Thursday, January 22, 2015

आईये कुछ बेस्टसेलर पढ़ें

वैसे तो किताबें पढ़ना बहुत लंबे समय से छूटा हुआ सा था.... हालाँकि एक अधिवक्ता होने के नाते तो हमेशा किताबों से घिरे ही रहना है पर फिलहाल मैं बात कर रहा हूँ अपने विषय से इतर पुस्तकों के बारे में

पिछले कुछ दिनों में जरूर कुछ पढ़ा खासकर दो - तीन विदेशी लेखकों की किताबों का हिन्दी अनुवाद पढ़ा.... आजकल एक बात अच्छी हो गई है कि मूलरूप से दूसरी भाषाओं में लिखी गई किताबों के हिन्दी अनुवाद बहुत ही अच्छे हैं....लगता ही नहीं कि किताब मूलतः हिन्दी में नहीं लिखी गई... विदेशी बेस्टसेलर और 'हाईली रिकमेंड' कही जाने वाली किताबों के हिन्दी अनुवाद भी खूब बिक रहे हैं आजकल... भारतीय अँग्रेज़ी लेखन के भी हिन्दी संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं पर मैंने कभी पढ़े नहीं....

वे दो तीन पुस्तकें भी इस कारण पढ़ डालीं कि इस बहाने कुछ नया पढ़ने को मिलेगा और जानने को मिलेगा कि इन बेस्टसेलर्स में होता क्या है....सबसे बड़ी बात कि ऐसे लेखकों की एक विशेषता होती है मेरी समझ मे... वो एक छोटी और साधारण बात को इतना अच्छे तरीके से... अलग अलग उदाहरणों से प्रस्तुत करके उसे इतना रोचक बना देते हैं कि पाठक के दिमाग में वह बात जम जाए..... और पढ़ने वाले को लगे कि वाकई लेखक ने कमाल की किताब लिख डाली है.... हालाँकि ऐसी किताबों की मार्केटिंग बहुत ही जबरदस्त होती है... इनका प्रचार इस प्रकार से किया जाता है कि यह वो पुस्तक है जो आपके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है... जीवन में सफल होने के लिये इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए.. कुछ इस तरह से इनके बारे में बताया जाता है....

हालाँकि कुछ लोगों से बातें करने पर लगा कि उनके लिये ये किताबें ज्यादा महत्व की नहीं हैं.... क्योंकि इनमें वही सब कहा गया है जो हम पहले से जानते हैं.... पर इतना कह देने भर से इन किताबों को खारिज करना भी मैं जल्दबाजी ही मानूँगा...

हजार साल पहले किसी किसी किताब में कोई बात कह दी गई हो और अब उस बात को दुबारा से कह देना भले ही लोगों को मौलिक ना लगे... पर हममें से कितने हैं जो हज़ार साल पहले की पुस्तक को खोजेंगे.... भले ही हमने उसके बारे में सुन रखा हो... जो चीज सामने है उसे तो पढ़ ही डालें

खैर अपनी अपनी सोच है लोगों की.... यह भी सही है कि सबसे ज्यादा बिकना सबसे अच्छे होने की कसौटी नहीं है पर इन लिखने वालों की एक विशेषता तो है कि वे पाठक को ध्यान में रखकर लिखते हैं और भाषा सहज पठनीय होती है ... जबकि हिन्दी किताबें लिखने वालों का एक बड़ा तबक़ा कतई पाठकों को ध्यान में नहीं रखता लिखते समय... और ना ही एक आम पाठक के समझ में आ जाने वाली भषा से उसे सरोकार है.... और यही तबक़ा सबसे ज्यादा कुंठित है जब किताबें उनकी बिकती नहीं...

पर हिन्दी में नयी पीढ़ी के लेखक वाकई इन विदेशी लेखकों के बेस्टसेलर लेखन से अच्छा लिखने की क्षमता रखते हैं... और लगातार अच्छा लिख भी रहे हैं.... मार्केटिंग भी ठीकठाक हो ही रही है.... मुझे तो पूरा भरोसा है कि आगामी समय में बुकस्टॉल्स से लेकर ईकॉमर्स साइटों तक बेस्टसेलर्स भारतीय ही होंगे... वैसे भारतीय और हिन्दी साहित्य के लिये सबसे अच्छी बात यह है कि किताबों की उपलब्धता आज फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसी साइटों के जरिये सब जगह हो गई है.....

पाठक को फोकस कर बढ़िया लेखन और हर जगह को पाठक की इंटरनेट के माध्यम से किताबों तक पहुँच....ये ट्रेंड धीरे धीरे बढ़ रहा है..... मेरे खुद के शहर में ऐसी एक भी दुकान नहीं जहां  पढ़ने लायक कुछ भी उपलब्ध हो... जितनी भी किताबें मेरे पास हैं सब बाहर से खरीदी गई हैं... पर अब इंटरनेट से खरीदने की शुरूआत की है और घर पर ही आ जाती है किताब... किताब भी वाजिब दामों में फ्री शिपिंग सुविधा के साथ... इससे मेरे जैसे पुराने शौकीन फिर इस शौक की तरफ लौटेंगे

Wednesday, July 20, 2011

लो अब गूगल एडसेंस में भी दलाली

कमाने के अवसर अनगिनत हैं यदि बंदा थोड़ा अपनी अकल खपाये...गूगल एडसेंस के विज्ञापनों से कमाई बहुतेरे ब्‍लॉगरों के लिए अतिरिक्‍त आय का साधन बन गया है वहीं बहुत से ब्‍लॉगर अब भी इस अरमान को संजोये बैठे हैं कि कब गूगल एडसेंस उनके आवेदन को स्‍वीकार करे और वे कंप्‍यूटर पर बैठे-बैठे ही अपने खाते में डॉलर जमा होते हुए देखें

हालांकि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के लिए तो ये अभी-भी दूर की ही कौड़ी है क्‍योंकि हिन्‍दी अभी तक गूगल की विज्ञापन सेवा एडसेंस की समर्थित भाषाओं की सूची में नहीं है...हालांकि कुछ ब्‍लॉग्‍स पर अभी भी विज्ञापन नजर आ रहे हैं जिसका कारण है ब्‍लॉग्‍स पर सर्च इंजन से ट्रैफिक जुगाड़ने हेतु अंग्रेजी कीवर्ड्स की उपस्थिति...फिर भी आमदनी नगण्‍य ही है क्‍योंकि अव्‍वल तो ये विज्ञापन ब्‍लॉग पर दिखते ही नहीं और यदि दिखते भी हैं तो आने वाले पाठक इन पर क्लिक नहीं करते...मेरा तो अनुभव यही है बाकी वे लोग बतायें जो इससे यदि वाकई में कुछ कमाई कर रहे हैं

हालांकि आजकल गूगल अपने कुछ विज्ञापनों को हिन्‍दी में भी दिखा रहा है खासकर आजकल बंबई-पूना की सैर कराने वाले विज्ञापन ही हिन्‍दी में ज्‍यादा नजर आ रहे हैं जिन पर शायद ही कोई क्लिक करता होगा...क्‍योंकि हिन्‍दी चिट्ठों पर ज्‍यादातर ट्रैफिक हिन्‍दुस्‍तान से ही आता है...एक और एलआईसी का कराड़पति बनाने वाला विज्ञापन है जो कभी-कभार नजर आता है...ऐसे ही इक्‍के-दुक्‍के विज्ञापन नजर आते हैं फिलहाल हिन्‍दी में...वैसे गुजराती और मराठी भाषाओं के विज्ञापन भी इन इक्‍के-दुक्‍के विज्ञापनों की जमात मे शामिल हैं...

मेरे एक मित्र जिन्‍हें मोबाइल से ब्‍लॉगिंग का शौक है हाल ही में एडसेंस से परिचित हुए हैं और मोबाइल ब्‍लॉगिंग छोड़कर लैपटाप पर हाथ आजमा रहे हैं ताकि अपने अंग्रेजी ब्‍लॉग पर ट्रैफिक बढ़ाकर विज्ञापनों से कमाई की जा सके... उन्‍होंने दो-तीन बार एडसेंस के लिए आवेदन किया पर हर बार उनका आवेदन निरस्‍त हो गया...बेचारे बड़े दुखी थे...गूगल पर उन्‍हें गुस्‍सा भी आ रहा था कि गूगल सबको पैसा कमाने दे रहा है पर उनसे कन्‍नी काट रहा है...मैंने उनको सुझाव दिया कि विज्ञापन प्रदान करने वाली भारतीय सेवाओं जैसे एड्स फॉर इंडियंस या अन्‍य एफिलिएट प्रोग्राम में क्‍यों नहीं रजिस्‍टर कराते वे भी कुछ ना कुछ दे ही देंगे....पर उन्‍हें तो केवल गूगल के ही विज्ञापन चाहिए थे...वे खोजते रहे..उनको कुछ पता लगा तो उन्‍होंने बताया कि कुछ लोग नेट पर गूगल अकाउंट बनाकर देते हैं और उसका आपसे कुछ पैसा भी लेते हैं...मैंने कहा मुझे तो इसकी जानकारी है नहीं यदि ऐसा है तो एक बार कोशिश कर डालिए...उन्‍होंने संबंधित सेवा प्रदान करने वाले व्‍यक्ति से संपर्क कर उसे पैसा भी भेज दिया परंतु आज तक उसकी तरफ से कोई उत्‍तर नहीं मिला है...मेरे मित्र का कहना है कि इंटरनेट पर सक्रिय इस प्रकार के ठगों का काम मजे में चल रहा है और लोग उनके चंगुल में आकर पैसे भी गंवा रहे हैं....शायद लोगों से पैसे ऐंठने का ये भी एक तरीका है... क्‍योंकि बहुतेरे आवेदन जो एडसेंस को भेजे जाते हैं वे निरस्‍त ही हो जाते हैं....और बढि़या ट्रैफिक और विजिटर्स पाने वाले ब्‍लॉगर्स जल्‍द से जल्‍द इस एकाउंट की चाबी चाहते हैं....हालांकि मेरा मानना है कि शायद ही लोगों का काम बनता हो उनका पैसा तो लालच मे आकर पानी में ही बह जाता है....क्‍योंकि गूगल के नियम व शर्तें बहुत सख्‍त हैं....बहरहाल मेरे मित्र बेचारे दुखी हैं विज्ञापन ना जुटा पाने और पैसे डूबने के कारण...फिलहाल उन्‍होंने शादी-ब्‍याह कराने वाले किसी एफिलिएट विज्ञापन के लिए आवेदन किया है और तुरंत ही उन्‍हें एप्रूवल भी मिल गया....देखते हैं बेचारे इतनी मेहनत के बाद भी कुछ कमा पाते हैं या नहीं...

Tuesday, July 19, 2011

भ्रष्‍टाचार का कांग्रेस ब्रांड अचार : कुछ मजेदार तस्‍वीरें

अन्‍ना के आंदोलन और रामदेव प्रकरण के बाद से ही इंटरनेट पर कांग्रेस पार्टी, उसकी यूरोपियन हाईकमांड, मनमोहन और दिग्विजय सिंह की भयंकर तरीके से भद्द पिटी है...कांग्रेस पर चुटकुले, एसएमएस और तो व्‍यंग्‍यात्‍मक तस्‍वीरें रोज ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर देखने को मिल जाती हैं....कुछ तस्‍वीरें तो ऐसी हैं जिन्‍हें यहां प्रकाशित भी नहीं किया जा सकता...प्रस्‍तुत हैं एक झलक-


Thursday, June 02, 2011

कनिमोझी का फेसबुक प्रोफाइल Funny Facebook profile of Kanimozhi

अभी-अभी इनबॉक्‍स में एक मजेदार मेल मिला जिसमें 2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की आरोपी और फिलहाल तिहाड़ जेल में कैद कनिमोझी का मजेदार फेसबुक प्रोफाइल दिखाया गया है...

अपने पिता करुणानिधि को लिखे एक संदेश में वे कह रही हैं-
"Appa, I prefer being in Tihar than Chennai Central Jail.....less mosquitoes, less humidity and Raja for company" :)

चित्र को बड़ा करने के लिए उस पर क्लिक करें-

Thursday, April 07, 2011

क्‍या अन्‍ना दूसरे जयप्रकाश साबित होंगे?

अन्‍ना हजारे के आंदोलन के चलते कुछ लोग जयप्रकाश की बात फिर से करने लगे हैं...जिनमें दोनों ही तरह के सुर है...कुछ का कहना है कि जब जयप्रकाश जैसे नेता की संपूर्ण क्रांति की लहर भी कोई बदलाव नहीं ला सकी ऐसे में जयप्रकाश के समय से ही चली आ रही मांग को अन्‍ना कैसे मनवा पाएंगे जब पूरा देश क्रिकेट की जीत के नशे में मदमस्‍त हो और मौजूदा सरकार ने भारत की अब तक की भ्रष्‍टतम सरकार का मेडल पहन रखा हो और जिसका नेतृत्‍व एक ऐसा प्रधानमंत्री कर रहा हो जिसे अब तक मीडिया और विपक्ष द्वारा की गई सरेआम बेइज्‍जती पर जरा भी शर्म नहीं आती हो और जो एक ही रटा-रटाया जवाब देना जानता हो- मुझे कुछ नहीं पता.... और ऐसी जनता जिसका एक विदेशी परिवार के सदस्‍य को युवराज कहे जाते समय खून ही नहीं खौलता हो...और तमाम भ्रष्‍टाचार या कहें भ्रष्‍टाचार के वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाने वाली सरकार के प्रधानमंत्री के बारे में लोग कहते हुए मिल जाते हैं कि- बेचारा वो तो भला और ईमानदार है....
जनता को कुछ नहीं चाहिए उसे तो चालीस चोरों का सरदार भला और ईमानदार दिखना चाहिए फिर वो चालीस चोरों को भी स्‍वीकार कर लेगी...और गोरी चमड़ी के प्रति आदर तो जीन में है इसलिए हर जगह राहुल बाबा की जय है...ये कोई नहीं सोचना चाहता कि अभी तो हिंदुस्‍तान में फिर भी काली कमाई करने वाले मीडिया में आने के कारण कहने को ही सही पुलिस की गिरफ्त में हैं...युवराज के गद्दीनशीं होने और रामराज्‍य आने के बाद तो शायद पता भी ना चले कि इटली में बैठकर कौन भारत का गेम बजा रहा है और ना पुलिस ना इंटरपोल उसे पहचान पा रही है
पर फिलहाल भारत वर्ल्‍ड-कप जीता है और शायद आगामी दिनों में इस बात पर भी देशव्‍यापी आंदोलन हो जाए कि सरकार सचिन को भारत-रत्‍न क्‍यों नहीं दे रही है वैसे फिलहाल आईपीएल के कारण इस आंदोलन को थोड़ा आगे बढ़ाना ज्‍यादा मुनासिब लग रहा है..
हालांकि अन्‍ना को अच्‍छा समर्थन मिल रहा है और खासकर मीडिया कवरेज के कारण वे पूरे देश में सुर्खियों में हैं....और कम से कम यही अच्‍छी बात है....दूसरी तरफ युवाओं में उनके प्रति समर्थन की उम्‍मीद मुझे है...कम से कम वे इस बात को जरूर समझ रहे हैं और उनको इस वर्ग से समर्थन मिल भी रहा है...और आगे ये और बढ़ेगा ऐसी उम्‍मीद सबको है...
पर समाज के हर तबके से अन्‍ना को व्‍यापक समर्थन मिल पाना फिलहाल के समय में संभव नहीं दिखता है....और खासकर जब ऐसा कहा जा रहा है कि भ्रष्‍ट भारत में बहुसंख्‍यक समाज भ्रष्‍ट हो चुका है तब वही समाज कैसे अपने ही खिलाफ उठ खड़ा होगा...मेरे ख्‍याल में भ्रष्‍टाचार और ईमानदारी की परिभाषाओं के फेर में पड़ने की कोई जहमत नहीं उठाना चाहता हर व्‍यक्‍ित और वर्ग के अपने हित हैं और सभी अपने हितों की लड़ाई लड़ने में व्‍यस्‍त हैं...वैसे भी बढ़ती महंगाई और भौतिकतावादी युग में पीछे कोई नहीं रहना चाहता...सभी कैसे भी करके जल्‍दी आगे बढ़ने की होड़ में व्‍यस्‍त हैं...ये अनुभव अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में किया होगा कि सिस्‍टम कैसे व्‍यक्ति को भ्रष्‍ट बनाता है....हालांकि ईमानदारी अभी बची हुई है पर बहुत थोड़ी जैसे चिडि़याघर तक सिमटा वन्‍य-जीवन....फिर भी हरिशंकर परसाई की इस उक्ति को कोई नहीं झुठला सकता कि- 'ईमानदार तभी तक ईमानदार है जब तक उसे बेईमान होने का मौका नहीं मिला'

Saturday, July 31, 2010

चरणस्‍पर्श और इमेज-बिल्डिंग

मेरे एक रिश्‍तेदार ने जब बताया कि फलांजी आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे...मुझे उत्‍सुकता हुई तो मैंने और पूछा तो उन्‍होंने उन फलांजी के मुंह से की गई तारीफ के पुलिंदे खोल दिए....मुझे लगा फलांजी मेरी इतनी तारीफ क्‍यों कर सकते हैं ?
वे फलां सज्‍जन हमारी जिला अदालत में सीनियर एडवोकेट हैं जिन्‍हें मैं काफी पहले से जानता हूं...पर वे मुझे नहीं जानते थे....एक दिन वे घर जाने के लिए किसी रिक्‍शे वगैरह का इंतजार कर रहे थे....मुझे वे दिख गए मैंने उनके चरणस्‍पर्श किए और गाड़ी में बैठने को कहा...वे अपने साथी महोदय के साथ बैठ गए...उन साथी महोदय ने उनका मुझसे परिचय कराया...बातें हुईं रास्‍ते में ही उनका घर था....उतरते समय मैंने फिर से खासतौर पर उनके चरणस्‍पर्श किए....अब इसमें खास बात क्‍या है मुझे तो कुछ समझ नहीं आया....पर इस चरणस्‍पर्श के चमत्‍कारिक प्रभाव मैंने और भी जगह देखे...कुल मिलाकर जिनके चरणस्‍पर्श मैं किया करता हूं उन सबकी राय मेरे बारे में एक सुसंस्‍कारी और बहुत अच्‍छे बालक की हो गई....वैसे चरणस्‍पर्श करने को मैं एक औपचारिकता से ज्‍यादा नहीं मानता और ना ही अब तक मेरी नजर में चरणस्‍पर्श जैसी बातों की कोई अहमियत थी....चरणस्‍पर्श को हमेशा से ही मैं दकियानूसी परंपरा मानता था और अब भी मानता हूं पर अब अंदर से कुछ और होते हुए भी बाहर कुछ और दिखावा करने की आदत-सी बन गई है.....अब जितने भी लोगों के आप चरणस्‍पर्श करते हैं उनमें से कई ऐसे भी होंगे जो चरणस्‍पर्श कराने की बजाय जूते खाते हुए लोगों को नजर आयें तो लोग कहें- ठीक रहा, साले के साथ यही होना चाहिए था...पर फिर भी ऐसे लोग चरणस्‍पर्श कराने का सुख पा जाते हैं...
मेरे एक सीनियर हैं जो चरणस्‍पर्श करने में इतने महारथी हैं कि हमें उनसे दूर रहना पड़ता है....पता नहीं कब कोई उन्‍हें सामने नजर आये और उसके चरणों में झुक जायें और इसी कारण वे अपना काम भी बड़ी आसानी ने निकाल लेते हैं....साथ होने के कारण हमें भी ये करना पड़ता है
व्‍यक्तिगत रूप से मैं इस परंपरा को बिलकुल ठीक नहीं मानता हूं...कारण बहुत सारे हैं....मैं स्‍वयं किसी से पैर छुआना पसंद नहीं करता....चाहे छोटा बच्‍चा हो....कभी-कभार बराबर के लोग भी रिश्‍तेदारी वगैरह टाइप का संबंध होने के कारण भी पैर छूने पर उतारू हो जाते हैं तो उनको रोकना पड़ता है...
ये कहने की जरूरत नहीं कि आचार और व्‍यवहार में तो हम लोग बहुत बड़े ढोंगी हैं....पर अभिवादन जैसे छोटे-मोटे मुद्दों पर भी हम ढोंग करने से बाज नहीं आते....हालांकि मैं स्‍वयं भी ऐसा ही करने लगा हूं कुछ समय से....पर कुछ मजबूरी कहें या कुछ और पर अब एक आदत-सी बन गई है....पहले मैं चाहे जिस व्‍यक्ति के चरण-स्‍पर्श नहीं कर पाता था....जिस व्‍यक्ति की मैं दिल से इज्‍जत करता था और जो मुझे इस काबिल लगता था उसके ही चरणों में झुकता था...इसीलिए मुझे इस परंपरा का पालन करने की कोई बड़ी खास जरूरत नहीं होती थी....ये भी गलतफहमी थी कि जिन गिने-चुने व्‍यक्तियों के मैं पैर छूता हूं जिनको इस काबिल समझता हूं उनके पैर ना भी छुऊं तो वे इतने समझदार हैं कि वे इसे अन्‍यथा कतई नहीं लेंगे....पर शायद ऐसा नहीं है....बाकियों के पैर छूने की गलती तो शायद मैं कभी-कभार मजबूरी में ही करता था....हालांकि रिश्‍तेदारों की गिनती इसमें शामिल नहीं है...उनके पैर तो हमें छूना ही है....
पर स्‍टूडेंट लाइफ के बाद से सामाजिक जीवन में जो गहराई से घुसपैठ हुई उसके बाद से मैंने इसे बहुत बड़ा मुद्दा मानना बंद कर दिया....जो भी बड़ा है, बुजुर्ग है, सीनियर है उसके पैर छूने से पहले और ना ही बाद में सोचने की कुछ जरूरत पड़ती है...बस छू लेते हैं...भला ही सामने वाला कुछ भी हो....और वैसे भी ये ढोंगी समाज ढोंग करने को ही मान्‍यता देता हो और वे ढोंगी ही आपके बुजुर्ग और सम्‍माननीय लोगों की कतार में हों तो ऐसे में आदमी के पास रास्‍ता ही क्‍या बचता है....खैर छोटी-सी बात को ज्‍यादा गंभीरता की ओर ना ले जाकर अपना बस इरादा है छोटी सी बात को कहना कि चलो कम से कम इस आदत से एक बात तो हुई कि लोगों का अपने बारे में नजरिया बेहतर बना...
हालांकि फिर भी बहुत से लोग हैं जिनका मैं दिल से सम्‍मान करता हूं और इसी कारण से उनके चरणस्‍पर्श जरूर करता हूं इसके बावजूद ऐसे बहुत से लोगों के भी चरणस्‍पर्श करता हूं जिनमें मन तो जूते देने का होता है पर उनसे संबंधों के आंकड़े इस कदर उलझे हैं कि ये सब करना ही पड़ता है...ये बात अलग है कि उन्‍होंने मेरे प्रति ऐसा कुछ नहीं किया कि मैं व्‍यक्तिगत कारणों से ऐसा सोचूं.....हालांकि पूरी तरह से इन सब चीजों का आदी नहीं हो पाया हूं पर कोशिश कर रहा हूं क्‍योंकि हिंदुस्‍तान में रहकर सौ में से निन्‍यानवे बेईमानों से हमको काम पड़ना है....और फिर आप ऐसे देश में रहते हैं जहां पैर छूने वाले और दुम हिलाने वाले प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति तक की नौकरी पा जाते हैं( जी हां नौकरी, क्‍योंकि असली कुर्सी पर जो है उसके तो ये सब चाकर ही हैं)...ऐसे देश में रहकर देश की परंपरा को थोड़ा-बहुत तो बजाना ही पड़ेगा...बाकी जिस दिन ये कला बहुत अच्‍छी तरह सीख गया उस दिन शायद मैं नेता भी बन जाऊंगा.

Friday, July 30, 2010

क्‍या आप अपनी मनपसंद फिल्‍में देख पाते हैं


आज दिन में टीवी पर 'वन्‍स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' का रिव्‍यू आ रहा था शाम को सड़क पर टहलते समय पोस्‍टर भी दिखा...फिल्‍में अक्‍सर देखता नहीं हूं पर आसपास से, समाचारों से या एफ एम चैनलों पर आने वाली फिल्‍मों के गाने सुनकर इतना तो पता रहता ही है कि कौन-सी फिल्‍में रिलीज होने वाली हैं, क्‍या स्‍टार-कास्‍ट है, निर्देशन किसका है क्‍या थीम है...
खैर वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई का ट्रेलर जबसे देखा उसको देखने की इच्‍छा बनी हुई है...एक खास कारण ये भी कि उसमें प्राची देसाई अभिनय कर रही हैं जिनकी एक्टिंग के बारे में तो क्‍या कहें पर उनको पर्दे पर देखना बड़ा अच्‍छा लगता है बड़ी क्‍यूट हैं, फिल्‍म के गाने भी सुनने में और देखने में भी अच्‍छे लग रहे हैं.....पर एक तो शहर के फटीचर और टूटे-फूटे सिनेमाघर, ऊपर से आजकल साथ जाने वाला भी कोई नहीं.....दोस्‍त सब शहर से बाहर, बचे-खुचे व्‍यस्‍त....फिल्‍म देखने की किसी को फुर्सत नहीं....फिर भी साल-दो साल में शहर के किसी सिनेमाघर के दर्शन कर ही लेते हैं....
ऊपर से एक नया बवाल....जबसे मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍म देखी है तबसे शहर के सिनेमाघरों में जाने का मन बिलकुल भी नहीं होता....वैसे भी कौन-सा जाते ही थे....एक दिन गलती से चले गये...बहुत सी फिल्‍में देखने की इच्‍छा रहती है पर नहीं देखते...राजनीति छोड़नी नहीं थी सो एक छुट्टी वाले दिन चले गये....बड़ी मुश्किल से टिकट लेकर बालकनी में पहुंचे....एक भाईसाहब जो साथ आये थे उन्‍होंने कहा कि पिक्‍चर काफी निकल गई....बहुत देर तक बैठने की जगह ढूंढ़ते रहे....काफी समय बाद सोचा चलो नीचे हॉल में देखते हैं....वहां जगह मिल गई....कैटरीना कैफ को सोनिया गांधी समझकर फिल्‍म देखने आई ऑडियंस के हल्‍ले में सुनाई भी मुश्किल से दे रहा था..ऊपर से सिनेमाघर का साउंड सिस्‍टम और पिक्‍चर क्‍वालिटी भी बहुत धांसू थे...कुल मिलाकर पिक्‍चर तो खैर उतनी अच्‍छी लगी नहीं...पर उससे ज्‍यादा मलाल रहा बालकनी का टिकट लेकर हॉल में बैठकर पिक्‍चर देखने से...ऊपर से पिक्‍चर बहुत ध्‍यान लगाकर देखनी पड़ रही थी इतने घटिया साउंड सिस्‍टम और दर्शकों के हल्‍ले में....
बारहवीं में या कॉलेज में जब थे तब जरूर उन सिनेमाघरों की अहमियत हमारे लिए पीवीआर या एडलैब्‍स से कम नहीं थी...अब तो कोई पैसा देकर भी देखने को कहे तो सोचेंगे....
सीडी और डीवीडी भी फिल्‍म देखने का ठीक-ठाक जरिया है .... आज सुबह से सोच रहे हैं कि उड़ान की सीडी लेकर आयेंगे पर अब ब्‍लॉग लिखते समय याद आ रहा है कि सुबह ऐसा सोचा था....ठीक है एक आईडिया और है फिल्‍म देखने का, कुछ वेबसाइट ऑनलाइन फिल्‍म दिखाने की सुविधा भी देती हैं....गुलाल ऐसे ही देखी थी...तो सोचते हैं कि ऑनलाइन ही देखेंगे....पर ऑनलाइन भी साल या छह महीने में एकाध का औसत है...
आगे पीपली लाइव रिलीज होनी है....उसका भी इंतजार हो रहा है....
एक समस्‍या ये भी है कि फिल्‍म रिलीज के आसपास नहीं देख पाने से कुछ समय बाद देखने की इच्‍छा ही खतम हो लेती है....लगता है अब क्‍या देखें फिल्‍म में, देखने के लिए कुछ खास है ही नहीं....खास क्‍यों नहीं है इसका कारण भी सुन लीजिए...गाने सुन चुके, रिव्‍यू कई सारे पढ़ चुके, फिल्‍म की स्‍टोरी भी पता लग गई...अब कहीं फिल्‍म पिट गई या अपने टाइप की नहीं तो क्‍या देखना ऐसी फिल्‍म.....अपने टाइप की बोले तो जिन्‍हें लोग आजकल मल्‍टीप्‍लेक्‍स सिनेमा कहते हैं या छोटी स्‍टार-कास्‍ट और डिफरेंट सब्‍जेक्‍ट पे बनी फिल्‍में....मतलब शाहरुख, सलमान, रितिक टाइप बड़ी फिल्‍मों का तो अपन रिव्‍यू तक नहीं पढ़ते....क्‍यूंकि अपने लिए तो के.के.मेनन, विनय पाठक, राहुल बोस या कोंकणा सेन ही सब कुछ हैं....बाकी सो-काल्‍ड स्‍टार कहे जाने वालों की फिल्‍म में देखने लायक कुछ हुआ तो रिव्‍यू पढ़कर ही फारिग हो लेते हैं देखने की नौबत तो बहुत मुश्किल से आती है....
हालांकि फैमिली के साथ लिविंग रुम में हर टाइप की, गोविदा स्‍टायल हो या साउथ का नागार्जुन सबकी फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं...
पर हर बार नयी फिल्‍में रिलीज होती हैं...हम सोचते हैं कि अब देखेंगे या अबकी वीकेंड तो पक्‍का देखना ही है...पर हाय रे स्‍टार्स जिनकी बदकिस्‍मती से हम जैसे दर्शक उनको नसीब नहीं हो पाते... कारण शहर में कोई मल्‍टीस्‍क्रीन और सुविधायुक्‍त सिनेमाघर है नहीं, डीवीडी की दुकान तक जाने की जहमत हमने अरसे से उठाई नहीं और इंटरनेट भी हमारा इतना मरियल है कि बहुत जल्‍दी हांफने लगता है.....फिल्‍म रिलीज होकर पुरानी हो लेती है....फिर नयी फिल्‍में रिलीज होने का इंतजार करते हैं....फिर वो भी पुरानी हो जाती हैं....फिर इंतजार
लगता है आलसी प्रवृत्ति काम से लेकर मनोरंजन तक सबमें घुस गई है....चलूं अपने एक मित्र हैं उनसे कुछ टिप्‍स लूं....बेचारे बड़ी मेहनत करके बॉलीवुड की हर नयी रिलीज देखते हैं...काम भले रुक जाये पर फिल्‍म देखना नहीं छूटता...शायद उनसे कुछ सीखकर महीने में एकाध ही सही फिल्‍म देखने का लुत्‍फ तो मिले

Monday, February 15, 2010

अकेला राही- कविता

मैं स्‍वयं बढ़ता चलूंगा
और को मैं क्‍यों बुलाऊं

राह भी मैं खुद बनाऊं
चाल भी चलकर बताऊं
साथ में कोई न आये
राही चिन्‍ह का पत्‍थर बने
सदियों की सदियां गुजारे
दूसरा राही तब उसे
और थोड़ी दूर चलकर
वह भी चिन्‍ह का पत्‍थर बने

ऐसे युगों के बीतने पर
शाश्‍वतों की डग बने
फिर वहीं अवतार आयें
स्‍वयं चल कंटक डगर पर
शूल पग से सोख जायें
तब कहीं दुनियां चलेगी
सत्‍य शिव की राह पर

तू रोक मत डग खोदना
मत किसी की परवाह कर
स्‍वयं अकेला बढ़ता चल
और को तो मत बुला
ऐसे मेरे हैं विश्‍वास
मैं किसी को क्‍यों बुलाऊं

मैं स्‍वयं बढ़ता चलूंगा,
और को मैं क्‍यों बुलाऊं

- बाबू विद्यारामजी गुप्‍ता द्वारा दिनांक 2-2-1972 को रचित

Saturday, February 13, 2010

कुछ दिन तो जी लूं और

कुछ दिन तो जी लूं और
अब तक रही जिलाती मुझको
मां का अंक, पिता की उंगली
गुरू की शिक्षा, मित्र की बगली
नभ के तारे, नभ की बदली
यौवन की वह स्‍वयं कल्‍पना
आशा नव जीवन निर्माण की
भुजबल का व्‍यर्थ डींगना
रचने डग, नव निर्माण की
आशायें काफूर हुईं
अड़ी निराशा मध्‍य कंठ में
उसे निगल बाद करने जुगाली
दुनिया को सब स्‍वाद बताने
और मूर्खता पर पछताने
कुछ दिन तो जी लूं और

- बाबू विद्याराम गुप्‍ता द्वारा 26-11-1977 को रचित

Tuesday, January 19, 2010

जिंदादिल जिंदगी के सफहों पर तजुर्बे की सुर्ख इबारत - बाबू विद्यारामजी गुप्‍ता

कहने को तो उनके व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व के बारे में एक संक्षिप्‍त-सा परिचय यहां रखा जा सकता है...परंतु उनके जीवन की किताब के सफहों से बहुत ज्‍यादा रूबरू होने का मौका मुझे नहीं मिल पाया है...और उनके बारे में जितना जान पाता हूं उससे ज्‍यादा जानने की उत्‍कंठा बार-बार जोर मारती रहती है...और जितना जान पाऊंगा उतना जान करके भी एक अफसोस रहेगा और ज्‍यादा ना जान पाने का और अंदर एक ये गर्वानुभूति भी साथ में रहेगी कि कम से कम जीवन में उन जैसे व्‍यक्तित्‍व को इतने निकट से जानने का और उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिल सका या यों कहें कि एक पूरा जीवन-दर्शन विकसित कर पाने के लिए उनके जैसा पथप्रदर्शक जीवन में मिला...

मैं बात कर रहा हूं मेरे सीनियर एडवोकेट और मेरे गुरू बाबू श्री विद्याराम गुप्‍ताजी के बारे में...जिनके सान्निध्‍य में मुझे वकालत के व्‍यवसाय को शुरू करने का अवसर मिला...विगत वर्ष से ही मैंने उनके साथ एक जूनियर के नाते काम शुरू किया...

कल कोटा,राजस्‍थान के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता श्री दिनेशराय द्विवेदीजी, जिन्‍हें मैं अपना गुरू और मार्गदर्शक भी मानता हूं, ने अपने ब्‍लॉग पर हिंदी के विख्‍यात साहित्‍यकार रांगेय राघवजी के बारे में लिखा था....कल रात ही मेरी उनसे बात हुई थी, मैंने उन्‍हें बताया भी था कि बाबू विद्यारामजी ने अपने छात्र जीवन में रांगेयजी के साथ आगरा में काफी समय बिताया...बाबूजी से ही कुछेक बार उनका नाम भी मैंने सुन रखा था. ...द्विवेदी सर ने बाबूजी से मिलने की और उनके बारे में जानने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी तो मैंने उन्‍हें सहर्ष मुरैना आने का निमंत्रण दे डाला...देखते हैं मेरे दोनों ही मार्गदर्शक और प्रेरणापुरूष शख्सियतों की मुलाकात कब संभव होती है....इस बहाने मुझे भी पहली बार द्विवदीजी से मिलने का सौभाग्‍य मिलेगा...खैर आज दिमाग में आया कि क्‍यों ना ये ब्‍लॉग ही बाकी लोगों के लिए बाबूजी से परिचित हो पाने का माध्‍यम बने...

अपने निवास स्‍ि‍थत कार्यालय में बाबूजी
बकौल पंडित नेहरू भारतवासियों के 'नियति के साक्षात्‍कार' वाले दिन से भी पहले 4 अगस्‍त सन् 1947 के दिन से लेकर अनवरत रूप से बाबूजी वकालत में आज भी 63 वर्षों से सक्रिय बने हुए हैं....छात्र जीवन के दिनों में भारत छोड़ो आंदोलन के समय से ही कम्‍युनिस्‍ट पार्टी से जुड़कर स्‍वाधीनता आंदोलन के लिए काम करने और काफी समय भूमिगत रहने से लेकर आजादी के बाद भी लंबे समय तक राजनीतिक गतिविधियों में पूरे जोर के साथ सन् 1977 तक सक्रिय रहने और उसी समय पार्टी और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था की कमियों के कारण मोहभंग होकर राजनीति छोड़ने तक उन्‍होंने एक लंबा सफर तय किया....शायद ही किसी को मालूम होगा कि सन् 1942 में बाबूजी ने ही पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी का कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में प्रवेश कराया...जब वे कॉलेज में साथ-साथ पढ़ाई कर रहे थे...बाद में किन्‍हीं कारणों से अटलजी संघ से जुड़ गए...

मध्‍यप्रदेश के उत्‍तरी छोर पर स्थित जिले मुरैना की तहसील अम्‍बाह में 1923 में बाबूजी का जन्‍म हुआ....छात्र जीवन का लंबा सफर ग्‍वालियर में गुजारने के बाद आगरा से एल.एल.बी की डिग्री लेकर बाबूजी ने अम्‍बाह कस्‍बे में ही आकर वकालत शुरू की...कुछ समय बाद जिला मुख्‍यालय पर आकर जिला अदालत पर अपने व्‍यवसाय में नाम कमाते हुए ग्‍वालियर उच्‍च न्‍यायालय में भी काफी वर्षों तक प्रैक्टिस करते रहने और सफलता के लगातार सोपान तय करने के बाद सन् 1972 में एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल होकर और महीनों बिस्‍तर पर पड़े रहकर अपनी अदम्‍य इच्‍छाशक्ति के बल पर फिर उठ खड़े हुए....उसके बाद से मुरैना जिला मुख्‍यालय पर लगातार सभी अदालतों दीवानी, फौजदारी, रेव्‍हेन्‍यू इत्‍यादि सभी में सफलता के उच्‍चतम पायदान पर पहुंचने के बाद मुरैना जिला अधिवक्‍ता परिषद् के वरिष्‍ठतम अधिवक्‍ता के तौर पर आज भी पक्षकारों को अपनी सेवायें दे रहे हैं....आसपास के कई जिलों में और मध्‍यप्रदेश उच्‍च न्‍यायालय ग्‍वालियर खंडपीठ में अपनी सफलता के झंडे गाढ़ने के पश्‍चात इस व्‍यवसाय के इतिहास पुरूष के रूप में उनका नाम उनके जीवित रहते ही लिया जाता है....जिन्‍हें यहां के अधिवक्‍तागण अधिवक्‍ता परिषद् के पितामह के नाम से भी संबोधित करते हैं....पिछले काफी समय से बाकी क्षेत्रों को छोड़कर केवल फौजदारी मुकदमों तक ही उन्‍होंने खुद को सीमित कर रखा है....और इस क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता को देखते हुए पूरे प्रदेश-भर की न्‍यायपालिका के लोग(जो उन्‍हें जानते हैं या जिन्‍होंने उनके बारे में सुना है) उनके सामने नतमस्‍तक हैं

हम जूनियर्स के साथ बाबूजी: बायें से- धर्मेंद्र तिवारीजी, बाबूजी और मैं

उनके व्‍यक्तित्‍व के कई आयाम हैं...जब वे किसी विषय पर बात करते हैं तो उन्‍हें सुनना एक बेहतरीन अनुभव होता है...प्रखर वक्‍ता और विद्वान होने के साथ-साथ उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का है....एक पूरे इतिहास को वे स्‍वयं में समेटे हुए हैं...उनकी भाषा शैली और उनकी कहावतें जिन्‍हें लोग अक्‍सर पहली बार ही सुनते हैं का भी एक निराला अंदाज है....एक और सबसे बड़ी बात है उनकी बोल्‍डनेस....जिस बिंदास तरीके से वे अपनी बात रखते हैं उनसे रूबरू होने वाले व्‍यक्ति को अहसास हो जाता है कि शायद ही वो अपने जीवन में ऐसे बोल्‍ड और स्‍पष्‍टवक्‍ता से रूबरू हुआ हो और आगे कभी होगा.... राजनीतिक सफर से विदा लेने के बावजूद सामाजिक रूप से आज भी वे सक्रिय हैं और अब भी उसी दमखम से बात करते हैं जैसे अपने युवाकाल में मंच से हजारों की भीड़ को संबोधित करते नजर आते थे....आज भी माइक पर उन्‍हें सुनना विरल अनुभव है हालांकि ऐसे मौके आजकल बिरले ही होते हैं....आज भी 87 वर्ष की उमर में सुबह पांच बजे उठकर रात तक लंबे समय तक काम करते रहने के बावजूद ऊर्जा से हर समय लबरेज नजर आते हैं.....लोग उनकी इस ऊर्जा का कारण पूछते हैं तो वे हंसकर कहते हैं- हम बस हंसते रहते हैं और काम करते रहते हैं...ज्‍यादा कुरेदने पर अक्‍सर वे इस पंक्ति को दोहरा देते हैं- 'जिंदगी जिदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्‍या खाक जिया करते हैं.'

वे अक्‍सर कहते हैं क‍ि एक वकील और सफल वकील बनने के लिए सबसे जरूरी है कि आपको मानव-मनोविज्ञान की गहरी समझ हो....उनके बारे में उनके कनिष्‍ठ अधिवक्‍तागण मजाक करते हैं कि वे आदमी का जूता देखकर बता सकते हैं कि फलां व्‍यक्ति कैसा है...और भले ही लोगों को अतिश्‍योक्ति लगे पर इस बात पर अविश्‍वास करना भी मुश्किल ही लगता है...बहुत से लोग उन्‍हें इन्‍हीं बातों के कारण बहुत बड़ा ज्‍योतिषी भी समझते हैं....

खैर एक और सबसे महत्‍वपूर्ण पक्ष है साहित्‍य के प्रति उनका प्रेम और उनका खुद का शोधकर्म और रचनाकर्म....चंबल के इस बीहड़ी इलाके में रहकर इस क्षेत्र का गांव-गांव वे घूमे हैं....बहुत कठिन मार्गों की यात्रा करके और अपने साथियों के राजनीतिक सफर में उनके चुनाव अभियान की जिम्‍मेदारी उठाने के साथ में यहां के लोगों को, गांवों को, उनकी कठिनाईयों को, बीहड़ी जीवन के आतंक को, उसके कारणों को, उसके प्रभावों को और उसके विविध पक्षों को जानने और समझने के लिए उन्‍होंने सैकड़ों किलोमीटर के क्षेत्र में आसपास के पड़ौसी राज्‍यों तक में भटकने का संघर्ष भी किया है....चंबल की डकैत समस्‍या पर इस शोध को को उन्‍होंने एक पुस्‍तक में संकलित किया है....पुस्‍तक का नाम है 'डाकू समस्‍या का अभिशाप- खोजपूर्ण विवेचन, कारण व हल'...प्रकाशन वर्ष है 1972....पुस्‍तक में उन्‍होंने इस समस्‍या की एतिहासिक पृष्‍ठभूमि में इसके कारण, इसकी उत्‍पत्‍ित और समस्‍या के बने रहने में विभिन्‍न कारकों के योगदान, यहां की जातीय संरचना, भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों जैसे विभिन्‍न पहलुओं की विवेचना के साथ जो सबसे महत्‍वपूर्ण बात प्रस्‍तुत की है वो है- इस समस्‍या के निदान के उपाय....

इसके अलावा उन्‍होंने विगत पांच-छह दशकों में समय-समय पर कविताएं भी लिखी हैं जो सैकड़ों की तादाद में हैं और अब तक अप्रकाशित हैं....अपनी काव्‍य-रचना में उन्‍होंने राजनीतिक और सामाजिक व्‍यंग्‍य के साथ-साथ हास्‍य और प्रेम जैसे विषयों पर भी कागज रंगे हैं साथ ही दुनियावी दर्शन और जीवन को प्रभावित करने वाले लगभग सभी पहलुओं पर उन्‍होंने अपने विचारों को कविता में पिरोया है....अंग्रेजी भाषा में रचित कविताओं से भी उनकी दशकों पुरानी डायरियां भरी पड़ी हैं....

अपने व्‍यस्‍त जीवन में कई विषयों पर लिख पाने और खासकर कानूनी विषयों पर लिख पाने के लिए बहुत सी बार उन्‍होंने सोचा...पर किन्‍हीं कारणों से ऐसी योजनाएं मूर्त रूप नहीं ले सकीं.... बहुत अधिक व्‍यस्‍तता और पारिवारिक जिम्‍मेदारियों से राहत पाने और पंद्रह वर्ष पहले हुई बाईपास सर्जरी के कारण अब उनका इरादा काम को धीरे-धीरे खतम करके केवल लेखन का है....हालांकि वे अपने इस इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए हर साल रिटायरमेंट की बात करते हैं और इस साल भी कर रहे हैं....पर सभी लोग जानते हैं कि उसका एक्‍सटेंशन होना है... और वे अपना काम बंद नहीं करने वाले....

इस वर्ष मेरा उनसे आग्रह है कि वे अपनी काव्‍य रचनाओं को प्रकाशित कराने हेतु कुछ समय निकालें....मैं स्‍वयं इसके लिए प्रयास कर रहा हूं...पर बहुत से देशज शब्‍दों और प्रूफ संबंधी बातों व अन्‍य पहलुओं को लेकर उनका बहुत-सा समय मुझे चाहिए होगा....देखते हैं बात कब तक आगे बढ़ती है और एक पुस्‍तक के रूप में उनके चाहने वालों के हाथ में कब तक पहुंचती है....वैसे प्रयास तो ये है कि इस वर्ष ये पुनीत कार्य संपन्‍न कर लिया जावे....साथ ही डकैत समस्‍या को लेकर भी उनकी पुस्‍तक पुनर्प्रकाशित करा ली जाये ऐसा भी प्रयास रहेगा....इंटरनेट पर भी उनके रचनाकर्म को लाने का प्रयास इस वर्ष रहेगा....जब मैंने उनसे इस बारे में एक बार बात की तो उन्‍होंने पुस्‍तक के प्रकाशन के पश्‍चात उसका विमोचन अपने छात्र-जीवन के साथी और मित्र अटलजी से कराने की बात कही....देखें कब और कितनी जल्‍दी ये सब संभव हो पाता है...

बाकी अंत में एक बात उन्‍हीं के शब्‍दों में कहना चाहूंगा जो वे अक्‍सर कहा करते हैं- हर आदमी में एक खुशबू होती है, आप कोशिश कीजिए और अपनी खुशबू दूर-दूर तक फैलाईये.....उनके साथ रह पाने पर उनकी खूशबू चरम रूप में महसूस कर पा रहा हूं....उनके स्‍वस्‍थ एवं सक्रिय बने रहने की कामना के साथ इन शब्‍दों की गति को यहीं विराम दे रहा हूं...

Saturday, January 16, 2010

अच्‍छा एक्‍टर होना ही सफल होना है

फलां व्‍यक्ति कैसा है....उसमें क्‍या अच्‍छा है...क्‍या खराब है इसका विश्‍लेषण सतत चलता रहता है उसके आसपास के जनमानस में....और एक ही व्‍यक्ति के बारे में सामान्‍यतया अलग-अलग राय बना लेते हैं लोग...जिनको उससे बेहतर रिस्‍पांस मिल रहा है उसके लिए वो बढि़या है...भले वो उसे केवल मतलब निकल जाने तक या मतलब का होने से ही ऐसा कहते है...बाकी कुछ लोग उसकी बुराई करते भी पाये जा सकते हैं...जरूरी नहीं कि उसमें बुराई हों भी ना.
जैसे एक आदमी ऑफिस में अच्‍छा बॉस हो सकता है पर बीवी के लिए अच्‍छा पति नहीं....
साधारणतया कहा जाता है कि जो व्‍यक्ति अच्‍छा इंसान होता है वो सभी के लिए अच्‍छा होता है....हो सकता है कुछ लोग उसे अपने माफिक ना पाकर उसे अच्‍छा ना भी कहें...
पर बहुमत ऐसे लोगों का ही है जिनका व्‍यवहार किसी व्‍यक्ति के प्रति एक तरह का है तो दूसरों के प्रति दूसरी तरह का, परिस्थिति के अनुसार भी व्‍यवहार में परिवर्तन संभव है....कई लोग काम के दिनों में बहुत चिढ़चिढे़ होते हैं और छुट्टी में बड़े खुशमिजाज इंसान की तरह पेश आते हैं...कई बातें हैं जो इंसानी व्‍यवहार पर प्रभाव डालती हैं..

पर भाई आजकल सेल्‍फ इंप्रूवमेंट बुक्‍स का जमाना है....कई लोग खुद के व्‍यवहार में सकारात्‍मक बदलाव की खातिर इनको आजमाते भी हैं....मैं तो मानता हूं ये सब बहुत मजबूत इच्‍छाशक्ति वाले लोगों के बस की बात है कि खुद की कमियां खोजकर, खुद पर कंट्रोल कर और आदतों में बदलाव लाकर खुद को बेहतर बनाने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं
पर ये तथ्‍य तो स्‍वीकार करना ही पड़ेगा कि ज्‍यादातर लोग अपनी आदतों से मजबूर होते हैं....वे खुद को बदल पाने में खुद को लाचार ही महसूस करते हैं या इसकी ओर ध्‍यान नहीं देते या उनको इस बारे में सोचने का वक्‍त ही नहीं..

इन सबके बीच सबसे महत्‍वपूर्ण बात जो हमारे अंदर घूमती रहती है कि हमें अपने प्रोफेशन में, दिनचर्या में और बाकी बहुत से कामों में बहुत से लोगों से डील करना होता है और अपना काम निकालना होता है....ऐसे में हमें खुद के लिए बेहतर नतीजे पाने के लिए क्‍या करना होगा?... ये सबसे ज्‍यादा जरूरी बात है....

हमें खुद को अलग-अलग परिस्थिति और अलग-अलग लोगों के सामने खुद का प्रिजेंटेशन ऐसा रखना होगा कि हमारा काम निकल जाए और सामने वाले से हम जो चाहते हैं वो पा सकें.....चूंकि हमारा जो प्रयास है वो सफलता के लिए हो रहा है सो उसके माफिक हमें खुद के व्‍यवहार में कुछ बातें शामिल करनी होंगी..

हमें ऐसे लोगों से भी काम निकालना है जिन्‍हें हम कतई पसंद नहीं करते...और ऐसे लोगों से भी जो बहुत ही अकड़ू और ढीठ मिजाज के होते हैं....पर हमारी मजबूरी है कि हमें उनके साथ काम करना है या उनके साथ रहना है...हर जगह हमें एक बैलेंस बनाकर चलना है....जिस व्‍यक्ति को हमें गाली देने का मन हो रहा है उसके साथ बहुत ही भद्र तरीके से व्‍यवहार कर हमें तालमेल बिठाना पड़ता है और जहां जरूरत स्‍ट्रेटफॉरवर्डनेस की है वहां वैसे ही बनना पड़ेगा, कभी जानबूझकर किसी को इग्‍नोर भी करना पड़ता है उसे कुछ समझाने हेतु और कभी जिनकी चांद पर जूते बजाने का मन होता है उनके चरण-स्‍पर्श भी करने पड़ सकते हैं.....

कुल मिलाकर लुब्‍बेलुआब ये है कि हमें सामने आने वाली परिस्थिति में से अपना रास्‍ता बनाते हुए निकल जाना है तो हमें उसके अनुरूप व्‍यवहार करना होगा....हम अक्‍सर नेताओं को गालियां देते हैं पर कभी नजर डालिए अपने आसपास के नेता प्रजाति के जीवों पर...कई बार जब हम उनसे मिलते हैं तो वे हमें अपने व्‍यवहार से, विनम्रता से गदगद कर देते हैं...वे वाकई में इंसान कैसे भी होने के बावजूद एक्‍टर बड़े कमाल के होते हैं....और यही स्किल उनकी सफलता का राज भी है..

हमें भी हम जैसे हैं, जो हैं के बजाय खुद को इस तरह से पेश करने की कला सीखनी चाहिए कि सामने वाले को वह जंचे...भले हम उससे बात तक नहीं करना चाहते पर उसे हमारी बातों से ऐसा लगे कि हम उससे बात करके, उससे मिलकर बड़े खुश हैं...उसे ऐसा एहसास हो कि हमने उसे बड़ी तवज्‍जो दी....बाकी चाहे अंदर से मन कह रहा हो कि लगाओ चार जूते साले की चांद में....नैतिकतावादी या आदर्शवादी टाइप की प्रजाति मेरी बातों से कुछ बवाल मचाने लायक मसाला खोज सकती है....पर सौ में से निन्‍यानवे बेईमानों के देश में आपको रहना है और इन्‍हीं के बीच में रहना है और इनसे ही काम निकालना है तो आपके लिए यही सही रास्‍ता है कि सबसे बनाकर चलें...नहीं तो खामखा आप अपने लिए रास्‍ते बंद कर लेंगे....
और रही गलत-सही की बात तो इस देश में इतना कुछ गलत हो रहा है कि भगवान के करे से भी नहीं रुकने वाला...हमें बस ऐसे में ये खयाल रखना है कि हम कहीं आदर्शवाद के चक्‍कर में पड़कर खुद का ही नुकसान ना कर बैठें और खुद को चिड़चिड़ा, अलग-थलग कहलाये जाने से बचा सकें.....
ऐसे में आपकी बेहतर एक्टिंग स्किल ही आपके अस्तित्‍व को बचा पायेगी. क्‍या खयाल है?

( उक्‍त विचारों में डेल कारनेगी के साहित्‍य और स्‍वयं के अनुभवों की बैठे-ठाले खिचड़ी बन गई है। बाकी आगे बहस की गुंजाइश है सो फुरसत मिलने पर...)

Wednesday, December 30, 2009

रिमोट कंट्रोल से ही चल पायेगा ये लोकतंत्र

आज के दैनिक भास्‍कर में वेदप्रताप वैदिक ने भारतीय राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की भूमिका के बारे में लिखा है...उनकी भूमिका और प्रबल हो ऐसा लोकतंत्र और राष्‍ट्र दोनों के हित में है ऐसा वे कहते हैं...साथ ही सबसे बड़ा मुद्दा उन्‍होंने उठाया है दोनों पार्टियों के अंदर के आंतरिक लोकतंत्र का...उन्‍होंने भारतीय जनता के ऊपर थोपे हुए नेता जो कि जनता के अपने नहीं हैं, द्वारा शासन किये जाने की विडंबना पर चिंता व्‍यक्‍त करने के साथ बताया है कि इन नेताओं का रिमोट कंट्रोल कहीं और ही है.

वैदिकजी की बात से असहमत होने की कोई वजह नहीं है परंतु जो बातें उन्‍होंने कहीं यदि ऐसा वाकई में संभव हो जाए और गांधी परिवार कांग्रेस को एवं अन्‍य पार्टियों के अपने-अपने रिमोट कंट्रोलर उन्‍हें रिमोट कंट्रोल से संचालित करने की बजाय खुला छोड़ दे और आंतरिक लोकतंत्र विकसित होने देने लायक परिस्थितियां उत्‍पन्‍न हो सकें तब क्‍या स्थिति होगी क्‍या इसकी कल्‍पना नहीं की जानी चाहिए?.....हालांकि जो रिमोट कंट्रोल वाली कहावत है वह केवल कांग्रेस में ही नहीं है...ऐसा दल जिसका केवल एक ही सांसद या दो-चार ही एमएलए होंगे वहां भी यही स्थिति देखने मिलेगी.

एक साधारण व्‍यक्ति जो थोड़ी-बहुत राजनीति में दिलचस्‍पी लेता है वह भी निश्चित रूप से इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचेगा कि हर पार्टी में जो आका बैठा हुआ है यदि उसकी पार्टी पर पकड़ ढीली हो जाए या उसके बिना पार्टी की कल्‍पना करके देखें तो हमें केवल और केवल अराजकता नजर आयेगी...हां कुछ समय के लिए ये हो सकता है कि यदि उनके पास सत्‍ता है तो वे अपने हितों को ध्‍यान में रखकर एक-दूसरे से चिपके रहें....पर अंतत: सिर-फुटौव्‍वल ही होना है...उदाहरण देने की यहां आवश्‍यकता यों नहीं कि ये सभी बातें लोगों ने विगत काफी समय से अनुभव की ही होंगी....हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र ही इस प्रकार का है कि हम कभी विचारधारा को तवज्‍जो दे ही नहीं सकते...हमें कोई मसीहा चाहिए, हमें चमत्‍कारिक नेता चाहिए, हमारी आस्‍थाओं में सामंतवाद अभी भी जिंदा है....व्‍यक्तिपूजा से दूर हम रह नहीं सकते.... ऐसी स्थिति में सत्‍ता की चाबी जनता से कुछेक लोगों या परिवारों तक पहुंच जाना सहज ही है...फिर वे चाहे उसका कैसा ही दुरुपयोग करें...हम एक व्‍यक्ति विशेष को इतना शक्तिशाली बना देते हैं कि पार्टी में बाकी लोगों को यदि अपना अस्तित्‍व कायम रखना है तो उसको शीश नवाना ही पड़ेगा, इसीलिए कोई पार्टी व्‍यक्ति-विशेष के रिमोट से संचालित उपकरण बनकर रह जाती है.....

जब ऐसी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र लागू कर दिया जाए तो इतने मतभेद उभरकर सामने आयेंगे कि उसका हाल जनता पार्टी जैसा हो जाएगा...जैसा आज लोगों को पता ही नहीं कि कौन सी जनता पार्टी जनता पार्टी है और बाकी जनता पार्टियां जाने कितने व्‍यक्ति-विशेषों की तिजोरियों में बंद हैं...

बड़ी ही विचित्र विरोधाभासी स्थिति है....जैसा कि वैदिक कहते हैं कि सही मायने में लोकतंत्र स्‍थापित होने के लिए जरूरी है कि पार्टियों में भी आंतरिक लोकतंत्र हो....वाकई ये एक आदर्श स्थिति है...परंतु हमारी भारतभूमि पर रोना ये है कि यदि ऐसा आंतरिक लोकतंत्र पार्टियों में हो जाए तो ये सब लड़-झगड़कर लोकतंत्र का सब रायता ही फैला दें...और पार्टी के इतने टुकड़े कर दें कि पता ही ना चले कि हम किस पार्टी और किस आंतरिक लोकतंत्र की बात कर रहे थे... इसलिए कम से कम रिमोट कंट्रोल से ही सही और दिखावे के लिए ही सही लोकतंत्र तो चल ही रहा है...बाकी वैदिकजी के लेख पर यही कहा जा सकता है कि 'दिल के खुश रखने को वैदिकजी ये खयाल अच्‍छा है'

Monday, June 15, 2009

ये बेजुबान भी हमारे अपने हैं

कुछ समय पहले मेरे पास एक एसएमएस आया जिसे यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं-

HUMBLE REQUEST:
Plz keep a bowl in ur balcony or window so that BIRDS can drink water as it too hot this summer for all lives...plz fwd it to all..

बचपन में मैं हमेशा पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम कर देता था...पर कुछ समय से थोड़ा आलसी हो गया हूं...पर मेरी एक रिश्‍ते की बहन ने एसएमएस करके फिर से मुझे इसके लिए उकसाया और अपना आलस त्‍यागकर छत पर गया तो दो पुराने मटके रखे हुए थे। उनके ऊपरी हिस्‍से को काटकर मैंने उनमें पानी भरा और अलग-अलग जगहों पर रख दिया।
इस एसएमएस को यहां रखने का यही उद्देश्‍य सभी को इसके लिए उकसाना है कि अपने घरों की छतों, बालकनियों, छायादार स्‍थानों पर गर्मियों में मिट्टी के बर्तन या पुराने मटकों इत्‍यादि में पानी भरकर रखें जिससे बेचारे प्‍यासे पक्षी अपना कंठ तर कर सकें।
वैसे भी हमारे भारत में प्‍यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्‍य माना गया है तो क्‍यों ना मुफ्त में पुण्‍य भी बटोर लें :-) ।

Sunday, June 14, 2009

जरूरतें कम करके भी आप पर्यावरण को बचा सकते हैं


सबसे पहले तो अपन स्‍पष्‍ट कर दें कि अपन यहां पूंजीवाद, साम्‍यवाद, समाजवाद या और किसी वाद या विचारधारा पर बहस की शुरूआत नहीं कर रहे। फिलहाल जो दुनियाभर में हल्‍ला मचा हुआ है ग्‍लोबल वार्मिंग का और उसके लिए जो प्रयास हो रहे हैं वो कितने मायने रखते हैं जब तक हम एक व्‍यापक परिवर्तन या ठीक से कहें तो जीवनशैली में परिवर्तन को एक मुद्दा नहीं बनाते। मेरा मानना है कि आज के इंसान की जीवनशैली संबंधी जरूरतें इसी तरह बढ़ती रहें और साथ ही हम ग्‍लोबल वार्मिंग व पर्यावरण की ढपली भी बजाते रहें तो उससे कोई सुधार आ सकेगा ऐसा लगता तो नहीं।
आज की मुक्‍त बाजार व्‍यवस्‍था और पूंजीवाद के घनघोर समर्थक चाहते हैं कि लोगों की जरूरतें बढ़ें, लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा उपभोक्‍ता सामान खरीदें, उन्‍हें किसी भी तरह ललचाकर बाजार तक खींचा जाए और यही एक बढ़ती और तरक्‍की करती हुई अर्थव्‍यवस्‍था का मूलमंत्र है। इसी विषय पर मैंने काफी समय पहले एक पोस्‍ट लिखी थी (पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) जिसमें मैंने मुद्दा उठाया था कि किस प्रकार पूंजीवादी व्‍यवस्‍था लोगों की जरूरतें बढ़ाने और बेवजह के सामानों का निर्माण कर उन्‍हें बहुत ही आवश्‍यक वस्‍तु के रूप में प्रचारित कर बाजार में खपाने की है। पूंजीवाद के समर्थकों का कहना है कि इस व्‍यवस्‍था के अलावा फिलहाल कोई विकल्‍प नहीं है और ये व्‍यवस्‍था लोगों का जीवन-स्‍तर सुधारने और उपभोक्‍ता वस्‍‍तुओं तक उनकी पहुंच सुलभ बनाने के लिए कारगर साबित हुई है परंतु धरती पर दिनोंदिन बढ़ रहा कचरा, ई-कचरा, संसाधनों का अंधाधुंध शोषण, कटते जंगलों के लिए क्‍या यही व्‍यवस्‍था उत्‍तरदायी नहीं है। केवल और केवल यही कारण है कि मुझे इस व्‍यवस्‍था से चिढ़ है चूंकि पर्यावरण के लिए बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍थाएं और बढ़ते बाजार एक अभिशाप बन चुके हैं और ध्‍यान देने वाली बात ये है कि इन बाजारों में आम इंसान की जरूरत की चीजों के अलावे जो अधिकांश चीजें खपाई जा रही हैं उनकी वास्‍तविकता में कोई जरूरत व औचित्‍य नहीं है पर बाजार बढ़ाना है, मुनाफा बढ़ाना है अर्थव्‍यवस्‍था बढ़ानी है और सबसे बड़ी बात ये है कि दूसरे देशों से आज के युग में प्रतिद्वंदिता भी करनी है और मुनाफे की इस रेस के लिए चाहे कितनी भी कुर्बानी देनी पड़े सब जायज है।
लोगों को मेरी बात कष्‍ट पहुंचा सकती है...कुछ लोग ये भी कहेंगे कि पैसा जो मैं अपनी मेहनत से कमाता हूं उसे खर्च करने की मुझे पूरी आजादी है पर क्‍या एक इंसान होने के नाते आपकी जो जिम्‍मेदारी है उसके लिए क्‍या आपने सोचा है।
हालांकि इसमें लोगों का दोष भी नहीं है....उन्‍हें जो सिखाया जाता है वे वैसा ही करते हैं। आजकल के बच्‍चे जो पैदा होते ही टीवी देखकर बड़े हो रहे हैं वे बड़े होकर इन सब बातों को कैसे समझ पायेंगे। आज की बाजार व्‍यवस्‍था एक ऐसा समाज तैयार कर रही है जिसमें उसे केवल उपभोक्‍ता ही नहीं बनाने हैं बल्कि उनकी सोच, उनकी आदतों का भी निर्माण करना है और ऐसे ही लोगों की जरूरत है इस सिस्‍टम को।
महात्‍मा गांधी का वो प्रसिद्ध कथन तो सबने पढ़ा होगा कि ये धरती लोगों की जरूरतें पूरा करने में सक्षम है पर उसके लालच को नहीं। पर फिर भी बाजार व्‍यवस्‍था के समर्थक कुतर्क करने से बाज नहीं आने वाले जबकि बाजार व्‍यवस्‍था और बढ़ता हुआ लालच एक दूसरे के पर्यायवाची हैं और दुनिया को लगातार लालची बनाते जाने के दुष्‍परिणाम हम अभी से देख ही रहे हैं।
ब्राजील में अमेजन के घने जंगल जिन्‍हें धरती के फेफड़े भी कहा जाता है उन फेंफड़ों में भी यही लालची बाजार व्‍यवस्‍था कैंसर की तरह प्रवेश कर चुकी है। पर फिर भी लगता है कि पर्यावरण सरकारों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है सभी मुद्दों का केंद्र है बढ़ती हुई अर्थव्‍यवस्‍था जिससे उद्योगपति भी खुश, उपभोक्‍ता भी खुश और टैक्‍स से अपनी जेबें भरने वाली सरकारें भी खुश।
एक साधारण समझ की बात है एक तरफ तो हम अपनी जरूरतों को बढ़ाने में लगे हुए हैं दूसरी तरफ पर्यावरण की भी बात कर लेते हैं। ये दोनों ही बातें घोर विरोधाभाषी हैं....जैसे हम पानी बचाने की बात करते हैं पर पैसा होने पर घर में खुद का स्‍वीमिंग पूल बनवाने से भी नहीं कतराते। जबकि जितनी भी लग्‍जरी सुविधाएं हैं उन्‍हीं की कीमत हम चुका रहे हैं।

खैर इस तरह की उपदेशात्‍मक बातें करके भी हम क्‍या उखाड़ लेंगे। आईये आज हम मिलकर संकल्‍प लेते हैं कि बाजार से केवल उन्‍हीं सामानों को खरीदेंगे जिनकी हमें जरूरत है। केवल विज्ञापनों से प्रभावित होकर, पड़ौसियों व रिश्‍तेदारों से प्रभावित होकर हम बाजार का रुख नहीं करेंगे। यही एक मंत्र है जिसको हमें आत्‍मसात करना होगा यदि वाकई हम पर्यावरण के प्रति सचेत हैं।

Sunday, June 07, 2009

सभी हिंदी ब्‍लॉगर्स से पर्यावरण के हित में एक अनुरोध


परसों विश्‍व पर्यावरण दिवस था, इस प्रकार के औप‍चारिक दिवस चूंकि दिखावा बन कर रह गये हैं सो लोगों ने इस ओर ध्‍यान देना ही बंद कर दिया है हालांकि पहले भी इनको कितनी तवज्‍जो दी जाती थी यह सभी जानते ही हैं...बस चंद बड़े अखबारों में सरकारी विज्ञापन और संपादकीय लिखने भर की रस्‍म-अदायगी करके दिवस मना लिया जाता है पर फिलहाल अपन इस तरह की बातों का रोना-धोना मचाकर खुद को बुद्धिजीवी साबित नहीं करना चाहते सो कुछ ठोस बात करते हैं।

काफी दिनों से सोच रहा था कि ऐसे कौन से उपाय हैं जो हम अपने पर्यावरण को बचाने और इस धरती को लाखों-सालों तक जीवित बनाये रखने के लिए अपना सकते हैं। वैसे जहां बिगड़ते पर्यावरण के बावजूद लोगों को गैरजिम्‍मेदाना हरकतें करते देखता हूं तो खून खौल उठता है परंतु फिर भी हमारे आसपास अक्‍सर ऐसे सज्‍जन लोग मिल ही जाते हैं जो अपने पर्यावरण के लिए वाकई ईमानदारीपूर्ण प्रयास कर रहे हैं पर मुझे लगता है कि ऐसे एकल प्रयासों के साथ-साथ सामूहिक प्रयासों की भी आवश्‍यकता है और मेरा मानना है कि हमारा हिंदी ब्‍लॉगर्स का जो इतना बड़ा समुदाय है वह साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ संकल्‍प ले और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करे तो लाखों-करोंड़ों नहीं तो कुछ हजार लोगों का ये कदम बहुत छोटा ही सही कुछ तो परिवर्तन ला ही सकता है। वैसे काबिले-गौर बात ये भी है कि ज्‍यादातर हिंदी ब्‍लॉगर इस बारे में काफी सजग हैं और अपने स्‍तर पर प्रयास करते भी रहते हैं। काफी समय पहले परिचर्चा नामक फोरम पर(जो कि आजकल बंद पड़ा हुआ है) बहुत से ब्‍लॉगर्स ने अपने प्रयासों और आइडियाज को शेयर किया था वे वाकई काबिले-तारीफ थे जैसे संजय बेंगाणीजी महानगर में रहते हुए भी अपने अधिकर कामों के लिए सायकल का प्रयोग करते हैं, बहुत से लोग पॉलीथीन की जगह कपड़े के थैले प्रयोग कर रहे हैं, पानी का भी बहुत किफायत से इस्‍तेमाल करने वाले लोग हैं।
मेरा मानना है कि हम सभी लोग जो भी प्रयास कर रहे है उन्‍हें एक-दूसरे से साझा करें, कुछ तुम चलो कुछ हम चलें की तर्ज पर और जो भी इसके लिए नया किया जा सकता है करें, नये नये उपाय एक-दूसरे को सुझायें-अपनायें। साथ ही अपने परिवार और आसपास में भी यथासंभव जो किया जा सकता है उसकी शुरुआत करें ।

फिलहाल तो मेरी सभी ब्‍लॉगर बंधुओं से अपील है कि वे अपने-अपने चिट्ठे पर खुद के द्वारा पर्यावरण के लिए किये जा रहे प्रयासों से दूसरों को अवगत करायें हालांकि कुछ लोगों को ये खुद मियां मिट्ठू बनना लग सकता है फिर भी प्‍लीज ऐसा करें क्‍योंकि जब हम अपने आइडियाज दूसरों से शेयर करेंगे तो ही तो हम दूसरों को कुछ बता पायेंगे और उनसे कुछ नया सीख पायेंगे।

फिलहाल तो मैं खुद के कुछ प्रयासों के बारे में यहां लिख रहा हूं आप सब से भी अपील है कि अपने-अपने चिट्ठे पर ऐसे ही प्रयासों के बारे में लिखें जिससे दूसरे भी पढ़कर उन्‍हें अपना सकें।-

1- सबसे पहले बात बिजली की, अपने घर में जिन बिजली के उपकरणों जैसे पंखा, टीवी, ट्यूबलाइट आदि का प्रयोग नहीं हो रहा है उनको बंद करना

2- बल्‍ब की जगह सीएफएल प्रयोग करना

3- पॉलीथीन का प्रयोग यथासंभव कम करना और जहां उसके बिना काम चल सकता हो वहां उसका प्रयोग ना करना।

4- जितना संभव हो पैदल चलना, सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग करना। पैदल चलना इसलिए भी मुफीद है कि मेरा शहर छोटा है।

5- एक तरफ से प्रिंट किये हुए फालतू कागजों, पैम्‍पलेट आदि को कचरे में नहीं फेंकना बल्कि उनकी दूसरी तरफ लिखने के लिए प्रयोग में लेना।

6- पानी का जितना कम प्रयोग हो सके करना और फालतू पानी को पौधों-गमलों में डालना।

7- कॉस्‍मेटिक्‍स का प्रयोग बिलकुल नहीं करना क्‍योंक‍ि ऐसी अनुपयोगी चीजें केवल कचरे को बढ़ावा देती हैं जो बायोडिग्रेडेबल नहीं हैं साथ ही उनमें क्‍लोरो-फ्लोरो कार्बन होते हैं जो विशेष रूप से खतरनाक हैं।


हालांकि सूची बहुत छोटी है पर हौसले बुलंद हैं....इंशाल्‍लाह ये सूची आपके मार्गदर्शन से बढ़े और हमारे सामूहिक प्रयासों को नेट पर ही सही दुनिया देखे।
फिलहाल तो अपन यहीं से शुरूआत करते हैं....बाकी धीरे-धीरे जब कारवां चल पड़ेगा तो और भी मुसाफिर आ जाएंगे काफिले में... साथ ही आप सबसे एक छोटी सी गुजारिश और है कि अपने आस-पास और कहीं भी पर्यावरण के लिए काम कर रहे लोगों के छोटे-छोटे प्रयासों को भी अपने चिट्ठे पर प्रकाशित कर दूसरों को भी उनके बारे में बताएं..वस्‍तुत: यही लोग जो छोटे-छोटे प्रयास कर रहे हैं हमारे हीरो हैं और हमें इनके प्रयासों से खुद भी प्रेरणा लेकर दूसरों को भी उनके बारे में बताना चाहिए क्‍योंकि आलोचनाएं और दूसरों पर दोषारोपण तो बहुत हो चुका अब समय है खुद कुछ कर दिखाने का और सकारात्‍मक सोचने का.....वो गायत्री परिवारवाले कहते हैं ना कि हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।

Monday, February 23, 2009

गर्व है कि हम स्‍लमडॉग से बेहतर फिल्‍में बनाते हैं

कल तकरीबन छ: महीने बाद कोई फिल्‍म सिनेमा में जाकर देखी वो भी इसलिए कि फिल्‍म के बारे में इतना सुन रखा था कि बिना देखे रह नहीं सका.....पर लौटते समय यही बात जेहन में थी कि हम भारतीय कब बाज आयेंगे गुलामी की आदत से। स्‍लमडॉग के रिलीज से पहले और रिलीज के वक्‍त हमारे यहां विवाद हो चुके हैं पर अब जब इसे आठ ऑस्‍कर मिल चुके हैं तो सभी खुश हैं। मीडिया जश्‍न मना रहा है, कहीं इसे भारत की सफलता बताया जा रहा है, कहीं भारत का सम्‍मान।
पर मुझे अफसोस है कि क्‍यों मैंने इस घटिया फिल्‍म को देखने के लिए पैसे खर्च किये। यदि मनोरंजन की बात है तो साउथ की एक्‍शन फिल्‍में देखकर कहीं अधिक मनोरंजन हो सकता है और यदि वास्‍तविकता या सामाजिक मुद्दे पर फिल्‍म बनाने की बात है तो इसमें मुझे ऐसी कोई बात भी नजर ही नहीं आई। नजर आया तो केवल यह कि फिल्‍म का एक और केवल एक ही उद्देश्‍य था भारत की गंदगी, सड़ी हुई व्‍यवस्‍था और लोगों की दयनीय व्‍यवस्‍था को दिखाना और फिर वाहवाही लूटना। कुछ समय पहले अमिताभ बच्‍चन ने भी इसे लेकर नाराजगी जताई थी पर लोगों ने उनकी ही आलोचना करना शुरू कर दिया और फिर जब सब अच्‍छा ही अच्‍छा हो रहा हो- रहमान अवार्ड पर अवार्ड जीते जा रहा हो, भारतीय कलाकार उस फिल्‍म का हिस्‍सा हों और हमारी प्‍यारी आमची मुंबई पर फिल्‍म बनी हो तो बस हमें लग रहा है कि हमने दुनिया फतह कर ली।
पश्चिम में ऐसा प्रचार किया गया कि स्‍लमडॉग पहली फिल्‍म है जिसने भारत की वास्‍तविकता को सिनेमा के पर्दे पर दिखाया है। मतलब अब तक हम केवल मिथुन और शाहरुख टाइप मसाला और फूहड़ फिल्‍में ही बनाना जानते हैं और हमें एक गोरे से सीखने की जरूरत है कि फिल्‍म क्‍या होती है और कैसे व क्‍यों बनाई जाती है।
यदि हम मुंबई की ही बात करें तो विगत समय में हमारे यहां इतनी बेहतरीन फिल्‍में फिल्‍मकारों ने बनाई हैं कि स्‍लमडॉग वाला डैनी बॉयल उनके आगे पानी भरे। इस समय मुझे कुछ बेहतरीन फिल्‍में याद आ रही हैं- चांदनी बार, पेज3, ब्‍लैक फ्रायडे, अ वेडनेसडे और मुंबई मेरी जान। इन फिल्‍मों ने वाकई वास्‍तविकता के धरातल को छुआ है अपने सही अर्थों में। सच्‍चाई ये है और सच्‍चाई वो भी है जो स्‍लमडॉग में दिखाई देती है पर उसके पीछे छिपा नजरिया ही नहीं नजर आता।
यदि वास्‍तविकता की भी बात करें तो उस स्‍तर पर भी ये एक बचकानी फिल्‍म है। केवल मुंबई के स्‍लम्‍स, कूड़े के ढेर, गंदगी से पटे नाले, भीख मांगते बच्‍चे यही सब दिखाकर रियैलिटी का हल्‍ला मचाया जा रहा है। फिल्‍म का हीरो कैसे कौन बनेगा करोड़पति के हर सवाल का जवाब जानता है इसकी कहानी भी बहुत बचकानी सी और नाटकीय है। फिक्‍शन भी तर्कयुक्‍त होना चाहिए ना कि शाहरुख खान की 'रब ने बना दी जोड़ी टाइप'।
मेरे ख्‍याल में यदि स्‍लमडॉग जैसी घटिया फिल्‍म को ऑस्‍कर मिलता है तो कम से कम अब तो हमें जरूर खुश होना चाहिए। स्‍लमडॉग की सफलता पर नहीं बल्कि इस पर कि हम स्‍लमडॉग से बेहतर फिल्‍में बना चुके हैं और बना रहे हैं।
और हां वह गाना जिसके लिए रहमान को दो ऑस्‍कर मिले वाकई मुझे तो कुछ खास नहीं लगा पर ऑस्‍कर वालों को खास इसलिए लगा कि वह एक गोरे की फिल्‍म में है, जो कि केवल अपना सम्‍मान करना जानते हैं। रहमान इससे कई गुना बेहतर संगीत पहले रच चुके हैं। लगान या रंग दे बसंती के गीत ही सुन लें। पर गोरे लोगों को वही चीज पसंद आती है जिसमें हम भारतीयों की भद्द पिटे उनकी नहीं वरना लगान को ऑस्‍कर ना देने के पीछे का कारण मेरी समझ में तो नहीं आता।
हाल फिलहाल में सुना है एक भारतीय लेखक अरविंद अडिगा को भी बुकर मिला है। पश्चिम के हाथ एक और मसाला लगा है जिसके माध्‍यम से भारत की नीचता का प्रचार किया जा सके। पश्चिमी पुरस्‍कारों की मंशा मेरे ख्‍याल से पुरस्‍कार देकर हर उस चीज का प्रचार करने की है जिससे पूरब का अपमान होता हो। वरना वास्‍तविकता ही यदि दिखाना है तो बहुत कुछ है दिखाने को।
पर हमेशा पश्चिमी ठप्‍पा लगवाने को आतुर हम भारतीय हमेशा ऑस्‍कर को ही परम सत्‍य मानते हैं। क्‍या कोई भारतीय कह सकता है कि स्‍लमडॉग लगान से एक बेहतर फिल्‍म थी ? क्‍यों हम उस समय लगान के ऑस्‍कर में नामांकित होने पर जश्‍न मना रहे थे और पुरस्‍कार ना जीत पाने पर मायूस थे।
कुछ भी हो स्‍लमडॉग के ऑस्‍कर मिलने के बाद एक बात अच्‍छी हुई है कि हमें इस बात पर विचार-मंथन करने का मौका मिला है कि क्‍या वाकई ऑस्‍कर जैसे टुच्‍चे पुरस्‍कारों का कोई मतलब है और जो पुरस्‍कार ऐसी दोयम दर्जे की फिल्‍म को मिला है क्‍यों ना हम सब मिलकर उसका बॉयकॉट करें और फैसला लें कि अब कोई भारतीय फिल्‍म ऐसे छोटे और ओछे पुरस्‍कार के लिए ना भेजी जाए :) ।

छायाचित्र: बीबीसी के सौजन्‍य से।

Thursday, February 19, 2009

पूंजीवाद से चिढ़ इसलिए है

वैसे वैश्विक मंदी के दौर में जहां एक ओर सुना जा रहा है कि साम्‍यवादी विचारधारा की ओर फिर से लोग आकर्षित हुए हैं और कार्ल मार्क्‍स की किताबों की बिक्री बढ़ गई है तब पूंजीवाद जैसी व्‍यवस्‍था को गरियाना बुद्धिजीवी टाइप लोगों के लिए एक शगल हो सकता है खासकर उनके लिए जिनकी रोजी-रोटी ही पूंजीवाद के विरोध पर टिकी है ये बात अलग है कि उनकी खुद की जीवनशैली से पूंजीवाद को निकाल दिया जाए तो वे घिघियाने लगेंगे।
पर हर किसी के लिए पूंजीवाद के विरोध के अपने कारण हैं। ज्‍यादातर लोग किसी वाद या व्‍यवस्‍था के विरोधी इसीलिए होते हैं क्‍योंकि वे उसकी विरोधी व्‍यवस्‍था के पोषक होते हैं, ऐसे में उन्‍हें तो आंख मूंदकर उसका विरोध करना होता है। होता ये भी है कि यदि आप किसी एक विचारधारा या व्‍यवस्‍था का विरोध करते हैं तो आपको खुद-ब-खुद विरोधी खेमे का समझ लिया जाता है। जैसे यदि आप कांग्रेस का विरोध करते हैं तो यकीनन आपको लोग खाकी पैंट वाला ही समझेंगे चाहे आप उनसे भी कांग्रेस जितनी ही नफरत करते हों।

बहरहाल बिना बेकार की भूमिका बांधे सीधे मुद्दे पर आ जाते हैं। मैं कभी किसी वाद या विचारधारा का समर्थक नहीं रहा। किसी भी विचारधारा को अपना लेने के कारण मेरे ख्‍याल से हर सिस्‍टम या विचारधारा की अच्‍छी-बुरी बातों को जानने-समझने से हम महरुम रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में हम जब कुछ देखते हैं तो उसी विचारधारा के चश्‍मे से देखते हैं जैसे मनमोहन सिंह समाजवाद के नाम से और वामपंथी पूंजीवाद के नाम से बिदकते हैं।

पूंजीवाद के समर्थक मानते हैं क‍ि ये एक संपूर्ण व्‍यवस्‍था है और जनता के हितों के लिए जितने प्रयास इस व्‍यवस्‍था के माध्‍यम से किये जा सकते हैं उतने किसी और से नहीं। पर वास्‍तव में जनता-जनार्दन क्‍या है पूंजीवाद में ? अपना मुनाफा बढ़ाने का एक जरिया मात्र !
आज दोपहर में मैं एक नये बने शॉपिंग मॉल में घूम रहा था। वहां दो-चार शोरूम में मैंने लकड़ी का बना हुआ फर्श देखा। फालतू और बेवजह के लग्‍जरी सामान से बेहद चिढ़ होने के कारण मुझे बहुत बुरा लगा कि कैसे अनगिनत बेहतरीन पेड़ों को जूतों के तले रौंदे जाने के लिए फर्श में इस्‍तेमाल कर लिया जाता है। पिछले साल बीबीसी के राजेश जोशी दक्षिण अमेरिका में अमेजन के जंगलों से रिपोर्टिंग करते हुए कह रहे थे कि बड़ी तेजी से ये जंगल काटे जा रहे हैं और इसकी लकड़ी यूरोप और अन्‍य देशों में लकड़ी का सामान बनाने के लिए हो रही है। लकड़ी के सामान की जरूरत हर घर में होती है पर फर्श तक लकड़ी का बनवाने को लोग शान समझने लगे हैं। इसके पीछे की कीमत को कोई नहीं जानना चाहता। मेरा तो मानना है कि ये तो एक अपराधिक स्‍तर का उपभोक्‍तावाद है जिसमें प्रकृति के अपराधी हम खुद हैं और जैसा कि सर्वविदित है हमें एक ना एक दिन इसकी सजा मिलनी है।
पर आज के समय में जहां हर चीज मुनाफे को ध्‍यान में रखकर की जाती है और मुनाफा ही भगवान है वहां पर्यावरण जैसी चीजों के तो कोई मायने रह ही नहीं जाते।
टीवी पर विज्ञापन आ रहा है कि फलां परफ्यूम या डियो लगाये लौंडे के पीछे लड़कियां भाग रही हैं। जिसके पास बढि़या गैजेट्स हैं वही हीरो है। जो जितना ज्‍यादा फिजूलखर्च है उसका उतना ही जलवा है। हर कंपनी चाहती है लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा खरीदें और ज्‍यादा से ज्‍यादा मुनाफा दें। यहां तक कि एक पूंजीपति तो ये सोचता है कि लोग पुराने का मोह से जितनी जल्‍दी मुक्‍त हों उतना अच्‍छा और जितनी जल्‍दी पुराने माल को फेंककर नया माल खरीदने आयें उतनी ही चांदी। पर इस तरह की सोच हमें ले कहां जा रही है। क्‍या हमने कभी सोचा है कि हम जो अनाप-शनाप कॉस्‍मेटिक्‍स उपयोग करते हैं उनको बनाने और उनके उपयोग करने और उपयोग के बाद जो वेस्‍ट बचता है उसको मिलाकर पर्यावरण की कितनी वाट लगाये दे रहे हैं। हमें सिखाया जाता है कि हमें क्‍यों फलां चीज खरीदनी चाहिए और क्‍यों पुराना गैजेट बेकार है और तुरंत नया खरीद लेना चाहिए और एक उपभोक्‍ता के तौर पर हम वही सब किये जा रहे हैं जो पूंजीपति हमसे कराना चाहता है।

पूंजीवाद के समर्थक कहेंगे कि ये उपभोक्‍ताओं के लिए बेहतर है क्‍योंकि इसमें उपभोक्‍ता के हाथ में चॉइस रहती है, एक स्‍वस्‍थ प्रतियोगिता होती है जिससे उपभोक्‍ता वाजिब दामों पर अपनी मनपसंद चीजें खरीदता है। पर उपभोक्‍ता की अपनी पसंद या नापंसद क्‍या हो ये तो पूंजीवाद ही तय करता है। उपभोक्‍ता के ब्रेनवॉश के लिए जो तरीके अपनाये जाने चाहिए वे सब उसे पता हैं। उसे पता है कि कैसे किसी महाफालतू चीज की जरूरत पैदा की जाए और कैसे उसे एक जरूरी चीज में तब्‍दील करके उपभोक्‍ताओं से तगड़ा मुनाफा कमाया जाए। और एक बेचारा उपभोक्‍ता है जो दिन-ब-दिन पूंजीवाद के बहकावे और अपनी सुविधा के लालच में भयंकर रूप से लालची होता जा रहा है और उपभोक्‍ता का लालच जितना ज्‍यादा बढ़ेगा उतना ही बाजार की ताकतें उसे अपने जाल में उलझाकर मुनाफा ऐंठेंगी। लाखों-करोडों टन वेस्‍ट, ई-कचरा, धुंआ पैदा होता रहे उन्‍हें इससे क्‍या। उनका मकसद तो मुनाफा है चाहे इसके लिए धरती लाइलाज बीमारियों से ग्रसित होती रहे।
आजकल बड़े पैमाने पर लग्‍जरी आयटम्‍स की खरीदी की जाती है। ऐसे सामान जो गैरजरूरी और फालतू हैं उनका बाजार खड़ा करके एक दिखावटी समाज तैयार किया जा रहा है जो केवल दिखावे को ही सब-कुछ मानता है चाहे उसकी कितनी भी कीमत चुकानी पड़े। पर पूंजीवाद और आम ग्राहक की सुविधा के नाम पर सब चल रहा है और चूंकि सभी खुश हैं इसलिए किसे फिक्र है-सादा जीवन उच्‍च विचार जैसी बातें सुनने की। फैक्ट्रियां दिन-रात फालतू का सामान, जिसकी वास्‍तव में कोई जरूरत नहीं है, बनाने के लिए दिन-रात धुंआ उगल रही हैं। सरकारें भी खुश हैं कि टैक्‍स ज्‍यादा इकट्ठा हो रहा है। फिर ये सब करके क्‍योटो प्रोटोकाल जैसे सिस्‍टम बनाये जाते हैं मानो सौ चूहे खाकर बिल्‍ली हज करने जाए। भई समझौता तो इस बात का होना चाहिए कि मनुष्‍य अपनी जरूरतें कम करे और फालतू सामान की खरीद से बचे पर ये नहीं होगा और क्‍योटो प्रोटोकाल जैसी नौटंकियां चलती रहेगी। आगे और भी योजनाएं बनेंगी पर मनुष्‍य का लालच कहां जाएगा। संसाधनों की कमी का हल्‍ला हर जगह मचता है पर उनके किफायत से उपयोग की बात कभी नहीं होती।

महात्‍मा गांधी ने कहा था कि ये धरती मनुष्‍य की आवश्‍यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है पर उसके लालच की नहीं पर पूंजीवाद तो लालच पर ही टिका है जिस दिन मनुष्‍य ने साधारण तरीके से जीना सीख लिया उस दिन ये बेमौत मर जाएगा। पूंजीवाद एक विचारशून्‍य और भेड़चाल वाले समाज के निर्माण में जुटा है और काफी हद तक वो इसमें सफल भी हो चुका है। एक आदमी जब कुछ खरीदता है तो शायद ही सोच पाता है कि वह चीज वास्‍तव में कितनी जरूरी है उसके लिए। उसे तो बस यही सिखाया जाता है कि स्‍टेटस मेंटेन करना है या शान मारनी है तो फलां चीज तो खरीदनी ही होगी।

कुल मिलाकर पूंजीवाद लालच पर टिका एक ऐसा दैत्‍य है जो सब कुछ खतम करके ही दम लेगा। मनुष्‍य के बढ़ते लालच, उपभोग की चरमसीमा उसे कहां तक ले जाएगी ये बताने की जरूरत नहीं है।

पुरानी भारतीय जीवनशैली मेरे ख्‍याल में पूंजीवाद और पूंजीवाद से धरती के लिए पैदा घनघोर संकट का विकल्‍प हो सकती है। इस पर फिर कभी चर्चा करते हैं..... फिलहाल के लिए बस।

Sunday, January 18, 2009

आखिर मोदी इतने करिश्‍माई क्‍यों हैं


केरल से माकपा सांसद एपी अब्‍दुल्‍ला कुट्टी को गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के मॉडल की तारीफ करना महंगा पड़ गया, जब उन्‍हें अपने बयान के कारण पार्टी से निलंबित कर दिया गया। कट्टर भाजपा विरोधी और मोदी की मुखालफत करने में हमेशा मुखर रहने वाली माकपा को ये सहन नहीं हुआ कि उनका ही एक सांसद मोदी की तारीफ कर रहा है। उधर उद्योगपतियों अनिल अंबानी व सुनील भारती मित्‍तल द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिये प्रोजेक्‍ट करने संबंधी मामला भी गर्म है। मीडिया पिली हुई है भाजपा नेताओं से सफाई मांगने। कुल मिलाकर जो भी हो मोदी उत्‍तरोत्‍तर विवादों के केंद्र में रहकर और विवादों से ऊपर उठकर राष्‍ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर चमकने की पूरी तैयारी में जुटे हैं। हालांकि उन्‍होंने भी कहा है कि आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार हैं और इस बारे में कोई विवाद नहीं है।
जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है वे काफी समय से इसकी चर्चा के केंद्र में रहे हैं और उनके विरोधी इसे नकारते रहे हैं पर हालिया प्रकरण से उनकी इस दावेदारी को और बल मिला है और उनकी स्‍वीकार्यता राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के तौर पर बढ़ी है।
मोदी के बारे में उनके विरोधियों द्वारा कहा जाता है कि गुजरात के बाहर उनका कोई कद नहीं है, वे कट्टर हिंदूवादी और अल्‍पसंख्‍यकविरोधी हैं पर इन सब विवादों के बावजूद पिछले काफी समय से उनकी स्‍वीकार्यता बढ़ती ही गई है और इसमें बहुत बड़ा हाथ उनके विकास के एजेंडे का है। एक मुख्‍यमंत्री के तौर पर उनकी छवि पाक-साफ है उन पर भ्रष्‍टाचार का कोई आरोप नहीं है। सबसे बड़ी बात है गुजरातियों का उनमें विश्‍वास। आज हिंदुस्‍तान का कौन सा प्रदेश है जहां का मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की ही तरह अपने प्रदेश में लोकप्रिय है। मायावती प्रधानमंत्री बनने की बात करती हैं पर क्‍या उत्‍तर प्रदेश का एक आम नागरिक निर्विवाद रूप से उन्‍हें अपना नेता मानता है ? ऐस में देश का नेतृत्‍व कैसे होगा। सही बात तो ये है कि अटलजी के बाद अब तक देश में कोई राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता पैदा नहीं हो सका है जो हैं भी उनकी छवि और स्‍वीकार्यता राष्‍ट्रीय स्‍तर का नेता होने लायक नहीं भले ही वे आडवाणी क्‍यों ना हों।
जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है जनता की समझ में अब आने लगा है कि धर्मनिरपेक्षता की ढपली बजाते रहने वालों का ही दामन इस मामले में सबसे दागदार है। हालांकि प्रोपेगैंडा करने में उन्‍हें महारत हासिल है। वरना मोदी द्वारा गांधीनगर में मंदिरों को तोड़ा जाना उनको नजर नहीं आता जबकि हिंदुस्‍तान में कहीं भी किसी भी दूसरे धर्म के स्‍थलों पर एक ईंट भी उखाड़े जाने पर ये हंगामा बरपा देने के लिए तैयार बैठे हैं।
मोदी साथ सबसे बड़ी बात है कि उनके समर्थक उनके कट्टर समर्थक हैं और विरोधी धुरविरोधी। धीरे-धीरे जनमानस के दिमाग में ये बात बैठ रही है कि एक विकसित प्रदेश का मुख्‍यमंत्री वास्‍तव में एक विकासशील देश को प्रगति के रास्‍ते पर ले जा सकता है। उनके ऊर्जावान भाषणों में जनमानस को प्रभावित करने की कला है। वे मुद्दों पर स्‍पष्‍ट राय रखते हैं और सरल व सहज संप्रेषण कला उनको दूसरों से बेहतर वक्‍ता बनाती है। अभी हाल ही में मध्‍यप्रदेश के चुनावों के समय शहर में हुई आमसभा में एक गुजराती के मुख से हिंदी में जोरदार भाषण सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। उनका व्‍यक्तित्‍व वाकई एक नेता का सा है। वरना आजकल चारों ओर चोर, दलाल, दे शद्रोही नेता बने बैठे हैं। यहां तक कि देश का वर्तमान प्रधानमंत्री तक जब भाषण देता है तो लगता है अपनी ड्यूटी बजा रहा है कमोबेश यही स्थिति भाजपा के भावी प्रधानमंत्री की है और वे अपने दम पर भाजपा को जिता भी पायेंगे इसके कोई आसार नजर नहीं आ रहे।
मोदी के विरोधियों को अन्‍य मतभेदों से परे हटकर इस बात को तो स्‍वीकार करना ही होगा कि अन्‍य प्रदेशों की बजाय गुजरात में संभावनाएं ज्‍यादा नजर आती हैं, उद्योगपति वहां निवेश कर रहे हैं और जनता में उनकी लोकप्रियता निर्विवाद है। वरना विकास को साथ लिये बिना कोई भी नेता इतने समय तक कुर्सी पर काबिज नहीं रह सकता और लो‍कप्रिय नहीं बना रह सकता। ये मोदी ही हैं जिन्‍होंने ये कहने की हिम्‍मत दिखाई कि उन्‍हें केंद्र से एक पैसा नहीं चाहिए बशर्ते उनके प्रदेश से केंद्र को जो टैक्‍स जाता है वो ना मांगा जाए जबकि दूसरे प्रदेशों के मुख्‍यमंत्री कर्जों में डूबे रहने और केंद्र से पैकेज की मांग करने के लिए जाने जाते हैं।
आतंकवाद के मुद्दे और अन्‍य राष्‍ट्रीय मुद्दों पर अपनी बेबाक राय सामने रखना भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेताओं का ही शगल है। जो भी हो नरेंद्र मोदी भले ही आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री ना बन सकें पर राष्‍ट्र का नेतृत्‍व करने की ऊर्जा उनमें है।

Wednesday, September 17, 2008

मोनिका बेदीजी हम आपको नमन करते हैं

आजकल छोटे पर्दे पर एक चैनल पर बिग बॉस का प्रसारण हो रहा है पर हल्‍ला हर चैनल पर मचा हुआ है। कुछेक चैनल जिनका काम बस सेलेब्रिटी गॉसिप जैसे महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्रीय विषयों को दिखाने का है उनके अलावा हमारे लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ का पट्टा भी जिन्‍होंने लिखाया हुआ है वे सब मिलकर बिग बॉस के घर मे बंद लोगों की बातें, उनके झगड़े, उनके फैशन, उनके अफेयर जैसी बातों को चटखारा ले-लेकर दिन-रात दिखाने में लगे हैं। ऐसा दिखाया जा रहा है मानो इस समय देश में एक बहुत ही महान राष्‍ट्रीय उत्‍सव चल रहा है जिसके बारे में मीडिया वालों का दायित्‍व बनता है कि उसकी पल-पल की अपडेट जनता तक पहुंचाए।
शिल्‍पा शेट्टी जिन्‍होंने विदेश में जाकर भारत की महानता का परचम लहराया जिससे कि स्‍वामी विवेकानंद तक की उपलब्धियां हमें छोटी लगने लगती हैं, इस शो को होस्‍ट कर रही हैं। आखिर बिग ब्रदर के घर में अपनी ऐसी-तैसी कराकर और कुछ टसुए बहाकर इस बिल्‍ली के भागों ऐसा छींका फूटा कि वो अब तक साथ निभा रहा है। पर धन्‍य है भारतीय परंपरा जो हर विदेशी चीज को ऐसे अपनाती है जिससे ब्रिटेनवासियों को अब तक गर्व होता होगा कि हम भले अब उनके शासक नहीं पर दिल से वे खुद को हमारा गुलाम ही मानते हैं तभी तो जेड गुडी जिसके बारे में ना जाने बिग ब्रदर के समय क्‍या-क्‍या लिखा गया था, जब भारत में आती है तो पूरा मीडिया उसके सामने ऐसे बिछ जाता है जैसे स्‍वयं महारानी एलिजाबेथ अपनी रियाया को दर्शन देकर धन्‍य करने निकली हों।
रियेलिटी शोज में कितनी रियेलिटी होती है यह किसी से छिपा नहीं है। कुछ झगड़ालू और विवादास्‍पद छवि के लोगों को इकट्ठा कर एक घर में बंद कर दो और फिर चटखारे ले-लेकर उनकी गंदी हरकतों को दिखा-दिखाकर टीआरपी बटोरो। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे शोज में सभी कुछ पहले से फिक्‍स होता है।
सो इस बार बिग ब्रदर के घर में ऐसे सेलेब्रिटी (मीडिया ऐसा मानता है जनता नहीं ) बुलाये गये जिनकी महानता का वर्णन सूरज को दिया दिखाने जैसा होगा। इनमें हैं राहुल महाजन, मोनिका बेदी जैसी राष्‍ट्रीय हस्तियां, ऐसी पुण्‍यात्‍माएं जिनके पुण्‍यकर्मों का लेखा-जोखा खोलने की यहां जरूरत नहीं वैसे भी कहा जाता है कि प्रतिभा किसी तारीफ की मोहताज नहीं होती सो इन जैसे प्रतिभाशाली और महान विभूतियों को बिग बॉस के अन्‍य प्रतिभागियों से ज्‍यादा महत्‍व देना निहायत जरूरी है।
कुछ समय पहले शायद भारत-श्रीलंका क्रि‍केट सीरीज के ही दौरान बीच-बीच में बिग ब्रदर के विज्ञापन दिखाये जाते थे। जिनमें ये दोनों बड़ी मासूम सी सूरत बनाकर खुद को ही नैतिकता का सर्टिफिकेट देते दिखाई देते थे। मोनिका बेदीजी का कहना था कि उन्‍होंने इतने कष्‍ट सहे, इतनी मुश्किलें उनके सामने आईं फिर भी वे हिम्‍मत नहीं हारीं और डटकर खड़ी रहीं और जैसा कि किताबों में बच्‍चे पढ़ते हैं कि अंत में सच्‍चाई की जीत होती है कुछ वैसे ही उनको भी जीत मिली और जेल से बाहर अब वे आजाद हैं।
राहुल महाजन कहां पीछे रहने वाले थे। एक समय भारत के सबसे बड़े दलाल रहे व्‍यक्ति का यह सपूत भी चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कह रहा था कि उसने भी जीवन में कुछ कम कष्‍ट नहीं सहे, उसको भी बुरा समय देखना पड़ा, उसने भी मुंबई की बसों में धक्‍के खाए। लग रहा था कि जनता उसे उसके सुकर्मों का सर्टिफिकेट दे ना दे, वह खुद इसमें सक्षम है और खुद को सर्टिफिकेट देने के लिए उसे किसी दूसरे की जरूरत नहीं है। हाय भगवान हमें भी ऐसे बुरे दिन दिखाए और फिर हजारों करोड़ के कालेधन का एकमात्र वारिस बनने के लिए कुछेक कष्‍ट सहने में कोई बुराई नहीं है।
कुल मिलाकर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि उक्‍त दोनों ही लोग बेचारे इस गलत सिस्‍टम के मारे हैं। राहुल महाजन जैसे बेचारों को अदालतों के चक्‍कर काटने पड़ते हैं अरबपति होकर तो ये तो भाई सरासर जुलम है। हमारे पास इतना पैसा हो तो हम अदालत, पुलिस, सिस्‍टम सबको खरीद लें। पर बेचारे राहुल को कितना कष्‍ट भोगना पड़ा होगा इसकी तो बस कल्‍पना ही की जा सकती है। और मोनिका बेदीजी उनकी मासूमियत पर तो बस मर-मिटने को जी चाहता है। बेचारी कैसी रोनी सूरत बनाकर रोज कहती फिरती हैं कि वे अबू सलेम के बारे में कुछ नहीं जानतीं ना ही उससे उनका कोई संपर्क है। सही है जी एक आतंकवादी की रखैल होकर उन्‍हें इतनी फुर्सत ही कहां मिली होगी कि वे उसके बारे में कुछ जानें-समझें। फिर भी लोग अब तक शक करते हैं कि उनके अबू सलेम से संबंध हैं। कैसे इस देश के लोग एक बेचारी अबला के चरित्र पर कीचड़ उछालते हैं शर्म आनी चाहिए उन्‍हें और अब उन्‍हें जो फिल्‍मों के आफर मिल रहे हैं वे तो बस उनकी महान अभिनय प्रतिभा के कारण हैं।
मोनिकाजी आप वाकई में अब प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं ऐसे देश में जहां अब भी पैसे तथा पहुंच होने के बावजूद सिस्‍टम को ना खरीद सकने वाले लोगों के लिए जो बेचारे अदालत के चक्‍कर काट-काटकर परेशान हैं और इस कारण उन्‍हें जो कष्‍ट भोगने पड़ रहे हैं उसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। मोनिकाजी आप ही उन्‍हें कुछ मार्ग दिखाएं। आज के युग में आप ही उनकी तारणहार हैं। ऐसे प्रेरणादायी व्‍यक्तित्‍व को हमारा नमन।

फोटोग्राफी या संयोग ?