Wednesday, October 11, 2006

भारत में बाबागिरी का उद्योग

पिछली सर्दियों की बात है मैं अपने शहर से गुजरने वाले हाइवे पर खड़ा अपनी खटारा मारूति ८०० की मरम्मत करा रहा था कि तभी कुछ लग्जरी गाड़ियां ग्वालियर की ओर जाती दिखीं। मैंने सोचा किसी वी॰आई॰पी॰ का काफिला है। परंतु जब काफी देर तक गाड़ियों का रेला खत्म नहीं हुआ तो मैंने मैकेनिक से पूछा- "क्यों भाई आज कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आने वाले थे क्या?"

वो बोला- "क्या बात कर रहे हो भाईसाब बाबा जयगुरूदेव को नहीं जानते। आज ग्वालियर में उनका प्रवचन का प्रोग्राम है वहीं जा रहे हैं।"
मैने उत्सुकतावश पूछा- "पर इतनी सारी गाड़ियां?"
उसने कहा- "भाईसाब बाबा जब भी कहीं जाते हैं उनके साथ सौ-पचास गाड़ियां तो हमेशा चलती हैं।"
मैने मन ही मन खुद को अपना सामान्य ज्ञान कमजोर होने के लिए कोसा और कौतूहलवश बाबा के बारे में मैकेनिक से थोड़ी और बातें कीं, उसने बताया बाबा का यू॰पी॰ में कहीं आश्रम है। मैं घर की ओर रूख्सत हुआ।

मेरे कुछ मित्र अक्सर मथुरा जिले में स्थित गिर्राजजी की परिक्रमा के लिए जाते हैं। एक बार वे मुझे भी खींच ले गए। मथुरा से गिर्राजजी जाते समय एक जगह बड़ी सी महलनुमा इमारत नजर आई, जो ताजमहल की तरह शायद पूरी ही संगमरमर से बनी थी। ताजमहल के संगमरमर की चमक जहां फीकी पड़ चुकी है वहीं ये इमारत रात में ट्यूबलाइट्स और बल्बों की रोशनी में बड़ी सुंदर लग रही थी।मैने अपने मित्र से, जो अक्सर गिर्राजजी जाता रहता है, पूछा- "क्यों यार ये क्या है, कोई टूरिस्ट प्लेस?"

"अरे यार तुमको नईं पता ये बाबा जयगुरूदेव का आश्रम है, बड़ा पईसे वाला बाबा है, अनगिनत चेले हैं, करोड़पतियों-अरबपतियों का चढ़ावा आता है। क्या ठाठ हैं................." -उसने जवाब दिया।
थोड़ी देर बार फिर बोल पड़ा- "यार मैं भी ऐसा बाबा होता तो पाखाने भी मर्सिडीज से जाता। क्या लाइफ होती है ना इन बाबाओं की..............."

खैर ये तो था एक बाबा का किस्सा। हमारे भारतवर्ष में तो न जाने ऐसे कितने ऐसे बाबा भरे पड़े हैं और रोज पैदा भी हो रहे हैं। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ व उद्योगपति तो इनके चरणों में जूते-चप्पलों की तरह पड़े रहते हैं और अंधश्रद्धा की मारी भोली-भाली जनता के तो कहने ही क्या। आजकल के बाबाओं पर धनबल-बाहुबल की कोई कमी नहीं। वैसे ये बात सर्वविदित है फिर भी बता दूँ कि ये बाबाटाइप लोग राजनीतिज्ञ और उद्योगपतियों के बीच एक कड़ी (दलाली) का काम करते हैं।

हमारे इलाके में कुछ साल पहले एक बाबा का बड़ा प्रताप फैला। सुना बाबा बड़े चमत्कारी हैं और सीधे हनुमानजी से बातें करते हैं मानो हनुमानजी का मोबाइल नंबर केवल इन्हीं के पास हो। उन्होने लोगों को कुछ चमत्कार भी दिखाए, जैसे किसी नयी कंपनी का लांचिंग प्रोग्राम हो। कुछ लोग कहते हैं कि लोगों को बाबा एक साथ कई जगह दिखे। कुछ कहते हैं बाबा के यहां भंडारे में करोड़ों लोग आए फिर भी भोजन खत्म नहीं हुआ। खैर इस घटना के बाद तो क्या मंत्री क्या मुख्यमंत्री सब इनके चरणों में लोटपोट नजर आए और देखते ही देखते आश्रम की नयी बिल्डिंग तैयार। बाबाजी आबादी से दूर इलाके में रहते हैं। आश्रम के आसपास किसानों के खेत हैं जिन्हे बिजली के दर्शन तक मयस्सर नहीं, वहीं बाबाजी के आश्रम में २४ घंटे बिजली, ए॰सी॰, जनरेटर्स व तमाम तरह की सुविधायें उपल्बध हैं। २०-२५ लग्जरी गाड़ियां तो इनके आश्रम परिसर में हमेशा मौजूद रहती हैं। अभी २ साल पहले ही बाबाजी ने अपने नाम से निजी इंजीनियरिंग कॉलेज खोला है और सुना है जल्द ही दूसरा भी खुलने वाला है। बाबाजी की एक और विशेषता है कि इन्होने अपने नाम में उपनाम की जगह 'सरकार' जोड़ रखा है। ये 'बाबा' संबोधन को कतई पसंद नहीं करते। यदि आपको लग रहा है कि बाबाजी ने रामगोपाल वर्मा की 'सरकार' देखकर ऐसा किया है तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सरकार रिलीज होने के कई सालों पहले ही इन्होने स्वयं को 'सरकार' की उपाधि से नवाज लिया था। वैसे सरकार उपनाम सही भी है क्योंकि सरकार किसी भी पार्टी की हो हर मुख्यमंत्री नियमित रूप से इनकी चरण-वंदना करने आता है इसलिए इन्हे सरकार कहलाये जाने का पूरा हक है।

कुछ साल पहले एक कम उम्र बाबा भागवत कथा हेतु हमारे शहर में पधारे। भागवत का कार्यक्रम शायद १२ या १५ दिनों का रहा होगा। बाबा एक बड़े उद्योगपति के घर ठहरे। बाबा ए॰सी॰ में सोते और स्वीमिंग पूल में नहाते और प्रवचन पर जाने से पहले यदि उन्हे मनपसंद छप्पन भोग ना मिलें तो नाराज हो जाते। बाबा चूँकि युवा थे इसलिए स्त्रियों में वे विशेष लोकप्रय हो गए। बाबाजी भी उन्हे सम्मोहित करने की जुगत भिड़ाते रहते। उनके भागवत कथा कार्यक्रम में कथा कम व स्त्रियों के नृत्य (भजन आदि पर) ज्यादा होते। सुना है जब बाबा गए तो वे दक्षिणा के रूप में दस-पंद्रह लाख नकद व कई ट्रक माल-असबाब ले गए। बाद में उनके बारे में सुना गया कि वे एक बड़े शहर के पाँचसितारा होटल के स्वीमिंग पूल में महिलाओं के साथ जलक्रीड़ा करते देखे गए।

गुजरात के एक बाबा जिनका काफी समय से पूरे देश में जलजला है, अपने ब्रांडनेम को भुनाने पर तुले हुए हैं। इनका स्टेशनरी,कैसेट-सीडीज, डीवीडीज, पूजा-पाठ की सामग्री, गौमूत्र इत्यादि का काफी बड़ा कारोबार है। अखबारों व पत्रिकाओं का भी काफी बड़ा मार्केट है। कंपनी का मुख्य कार्यालय अहमदाबाद में है।

मेरा विचार है कि सरकार को बाबागिरी को भी उद्योग का दर्जा दे देना चाहिए, क्योंकि ये काफी संभावनाओं वाला क्षेत्र है और बाबागिरी कंपनियों के बीच एक प्रतियोगी माहौल तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए जिससे देश का G.D.P. बढ़ेगा और सरकार को भी राजस्व की प्रप्ति होगी। यदि ऐसा होता है तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय बाबागिरी कंपनियाँ इन्फोसिस, टाटा और रिलायन्स जैसी कंपनियों को पीछे छोड़कर विश्व बाजार में भारतीय अर्थव्यवस्था का परचम लहरायेंगी।

8 comments:

संजय बेंगाणी said...

यह खुशी की बात हैं की आपने इस विषय पर प्रकाश डालने की कोशीष की हैं भले ही बाबाओं का नाम लिखने से बचे रहे.
ये बाबा लोग संत नहीं कुटील-ठग-दलाल हैं जो धर्म का बाना पहन बचे हुए हैं. जैस गीदड शेर की खाल पहन लेता हैं और उसके नाम पर राज करता हैं. इनका यह धंधा मात्र इसलिए चल रहा हैं क्योंकि इस ठगी में राजनेता भी शामिल हैं.

गिरिराज जोशी said...

खुशी हुई यह देखकर कि अपनी बात बेबाक कहने का जज्बा अभी भी कायम है।
बाबाओं और राजनेताओं के रिश्तों पर जो सधा हुआ प्रहार आपने किया है उससे मुझे आपमें एक उच्च कोटि के पत्रकार होने के गुण छिपे दिखते है, यह सच्ची पत्रकारिता की निशानी है। लगे रहिये।

शुभकामनाओं सहित -

गिरिराज जोशी "कविराज"

अनुनाद सिंह said...

बात वहीं आकर अटक जाती है कि जनता ही जागरूक और सचेत नही है तो ये सब तो चलेगा ही। जनता इनके दोगलेपन को क्यों नहीं देख पाती? लोग क्यों प्रश्न नही करते कि बाबा के कथनी और 'लाइफ़स्टाइल' में जमीन-आसमान का फर्क क्यों है? जनता सादा और त्यागमय जीवन व्यतीत करने वालों को खोजकर उनकी संगति करना क्यों नहीं सीखती? इस देश में अब भी सच्चे साधु जनों की कमी नही है।

Manish said...

भुवनेश मैं हिन्दी और रोमन हिन्दी दोनों में लिखता हूँ । मेरे देवनागरी चिट्ठे का पता है ।

ek-shaam-mere-naam.blogspot.com

बाबा लोगों की जीवन शैली पर अच्छा कुठाराघात किया है आपने।

Anonymous said...

यार तुम्हारे ब्लाग मे समस्या हैं. इसकी फीड बार बार नारद डाउन कर रही है।
और मनीष...Manish यह कमेन्ट के साथ अपनी पोस्ट का एड लगाना अच्छी बात नही। जिसको पड़ना है खुद पड़ेगा, यह टीआरपी बनाने की जुगत कहां से सीखी?


जीतू | Jitu

SHUAIB said...

bahut acha likha aur ache kam ke liye likha hai aap ne - bahut khushi huwi aap ka ye post padh ker

इदन्नम्म said...

बाबा लोगो की अच्छी खबर ली है आपने। गुजरात के जिन बाबा का आपने जिक्र किया है उनका एक आश्रम यहाँ दिल्ली में भी है। गेट को देखकर ही आश्रम की भव्यता का अंदाजा लग जाता है, लेकिन गेट पर सुरक्षा बंदोबस्त को देखकर कभी अंदर जाने की अपनी हिम्मत ही नही हुई, वरना जरुर देखता कि दुनिया को मोह माया से दूर रहने का उपदेश देने वाले ये बाबा लोग खुद कितना मोह को त्याग पाये है। वैसे इनकी कथनी और करनी का अंतर तो विभिन्न धार्मिक चैनलो पर प्रसारित होने वाले इनके उपदेशों के दौरान ही हो जाता है।

अनूप शुक्ला said...

बहुत खूब.