Saturday, October 28, 2006

ये बेचारे क्रिकेट के मारे

वे क्रिकेट के बचपन से ही शौकीन थे या यूँ कहें दीवाने थे। वे जब भी दुकान आते-जाते समय गली में बच्चों को क्रिकेट खेलते देखते तो वहीं शुरू हो जाते। अंपायर नाम के जीव से इन्हें बहुत चिढ़ होती थी जो इन्हें अक्सर आउट ही करार देता था और ये उस पर भुनभुनाते हुए दुकान को रुख्सत होते। सुना तो उनके बारे में ये भी जाता है कि जब इनकी बरात गयी तो इन्होने जनवासे में भी क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया। बेचारे साले लोग क्या करते उन्हें अपने नये जीजा की ख्वाहिश तो पूरी करनी ही थी। खैर जैसे-तैसे इनकी शादी भी हो ही गयी।

लोग-बाग अव्वल तो इनके घर जाते ही नहीं थे पर वक्त-जरूरत जब भी जाते ये अपना सारा क्रिकेट ज्ञान उस पर उँडे़ल देते। आने वाला बेचारा अपनी जान बचाकर भागता। सचिन ने कब, कहाँ, कितने शतक मारे इन्हें मुँह जबानी याद हैं। भारत ने विदेशी धरती पर कब और कितने मैच जीते ये भी वे आपको तुरंत बता देते।

सचिन को ये साक्षात ईश्वर का रूप मानते थे और जब भी सचिन का नाम लेते अंत में भगवान लगाना नहीं भूलते थे- 'सचिन भगवान' । सचिन के खिलाफ़ इन्हें एक शब्द भी सुनना गवारा नहीं। सचिन बेचारा जब अपनी बुरी फ़ॉर्म से गुजर रहा था, उस दौरान ये एक बार नाई की दुकान पर हजामत बनवाने गये। इन्होने अपनी आदतस्वरूप क्रिकेट-चर्चा छेड़ दी। नाई बेचारा इनके क्रिकेट प्रेम और सचिन प्रेम से परिचित नहीं था। उसने सचिन की खराब फ़ॉर्म के बारे में दो-चार बातें मुँह से निकाल दीं। उसका इतना कहना था कि ये अपनी कुर्सी से खडे़ हो गये और उस पर प्रसाद स्वरूप गलियों की बौछार कर दी, बेचारे के घर की महिलाओं को भी नहीं बख्शा। पूरे घटनाक्रम को देखकर दुकान पर थोडी़ भीड़ जमा हो गयी और इन्हें समझाने का प्रयास किया। इस पर ये और भड़क गये और पूरी भीड़ को कोसते हुए वहाँ से पतली गली पकडी़।

फ़िल्मों के ये शौकीन नहीं थे पर एक बार किसी ने इनसे कह दिया कि लगान फ़िल्म में क्रिकेट मैच भी होता है। उसके बाद तो इनकी दुकान पर अक्सर ताला ही मिलता और ये थियेटर में।

अखबार इनके यहाँ नियमित रूप से आता था। वे सबसे पहले खेल-पृष्ठ को खोलते और मिनटों में क्रिकेट की पूरी खबरों को चाट डालते। उसके बाद यदि कभी इनका मूड बन जाता तो इधर-उधर की खबरों पर भी नजरें इनायत करते वर्ना पूरा अखबार यूँ ही पडा़ रहता। जो आदमी क्रिकेट पर चर्चा नहीं कर सकता और जिसे इसमें दिलचस्पी नहीं उसे ये पूरा निरक्षर मानते। इनके अनुसार आदमी के ज्ञान की कसौटी ये थी कि वह क्रिकेट के बारे में कितनी जानकारी रखता है और उस पर कितनी बहस कर सकता है। राजनैतिक और सामाजिक विषयों पर चर्चा करना ये मूर्खों का शगल मानते थे। ये खबरिया चैनलों के बडे़ रसिया थे क्योंकि उन पर अक्सर दिनभर ही क्रिकेट की कोई ना कोई खबर आती रहती है जिसे देखकर ये अपना सामान्य ज्ञान बढा़ते रहते थे।

एक बार इनका किसी शादी समारोह में जाना हुआ। शादी किसी प्रोफ़ेसर की लड़की की थी। वहाँ इनके बगल से बैठे हुए लोगों में राजनीति पर चर्चा छिड़ गयी। लोग राजनीति में नैतिकता और इसमें अच्छे लोगों को आना चाहिए जैसी कुछ बातें कर रहे थे। इतने में एक महाशय को राष्ट्रपति कलाम साहब का खयाल आया और उसने उनके सादा जीवन, उच्च विचारों और देश के लिए उनके योगदान की तारीफ़ कर दी। अन्य लोगों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी। जब ऐसी बातें सुन-सुन कर इनके कान का दर्द बहुत बढ़ गया तो ये उबल पड़े- " किसने कहा आपसे कि कलाम ने देश का सबसे ज्यादा भला किया है, सचिन को तो लोग ऐसे भुला देते हैं जैसे उसने कुछ किया ही ना हो। जितना योगदान सचिन ने इतनी छोटी सी उम्र में देश के लिए दिया है उतना कोई माई का लाल सात जन्मों में भी नहीं दे सकता!"
किसी ने उनसे पूछ लिया कि- "बताईये सचिन का देश के विकास में क्या योगदान है उसने तो सिर्फ़ अपना ही भला किया है पैसे कमाकर।"
ये भड़क गये बोले- " अच्छा आपको उसका योगदान ही नजर नहीं आ रहा उसने कितने मैच जिताये सब भूल गये, आजकल के पढ़े लिखे लोग भी ये बात नहीं समझते। लानत है। "
ऐसा कहकर वे वहाँ से फ़ूट लिये पर पीछे वे लोग सर ही धुनते रहे कि आखिर सचिन का देश के विकास में योगदान कलाम से ज्यादा कैसे है।

जिस दिन टी.वी. पर मैच आता उस दिन इनका टोटल हॉलीडे होता। हालाँकि इनकी दुकान पर भी टी.वी. लगा था पर उसका उपयोग ये क्रिकेट की खबरें सुनने के लिए ही करते थे। मैच के दौरान ग्राहक डिस्टर्ब ना करें इसलिए ये मैच घर पर ही बैठकर देखते थे। मैच में यदि टीम-इंडिया जीतती तो ये खाना सपरिवार रेस्टोरेंट में ही खाने जाते थे। वैसे ज्यादातर इन्हें (मतलब टीम-इंडिया को) हार का ही मुँह देखना पड़ता। उस दिन खाना इनके गले से बमुश्किल नीचे उतरता और रात भर करवटें बदलते।

वर्ल्ड-कप शुरू हो चुका था और इन्होंने दुकान पर जाना लगभग बंद सा कर दिया था। उसी समय इनके शहर की नगरपालिका को अतिक्रमण हटाने की सूझी। नगर-पालिका ने घोषणा करवाई कि जो भी दुकानें सरकारी जमीन पर बनी हैं उन्हें तोडा़ जायेगा। इनकी दुकान पर भी नोटिस चस्पा हो गया। अब चूँकि इनके कान में क्रिकेट-कमेंट्री को छोड़ कुछ भी प्रवेश नहीं कर पाता था इसलिए ये बेचारे उस खबर से अनजान ही रहे। इनके पड़ौसी दुकानदारों ने तो अपनी दुकानों का सामान खाली कर लिया था और दूसरी जगह धंधा जमाने की व्यवस्था कर ली। एक दिन इंडिया पाकिस्तान का मैच था और उसी दिन नगरपालिका का बुल्डोजर इनकी दुकान की तरफ़ आ रहा था। ये यहाँ चौवे-छक्के में व्यस्त थे और वहाँ भी धूम-धड़ाम हो रही थी। हालाँकि इनके एक साथी दुकानदार ने मैच के दौरान इन्हें फ़ोन भी किया कि बुल्डोजर आ गया है पर इन्होंने समझा कि दुकान के बगल वाले नाले की सफ़ाई हो रही है तो इन्होने फ़ोन काट दिया वैसे भी उस समय इनका प्रिय सचिन सॉरी 'सचिन भगवान' खेल रहे थे। पर बेचारी टीम-इंडिया हार गई। इन्होने सिर धुन लिया। दो दिन बाद ये टहलते-टहालते दुकान पर पहुँचे तो पैर के नीचे से जमीन गायब। वहाँ बस मलबा ही बिखरा पड़ा था और सामान राहगीर बीनकर ले गये थे। अब क्या करें इन्हें समझ ना आया। कुछ दिन शक्ल पर बारह बजाये घर बैठे रहे इतने में टीम-इंडिया वर्ल्ड-कप से बाहर हो गयी। मानो इन पर आसमान गिरा। अगले दिन केबल वाला जब पैसे माँगने आया तो इन्हें नानी की भी नानी याद आ गयी। जैसे-तैसे पडौ़सी से उधार लेकर उसे टरकाया। अब तो आर्थिक संकट आ खड़ा हुआ पर दुनियाँ में भले लोग अभी खतम नहीं हुए। इनके एक रिश्तेदार ने, जो ठेकेदारी करते थे, अपने बनवाये हुए मार्केट में इन्हें एक दुकान बाद में पैसे चुकाने की बात कहकर दे दी और थोडी़ आर्थिक मदद भी कर दी।

अब वे रोज नियम से दुकान पर जाते हैं और टीम-इंडिया के हारने पर रात-भर करवटें नहीं बदलते। अखबार पूरा पढ़ते हैं और कभी-कभार सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर होने वाली चर्चा में भी भाग लेते हैं। पर जब इनसे कोई क्रिकेट मैच देखने की बात करता है तो ये उस पर ऐसे भड़कते हैं मानो बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो।

9 comments:

संजय बेंगाणी said...

देर आए दुरुस्त आए.
वैसे स्कोर क्या हुआ है.

Pratik said...

सचिन के बारे में टिप्पणी कर नाई ने वाक़ई बुरा किया था। वैसे, 'वे' हैं कौन?

गिरिराज जोशी said...

वाह भूवनेशजी!!! अच्छा बाऊँसर मारा, पूरा आलेख ४ बार पढ़ा मगर "वो" का पता ही नही चला। :) :) :)

mahashakti said...

ए जी, वो जी, जो कहता हूं मै तुम भी सुनो जी कहता हूं माई नेम इज ...... ।

कही आप ...... बारे मे तो नही चर्चा नही कर रहे है।

यह पोस्‍ट काफी अच्‍छी तरह से लिखा है जो पाठको काफी देर तक बाधे रही है। ऐसी सर्वश्रेष्‍ठ पोष्‍ट से लिये बधाई। बहुत अच्‍छा लिखा है।

भुवनेश शर्मा said...
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भुवनेश शर्मा said...

प्रतीकभाई और कविराज आपको बता दूँ कि ये "वो" वो प्रजाति है जो भारतवर्ष में बहुतायत में पाई जाती है।
प्रमेंद्र भाई धन्यवाद।

Manish said...

अच्छा व्यंग्य किया है भारत के जुनून की हद तक क्रिकेट प्रेमी जनमानस पर !

Kalicharan said...

Nice Post, though a bit close to home, when it comes to cricket i forget food, work everything.

neelesh said...

bloge to bahut accha hai ... par wo= feradey /champu/library wala, in maise kon hai? .. jaldi batana...