Wednesday, July 04, 2007

दस जनपथ रबर स्‍टांप कंपनी प्राईवेट लिमिटेड

दस जनपथ रबर स्‍टांप कंपनी फिर से सुर्खियों में है। 2004 के आम चुनावों के बाद से यह कंपनी लगातार सुर्खियों में ही रहती है। 2004 में जब पहली बार इस कंपनी ने पी.एम. ऑफिस के लिए एक बढि़या, मेहनती, ईमानदार, वफादार रबर स्‍टांप जारी किया था तब से ही इस कंपनी की धाक जम गई थी। समझदार लोगों ने तभी अनुमान लगा लिया था कि अब यह देश रबर स्‍टांपों के बलबूते चलेगा। राष्‍ट्रपति चुनाव नजदीक हैं इसलिए इस कंपनी की सीएमडी सोनिया गांधी अपनी कंपनी का नया प्रॉडक्‍ट लांच करने जा रही हैं। जैसा कि नाम से ही विदित है यह कंपनी रबर स्‍टांप निर्माण में महारत रखती है इसलिए इस कंपनी का नया प्रॉडक्‍ट भी एक रबर स्‍टांप ही होगा जिसकी डिलीवरी सीधे रायसीना हिल्‍स की जायगी। इस नये प्रॉडक्‍ट में इस बार दस जनपथ की सहयोगी कंपनी है- इंडियन कम्‍युनिस्‍ट इंक। यह कंपनी भी अपने क्षेत्र की एक जानी-मानी कंपनी है, पर इसका बाजार पूंजीकरण बहुत कम है। इसीलिए इस कंपनी ने बाजार पर अपनी पकड़ बनाने के उद्देश्‍य से दस जनपथ से हाथ मिलाया है।

वैसे दस जनपथ रबर स्‍टांप कंपनी कोई नयी कंपनी नहीं है। पहले इस कंपनी का नाम द ग्रेट इंदिरा चाटुकार मैन्‍युफैक्‍चरिंग कंपनी हुआ करता था। तब यह कंपनी मुख्‍यत: चाटुकार, चमचे, नतमस्‍तक, दण्‍डवतप्रणाम वाले, जैसे प्रॉडक्‍ट ही बनाया करती थी। पर आजकल इस कंपनी की सीएमडी सोनिया गांधी ने रबर स्‍टांप निर्माण को अपना प्रमुख लक्ष्‍य बनाया है। बाकी प्रॉडक्‍ट्स का निर्माण भी कंपनी यथावत कर रही है।

हां तो बात हो रही थी कंपनी के नये प्रॉडक्‍ट की। प्रॉडक्‍ट का नाम है- प्रतिभा पाटिल। कंपनी जहां अपने प्रॉडक्‍ट को बढि़या, टिकाऊ, शानदार और लोकप्रिय होने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी कंपनियां इसे एक घटिया उत्‍पाद बताकर अपने उत्‍पाद की डिलीवरी होने की आस लगाये बैठी है। दक्षिण की एक कंपनी की मुखिया ने प्रतिभा पाटिल नाम के इस प्रॉडक्‍ट को देश के साथ मजाक तक बता दिया। ये मजाक है या नहीं ये तो पब्लिक जाने पर वे मोहतरमा खुद कितना बड़ा मजाक हैं यह भी गौर किया जाना चाहिए।

कुछ दिनों से इस बहुप्रचारित उत्‍पाद के समर्थक यह दावा कर रहे हैं कि इसकी लांचिंग महिला सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्‍थर है क्‍योंकि प्रॉडक्‍ट का नाम किसी महिला से मिलता-जुलता लगता है। इस देश में महिला सशक्तिकरण चुटकियों में हो जाता है। किसी गधी को सजा-संवारकर बढि़या कुर्सी पर बिठा दो और हो गया देश की करोड़ों महिलाओं का सशक्तिकरण। इतना हो जाने पर क्‍या जरूरत रह जाती है लिंगभेद मिटाने, उनके सामाजिक उत्‍थान, उनकी शिक्षा, उन्‍हें बराबरी का हक दिलाने की। विदेशी सर्टिफिकेट ही तो लेना है। मिल जायेगा। अमेरिका में हिलेरी क्लिंटन मारती रहें हाथ-पैर, पर हमने उनसे पहले अपने देश की महिलाओं का सशक्तिकरण करके दिखा दिया और ये दिखावा ही तो परम सत्‍य है। बाकी तो सब छलावा है।

हमारे देश में लोग बेकार ही रोना रोते रहते हैं। पर देश की जो समस्‍याएं इतनी बड़ी लगती हैं वे वास्‍तव में उतनी बड़ी हैं नहीं। देखिये न हमारे देश की सबसे बड़ी कंपनी की सीएमडी सोनिया गांधी ने तो ये साबित करके भी दिखा दिया। महिला सशक्तिकरण का हल्‍ला सालों से मच रहा था और उन्‍होंने एक चुटकी में ही समस्‍या हल करके दिखा दी। लोग चिल्‍लाते रहते थे कि राजनीति से त्‍याग, समर्पण, कर्तव्‍य, नैतिक मूल्‍य सब नष्‍ट हो गये। पर सोनियाजी ने अपने ‘महान त्‍याग’ से सबको दिखा दिया कि भैया जब तक मुझ जैसी त्‍याग, बलिदान, नैतिकता की देवी इस देश में है राजनीति का स्‍तर बना रहेगा। कुछ समझदार यह बात समझ भी रहे हैं इसीलिए उन्‍होंने अभी से इस देवी के पोस्‍टर, कैलेंडर, फोटो आदि बनाकर पूजा भी शुरू कर दी है। बाकी बेवकूफ भी जितनी जल्‍दी इस बात को समझ ले उतनी ही जल्‍दी उनका कल्‍याण होगा।

अपन वापस लौटते हैं प्रॉडक्‍ट पर। पता नहीं क्‍यों बहुत से लोग प्रॉडक्‍ट की औपचारिक लांचिंग से पहले ही उसे डिफेक्‍टेड बताने में जुटे हैं। आजकल का मीडिया तो कुछ ज्‍यादा ही समझदार हो गया है। किसी की भी पोल-पट्टी पूछ लो इन गुरू लोगों से। किसी के चरित्र की भी खटिया खड़ी करवालो। पर अब ये गुरू लोग बता रहे हैं कि इस नये प्रॉडक्‍ट का चरित्र कुछ ठीक नहीं है। इसका चरित्र कमोबेश हमारे राजनेताओं से ही मिलता-जुलता है। ये भी सुना गया कि ये भूतों से भी बातें करता है और इसने इतिहास भी पढ़ रखा है। पर भाई अपनी तो इन लोगों को यही सलाह है कि जब कानूनी रूप से डिलीवरी का टेंडर सोनियाजी के पास है तो क्‍यों बेकार माथापच्‍ची करते हो। कहीं ये न हो कि दस जनपथ कंपनी आपके आरोपों से तंग आकर किसी साफ-सुथरे विदेशी रबर स्‍टांप को मंगवाकर डिलीवरी कर दे।

7 comments:

संजय बेंगाणी said...

कांग्रेस को ऐसे ही राष्ट्रपति की जरूरत है, क्या करे दुसरे उत्तम उत्पाद इन्हे हजम ही नहीं होते, खानदानी बदहजमी है.

स्वागत करें एक और रबर स्टेम्प का. जिस पर चुने जाने से पहले ही आरोप लग रहें है.

एक और अच्छा लेख.

Sanjay Tiwari said...

इसको व्यंग्य न कहो भाई, यह सत्य समाचार है.

mahashakti said...

achchha likha hia wah!

विजय वडनेरे said...

कोई इसे (लेख को) अखबारों में छपवाओ रेऽऽऽऽऽऽ.

वैसे तो अपने नेताओं के जागने की कोई उम्मीद नहीं, पर शायद इसे पढ कर उन नेताओं के पीछे चापलूसी करने वाली जनता, नेताओं के भाषणों, रैलियों में भीड़ बढाने वाली जनता, और इन नेताओं को चुनने वाली जनता की समझ में इनकी कारगुज़ारियाँ आ जायें, और हो सकता हो कि अगली बार बेचारी जनता का बहुमूल्य "मत" जाया ना जाय.

अनुनाद सिंह said...

लिनक्स की दशा अपने हिन्दी जैसी है। लोग जबतक इसका प्रयोग नहीं करएंगे, इन दोनो को भला-बुरा कहते रहेंगे । जब अधिकाधित लोग इनका प्रयोग करने लगेगें, इनमे वे सारी खूबियां स्वत: आ जायेगीं जो अन्यत्र हैं।

अनुनाद सिंह said...

(मेरा उपर वाला कमेंट गलती से यहां लग गया, हटा दीजियेगा।)

राष्त्रपति का रबर-स्टैम्प होना बहुत हद तक भारत के संविधान की देन है। जिसने मापदण्द ही दिया है कि राष्त्रपति बस पागल नहीं होना चाहिये। बाकी उसका मानसिक स्तर कुछ भी हो, चलेगा।

Shrish said...

वाह खूब लिखा, मजा आ गया पढ़कर। ऊपर अनुनाद जी से सहमत हूँ।