिंह स्‍वयं ठाकुर थे अपितु उस समय कोई भी व्‍यक्ति मुख्‍यमंत्री से सीधे जाकर बताता था कि वह ठाकुर है और उसका फलां काम होना है तो मुख्‍यमंत्री स्‍वयं यथाशीघ्र उस काम में रुचि ले उसको निपटाते थे फिर भले उस व्‍यक्ति से मुख्‍यमंत्री की दूर-दूर तक पहचान न हो। ऐसा हमारे क्षेत्र के ठाकुर जाति के बुजुर्ग लोग स्‍वयं स्‍वीकार करते हैं। मुख्‍मंत्रीजी उस समय पूरी तरह अपनी जाति के लोगों को बढ़ावा देने के लिए कृतसंकल्पित थे। यदि कोई ठाकुर अपने बेरोजगार पुत्र को नौकरी दिलाने के लिए मुख्‍यमंत्री से जाकर मिल ले तो मुख्‍यमंत्रीजी चूंकि वह व्‍यक्ति ठाकुर है उसकी अर्जी जरूर मानते थे।

हमारे शहर में उस समय में एक सड़कछाप नेता कहें या गुंडा हुआ करता था। जिसकी हैसियत आज भी सड़कछाप टाइप ही है, पर माननीय मंत्रीजी के कार्यकाल में उस व्‍यक्ति की हैसियत की कोई बराबरी नहीं कर सकता था। उक्‍त व्‍यक्ति सरेआम आई.ए.एस और आई.पी.एस स्‍तर के अधिकारियों और मंत्रालय तक में अपना जोर चलाता था। उसकी इस हैसियत का सिर्फ एक ही कारण था कि वह जाति से ठाकुर था। कुछ लोगों से तो मैंने यहां तक सुना है कि उस समय उक्‍त व्‍यक्ति ने जो कह दिया वह समझो अर्जुन सिंह ने कह दिया।

एक और खास बात मैंने माननीय मंत्रीजी के संबंध में सुनी थी हालांकि उसका इस विषय से कोई लेना-देना नहीं है। मंत्रीजी के लाड़ले पुत्र उन दिनों शिकार का शौक फरमाते थे और वह भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि शेर का। जबकि वह मध्‍यप्रदेश में टाइगर प्रोजेक्‍ट का शुरूआती समय था। परंतु मुख्‍यमंत्रीजी के लाड़ले भोपाल के पास स्थित राष्‍ट्रीय उद्यान को अपनी शिकारगाह के तौर पर इस्‍तेमाल करते थे। रात के समय जब-तब उनकी वैन घने जंगल में उतर जाया करती थी। शौक भी क्‍यों न फरमायें आखिर वे मुख्‍यमंत्री के चिरंजीव जो ठहरे!

वही अर्जुन सिंह सरकार में अपने कद को ऊंचा करने के लिए आरक्षण का घिनौना दांव खेलें तो इसमें अचरज क्‍या है। अचरज तो तब होता है जब उनके मुंह से सामाजिक न्‍याय और बराबरी जैसे शब्‍द निकलते हैं।