Thursday, April 26, 2007

इस हार में संभावनाएं तो बहुत हैं

क्रिकेट के खेल में मेरी कभी कोई खास रुचि नहीं रही, हालांकि घर की छत पर और मुहल्‍ले में क्रिकेट खेला भी बहुत है। टीवी पर मैच भी खूब देखे हैं। पर कुछ समय से क्रिकेट में रुचि लेना लगभग बंद ही कर दिया था। कभी-कभार यदि मैच चल रहा हो तो स्‍कोर अवश्‍य देख लेता हूं। क्रिकेट पर होने चर्चा-परिचर्चा में भी अपना कोई दखल नहीं। इसका कारण यह धारणा भी है कि जो इंसान दिमाग से जितना ज्‍यादा पैदल होगा, वो उतना ही ज्‍यादा क्रिकेट पर अपना ज्ञान बघारकर खुद को तीस-मारखां साबित करने की कोशिश करेगा और ये जानते हुए भी मैं ऐसा करता हूं तो मेरी गिनती भी इनमें ही होनी है। वैसे भी भारत में अनगिनत ऐसे भी महारथी मिल जायेंगे जिन्‍हें शायद अपने प्रधानमंत्री का नाम तक मालूम न हो पर पूरी क्रिकेट टीम के सदस्‍यों के नाम जरूर गिना देंगे। अतिरिक्‍त खिलाडि़यों और कोच फिजियो आदि-आदि सहित। हमारे देश में क्रिकेट से एक बात अवश्‍य पॉजिटिव हुई है- वो है परिचर्चा करने के लिए मुद्दा। सोनियाजी के लाडले मन्‍नू भाई ने पाकिस्‍तान के बारे में कोई मसखरा बयान न दिया हो, अटलजी या जार्ज फर्नांडीज ने कोई मजाक न भी किया हो, महंगाई बढ़ भी रही हो तब भी लोगों के पास चर्चा करने के लिए एक रेडीमेड मुद्दा तैयार रहता है- क्रिकेट। ये कतई जरूरी नहीं कि क्रिकेट का सीजन भी चल ही रहा हो, क्‍योंकि चर्चा का सीजन तो बारामासी है। अब हमारे मुहल्‍ले के लल्‍लू पानवाले को ही लीजिए। धोनी के पास किस ब्रांड की कितनी मोटरसाइकिल हैं, वह बालों में हेयर-जैल कौन सी लगाता है, उसे सब पता है। इसलिए वह भी आजकल अपने धोनी कट बालों में वही हेयर-जैल लगाता है। इसलिए अपन तो हमेशा उसकी दुकान से जरा बच के निकलते हैं। वैसे भी अपना सामान्‍य ज्ञान वैसे ही सीमित है अगर उस क्रिकेट परिचर्चा में किसी ने फंसा लिया तो गलती से जो दो-चार लोग पढ़ा-लिखा समझते है उनके सामने भी कलई खुल जाएगी। पर बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाएगी की तर्ज पर मैं कभी-कभार ऐसे लोगों के बीच फंस ही जाता हूं। एक बार एक गांव में मैं फंस गया। गांव के लड़कों के साथ मैं बैठा हुआ था। सब इधर-उधर की हांक रहे थे। मैं भी हांके जा रहा था। मैं हांकने वालों के बीच खुद को कुछ सुविधाजनक महसूस कर रहा था। कारण, मैं शहर का निवासी और वे गांव के गंवार। बाहरी दुनिया की बातें, नयी तकनीकें आदि के बारे में मैं उनसे ज्‍यादा ही जानता था। इसलिए मेरी बातों से उनकी पट नहीं पड़ पा रही थी। तभी उन्‍होंने एक दांव चला। वे बातचीत को क्रिकेट पर ले आए। क्रिकेट के बारे में अपना ज्ञान ज्‍यादा से ज्‍यादा प्राइमरी तक ही है पर वे तो शायद पी.एच.डी. थे। न भी हों तो मुझ जैसे को झेलाना क्‍या मुश्किल काम है। वे सब मुझ पर पिल पड़े और मेरी बेचारी सूरत पर हारमानी के भाव तैरने लगे। तब से मैं गांव के लड़कों से विशेषकर बचकर निकलता हूं। यदि फंस गया तो उनके एक ही दांव से मेरी सारी स्‍मार्टनेस हवा हो जाएगी।

बहरहाल कल टीवी खोली तो पता लगा कि हमारे वीर-सूरमा विदेशी धरती से भारत का परचम लहराकर लौटे हैं। मन ही मन अत्‍यधिक प्रसन्‍नता हुई पर थोड़ी ग्‍लानि भी हुई भारतीय मीडिया के रूखे और अभद्र व्‍यवहार पर। खिलाडि़यों का अभिनंदन तो दूर वे लोग- ‘पिटकर आ गए’ और ‘शर्म करो’ जैसे संबोधनों का भी प्रयोग कर रहे थे। खैर मीडिया को जाने दीजिए उनका व्‍यवहार तो हमेशा से ही गैर जिम्‍मेदाराना रहा है।

हमारे खिलाडि़यों ने इस बार फिर साबित कर दिया कि पश्चिम के सामने स्‍वामी विवेकानंद ने जो विचार रखे थे वे आज की पीढ़ी के समय में भी अप्रासंगिक नहीं हुए हैं और हमारे खिलाडि़यों ने विश्‍व कप में दूसरे, दबे-कुचले, वर्षों से किसी टूर्नामेंट को जीतने की आस लगाए लोगों को मौका देकर फिर उसी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की महान भावना को चरितार्थ किया है। मैं शायद यहां गलती कर रहा हूं। हमारे खिलाड़ी शायद अभी उस भावना को आत्‍मसात करने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं इसलिए उन्‍होंने शुरूआत ‘एशिया कुटुंबकम’ से की है। अंग्रेजी में एक कहावत भी है- ‘चैरिटी बिगंस एट होम’। सो हमारे शूरवीरों ने एक बड़े भाई के दायित्‍व का निर्वहन करते हुए उनके उज्‍जवल भविष्‍य को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें आगे जाने का मौका दिया है। साथ ही एक भाई जो पहले ही दौर में अपनी असफलता से निराश होकर टूट चुका था उसका साथ भी बखूबी निभाया है। जब हमारे बम बनाने पर वे बम बनाते हैं तो उनके असफल होने पर हमें भी असफल हो जाना चाहिए। जो नियम शस्‍त्रीकरण के खेल में लागू होते हैं वे क्रिकेट में भी लागू होने चाहिए। जब भी हमारी उनसे लड़ाई होती है तो यह क्रिकेट का खेल ही हमें फिर से एक-दूसरे के निकट लाने में मदद करता है। शांति प्रक्रिया के आगे बढ़ते रहने के लिए आवश्‍यक है हम कम से कम क्रिकेट में तो एक-दूसरे से सामंजस्‍य और बराबरी बनाये रखें। कल को यदि भारतीय टीम विश्‍वकप ले आती और पाकिस्‍तान की टीम बैरंग लौटती तो पाकिस्‍तान हम पर आरोप लगा सकता था कि- “भारत एशिया में खुद का प्रभुत्‍व जमाने की कोशिश में है और इससे हमारे हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।” तब हमारे मन्‍नू भाई को मजबूरी में यह कहना पड़ता कि हम एक साझा समूह बनाने जा रहे हैं जो इस बात की निगरानी करेगा कि वे कौन से कारण हैं जिनसे हमारी टीम जीत रही है और वे कौन से उपाय हो सकते हैं जिनसे दोनों टीमों का स्‍तर बराबर लाया जा सके। परंतु हमारे शूरवीरों ने मन्‍नू भाई को इस दुविधा से बचा लिया है वैसे भी उनके पास समय की कमी है यदि ऐसी कूटनीतिक बातों में ही उनका सारा समय खप गया तो विकास दर का क्‍या होगा?

विकास दर आगे बढ़ रही है। अर्थव्‍यवस्‍था आगे बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में हर भारतीय का कर्तव्‍य है कि वह भी यथासंभव देश के प्रति अपने कर्तव्‍य का पालन करे और देश को और आगे ले जाए। सो क्रिकेट टीम की भूमिका मैदान के साथ-साथ अर्थव्‍यवस्‍था के लिए भी महत्‍वपूर्ण हो जाती है। जब देशवासी क्रिकेट के बुखार में तप रहे हों और काम-धाम छोड़ टेलिविजन के सामने बैठे हों और इस प्रकार विकास दर की मट्टी पलीद करने तुले हों तब हमारे शूरमाओं का ये कर्तव्‍य हो जाता है कि उन्‍हें समझाएं कि जाओ भैया अपना-अपना काम करो काहे को टाइम खोटी करते हो। पर मजाल है हमारे क्रिकेट-प्रेमी टीवी बंद कर दें। तो ऐसे नालायकों को समझाने के लिए मजबूरी में हमारी पूरी टीम को ही यहां आना पड़ा। अब अर्थव्‍यवस्‍था को कोई खतरा नहीं है। बच्‍चे भी फिर से परीक्षाओं में व्‍यस्‍त हो गए हैं और उनके अभिभावकों को उनके भविष्‍य का डर अब नहीं सता रहा है। यही प्रतिभावान बच्‍चे कल को हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को और ऊंचाईयों पर ले जाएंगे। इस प्रकार अप्रत्‍यक्ष रूप से हमारे क्रिकेटरों ने देश के लिए जो योगदान दिया है उसे नकारा नहीं जा सकता। हालांकि हमारे शूरमा इतने कायर भी नहीं कि वे हर काम पर्दे के पीछे ही रहकर करें। भई जब अर्थव्‍यवस्‍था प्रगति करेगी, नये उद्योग लगेंगे और उनसे जो उत्‍पाद निकलेंगे, उनको जनता तक पहुंचाने का काम भी किसी को करना पड़ेगा। और वैसे भी आजकल मॉडल्‍स की कमी है। जो हैं वो फिल्‍मों में व्‍यस्‍त हैं। सो क्रिकेटर, जो कि उत्‍पादन से लेकर उपभोक्‍ता तक एक महत्‍वपूर्ण कड़ी हैं, इस आर्थिक प्रक्रिया के चरण में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

क्रिकेट खेलने के कारण खिलाडि़यों का ब‍हुत सा समय यूं ही बर्बाद हो जाता है। इसलिए उन्‍होंने एक नयी नीति को अमल में लाना शुरू किया है। जब भी वे किसी श्रृंखला में खेलेंगे, जल्‍दी से जल्‍दी वहां अपना काम खतम करेंगे(हारेंगे) और वापस अपने काम पर लग जाएंगे। इस नीति का भारत को बहुत राजनयिक लाभ मिलेगा। मन्‍नू भाई बुश से कहेंगे कि आओ भई एक मैत्री क्रिकेट श्रृंखला हो जाए। बुश कहेंगे पहले बताओ मेरा फायदा क्‍या है? मन्‍नू भाई कहेंगे कि फायदा आपका ही आपका है। आप महाशक्ति होकर भी क्रिकेट में कुछ नहीं हैं, हम आपसे मैच हारेंगे और हमें दो-चार श्रृंखला हराने से शायद आपको आई.सी.सी. से मान्‍यता भी मिल जाए। ज्‍यादा हुआ तो हमारे एक-दो खिलाड़ी यदि गलती से अच्‍छा खेले तो आप उन्‍हें ग्रीन कार्ड देकर अपने पास रख लीजिएगा। फिर आप क्रिकेट की भी महाशक्ति हो जाएंगे। इससे हमारे संबंध अमेरिका से और ज्‍यादा प्रगाढ़ होंगे। शायद वो हमसे रक्षा तकनीक समझौता कर ले और आतंकवाद के खिलाफ हमें साझा सहयोगी बना ले। ऐसा न भी करे तो कम से कम चीन की बजाय हमारे यहां अधिक निवेश करने लग जाए।

नीति का एक पहलू यह भी है कि भारत क्रिकेट में कमजोर टीमों से हारेगा तो इससे उन टीमों के मनोबल में वृद्धि होगी और इस प्रकार क्रिकेट में और भी नयी टीमें आयेंगी जो भारत को हराकर शायद टेस्‍ट क्रिकेट खेलने का दर्जा भी पा जायें जो उन्‍हें अन्‍यथा नहीं मिलेगा। इस प्रकार भारत विश्‍व में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। आगे ऐसा भी संभव है कि भारत इन छोटे-छोटे देशों से हारने के एवज में उनसे मुक्‍त व्‍यापार समझौता कर ले और भारत का विदेशी व्‍यापार नयी ऊंचाईयां छूने लगे।

भई संभावनाएं तो बहुत हैं पर जनता कुछ समझ ही नहीं रही है।

4 comments:

Sagar Chand Nahar said...

मजेदार लेख, चलो कोई तो है जिसे दया आई बाकी सब के सब...

हाँ आपके मुहल्‍ले का लल्‍लू पानवाला अपनी धोनी कट स्टाईल को कटवा कर अमरीश पुरी की स्टाईल में दिखा था आज। :)

Pratik said...

वाह, बहुत खूब लिखा है। अगली बार जब बात होगी तो क्रिकेट पर चर्चा करेंगे। :)

अनूप शुक्ला said...

सही लिखा। अच्छा लगा। काश भारतवासी तुम्हारे विचार से सहमत हो पाते। वे तो अगली जीत से ही उछलने लगेंगे।

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

क्षमा करें भुवनेशजी,

आपकी लेखन शैली में गिरावट महसूस हो रही है... आपकी पिछली प्रविष्टियों से तुलना न की जाये तो आपकी यह प्रविष्टि भी लाजवाब हो सकती है। मगर मैं आपकी व्यंग्य शैली में वो कसावट इस पोस्ट में महसूस नहीं कर पाया जो इससे पूर्व की प्रविष्टियों में देखने को मिलती है।

यार एक तो इतना लम्बा-लम्बा टाईम लेकर लिखते हो और ऊपर से उम्मीद जगाकर उससे निम्न दर्जे का।

ज्यादा कान खिंचाई लग रही है तो एक मजेदार पोस्ट लिखो, अगली टिप्पणी में जमकर तारीफ़ कर दूँगा। :)