Friday, July 30, 2010

क्‍या आप अपनी मनपसंद फिल्‍में देख पाते हैं


आज दिन में टीवी पर 'वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' का रिव्‍यू आ रहा था शाम को सड़क पर टहलते समय पोस्‍टर भी दिखा...फिल्‍में अक्‍सर देखता नहीं हूं पर आसपास से, समाचारों से या एफ एम चैनलों पर आने वाली फिल्‍मों के गाने सुनकर इतना तो पता रहता ही है कि कौन-सी फिल्‍में रिलीज होने वाली हैं, क्‍या स्‍टार-कास्‍ट है, निर्देशन किसका है क्‍या थीम है...
खैर वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई का ट्रेलर जबसे देखा उसको देखने की इच्‍छा बनी हुई है...एक खास कारण ये भी कि उसमें प्राची देसाई अभिनय कर रही हैं जिनकी एक्टिंग के बारे में तो क्‍या कहें पर उनको पर्दे पर देखना बड़ा अच्‍छा लगता है बड़ी क्‍यूट हैं, फिल्‍म के गाने भी सुनने में और देखने में भी अच्‍छे लग रहे हैं.....पर एक तो शहर के फटीचर और टूटे-फूटे सिनेमाघर, ऊपर से आजकल साथ जाने वाला भी कोई नहीं.....दोस्‍त सब शहर से बाहर, बचे-खुचे व्‍यस्‍त....फिल्‍म देखने की किसी को फुर्सत नहीं....फिर भी साल-दो साल में शहर के किसी सिनेमाघर के दर्शन कर ही लेते हैं....
ऊपर से एक नया बवाल....जबसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍म देखी है तबसे शहर के सिनेमाघरों में जाने का मन बिलकुल भी नहीं होता....वैसे भी कौन-सा जाते ही थे....एक दिन गलती से चले गये...बहुत सी फिल्‍में देखने की इच्‍छा रहती है पर नहीं देखते...राजनीति छोड़नी नहीं थी सो एक छुट्टी वाले दिन चले गये....बड़ी मुश्किल से टिकट लेकर बालकनी में पहुंचे....एक भाईसाहब जो साथ आये थे उन्‍होंने कहा कि पिक्‍चर काफी निकल गई....बहुत देर तक बैठने की जगह ढूंढ़ते रहे....काफी समय बाद सोचा चलो नीचे हॉल में देखते हैं....वहां जगह मिल गई....कैटरीना कैफ को सोनिया गांधी समझकर फिल्‍म देखने आई ऑडियंस के हल्‍ले में सुनाई भी मुश्किल से दे रहा था..ऊपर से सिनेमाघर का साउंड सिस्‍टम और पिक्‍चर क्‍वालिटी भी बहुत धांसू थे...कुल मिलाकर पिक्‍चर तो खैर उतनी अच्‍छी लगी नहीं...पर उससे ज्‍यादा मलाल रहा बालकनी का टिकट लेकर हॉल में बैठकर पिक्‍चर देखने से...ऊपर से पिक्‍चर बहुत ध्‍यान लगाकर देखनी पड़ रही थी इतने घटिया साउंड सिस्‍टम और दर्शकों के हल्‍ले में....
बारहवीं में या कॉलेज में जब थे तब जरूर उन सिनेमाघरों की अहमियत हमारे लिए पीवीआर या एडलैब्‍स से कम नहीं थी...अब तो कोई पैसा देकर भी देखने को कहे तो सोचेंगे....
सीडी और डीवीडी भी फिल्‍म देखने का ठीक-ठाक जरिया है .... आज सुबह से सोच रहे हैं कि उड़ान की सीडी लेकर आयेंगे पर अब ब्‍लॉग लिखते समय याद आ रहा है कि सुबह ऐसा सोचा था....ठीक है एक आईडिया और है फिल्‍म देखने का, कुछ वेबसाइट ऑनलाइन फिल्‍म दिखाने की सुविधा भी देती हैं....गुलाल ऐसे ही देखी थी...तो सोचते हैं कि ऑनलाइन ही देखेंगे....पर ऑनलाइन भी साल या छह महीने में एकाध का औसत है...
आगे पीपली लाइव रिलीज होनी है....उसका भी इंतजार हो रहा है....
एक समस्‍या ये भी है कि फिल्‍म रिलीज के आसपास नहीं देख पाने से कुछ समय बाद देखने की इच्‍छा ही खतम हो लेती है....लगता है अब क्‍या देखें फिल्‍म में, देखने के लिए कुछ खास है ही नहीं....खास क्‍यों नहीं है इसका कारण भी सुन लीजिए...गाने सुन चुके, रिव्‍यू कई सारे पढ़ चुके, फिल्‍म की स्‍टोरी भी पता लग गई...अब कहीं फिल्‍म पिट गई या अपने टाइप की नहीं तो क्‍या देखना ऐसी फिल्‍म.....अपने टाइप की बोले तो जिन्‍हें लोग आजकल मल्‍टीप्‍लेक्‍स सिनेमा कहते हैं या छोटी स्‍टार-कास्‍ट और डिफरेंट सब्‍जेक्‍ट पे बनी फिल्‍में....मतलब शाहरुख, सलमान, रितिक टाइप बड़ी फिल्‍मों का तो अपन रिव्‍यू तक नहीं पढ़ते....क्‍यूंकि अपने लिए तो के.के.मेनन, विनय पाठक, राहुल बोस या कोंकणा सेन ही सब कुछ हैं....बाकी सो-काल्‍ड स्‍टार कहे जाने वालों की फिल्‍म में देखने लायक कुछ हुआ तो रिव्‍यू पढ़कर ही फारिग हो लेते हैं देखने की नौबत तो बहुत मुश्किल से आती है....
हालांकि फैमिली के साथ लिविंग रुम में हर टाइप की, गोविदा स्‍टायल हो या साउथ का नागार्जुन सबकी फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं...
पर हर बार नयी फिल्‍में रिलीज होती हैं...हम सोचते हैं कि अब देखेंगे या अबकी वीकेंड तो पक्‍का देखना ही है...पर हाय रे स्‍टार्स जिनकी बदकिस्‍मती से हम जैसे दर्शक उनको नसीब नहीं हो पाते... कारण शहर में कोई मल्‍टीस्‍क्रीन और सुविधायुक्‍त सिनेमाघर है नहीं, डीवीडी की दुकान तक जाने की जहमत हमने अरसे से उठाई नहीं और इंटरनेट भी हमारा इतना मरियल है कि बहुत जल्‍दी हांफने लगता है.....फिल्‍म रिलीज होकर पुरानी हो लेती है....फिर नयी फिल्‍में रिलीज होने का इंतजार करते हैं....फिर वो भी पुरानी हो जाती हैं....फिर इंतजार
लगता है आलसी प्रवृत्ति काम से लेकर मनोरंजन तक सबमें घुस गई है....चलूं अपने एक मित्र हैं उनसे कुछ टिप्‍स लूं....बेचारे बड़ी मेहनत करके बॉलीवुड की हर नयी रिलीज देखते हैं...काम भले रुक जाये पर फिल्‍म देखना नहीं छूटता...शायद उनसे कुछ सीखकर महीने में एकाध ही सही फिल्‍म देखने का लुत्‍फ तो मिले

6 comments:

बी एस पाबला said...

रोचक अभिव्यक्ति

सीखकर हमें भी नुस्खा बताईएगा :-)

neelesh mudgal said...

shreeman BHUvnesh mahoday, jaisa ki aapne likha..aalas k kaaran aap kaam bhee nahi kartey,or manoranjan bhee nahi karte(any type).KYA AAP JEEVIT HAIN?...lagta hai ab samay AA gaya hai.ki aap 'BUDDHAM SARNAM GAKCHAMI' kahte huey is MITHYA JAGAT ko tyag den......
baise blog k ant me jis mitra ka jikra kiya hai..uska naam to likh dete...bagair naam liye kisi ki taarif acchi nahi lagti....ummed hai agli post me aap khayaal rakhenge...par saayad aap agli post HIMALaYa se likhen(bairaagi hone k baad)...bolo BAIRAAGI BABA ki jai jai.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

फिल्म देखना एक आदत होता है। नयी फिल्म का पहला शो देखना। उस का रोमांच अलग ही होता है। हालांकि मेरी भी यह आदत छूट गई है। पर दोस्तों के साथ देखने में आनंद आता है। साथ साथ रिव्यु जो चलता रहता है।

राम त्यागी said...

वैसे मोरेना टाकीज का साउंड सिस्टम तो वर्ल्ड फैमस है :-)

Udan Tashtari said...

हम जरा कम ही टिक कर फिल्म देख पाते हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

पीपली लाइव की प्रतीक्षा हमें भी है।