Sunday, June 07, 2009

सभी हिंदी ब्‍लॉगर्स से पर्यावरण के हित में एक अनुरोध


परसों विश्‍व पर्यावरण दिवस था, इस प्रकार के औप‍चारिक दिवस चूंकि दिखावा बन कर रह गये हैं सो लोगों ने इस ओर ध्‍यान देना ही बंद कर दिया है हालांकि पहले भी इनको कितनी तवज्‍जो दी जाती थी यह सभी जानते ही हैं...बस चंद बड़े अखबारों में सरकारी विज्ञापन और संपादकीय लिखने भर की रस्‍म-अदायगी करके दिवस मना लिया जाता है पर फिलहाल अपन इस तरह की बातों का रोना-धोना मचाकर खुद को बुद्धिजीवी साबित नहीं करना चाहते सो कुछ ठोस बात करते हैं।

काफी दिनों से सोच रहा था कि ऐसे कौन से उपाय हैं जो हम अपने पर्यावरण को बचाने और इस धरती को लाखों-सालों तक जीवित बनाये रखने के लिए अपना सकते हैं। वैसे जहां बिगड़ते पर्यावरण के बावजूद लोगों को गैरजिम्‍मेदाना हरकतें करते देखता हूं तो खून खौल उठता है परंतु फिर भी हमारे आसपास अक्‍सर ऐसे सज्‍जन लोग मिल ही जाते हैं जो अपने पर्यावरण के लिए वाकई ईमानदारीपूर्ण प्रयास कर रहे हैं पर मुझे लगता है कि ऐसे एकल प्रयासों के साथ-साथ सामूहिक प्रयासों की भी आवश्‍यकता है और मेरा मानना है कि हमारा हिंदी ब्‍लॉगर्स का जो इतना बड़ा समुदाय है वह साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ संकल्‍प ले और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करे तो लाखों-करोंड़ों नहीं तो कुछ हजार लोगों का ये कदम बहुत छोटा ही सही कुछ तो परिवर्तन ला ही सकता है। वैसे काबिले-गौर बात ये भी है कि ज्‍यादातर हिंदी ब्‍लॉगर इस बारे में काफी सजग हैं और अपने स्‍तर पर प्रयास करते भी रहते हैं। काफी समय पहले परिचर्चा नामक फोरम पर(जो कि आजकल बंद पड़ा हुआ है) बहुत से ब्‍लॉगर्स ने अपने प्रयासों और आइडियाज को शेयर किया था वे वाकई काबिले-तारीफ थे जैसे संजय बेंगाणीजी महानगर में रहते हुए भी अपने अधिकर कामों के लिए सायकल का प्रयोग करते हैं, बहुत से लोग पॉलीथीन की जगह कपड़े के थैले प्रयोग कर रहे हैं, पानी का भी बहुत किफायत से इस्‍तेमाल करने वाले लोग हैं।
मेरा मानना है कि हम सभी लोग जो भी प्रयास कर रहे है उन्‍हें एक-दूसरे से साझा करें, कुछ तुम चलो कुछ हम चलें की तर्ज पर और जो भी इसके लिए नया किया जा सकता है करें, नये नये उपाय एक-दूसरे को सुझायें-अपनायें। साथ ही अपने परिवार और आसपास में भी यथासंभव जो किया जा सकता है उसकी शुरुआत करें ।

फिलहाल तो मेरी सभी ब्‍लॉगर बंधुओं से अपील है कि वे अपने-अपने चिट्ठे पर खुद के द्वारा पर्यावरण के लिए किये जा रहे प्रयासों से दूसरों को अवगत करायें हालांकि कुछ लोगों को ये खुद मियां मिट्ठू बनना लग सकता है फिर भी प्‍लीज ऐसा करें क्‍योंकि जब हम अपने आइडियाज दूसरों से शेयर करेंगे तो ही तो हम दूसरों को कुछ बता पायेंगे और उनसे कुछ नया सीख पायेंगे।

फिलहाल तो मैं खुद के कुछ प्रयासों के बारे में यहां लिख रहा हूं आप सब से भी अपील है कि अपने-अपने चिट्ठे पर ऐसे ही प्रयासों के बारे में लिखें जिससे दूसरे भी पढ़कर उन्‍हें अपना सकें।-

1- सबसे पहले बात बिजली की, अपने घर में जिन बिजली के उपकरणों जैसे पंखा, टीवी, ट्यूबलाइट आदि का प्रयोग नहीं हो रहा है उनको बंद करना

2- बल्‍ब की जगह सीएफएल प्रयोग करना

3- पॉलीथीन का प्रयोग यथासंभव कम करना और जहां उसके बिना काम चल सकता हो वहां उसका प्रयोग ना करना।

4- जितना संभव हो पैदल चलना, सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग करना। पैदल चलना इसलिए भी मुफीद है कि मेरा शहर छोटा है।

5- एक तरफ से प्रिंट किये हुए फालतू कागजों, पैम्‍पलेट आदि को कचरे में नहीं फेंकना बल्कि उनकी दूसरी तरफ लिखने के लिए प्रयोग में लेना।

6- पानी का जितना कम प्रयोग हो सके करना और फालतू पानी को पौधों-गमलों में डालना।

7- कॉस्‍मेटिक्‍स का प्रयोग बिलकुल नहीं करना क्‍योंक‍ि ऐसी अनुपयोगी चीजें केवल कचरे को बढ़ावा देती हैं जो बायोडिग्रेडेबल नहीं हैं साथ ही उनमें क्‍लोरो-फ्लोरो कार्बन होते हैं जो विशेष रूप से खतरनाक हैं।


हालांकि सूची बहुत छोटी है पर हौसले बुलंद हैं....इंशाल्‍लाह ये सूची आपके मार्गदर्शन से बढ़े और हमारे सामूहिक प्रयासों को नेट पर ही सही दुनिया देखे।
फिलहाल तो अपन यहीं से शुरूआत करते हैं....बाकी धीरे-धीरे जब कारवां चल पड़ेगा तो और भी मुसाफिर आ जाएंगे काफिले में... साथ ही आप सबसे एक छोटी सी गुजारिश और है कि अपने आस-पास और कहीं भी पर्यावरण के लिए काम कर रहे लोगों के छोटे-छोटे प्रयासों को भी अपने चिट्ठे पर प्रकाशित कर दूसरों को भी उनके बारे में बताएं..वस्‍तुत: यही लोग जो छोटे-छोटे प्रयास कर रहे हैं हमारे हीरो हैं और हमें इनके प्रयासों से खुद भी प्रेरणा लेकर दूसरों को भी उनके बारे में बताना चाहिए क्‍योंकि आलोचनाएं और दूसरों पर दोषारोपण तो बहुत हो चुका अब समय है खुद कुछ कर दिखाने का और सकारात्‍मक सोचने का.....वो गायत्री परिवारवाले कहते हैं ना कि हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।

15 comments:

Suresh Chiplunkar said...

बहुत ही उम्दा विचार हैं, यह एकल प्रयास से होने वाली बात नहीं है, इसके लिये सामूहिक प्रयास करने होंगे… दुनिया का सबसे बुद्धिमान लेकिन स्वार्थी प्राणी "मनुष्य" जब तक नहीं सुधरेगा, धरती तेजी से विनाश की ओर बढ़ती रहेगी…

पूर्णिमा वर्मन said...

आपका अनुरोध सिर आँखों पर। हम सब मिलकर पर्यावरण की रक्षा के लिए सहयोग और सार्थक प्रयास करें, यही कामना है।

सागर नाहर said...

जितनी कोशिश होती है, करते ही हैं, फिर भी आपने कहा है तो पोस्ट लिख कर बतायेंगे की क्या क्या करते हैं।
धन्यवाद एक बढ़िया विषय पर लिखने के लिये।

मुनीश ( munish ) said...

i am with you in this holy mission.

naturica said...

aapki salaah bade kaam ki hai.amal karne karwane ki koshish rahegi
.....aur han paryawaran ke hit men aap ki tarah apne blog par ped bhi lagaunnga...

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सटीक उम्दा विचार. धन्यवाद.

सुशील कुमार छौक्कर said...

मै जल्द पोस्ट डालूँगा। वादा। बहुत ही जागरुक करती पोस्ट।

Dr Prabhat Tandon said...

बिल्कुल सही विचार !! लेकिन इच्छा शक्ति होनी चाहिये करने के लिये । पालीथीन इसक सबसे बडा उदाहरण है , सब जानते हैं कि वह कितनी हानिकारक है लेकिन फ़िर भी दैनिक कार्य जैसेसब्जी लने मे उसका इस्तेमाल धडल्ले से होता है ।

AlbelaKhatri.com said...

prabhavit kiya bhai.............
hum aapke saath saath hain

अविनाश वाचस्पति said...

सिर्फ ब्‍लॉगर्स से ही क्‍यों ...

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बहुत संयत और सही बात। समझ नहीं आता कि इस मुद्दे पर इतना आलस्य क्यों है। शायद इस लिये कि इसे अभी धर्म या सेलिब्रिटी बैकिंग नहीं मिली है। भारत में इन्ही दो का अनुसरण करते हैं लोग! :)
ब्लॉग पर अधिकाधिक पोस्ट किया जाना चाहिये ऐसे मुद्दों को।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप वापस आए,
साथ बहार लाए।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा विचार हैं. इस चिन्तन हेतु साधुवाद!!

राम त्यागी said...

भाई, कल हमने subway से lunch pick करते समय पन्नी लेने से मना कर दिया था. आपके अभियान को जरूर आगे ले जायेंगे

बी एस पाबला said...

मैं तो अक्सर ही पॉलीथीन का कैरी बैग लेने से मना कर देता हूँ। कम्प्यूटर टेबल पर एक तरफ छपे, लिखे विभिन्न लिफाफों, पम्पलेट्स, पन्नों आदि को एक स्लिप के रूप मे फाड़ कर आकस्मिक उपयोग में लाने की आदत तो पूरे घर को पड़ गयी है। अपने वाहन में जूट के दो छोटे बड़े थैले हमेशा रखता हूँ।

कोई करे ना करे, मुझे जो आत्मसंतुष्टि मिलती है, उसका जवाब नहीं।