Friday, June 08, 2007

झीनी झीनी बीनी चदरिया

पिछली बार मैंने जिस किताब का जिक्र किया था वह बनारस शहर की खूबसूरत संस्‍कृति को एक चलचित्र की भांति हमारे सामने प्रस्‍तुत करती है। पर कमाल की बात यह है कि उसके बाद फिर से एक किताब हाथ लगी जो हमें उसी बनारस की गलियों में वापस ले जाती है। बनारस शहर को बड़ी नजदीकी से देखने वाले लेखक अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह अपनी पुस्‍तक के माध्‍यम से हमें बनारस की उस संस्‍कृति के समक्ष ला खड़ा करते हैं जहां इस शहर का एक तबका सदियों से अपनी कला के माध्‍यम से बनारस के साड़ी उद्योग की पहचान विश्‍व भर में कायम रखे हुए है। अपनी जिंदगी में आने वाली कठिनाईयों से जूझते हुए ये कलाकार किस तरह आज भी इस अद्भुत कलाकारी को जिंदा रखे हुए हैं, इसी की बानगी प्रस्‍तुत करती हुई पुस्‍तक है झीनी झीनी बीनी चदरिया


कबीर के इन मेहनतकश वंशजों को इस बात का गर्व है कि आज भी उनकी यह कला बनारस शहर की पहचान है। यह पुस्‍तक एक झरोखा है जो उनके समाज की गलियों, मुहल्‍लों में जाकर खुलता है और हमें दर्शन कराता है बनारसी साड़ी के बुनकरों के जीवन का, उनके संघर्षों का, मशीनों के युग में भी हथकरघे की श्रेष्‍ठता सिद्ध करने के उनके प्रयासों का, व्‍यवस्‍था द्वारा किये जाने वाले उनके शोषण का और भी बहुत कुछ का। जो बाहरी दुनिया के लिए एकदम अनजाना ही है।


उपन्‍यास का कथाक्रम मुख्‍यत: मतीन और उसके परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसमें हैं उसकी बीवी अलीमुन और बेटा इकबाल। मतीन भी आम गरीब बुनकर की तरह शोषण का शिकार है, पर वह संघर्ष से डरने वाला इंसान नहीं है। वह अपनी और अपने समाज की बदहाली पर आंसू नहीं बहाता बल्कि खाली हाथ होते हुए भी इस स्थिति को बदल डालने के लिए भरसक प्रयास करता है। वह अपने बेटे इकबाल के लिए एक बेहतर भविष्‍य की कल्‍पना करता है और इसके लिए जी-तोड़ संघर्ष करता है। इस संघर्ष में समाज के लोग भी उसका साथ देते हैं। पर भ्रष्‍ट सरकारी संस्‍थाओं और सेठों व गिरस्‍तों का चक्रव्‍यूह उनके लिए भारी पड़ता है और वे अपने को असहाय पाते हैं। पर पात्रों का सबसे बड़ा जज्‍बा है हार न मानने का, जिसे वे बार-बार ठोकर खाने के बावजूद अंत तक चुकने नहीं देते।


साड़ी बुनकरों की जिंदगी को उनकी सामाजिक परंपराओं, रूढि़यों, विश्‍वासों आदि ने किस हद तक प्रभावित किया है इसका लेखक ने अच्‍छा विश्‍लेषण किया है। मुस्लिम बुनकरों के इस समाज को कुरीतियों, ढोंग, मजहब के नाम पर बने व्‍यर्थ के नियम-कायदों आदि ने जिस बुरी तरह जकड़ रखा है, वह भी पिछड़ेपन की इन परिस्थितियों के लिए बहुत हद तक जिम्‍मेदार है। पर सबसे अच्‍छी बात है कि इसी समाज में से कुछ ऐसे लोग भी उठ खड़े होते हैं जिन्‍हें इस बात का भान हो चुका है कि यदि हमें उन्‍नति करनी है तो ये जड़वाद तोड़ना होगा और इन्‍हीं के कारण इस गरीब समाज ने आशा का दामन नहीं छोड़ा है। सोवियतलैंड-नेहरू पुरस्‍कार से सम्‍मानित अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह की यह कृति एक बेहतरीन रचना है और गरीब बुनकरों की अभावों से भरी जिंदगी पर व्‍यर्थ करुणा पैदा करने के बजाय संघर्ष करने के उस जज्‍बे को समर्पित है जो बार-बार ठो‍करें खाने के बावजूद भी उनके दिलों में जिंदा है।


प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
मूल्‍य- पचास रुपये(पेपरबैक संस्‍करण)

3 comments:

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा यह समिक्षात्मक आलेख. आभार.

Manish said...

इस उपन्यास का अच्छा झरोखा प्रस्तुत किया है आपने !

अनूप शुक्ला said...

बहुत अच्छा लगा इस किताब की समीक्षा पढ़ कर। ऐसे ही पढ़ते-लिखते रहो।