Sunday, November 26, 2006

जय हो पपीता देव की

मध्य प्रदेश के सीधी शहर में गत १५ नवंबर को एक सज्जन के यहाँ लगे पपीते के पेड़ से एक विकृत आकृति का पपीता प्राप्त हुआ। जिसे उन्होंने गणेशजी का पपीते में अवतरण मानते हुए पूजा-अर्चना शुरू करवा दी। पपीते में गणेश भगवान की बात सुनकर हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित हो गये। सुबह-शाम उसकी आरती भी की जाने लगी, चढ़ावा एकत्रित होने लगा। २२ नवंबर को उस पपीते को एक जगह दफ़ना दिया गया। अब उस जगह पर गणेशजी का मंदिर बनाने की उक्त महाशय की योजना है।

सहारा समय मध्य प्रदेश के पत्रकार ने लाइव बातचीत में जब इन सज्जन को समझाने की कोशिश की कि ये पपीते में आई किसी विकृति का परिणाम है। ऐसा कभी-कभार मनुष्यों और पशुओं के बच्चों में भी देखा जाता है। तो ये सज्जन उनकी आस्था पर कुठाराघात समझकर उस पत्रकार पर भड़क गये। पत्रकार का ये भी कहना था कि आपके कारण लोग अपने काम-धंधों पर जाने की बजाय आपके यहाँ पूजा-अर्चना में लगे हैं। और आप पपीते की जगह पर मंदिर बनवाकर भगवान के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाना चाहते हैं।

खैर ये तो बात हुई सहारा समय पर प्रसारित हुई खबर की। पर हमारे देश में ऐसी असंख्य घटनाएं हर रोज ही घटा करती हैं। कुछ समय पहले की ही बात है मेरे गाँव में एक आदमी के यहाँ विकृत अंगों वाली बालिका पैदा हुई। गाँव वालों ने उसे देवी मानकर चढ़ावा चढ़ाना शुरू कर दिया। उस गरीब ने कुछ दिनों के लिए इस अफ़वाह से अपनी गरीबी दूर कर ली। ये हाल तब है जब गाँव शहर से ही लगा हुआ है, और लोगों की जीवन-शैली भी शहर के लोगों से अलग नहीं हैं।

हाल ही में मेरा एक मित्र बता रहा था कि कुछ बाबा लोग किसी स्थान पर कोई पत्थर की प्रतिमा गाड़ देते हैं और फ़िर उस इलाके में लोगों के पास जाकर कहते हैं कि हमें भगवान ने सपना दिया है कि फ़लां जगह उनकी मूर्ति निकलेगी। खुदाई करने पर मूर्ति निकल आती है और फ़िर ये लोग उसे दैवीय स्थान मानकर लोगों से चंदा इकट्ठा कर अपनी दुकानदारी चलाने के लिए मंदिर बना देते हैं।

ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था होने का दावा करने वाले देश के लोगों के ज्ञान का स्तर कितना है ये सर्वविदित है। हालात ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में ही ऐसे हों ऐसा भी नहीं। हाल ही में मुंबई और सूरत की घटनाओं के बारे में सब जानते ही हैं। हम विद्यालयों और महाविद्यालयों में आज किस प्रकार की शिक्षा दे रहे हैं? आज शिक्षा ऐसे छात्र पैदा कर रही है जो विचारशून्य होकर केवल मशीन की तरह काम करना जानते हैं। महज किताबी ज्ञान देने या रोजगारपरक शिक्षा ले लेने से क्या हम अच्छे नागरिक पैदा कर सकते हैं? क्या हम किसी भी घटना को व्यापक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में देखने का दृष्टिकोंण उन्हें दे पा रहे हैं?

कुछ लोगों को ये बात लीक से हटकर लगे पर मैंने खुद कई उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को ऐसी हरकतें करते देखा है। जब हमारे उच्च शिक्षा प्राप्त लोग ही इस प्रकार की घटनाओं में कोई वैज्ञानिक कारण होना स्वीकार नहीं करते तब गरीब अनपढ़ लोगों से इस प्रकार की आशा करना तर्कसंगत नहीं है। मैंने अक्सर पाया है कि पढ़े-लिखे लोग घर के अंदर तो कहते मिल जायेंगे कि हां इसमें कोई वैज्ञानिक कारण ही होगा। पर भीड़ के साथ वे भी समान कृत्य करते ही नजर आयेंगे। हम मनुष्यों के नहीं भेड़-बकरियों के समाज में रहते हैं। जहाँ अधिकांश लोगों को धर्म, आध्यात्म, ईश्वर का नाम लेकर किसी भी दिशा में हांका जा सकता है।

इसलिए मैं सोच रहा हूँ क्यों ना ये चिट्ठालेखन छोड़कर कोई धर्म और आध्यात्म की दुकान खोल लूँ और इस चिट्ठे को अपनी दुकान की मार्केटिंग के लिए प्रयोग करूँ।

9 comments:

Pratik said...

बहुत उत्तम विचार है। हम तो पहले ही जय-जयकार किए लेते हैं - गुरूघण्टाल 1008 स्वामी श्री भुवनेश महाराज जी की जय हो!!! :-)

अनूप शुक्ला said...

ये सब भी धंधे होते हैं जगह, जमीन और पैसा हथियाने के.

Udan Tashtari said...

ये तो पुरानी स्टाईल हो गई,आप तो अपने चिट्ठे पर ही गणेश जी की आकृति अपने आ गयी, घोषणा करके कोशिश करो, शायद सोलिड हिट मिलने लगे फिर विज्ञापन!! जय हो, जय हो!!

संजय बेंगाणी said...

शिक्षित होने का यह अर्थ नहीं की आपके दिमाग के खिड़की दरवाजे खुल गए हैं. कई डॉक्टर अपने दवाखाने में घोड़े की नाल लगाते है!.
पतित-प्रजा पपिता ही पुजेगी ना.

सागर चन्द नाहर said...

भाई हमारे यहाँ हैदराबाद के अखबारों में महीने में कम से कम २० दिन ऐसे भगवानों के अवतरित होने की खबरें छपती है, गणेश जी कभी टमाटर, भिण्डी या कभी आम में अवतार लेते हैं।

गिरिराज जोशी said...

उत्तम....:-)

अब मै आपका चिट्ठा पढ पा रहा हूँ

hemanshow said...

यही नहीं, आजकल बडी-बडी कम्पनीयाँ भी इस दौड़ में पीछे नहीं। कभी देखा नहीं विज्ञापनों को "बाल काले करने की/उगाने की गारण्टी", "झुर्रीयाँ हटाने की गारण्टी", "लम्बाई बढ़ाने की गारण्टी", "शर्तिया वजन घटाने की गारण्टी", "बढि़या स्वादिष्ट भीजन की गारण्टी" आदि आदि। यहाँ अमरीका के बीसीयों टीवी चैनलों पर ऐसे विज्ञापनों की भरमार है।

ATUL DOGRA said...

wah bhai ji shi vichar hai . per mai bhi sochta hun k baba ban jau humara gher ke pass ek admi postman ka kaam kerta tha 10 sal pehle fir thode din bad wo baba ban gya badi si dadhi rakh li aj uske paas safari gadi hai , or kerta kya hai thodi si bhabhuta deta hai or bolta hai gher mai pareshani hai ldai hoti hai koi nhi isko le jao dobara dkha lena

Manish said...

सही कहा है आपने ! विश्वास की आड़ में लोगों को मूर्ख बनाने का ये सहज तरीका है .