Saturday, April 05, 2008

ग से ‘गाय’ नहीं सी फॉर ‘काऊ’

मेरे चिट्ठे पर प्रकाशित डा. निरंजन कुमार का आलेख पढ़कर हमें पता चला कि कैसे इस देश का नाम इंडिया पड़ा और अपने देश के लिए आजकल भारत या हिन्‍दुस्‍तान की बजाय लोग विदेशियों की तर्ज पर इंडिया शब्‍द का प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं।

पर ये इंडियंस वास्‍तव में चाहते क्‍या हैं ? इंडिया शब्‍द कहने से केवल इस बात का बोध नहीं होता कि फलां व्‍यक्ति अपने देश का नाम अंग्रेजी में ले रहा है बल्कि इसके बहुत गहरे निहितार्थ हैं और इसके पीछे की मंशा पर भी विचार किया जाना चाहिए।

सीधे शब्‍दों में कहा जाए तो यह तीन अक्षर का शब्‍द इंडिया हमारी हजारों वर्षों की पहचान को मिटाने की विदेशी साजिशों और हमारे देश में रहने वाले इंडियंस की नासमझी और विकृत मानसिकता का प्रतीक है।

मेरे पड़ौस में रहने वाले शर्माजी अपने दो वर्षीय नाती को घुमाने ले जाते हैं तो रास्‍ते में मिलने वाले जानवरों से उसका परिचय कराते हैं। परिचय कराते समय वे इस बात का विशेष ध्‍यान रखते हैं कि जिन भी जानवरों का नाम वे अपने नाती को बतायें वे अंग्रेजी में हों। गाय के लिए काउ, कुत्‍ते के लिए डॉग, सुअर के लिए पिग और चिडि़या के लिए बर्ड जैसे शब्‍द वे अपने छोटे से नाती को सिखाते हैं। एक दिन वे सिखा रहे थे- काउ इज अवर मदर। मुझे लगा कि अगले दिन वे यह न सिखाने लगें कि एलिजाबेथ इज अवर मदर।

खैर ये तो एक उदाहरण है। पर आप कहीं भी नजर दौड़ाईये आप ये अवश्‍य पाएंगे कि जो इंडियंस खुद अपनी पूरी उमर में अंग्रेजी नहीं सीख पाए वे बच्‍चे को अंग्रेजी में धुरंधर बनाने का अजीब सा हठ रखते हैं। हर कोई इस बात पर तुल गया है कि कैसे भी करके अपने बच्‍चे को अंग्रेजी ही सिखाई जाए और ऐसे में भले बच्‍चा अपनी भाषा हिंदी सीखने से वंचित रह जाए। हिंदी सीखने को एक गैरजरूरी और समय बर्बाद करने वाला काम समझा जाने लगा है। मेरे एक परिचित डॉक्‍टर के पास एक सज्‍जन अपने बेटे को दिखाने लाए। डॉक्‍टर ने कहा- बेटे जीभ दिखाओ। बच्‍चे ने नहीं दिखाई। फिर उसके पिता ने कहा- बेटे टंग दिखाओ और बेटे ने जीभ दिखा दी।

अपनी उमर भर गाय को गैया कहने वाले और पक्षियों को परेबा कहने वाले जब छोटे बच्‍चों के सामने बनावटी ढंग से अंग्रेजी में काउ और बर्ड हांकने लगते हैं तो दिल को बहुत कोफ्त होती है। अंग्रेजी को एक विषय के रूप में सिखाये जाने की बजाय हम बच्‍चों को पूरा ही अंग्रेज बनाने पर तुल गये हैं। इस तरह के ब्रेनवॉश से जो पीढ़ी सामने आयेगी वो बाद में अपने बुजुर्ग मां-बाप से यही पूछेगी कि- व्‍हाट इज दिस फ्रीडम फाइटर एंड व्‍हाई डिड दे फाईट फार इंडिया। तो फिर वे क्‍या जवाब देंगे ? क्‍या ऐसे लोग जो खुद अपनी पहचान मिटाने पर तुले हैं अपने बच्‍चों को समझायेंगें कि हमारे स्‍वतंत्रता-सेनानी अपनी पहचान, अपने भारत के लिए अंग्रेजों से लड़े। ये कैसे अपने बच्‍चों को ये समझा पाएंगे कि वे किस भारत देश के लिए लड़े जबकि ये लोग अब उसी भारत के खिलाफ, उसकी पहचान के खिलाफ हैं। भाषा केवल शब्‍दों के माध्‍यम से अपनी बात कहना भर नहीं है। उससे हमारी पहचान, हमारा इतिहास, हमारा सम्‍मान बहुत कुछ जुड़ा होता है।

अभिभावकों द्वारा ऐसी मानसिकता को अपना लिये जाने के भी कुछ कारण हैं। हर किसी के अंदर एक बहुत बड़ा डर बैठा हुआ है कि हमारा बच्‍चा किसी से कमतर न हो और इस कमतरी का मतलब हिंदी में बात करना, अंकल को चाचा कहना और टेंपल को मंदिर कहना समझ लिया गया है। लोगों को लगता है यदि बच्‍चे को जिंदगी की रेस में दौड़ाना है तो उन्‍हें घोड़े को घोड़े की बजाय हॉर्स कहना सिखाना होगा। हर कोई अपनी पहचान को मिटाने और अंग्रेज बन जाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। भारतीयता को मूर्खता, पिछड़ेपन और गँवारपन का पर्याय मान लिया गया है। लोग खुद के भारतीय होने पर शर्म महसूस करते हैं। हम खुद के भारतीय होने के खिलाफ लड़ रहे हैं। अपनी पहचान के खिलाफ लड़ रहे हैं। हम उस पहचान के‍ खिलाफ लड़ रहे हैं जिससे हमारा अस्तित्‍व है और अपने ही अस्तित्‍व के खिलाफ इस लड़ाई में हम खुद को ही हार जाने वाले हैं।

13 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सटीक मुद्दे पे सटीक विचार!!

Suresh Chiplunkar said...

इन अंग्रेजीदां लोगों के सिर से भूत उतारने के लिये ही तो हिन्दी ब्लॉग जगत को आगे बढ़ाना है… ऐसे लोगों की जमकर और खुलकर आलोचना करो…

सागर नाहर said...

आपकी बात से सहमत हूं पर मैं यहां जोड़ना चाहूंगा कि , मात्र अंग्रेजी नहीं जानने की वजह से मैने जो भोगा है, जो नुकसान मेरा हुआ है, कम से कम अपने बच्चों का नहीं होने दूंगा।
हिन्दी तो वैसे भी हम घर में बोलते लिखते पढ़ते हैं सो हिन्दी तो कैसे भी सीखेंगे ( अगर नहीं सीख पाये तो हम सिखायेंगे) परन्तु उन्हें अंग्रेजी में कमजोर या अंग्रेजी ना जानने वाला बना कर कम से कम उनकी जिंदगी तो बर्बाद नहीं होने दूंगा, जैसी मेरी हुई है।
उन्हें पहले हिन्दी और उसके बाद अंग्रेजी में पारंगत होना ही होगा, हमें करना ही होगा।

सागर नाहर said...

मैने अक्सर यह देखा है कि हिन्दी की चिन्ता उन्हें ज्यादा है जो खुद अंग्रेजी में माहिर है, या खुद अंग्रेजी माध्यम से पढ़े लिखे हैं।
:) ( स्माईली)

राज भाटिय़ा said...

भुवनेश शर्मा जी,आप की बात बिल्कुल ठीक हे,भाषा सीखना गलत नही,आप जितनी भाषा सीखे उतना ही अच्छा हे,लेकिन किसी विदेशी भा्षा को बोल कर अपने आप कॊ ओर से उच्च दिखना, या उस भाषा को अप्नी भाषा से ऊचा समझना,महा बेब्कुफ़ी हे,सागर नाहर जी आप की बात कुछ उचित हे, लेकिन जब हम सभी यही सोचे गे तो हिन्दी एक दिन खत्म हो जाये गी,अग्रेजी सिर्फ़ भारत पकिस्तान ओर कुछ अफ़्रिकन देशॊ मे बोली जाती हे, क्यो की यह सब गुलाम रह चुके हे,पुरे युरोप मे (ब्रिटेन ) को छोड कर कही भी नही बोली जाती, तो कया यह सब अनपड हे??

Udan Tashtari said...

सही है!!

मीत said...

हिन्दी और अंग्रेज़ी mutually exclusive हैं क्या ??

Technoventors said...

yaar main kshama chahta hoon.... par shayad main isbaar aapke lekh se sahamat nahin ho sakta hoon..... kyunki bharat desh ko agar aap kewal hindi-bhashi mante ho toh, toh ye shayad nadanagi hogi... aur sirf hindi bolna hi abhiman hai toh ye mudda aur bhi gambhir ho sakta hai aur ek aur bantware ko janma de sakti hai... jo shayad bharat pakistan bangladesh aur myanmar jaisi zakhmo se bhi jyaada dardnaak ho.... shayad aap samajh sakte ho kyun !!! kyunki, bharat main 100 se jyaada boliyan hain..... samvidhan main hi 22 bhashaein sveekrut ki ja chuki hain. aur shaya aap jante hi hoge ki abhi haal hi main Maharashtra main kya hua hai, mera sochna ye hai ki bharat ek sabhyata hai ek sanskruti hai jo ki in chhoti chhoti baatoh se nasht nahin ho sakti hai..... aur agar ye sanskruti agar itni hi kamjor hai toh phit iska nasht ho zaana shayad behtar hoga... kam se kam log bhasha jaise mudde par ek doosre ke khoon ke pyaase toh nahin honge... shayad maine kisi ki bhawanaon ko kshati pahunchayi ho to main iske liye phir ek baar kshama chahta hoon.... main ek sachha bharteey hoon aur bhasa se jyaada sanskruti ko mahatva deta hoon... "Bharteey Sanskruti" or may be "Indian Culture"

Zololkis said...

See Please Here

neeraj badhwar said...

भुवनेश मेरा मानना है कोई भी भाषा जब तक पेट से नहीं जुड़ती उसकी तरक्की हो ही नहीं सकती। आज जब ज़्यादातर जगहों पर अंग्रेजी ही रोज़गार दिलाती है तो क्यों न आदमी अंग्रेजी सीखे।

अब इस भाषा को रोज़गार से किसने जोड़ा, क्यों जोड़ा ये सोचने का उसे भूखे और बेरोज़गार आदमी के पास वक़्त नहीं है। वो तो बस यही जानता है अंग्रेज़ी सीख ली तो नौकरी लग जाएगी। और ये किसने कहा हिंदी को इस बदलते दौर में ख़तरा है आज मीडिया से लेकर ऐसी तमाम जगहों में हिंदी वालों के लिए ज़्यादा मौकें हैं जितने आज से दस साल पहले हुआ करते थे।

pallavi trivedi said...

राज जी की बातों से समत हूँ! भाषा अंग्रेजी भी बुरी नहीं है बल्कि आज के दौर में जानना ज़रूरी भी है किन्तु वो लोग पिछड़ी मानसिकता के हैं जो हिंदी को पिछडेपन का पर्याय मानते हैं!हमें अपनी भाषा बोलने पर गर्व होना चाहिए!

pandit visnugupta said...

baise to main logo ko jagane main viswas nahi rakhata kyoki is desh hindu ab jaroorat se jyada kayar ho gaye hai......par mera hindu prem mujhe mujhe mazboor kar deta hai.............
in angreji samrthako ko shayad france ki taraf dekhana chahie.....ki bina angreji ke kaise unhone angrejo ki gand maar rakhi hai.......or ek hum angreji sikh kar bhi tarraki nahi kar rahe......kayar hindu samaz ....aaj it ka har software japani chini french or italiaon main banata hai par hindi main nahi ......bajah hamane angrejo ki tatti ko hi sab kuch maan lia hai ......maera manana hai ki agar bharat keval hindi upyog kare to sara vishv is 1 arab logo ki aabadi wale bazar ke lie hindi kya devvani sanskrit bhi bolega.....
jai hindu
jai hindu sthan

सुशील कुमार छौक्कर said...

सच कहा आपने। लोगो की मानसिकता ऐसी ही होती जा रही है। मैंने आपको बताया ना एक वाक्या। खैर एक अहम मुद्दे को उठाती एक अच्छी पोस्ट।