Monday, September 15, 2008

मीडिया वालों शिवराज पाटिल को मत डराओ, हिम्‍मत है तो खुलकर सामने आओ

लंबे समय से इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के रंग-ढंग देखकर टीवी देखना छोड़ ही दिया था। चाहे कितनी भी बड़ी, कैसी भी घटना हो सबकी जानकारी इंटरनेट पर मिल ही जाती है सो टीवी की कोई जरूरत ही नहीं है। परसों दिल्‍ली में धमाके हुए तब जरूर कुछेक मिनट को टीवी खोलकर देखा। उसके बाद कल एक मित्र ने बताया कि शिवराज पाटिल के बारे में टीवी पर न्‍यूज चल रही है तो उत्‍सुकतावश देखा। पता लगा कि महाशय शनिवार रात को बम-धमाकों के समय बार-बार अपने कपड़े बदल रहे थे मानो दिल्‍ली में कोई फैशन परेड हो रही हो और पाटिल साहिब को रैंप पर चलना हो।

पर इस बार बच्‍चू मीडिया के शिकंजे में आ ही गए। बहुत सही समय पर मीडिया ने एक जिम्‍मेदार ओहदे पर बैठे और नीचता के सभी रिकार्ड तोड़ चुके लोकतंत्र की आयातित महारानी के इस चरणसेवक की वो बखिया उधेड़नी शुरू की कि 10 जनपथ तक सकते में आ गया। मीडिया से इस प्रकार की जोरदार प्रतिक्रिया के साथ ही जनता की ये राय कि ऐसे मक्‍कार गृहमंत्री को लात मारकर बाहर कर देना चाहिए भी इटैलियन महारानी के कानों में जरूर गूंज रही होगी। आज 10 जनपथ पर हुई बैठक में पाटिल को ना बुलाने से लोग जरूर कुछ कयास लगा रहे होंगे पर बेकार में कोई उम्‍मीद ना पालें ऐसा मेरा सुझाव है क्‍योंकि कुछ भी बदलने वाला नहीं है। ऐसे समय में किसी भी बदलाव की उम्‍मीद करना खुद को धोखा देना है जब देश में सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं है और सत्‍ता एक विदेशी महिला, जो हमेशा भारत देश के लिए अपने किये गये त्‍याग का ढोंग करती है, के पैर की जूती बनकर रह गई है।

देश के नागरिकों के लिए बहुत सहजता से समझ में आने वाली बात है कि एक विदेशी महिला जो कदम-कदम पर भारत की प्रतिष्‍ठा की धज्जियां उड़ाती है, जिसके सामने राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री हाथ जोड़े खड़े रहते हैं, खुद एक राष्‍ट्राध्‍यक्ष की तरह व्‍यवहार करती है और दुनिया को यह संदेश देती है कि भारत भले सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हो उसके प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति की हैसियत मेरे पालतू से ज्‍यादा की नहीं है, की निष्‍ठा इस देश और इसके लोगों में कैसे हो सकती है। यदि यह ऐसी ही त्‍यागवान महिला है और इस महान त्‍याग की भावना के कारण इसने सभी पदों का त्‍याग कर दिया है तो क्‍या इसे मालूम नहीं है कि भारत के लोकतंत्र में एक प्रधानमंत्री की क्‍या गरिमा है, एक राष्‍ट्रपति का कितना सम्‍मान है। बम विस्‍फोटों के बाद प्रधानमंत्री आवास की बजाय 10 जनपथ पर आपात बैठक का होना क्‍या दुनिया वालों को ये दिखाने के लिए काफी नहीं है कि इस देश में आजकल प्रधानमंत्री नाम की कोई चीज है ही नहीं और है भी तो केवल मैडम के सामने दुम हिलाने के लिए। खुदा ना खास्‍ता इटली का कोई पर्यटक ही इन विस्‍फोटों का शिकार बन जाता तो पूरी की पूरी कैबिनेट ऐसे गला फाड़-फाड़कर रोती जैसे इनका कोई सगा मर गया हो खासकर हमारे चाटुकार-श्रेष्‍ठ मन्‍नू भाई। अभी ज्‍यादा दिन नहीं हुए जब ये कंधमाल की घटनाओं पर ऐसे मातम मना रहे थे जैसे इनके घर में ही गमी हो गई हो क्‍योंकि मरने वाले ईसाई थे। उनका बस चलता तो सिक्‍ख होने के बावजूद ऐसे गम के मौके पर अपने बाल तक मुंडवा लेते पर मैडम ने कहा होगा कि ईसाई धर्म में इसकी कोई जरूरत नहीं है।

फिलहाल तो ऐसा लगता है कि इस देश में केवल एक विदेशी महिला की जूतियों का ही सम्‍मान हो रहा है जिनकी राष्‍ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और कैबिनेट तक वंदना करते हैं और इसके अलावा उनकी किसी में कोई निष्‍ठा नहीं है। भारत के संविधान में चाहे कुछ भी लिखा हो पर अब तो यहां कोई भी माई का लाल मैडम के प्रसाद-पर्यन्‍त ही अपने पद पर बना रह सकता है चाहे वह राष्‍ट्रपति ही क्‍यों ना हो। ऐसी महिला जिसकी इस देश और यहां के संविधान में कोई आस्‍था नहीं है और उसके चरणवंदकों, जिनकी उसकी चरणवंदना के अलावा किसी और में कोई आस्‍था नहीं है, से इस देश के भोले-भाले लोग ये उम्‍मीद लगाकर बैठे हैं कि अब नहीं तो तब ये लोग कुछ करेंगे पर इन लोगों को अपनी महारानी के प्रशस्तिगान और उसकी सुविधाओं का ख्‍याल रखने से फुर्सत मिले तब तो वे कुछ सोचें

देश में कहीं भी बम धमाके हों, लोग मरे इनका घिसा-पिटा रिकॉर्ड बजता ही रहता है। सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखें, आतंकवादी कभी सफल नहीं होंगे, शांति बनाये रखें। ऐसा लगता है कि हिंदुस्‍तान की जनता हाथ धोकर सांप्रदायिक सौहार्द के पीछे पड़ी हुई है और देश में जो शांति है वो इन्‍हीं के कारण है। नहीं तो ये हिंदुस्‍तानी तो इतने जंगली लोग हैं कि रोज एक-दूसरे के खून के प्‍यासे हो उठें पर इनके रोज-रोज बजने वाले रिकॉर्ड को सुनकर ही रुके हुए है।

और वह शिवराज पाटिल वह तो बेचारा महारानी के इस दरबार का एक अदना सा नौकर है। अब आप यदि उसे गृहमंत्री समझने की भूल कर बैठे हैं तो इसमें उस बेचारे का क्‍या दोष ! वह तो बेचारा अपनी ड्यूटी बजाने के अलावा कुछ जानता ही नहीं। उस बेचारे को यदि कपड़े पहनने का शौक है तो पहनने दीजिए और इसके अलावा उसे कुछ आता हो तो कुछ करे ना। जब अहमदाबाद गया था तो वहां की बारिश में बेचारे के जूते में कीचड़ लगने के भय से कितना चिंतित हो गया था। हो भी क्‍यों ना, इतनी मेहनत करके बेचारे ने अपना वार्डरोब सजाया हुआ है। इतने भय के माहौल में उसे भी डर लगता होगा ना पर लोग उस बेचारे को और डरा रहे हैं। शास्‍त्रों तक में ऐसे निरीह प्राणियों पर दया करने की बात कही गई है फिर भी लोग ऐसे पापकर्म के भागी बन रहे हैं तो भगवान उनको सदबुद्धि दे।

मीडिया जो इस मामले में बड़े जोर-शोर से अपनी पीठ ठोंक रहा है अपने गिरेबान में झांके। एक अदने से व्‍यक्ति को बलि का बकरा बनाकर वाहवाही तो उसने लूट ली पर उसे भी पता है कि इससे कुछ होना-जाना नहीं है पर उसे इससे क्‍या मतलब। सत्‍ता के शीर्ष पदों पर बैठे व्‍यक्ति तक अब उस बेचारे के पीछे पड़े हैं, खुद कई कांग्रेसी नेता तक उनको बुरा-भला कह रहे हैं क्‍योंकि उन्‍हें भी अपनी गोटियां फिट करनी हैं। ऐसे में उस व्‍यक्ति को नंगा करने से म‍ीडिया को भला काहे कोई गुरेज हो पर ऐसा करके उसने कोई बड़ा वीरता का काम नहीं किया है। यदि मीडिया कुछ करना ही चाहता है तो खुलकर सामने आए और जो वास्‍तविक जिम्‍मेदार हैं उनकी ओर उंगली उठाए। पर उसे अपनी दुकान चलानी है और इसीलिए वह ऐसे विलेन खोजता है जो उसे कोई नुकसान तो नहीं पहुंचा सकते अव्‍वल वाहवाही जरूर दिला सकते हैं।

11 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

भुवनेश जी,
आप बेटी को तो अधिकार दे सकते हैं। उस बेटी के बेटे की बहू को क्यों नहीं? क्या इस लिए कि वह पराए घर से आई है?
वह नागरिक है देश की। मुद्दों पर बात करें तो अधिक अच्छा लगेगा।

Gyandutt Pandey said...

शिवराज पाटीळ जी तो दया के पात्र लगते हैं। पर सोनियां जी (और आपने जिस प्रकार उनके बारे में सम्बोधन किया उसकी भावाना अधिकांश भारतीयों के मन में है - और यही कारण है कि वे सीधे प्रधानमन्त्री न बन सकीं) को जबाब देने चाहियें आतंक के प्रश्न पर।

संजय बेंगाणी said...

दिनेशजी, सोनिया को यह देश प्यार दे सकता है, सम्मान दे सकता है, मगर सत्ता नहीं. इन्होने तो देश की वर्षो तक नाकरीकता ही नहीं ली थी.

मामला बेटी बहू का है ही नहीं, कोई विदेशी जमाई होता तो भी यही नियम लागू होते. क्या देश का खून इतना हीन हो गया है कि सत्ता न सम्भाल सके?

Suresh Chiplunkar said...

बेंगाणी जी और पांडेजी से पूरी तरह सहमत, पाटील, मनमोहन और सोनिया की तिकड़ी गाँधी के तीन बन्दरों जैसी है, आतंकवाद मत देखो, सिमी की बुराई मत सुनो और अफ़ज़ल गुरु को कुछ मत कहो, ये तीन बन्दर देश की वाट लगा रहे हैं, भुवनेश जी कलम में ऐसी ही आग बनाये रखो, बेहतरीन लेख…

Anonymous said...

बेहतरीन लेख.. बहुत आक्रोश होता है यह सब देख सुन और पढ़ कर। पर परेशानी वही है जो सही है वह चुनाव लड़ता नहीं , लड़ता है तो जीतता नहीं और अगर किसमत से जीत भी गया तो उसकी चलती नहीं, दुर्भाग्य है।

द्विवेदी जी
क्यों ना आसाम में हजारों बांग्लादेश वासियों को भी भारत का नागरिक मान लिया जाये, क्यों ना हजारों घुसपेठियों को देशवासी मान लिया जाये ? भई उनके पास भी राशन कार्ड है। इस लिहाज से वे भी भी देश के नागरिक हैं।
ब्ड़ा दुख: होता है इस सोच पर।
उन लोगों को देशवासी मान लिया जा रहा है जो देश को बर्बाद करने बैठे हैं, जो देश के वास्तविक गद्दा है उन्हें हम बहू बहू कहते नहीं थक रहे।
लान्त है हम पर

Anonymous said...

गद्दार*, बड़ा*, लानत*

डा. अमर कुमार said...

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भुवनेश, मुझे प्राणदान दिया जाय यदि मैं यह कहूँ, कि..
आपने लेख तो बहुत अच्छा लिखा.. पर सोनिया से ऎसा द्वेष
क्यों ? शासक को कोसने से पहले उनको पकड़ें, जो शासित
होने को निहुरे पड़े हैं, मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि, आप
सच्चे भारतीय हैं.. भारतीय तो आप यहाँ जन्म लेने मात्र से
स्वतः हो गये, सच्चे यूँ कि किसी को भी गरिया कर और अपना
कालर झरिया कर हम निश्चिन्त हो लेते हैं... आप भी तो ?

ऎनानिमस, अब आपको क्या ज़वाब दूँ, जो अपना नाम गाम
ठाम भी बताने का साहस नहीं रखते.. मियाँ, जब इनको राशन
कार्ड बाँटे जा रहे थे, तब आप सो रहे थे ? वोट की राजनीति में
आप अपना योगदान भी देखें ? हाँ, बाँग्लादेश ने ही इतनी बड़ी
संख्या में राशन कार्डधारी घुसपैठिये भेज दिये हों, तब अपनी
अकर्मण्यता पर आप दहाड़ सकते हैं, क्या कहें ?

बेंगाणी महाशय, एक लुटेरा यहाँ आकर बादशाहत कायम कर
गया.. तब हमारे पुरखे ज़ौहर करने वाली स्त्रियों के पेटीकोट गिन
रहे थे, क्या ? 700 साल ... 700 साल कम नहीं होते किसी भी
ज़िन्दा कौम को नींद से जगाने के लिये... क्षमा करें, मैं आपका
बहुत आदर किया करता हूँ, कृपया इस भ्रम को जीवित रखें !

सुशील कुमार छौक्कर said...

आपने अच्छा लिखा है। आपका गुस्सा जायज है। पाटिल जी को शायद अपने लुक की ज्यादा चिंता थी ना कि लोगो की जानों की। वही एक नेता की सत्ता के लिए लार टपक रही थी। हकीकत यही है कि नेताओ को अब आम आदमी की चिंता नही होती। चिंता बस होती हैं कि कैसे सत्ता बचाई जाए और कैसे सत्ता तक पहुँचा जाए बस। चाहे वह इंसानो की लाशो पर हो या फिर झुठे वादो पर। यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।

Gaurav Garg said...

बेशक आपका ये लेख कबि्ल-ए-तारिफ़ है, शिवराज़ पाटिल क कॄत्य निश्चय रूप से निन्दनीय है और देश के माननीय मंत्रीमंडल की भूमिका भी सन्देहास्पद ही है पर फिर भी मैं सो्नि्या जी का नाम यहां पर तर्कसंगत नहीं मानता... वो देश की बहु हैं और इस नाते से बराबर का सम्मान उनका हक है. किसी दूसरे देश मैं जन्म लेना किसी भी रूप से से उनके व्यक्तित्व को छोटा नहीं करता या नहीं कर सकता.......

अनूप शुक्ल said...

वीर रस में लेख अच्छा लिखा है!

SANJAYJUMNANIGKP said...

SHIVRAJ PATIL KO AGAR BANK KE CHAPRASI KI NAUKARI KE LIYA ENTRANCE EXAM DENA PADE TO WOH USME BHI QUALIFI NAHIN KAR PAYEGA . AISE AADMI SE DESH CONTROL KARNE UMMEED BEKAR HAIN.