Friday, April 04, 2008

चीन के आगे गिड़गिड़ाने के मायने

अब तो रोजमर्रा की बात हो चली है कि हमारे माननीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी चीन को आश्‍वासन देते रहते हैं कि हमारी धरती से आपके खिलाफ हम कोई गतिविधि नहीं होने देंगे। उधर चीन कभी आंखें दिखाता है तो कभी पीठ थपथपाता है।

फिर से प्रणब मुखर्जी ने चीन के आगे घुटने टेकने वाले रुख के साथ वही बात दोहराई कि भारत तिब्‍बत को चीन का हिस्‍सा मानता है और भारत में ओलंपिक मशाल को पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी। साथ ही दलाईलामा को फिर से समझाया गया है कि वे भारत में बस मेहमान बनकर रहें और चीन के खिलाफ कोई हरकत न करें। हालांकि वैसे भी वे कुछ करने के मूड में नहीं लगते।

विदेश नीति के हिसाब से देखा जाए तो भारत और चीन के रिश्‍तों में लंबे समय की कटुता के बाद अब संबंध सामान्‍य हो चले हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि द्विपक्षीय संबंधों के इस मधुर दौर में भारत को चीन के खिलाफ कुछ भी कहने से बचना चाहिए। पर मेरा मानना है कि भारत भले ऐसा सोचता हो चीन कभी भारत के साथ संबंध मधुर रखने का पक्षधर नहीं रहा है। वह केवल दबाव की विदेश नीति भारत जैसे देशों पर लागू करता रहा है और संभवत: आगे भी करता रहेगा। दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध भी इस कारण सामान्‍य हैं कि भारत के साथ उसका कारोबार 60 अरब डॉलर के आंकड़े पर दस्‍तक दे रहा है और आर्थिक संबंधों को बनाये रखने तथा भारत में अपना माल खपाने के लिए वह अच्‍छे संबंधों की बात कर रहा है। यदि भारत-चीन कारोबार ऐसी ऊंचाईयां नहीं छू रहा होता तब भी क्‍या वह भारत के साथ ऐसे ही संबंधों का पक्षधर होता इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है। संबंधों की इस कथित मधुरता के दौर में भी वह भारत के प्रधानमंत्री के अपने ही एक सीमांत प्रदेश में दौरे पर आ‍पत्ति उठाता है और प्रणब मुखर्जी जैसे लोगों को उसका बचाव करना पड़ता है।

कूटनीतिक नजरिए से देखा जाए तो भारत ने तिब्‍बत मसले पर प्रारंभ में समझदारी का परिचय दिया और तिब्‍बत को चीन का घरेलू मामला मानकर उससे दूरी बनाये रखी। यहां तक कि पूरा विश्‍व समुदाय इस बात पर चीन को गरियाता रहा पर भारत यही दोहराता रहा कि तिब्‍बत चीन का अभिन्‍न अंग है और वह अपनी जमीन से चीन विरोधी कोई गतिविधि नहीं होने देगा। वैसे भी भारत को चीन से सुधरते संबंधों की कीमत पर तिब्‍बत मसले में कोई टांग नहीं अड़ानी चाहिए। खासकर तब जब तिब्‍बती धर्मगुरू और उनकी निर्वासित सरकार भारतीय क्षेत्र में रहती है। क्‍योंकि इससे सीधा-सीधा संदेश जाता कि भारत अपनी जमीन से चीन विरोधी त्‍त्‍वों को समर्थन दे रहा है।

पर शुरू से ही चीन को भारत के द्वारा अपना रुख स्‍पष्‍ट कर दिये जाने के बावजूद वह भारत पर दबाव बना रहा है या कहें कि भारत की कमजोर विदेश नीति का वह पूरा फायदा उठाना चाहता है। जब भारत की धरती पर आकर अमेरिका की नेता नैंसी पेलोसी चीन को खरी-खोटी सुनाती हैं तब भी भारत खुद को इससे दूर रखता है। फिर भी हमारे नेताओं को बार-बार सफाई देने की जरूरत क्‍यों पड़ती है। उल्‍टा भारत कम से कम इस मामले में चीन को यह तो कह ही स‍कता था कि उसे अंतर्राष्‍ट़ीय समुदाय की भावनाओं का ख्‍याल रखना चाहिए था या तिब्‍बत मसले का वह शांतिपूर्वक समाधान खोजे। पर हमारे नेताओं को चीन से अपनी पीठ थपथपाये जाने का चस्‍का लग गया है और शुरू से ही स्‍पष्‍ट रुख रखने के बावजूद चीन की मनमर्जी के हिसाब से बयान दे रहे हैं। इससे अप्रत्‍यक्ष रूप से अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के चीन पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की साजिश की बू आती है और संदेश जाता है कि भारत इस मामले में चीन के साथ है। कहने की जरूरत नहीं कि इसमें बहुत बड़ा हाथ भारत के देशद्रोही वामदलों का है जो हमेशा फिलिस्‍तीन, कश्‍मीर या ईरान मसले पर चिल्‍ला-चिल्‍लाकर आसमान एक कर देते हैं। पर तिब्‍बत मसले पर मुंह पर पट्टी बांध लेते हैं क्‍योंकि इससे उनका चहेते चीन के हित जुड़े हैं जिसे वो अपना माई-बाप मानते हैं। पर भारत सरकार को यह तो सोचना चाहिए कि वह गद्दारों के दबाव में अपनी विदेश नीति चलाए या भारतीय हितों के मद्देनजर।

कुल मिलाकर शुरूआत में सही नीति अपनाने के बावजूद हमारे नेता अब पूरी तरह से चीन के दबाव मे दिख रहे हैं और बेवजह भारत की छवि को खराब करने के लिए चीन की जी-हुजूरी करने में जुट गये हैं।

6 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

भुवनेश जी, बार-बार तिब्बत मसले का लोग उल्लेख करते हैं। मगर इस पर खुल कर कोई बात नहीं कर रहा है। आखिर कोई समझाएगा यह तिब्बत मसला है क्या? इस पर संपूर्ण दृष्टि से कोई प्रकाश डालेगा?

अभिषेक ओझा said...

भुवनेशजी आपके लेख से मैं सहमत हूँ पर जो 'होना चाहिए' और जो होता है उसमें हमेशा ही फर्क होता रहा है... यथार्थ में सोचे तो हर जगह बाहुबली की ही चलती है. और यहाँ भी यही हो रहा है.

Suresh Chiplunkar said...

चीन से दबने का एक और पुख्ता कारण है, 1962 के युद्ध की गुलाम मानसिकता और बगैर जिम्मेदारी के सत्ता का सुख भोग रहे वामपंथी।
@ द्विवेदी जी…
तिब्बत मसला यदि आसान भाषा में समझायें तो "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाला मामला है, चीन कहता है तिब्बत उसका है, जिसे जो उखाड़ना हो उखाड़ ले… तकलीफ़ का असली कारण विभाजन के समय अंग्रेजों द्वारा स्पष्ट सीमा न बनने देना है… रही विश्व जनमत की बात… तो न अमेरिका न चीन कोई उसे नहीं मानता, सिर्फ़ "गाँधीवादी"(?) भारत ही सबसे डरता है…

Gyandutt Pandey said...

अच्छा लगा आपका लिखना और प्रतिक्रियायें।

जयेश said...

वामदल वाले आस्तीन के साप है। ये तो इस्लामी आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हैं।

pandit visnugupta said...

jin logo main apani jati ka gorav nahi hota bahi kayar or gandhi (mithyabad)hote hai......or humare logo ko angrejo, islam, comyunisto or gandhibad ki bhista (tatti)khane ki aadat hai.......