Tuesday, February 19, 2008

मरते घडि़याल, दम तोड़ती जैव विविधता

पिछले कुछ समय से चंबल नदी में पाये जाने वाले घडि़यालों की मौत की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं। विगत दो माह में मृत घडि़यालों की संख्‍या 96 बताई गई है। पर कमाल की बात ये है कि इतना समय बीत जाने के बाद भी घडि़यालों की मौत का सही कारण पता नहीं लगाया जा सका है। भारतीय उपमहाद्वीप के इस बेहद संकटग्रस्‍त जलीय जीव के वर्तमान में कुछ ही ठिकाने शेष हैं जिनमें चंबल नदी सबसे महत्‍वपूर्ण है।

चंबल नदी में पाये जाने वाले जीवों की संरक्षा के लिए सन् 1979 में राष्‍ट्रीय चंबल अभ्‍यारण की स्‍थापना की गई। 400 किमी से भी अधिक क्षेत्र में फैले इस अभ्‍यारण में मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान और उत्‍तरप्रदेश तीनों ही राज्‍यों का क्षेत्र सम्मिलित है। चंबल नदी भारत की सबसे कम प्रदूषित और समृद्ध जैव-विविधता वाली नदियों में से है। साफ पानी में पाई जाने वाली डॉल्फिन, जिसे गेंगेटिक डॉल्फिन कहा जाता है, भी इस नदी के पानी में अठखेलियां करती हैं। साथ ही दुर्लभ प्रजाति के कछुए भी यहां पाए जाते हैं। पर चंबल मुख्‍य रूप से घडि़यालों के लिए जानी जाती है घडि़यालों के अलावा यहां मगर भी पर्याप्‍त संख्‍या में हैं। 1979 में सेंचुरी घोषित होने के बाद से ही सरकार द्वारा इन जलीय जीवों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किये जा रहे हैं। पर सरकारी प्रयासों के अलावा यह बात भी ध्‍यान में रखने योग्‍य है कि यह नदी दुर्गम बीहड़ों से होकर गुजरती है और इसके किनारों पर आबादी और शहरी आबादी नाम मात्र की है(राजस्‍थान के कोटा को छोड़कर)। इसके अलावा यह इलाका लंबे समय से मानवीय गतिविधियों से अछूता रहा है और चंबल के बीहड़ों में पाये जाने वाले डकैत गिरोहों के कारण भी लोगों को हमेशा इसके आसपास जाने में भय सताता रहा है। इस कारण भी यहां जलीय जीवों पर संकट के मौके ज्‍यादा नहीं आ पाये हैं। पर पिछले कुछ समय से सेंचुरी क्षेत्र मे मानवीय गतिविधियां बढ़ी हैं।

चंबल में पाये जाने वाले घडि़यालों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए मुरैना जिले के देवरी में और लखनऊ के पास कुकरैल में संरक्षण केंद्र स्‍थापित हैं। इन केंद्रों में घडि़यालों के अंडों को लाकर रखा जाता है और उनसे निकले बच्‍चों के नदी में रहने लायक होने के बाद वहां छोड़ दिया जाता है। चंबल सेंचुरी के अधिकारियों का कहना है कि वे इस क्षेत्र को इको टूरिज्‍म के लिए विकसित करना चाहते हैं। पर अभी तक इस क्षेत्र में पर्यटन को विकसित करने के पर्याप्‍त प्रयास नहीं हुए हैं। मुरैना स्थित घडि़याल केंद्र पर पर्यटकों को मोटरबोट द्वारा नदी की सैर कराने के इंतजाम हैं पर पर्यटकों की संख्‍या नगण्‍य सी ही बनी रहती है। मुरैना का देवरी घडि़याल केंद्र राष्‍ट्रीय राजमार्ग क्र. 3 पर मुरैना शहर से 6-7 किमी की दूरी पर हैं। वहां जरूर घडि़याल और मगरमच्‍छ देखने के शौकीन पर्यटक देखे जा सकते हैं।

पर पिछले कुछ ही समय में इतने घडि़यालों की मौत संरक्षण के इन प्रयासों पर सवालिया निशान लगाती है। साथ ही मौत के कारणों का ठीक से पता न लग पाना भी एक समस्‍या बनी हुई है। पहले-पहल कहा गया कि घडि़यालों की मौत जहरीले पानी से हुई है। पानी में सीसे की मात्रा होने की बात भी सामने आई। कुछ विशेषज्ञ लिवर या किडनी में खराबी आने को मौत का कारण बता रहे हैं। पर कुल मिलाकर स्थिति अभी भी स्‍पष्‍ट नहीं है। किसी जलीय परजीवी को भी मौत का कारण बताया जा रहा है। एक कारण यह भी हो सकता है। दुनियाभर के घडि़याल विशेषज्ञ और जीव वैज्ञानिक सेंचुरी का दौरा कर चुके हैं। फिलहाल कोई भी स्‍पष्‍ट रूप से कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं है। हाल ही में उत्‍तरप्रदेश से लगे इलाके से डॉल्फिन के मरने की भी सूचना आई थी।

कुल मिलाकर सेंचुरी की व‍र्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक है। जलीय जीवों की लगातार होती मौतों और कारणों पर पड़ी धुंध ने इन अत्‍यंत संकटग्रस्‍त जीवों के अस्तित्‍व के संकट को और गहरा दिया है। साथ ही चंबल क्षेत्र में सक्रिय अवैध रेत माफिया के द्वारा बेरोकटोक रेत खनन और भारी वाहनों की आवाजाही से संकटग्रस्‍त जीवों के प्राकृतिक आवास नष्‍ट होते जा रहे हैं। रेत माफिया खासकर मुरैना-धौलपुर के क्षेत्र में इतना शक्तिशाली है कि प्रशासन भी उसे रोक पाने में नाकाम है। कई बार बड़ी मात्रा में पुलिस और टास्‍क फोर्स को वहां पहुंचकर उल्‍टे पांव भागना पड़ा है या उनकी बुरी तरह पिटाई हुई है। ऐसी परिस्थितियों में संबंधित राज्‍य सरकारों और पर्यावरण एजेंसियों के साथ जैव संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्‍थाओं के स‍मन्वित प्रयासों की अपेक्षा है जिससे ये महत्‍वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर अपना अस्तित्‍व कायम रख सके।

फोटो साभार: बीबीसी और द हिन्‍दू

5 comments:

Gyandutt Pandey said...

बहुत ही सुन्दर लेख। भैया गांगेय डॉल्फिन कैसे देखने को मिल सकती हैं। बहुत बचपन में देखी थी घर के पास गंगा में। सोईंस बोलते थे हम। बचपन की याद है।

भुवनेश शर्मा said...

ज्ञानजी ये निश्चित रूप से तो नहीं पर कभी-कभार चंबल में पर्यटकों को नजर आ जाती है. चंबल के अलावा ये गंगा व ब्रह्मपुत्र में भी दिख जाती हैं. आजकल संख्‍या कम होने से किस्‍मत से ही नजर आती हैं.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

बहुत विस्तार से जानकारी दी इसके लिये धन्यवाद। यदि सम्भव हो तो उन विशेषज्ञो की बात विस्तार से बताये जो किडनी की बीमारी की बात करते है।

उन्मुक्त said...

यदि हम आज भी नहीं जागे तो कल बहुत देर हो जायगी।

Shastri said...

मेरे परिवार में सब प्र्यावरण के प्र्ति जागरूक हैं अत: इस खबर को पढ कर हम सब को बहुत दुख हुआ.