Monday, May 07, 2007

अखबार पढ़ने की बीमारी

अखबार पढ़ना एक अच्‍छी आदत है, ऐसा बचपन में हमें सिखाया गया था। हमारे मास्‍साब ने अखबार पढ़ने के कई महत्‍व गिनाये थे- इससे जनरल नॉलेज बढ़ती है, शब्‍दज्ञान बढ़ता है, फलां ज्ञान बढ़ता है,.....। शब्‍दज्ञान का तो पता नहीं, हां खेलपृष्‍ठ को पढ़-पढ़कर क्रिकेट-ज्ञान हमारा जरूर बढ़ गया। जागरूक अभिभावक बच्‍चों को अखबार पढ़ने का महत्‍व समझाते हैं। आजकल के समझदार बच्‍चे ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ पढ़ने लगे हैं और अंग्रेजी सीखने के साथ नॉलेज भी गेन करते हैं।

भई अपन तो ठहरे देशी उजड्ड ! अपन को हिंदी अखबार ही रास आता है। यदि अखबार स्‍थानीय हो तो मजा ही अलग है। अपने गली मुहल्‍ले शहर में कहां सट्टा होता है, किस नाली की सफाई नहीं हुई है, किस मोहल्‍ले में किसको कुत्‍ते ने काटा, ये सब खबरें क्‍या अंतर्राष्‍ट्रीय खबरों से कम महत्‍व रखती हैं। पर कुछ समय पहले मुझे महसूस हो गया कि ये अखबार बीमारी के वाहक हैं इसलिए आजकल अपन इंटरनेट पर खबरें पढ़ कर काम चला लेते हैं। अखबार विशेषकर हिंदी अखबार पढ़ने वालों में एक खास बीमारी पाई जाती है- अड्डेबाजी की। ये अड्डेबाज आपको किसी भी सार्वजनिक स्‍थान, पान की या चाय की दुकान, सड़क के नुक्‍कड़, बस-रेल आदि में सहज ही नजर आ जायेंगे। अड्डेबाजी का एक और सह-उत्‍पाद है- ध्‍वनि प्रदूषण। शहरों में जितना भी ध्‍वनि प्रदूषण होता है, उससे आधा तो इन अड्डेबाजों की ही करामात है। मोटर वाहनों, टेंपो-आटोरिक्‍शावालों, भोंपुओं पर नाहक ही सब दोष मढ़ दिया जाता है।

सारे देश की भांति हमारे मुहल्‍ले में भी यह प्रजाति पाई जाती है। हमारा स्‍थानीय प्रशासन इन पर कुछ ज्‍यादा ही मेहरबान है सो कई दशकों पूर्व उसने इन अड्डेबाजों के अड्डेबाजी के लिए एक स्‍थान मुकर्रर किया। वैसे तो यह स्‍थान सार्वजनिक पुस्‍तकालय कहलाता है, परंतु यहां की पुस्‍तकें इन अड्डेबाजों और उनके नाते-रिश्‍तेदारों के निजी पुस्‍तकालयों की शोभा बढ़ाती हैं। कुल मिलाकर इस पुस्‍तकालय का बलात्‍कार हमारे अड्डेबाज बुद्विजीवी बहुत पहले ही कर चुके हैं। अब इसका महत्‍व केवल इतना रह गया है कि यहां कुछ अखबार और पत्रिकाएं आ जाती हैं और अड्डेबाजी के लिए प्‍लास्टिक की कुर्सियों और एक पंखे की उत्‍तम व्‍यवस्‍था है। यहां सुबह-शाम ऐसे ही अड्डेबाज बुद्विजीवियों का जमावड़ा होता है और देश-दुनिया की समस्‍याओं पर गहन विचार-विमर्श किया जाता है। ये बुद्विजीवी सुबह-सुबह अखबार पढ़ते हैं और दिनभर गुस्‍से में रहते हैं। व्‍यवस्‍था, शासन, प्रधानमंत्री, दुनिया, भगवान और न जाने किस-किस को कोसते रहते हैं। दिनभर इनका पेट खराब ही रहता है। शाम होते ही ये फिर से आकर अड्डे की कुर्सियों पर कब्‍जा जमा लेते हैं। फिर दिनभर का गुस्‍सा उतारा जाता है। जमाने भर को गालियां देकर जब ये घर लौटते हैं तो इनका पेट साफ हो जाता है और रात को यह सोचकर ये चैन की नींद सो जाते हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

ऐसे ही एक अड्डेबाज सज्‍जन हैं जो अपने सरकारी दफ्तर में कभी-कभार ही पाये जाते हैं। एक दिन शहर में फैली गंदगी के कारण कामचोर नगरपालिका के अमले पर बहुत गुस्‍सा हो रहे थे। बाद में यह कहकर शां‍त हो गए कि इस देश में तो कोई काम करना ही नहीं चाहता। एक प्राइमरी स्‍कूल के मास्‍टरसाब भी हैं जो स्‍कूल में जाकर कक्षाएं लेने को अपनी शान में गुस्‍ताखी समझते हैं और पुस्‍तकालय में किसी कुर्सी पर जमे हुए अखबार पढ़ते पाये जाते हैं। एक दिन अखबार पढ़कर वे बिगड़ गये। बोले- इस देश का क्‍या होगा, सरकार उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं में पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्‍यवस्‍था कर रही है, अजी पहले उनके लिए प्राथमिक शिक्षा की तो ढंग से व्‍यवस्‍था करे। अगले दिन वे आई.आई.टी. से होने वाले ब्रेन-ड्रेन पर चिंता करते सुने गए। एक दिन बड़ा ही मजेदार वाकया हो गया। एक सज्‍जन पुस्‍तकालय में पधारे। गले में सोने की मोटी चेन पड़ी हुई थी। मोबाइल फोन उनके पास दो थे। एक कान से चिपका हुआ था, दूसरे के बजने की आवाज जेब से आ रही थी। वे कभी-कभार अखबारों में छपने वाले टेंडरों की जानकारी लेने आया करते हैं। वैसे उनका एक अलग ही टाइप का व्‍यवसाय है। उनके पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली की एक दुकान का लाइसेंस है और वह मिट्टी का तेल बस-ट्रक, ट्रैक्‍टर वालों को बेचते हैं। उनके सामने अखबार पड़ा हुआ था। आजकल हमारे माननीय सांसदगण संसद की बजाय अदालतों और जेलों का चक्‍कर काटते हुए एक तीसरी जगह भी देखे जाते हैं- अखबारों की हेडलाइन में(पुलिस द्वारा धक्‍का देकर ले जाये जाते हुए)। सो उन महाशय की ऐसे ही किसी सांसद पर नजर पड़ गई। छूटते ही बोले- क्‍या हो रहा है इस देश में। बाद में बहुत देर तक वह सांसदों को उनके आचरण के लिए गरियाते रहे और राजनीति में भ्रष्‍टाचार,अपराधीकरण आदि पर चिंता जताते रहे। चलते-चलते उन्‍होंने कहा- इन भ्रष्‍टाचारियों के साथ यही व्‍यवहार होना चाहिए। मुझे लगा उनका आशय था कि हम रोज मिट्टी का तेल ब्‍लैक करते हैं, सड़क के ठेके में घटिया माल लगाकर पूरा पैसा डकार जाते हैं। जब हमारे खिलाफ शिकायतें हो रही हैं तो सांसद भी तो साले फंसने चाहिए !

मेरे एक मित्र भी हैं जो राष्‍ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करना अपने समय की बर्बादी समझते हैं। वे हमेशा अंग्रेजी अखबार पढ़ते हैं, अंतर्राष्‍ट्रीय मसलों पर चर्चा करते हैं और अड्डेबाजों की भीड़ में अपनी कुछ अलग पहचान बनाने के लिए उनसे थोड़ा हटकर बैठते हैं। एक दिन हमारे अड्डेबाज गांवों में होने वाले पंचायत चुनावों को लेकर चर्चा करने लगे। हमारे मित्रबंधु लगे नाक-भौं सिकोड़ने कि ये छोटे लोग केवल छोटी ही बात कर सकते हैं। वैसे आजकल हमारे मित्र बंधु इराक मामले में व्‍यस्‍त हैं और दुनिया से आतंकवाद मिटाने व मध्‍यपूर्व की बेहतरी के लिए उनका अपना एक रोडमैप है। इनसे छोटे मुद्दों पर बात करना वे अपनी तौहीन समझते हैं। ये शायद एक अलग टाइप की बीमारी है जो अंग्रेजी अखबार पढ़ने वालों को ही होती है, ऐसा मेरा ख्‍याल है। अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्दे से याद आया मेरी एक सहपाठी हुआ करती थी। वह अपने आपको कूटनीति की गहरी जानकार मानती थी। हुआ यूं कि एक दिन उसने एक अखबार में कश्‍मीर घा‍टी से संबंधित कोई लेख पढ़ लिया था।इसलिए वह अक्‍सर केंद्र सरकार को इस मामले में अदूरदर्शी कहकर कोसती रहती थी। एक दिन उसने नौकरशाही में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार के बारे में लेख पढ़ा और आई.ए.एस बनने का ख्‍वाब देखने लगी। उसकी किताबों से ज्‍यादा नजदीकी कभी नहीं देखी गई इसीलिए मैंने एक दिन उससे पूछ ही लिया कि आप आई.ए.एस क्‍यों बनना चाहती हैं। मोहतरमा का जवाब था कि देश में आजकल योजनाओं का ठीक से क्रियान्‍वयन नहीं हो पा रहा है। पूरी नौकरशाही भ्रष्‍टाचार में डूबी है। योजनाओं का एक पैसा नहीं खर्च किया जा रहा। अगर वह आई.ए.एस बन गई तो यह सब गड़बड़ घोटाला समाप्‍त कर देगी। जवाब सुनकर मुझे हंसी आ गई। दिमाग ने अनुमान लगाया कि अखबारी वायरस इन मोहतरमा के अंदर बहुत गहरे पैठ गया है और जल्‍द ही इलाज नहीं किया गया तो मरीज ये बीमारी दूसरों में भी फैलाता नजर आएगा।

अखबार पढ़ना स्‍वयं में तो बहुत खतरनाक चीज तो है ही, इससे उत्‍पन्‍न होने वाली बीमारियां भी एकाध नहीं कई प्रकार की होती हैं और उस पर भी तुर्रा ये कि इन बीमारियों का मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं। सबसे भयंकर बीमारी है देश की दशा सुधारने की। अखबार पढ़ने के शौकीन खुद जीवन में कभी न सुधरें, हर शाम देश को सुधारने का बीड़ा अवश्‍य उठा लेते हैं। अखबार इनके लिए दफ्तर की फाइल की तरह होते हैं। रोज नया अखबार आता है और रोज ये देश की नई-नई समस्‍याओं से जूझने में लगे रहते हैं। इससे भी भयंकर बीमारी है आदर्शवाद की बीमारी। भ्रष्‍ट से भ्रष्‍ट अखबार पढ़ने वाला भी रोज समाज और देश को एक नई राह दिखाता नजर आएगा।

ध्‍यान देने योग्‍य बात है कि व्‍यवस्‍था को कोसना और उसे कोसने की काबिलियत रखना दोनों मुख्‍तलिफ बातें हैं पर विडंबना है कि ये अड्डेबाज पाठक पहली श्रेणी में आते हैं और दूसरी श्रेणी में आने वाले लोग अपना काम करते हुए कम ही पाये जाते हैं।

हमारे इन अखबारी अड्डेबाजों की दुनिया में दुष्‍यंत कुमार की कविता का अर्थ कुछ इस प्रकार से निकलता है-


“सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही तो हमारा मकसद है,
सारी कोशिश है कि टाइमपास का कोई बहाना मिलना चाहिए।”

6 comments:

Pratik said...

सटीक व्यंग्य, आपके व्यंग्य की धार दिनों-दिन तेज़ होती जा रही है। हिन्दुस्तान में सड़क पर पड़ा रोड़ा भी हिलाओ तो नीचे से इस तरह का कोई बुद्धिजीवी व्यवस्था को कोसता हुआ निकल आता है। लेकिन सवाल यह है कि अमूमन ये बुद्धिजीवी नामक प्रजाति के जीव इतने नकारे क्यों होते हैं?

अभय तिवारी said...

नए ज़माने की नई पीढ़ी के साथ यही अच्छा है कि अख्नबार का कोई महिमामण्डित रूप नहीं उनकी चेतना में..और किसी चीज़ का भी नहीं.. उनकी पसन्द टी वी है.. और वे आदर्शवादी भी नहीं है..उपयोगितावादी हैं और सुखवादी हैं..

Sagar Chand Nahar said...

बहुत दिनों के बाद आपके कीबोर्ड से अच्छा व्यंग्य निकला है, भई मजा आ गया। बस इसी तरह की रचनायें लिखा करें। हमें अच्छी लगती है।
और हाँ वह हिन्दू- हिन्दू वाले लेख लिखने का काम औरों पर छोड़ देवें।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया लेख.

ये बुद्विजीवी सुबह-सुबह अखबार पढ़ते हैं और दिनभर गुस्‍से में रहते हैं।


:) सभी का साबका ऐसे लोगों से रहा है.

संजय बेंगाणी said...

नौजवान अपना समय ब्लोगिंग के पीछे खर्च कर रहे है. बोरा गए है. सरकार को नेट पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए. मगर फूर्सत किसे है. इस देश का कुछ नहीं हो सकता.

Manish said...

वाह, बढ़िया व्यंग्य !